“एक बिहारी सौ पर भारी” केवल एक नारा नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की मेहनत, संघर्ष और प्रतिभा का प्रतीक माना जाता है
“एक बिहारी सौ पर भारी” केवल एक नारा नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की मेहनत, संघर्ष और प्रतिभा का प्रतीक माना जाता है। देश के बड़े शहरों में मजदूरी से लेकर प्रशासनिक सेवाओं, शिक्षा, आईटी, चिकित्सा और राजनीति तक बिहारी युवाओं ने अपनी पहचान बनाई है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि बिहार आज भारी आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। राज्य पर बढ़ता कर्ज, बेरोजगारी, पलायन और सीमित औद्योगिक विकास कई सवाल खड़े कर रहे हैं। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि बिहार सरकार पर इतना कर्ज हो चुका है कि हर नागरिक पर लगभग 27 हजार रुपये का बोझ बैठता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह स्थिति क्यों बनी, कैसे बनी, कब से बढ़ी और इसका समाधान क्या हो सकता है।
कर्ज की स्थिति आखिर क्या है?
पिछले कुछ वर्षों में बिहार सरकार का कुल कर्ज तेजी से बढ़ा है। 2026 तक राज्य की कुल देनदारियां लगभग 3.70 लाख करोड़ रुपये के आसपास बताई जा रही हैं। राज्य सरकार हर साल विकास योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक खर्चों के लिए कर्ज लेती रही है। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब राजस्व कम हो और खर्च लगातार बढ़ता जाए।
राज्य की आय का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार से मिलने वाले टैक्स हिस्से और अनुदान पर निर्भर है। बिहार की अपनी कमाई सीमित है। उद्योग कम होने के कारण जीएसटी और व्यापारिक करों से पर्याप्त राजस्व नहीं मिल पाता। यही कारण है कि सरकार को योजनाएं चलाने के लिए बार-बार कर्ज लेना पड़ता है।
यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?
1. औद्योगिक विकास की कमी
बिहार में बड़े उद्योगों का अभाव लंबे समय से रहा है। 2000 में झारखंड अलग होने के बाद खनिज संपदा का बड़ा हिस्सा बिहार से अलग हो गया। इससे औद्योगिक आधार कमजोर हुआ। आज भी बिहार में बड़े निवेश सीमित हैं। फैक्ट्री और उद्योग कम होने से रोजगार भी कम पैदा होता है और सरकार को टैक्स से पर्याप्त आय नहीं मिलती।
2. पलायन आधारित अर्थव्यवस्था
बिहार की बड़ी आबादी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है। पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में लाखों बिहारी काम करते हैं। राज्य के भीतर रोजगार के अवसर कम होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो पाती। बाहर कमाने वाले लोग अपने परिवार को पैसे भेजते हैं, लेकिन उससे सरकारी राजस्व बहुत अधिक नहीं बढ़ता।
3. सामाजिक योजनाओं का बढ़ता बोझ
सरकार गरीबों, बुजुर्गों, महिलाओं और छात्रों के लिए कई योजनाएं चलाती है। पेंशन, छात्रवृत्ति, साइकिल योजना, मुफ्त इलाज, राशन और अन्य योजनाओं पर भारी खर्च होता है। सामाजिक दृष्टि से ये योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन जब आय कम और खर्च अधिक हो जाए तो सरकार को कर्ज लेना पड़ता है।
4. प्राकृतिक आपदाएं
बिहार हर साल बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं से जूझता है। कोसी, गंडक और गंगा जैसी नदियां लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। बाढ़ राहत, पुनर्वास और मरम्मत पर सरकार को भारी राशि खर्च करनी पड़ती है। इससे विकास बजट पर दबाव बढ़ता है।
5. जनसंख्या का दबाव
बिहार देश के सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों में है। बड़ी आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार की व्यवस्था करना आसान नहीं है। सीमित संसाधनों में अधिक लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए सरकार को अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है।
यह स्थिति कब से गंभीर हुई?
बिहार में कर्ज की समस्या नई नहीं है, लेकिन पिछले डेढ़ दशक में यह तेजी से बढ़ी है। 2005 के बाद सड़क, पुल और आधारभूत ढांचे पर बड़े पैमाने पर खर्च शुरू हुआ। इससे विकास की गति तो बढ़ी, लेकिन खर्च भी बढ़ा। कोविड-19 महामारी के बाद स्थिति और कठिन हुई। लॉकडाउन के दौरान लाखों मजदूर वापस बिहार लौटे। स्वास्थ्य सेवाओं, राहत कार्यों और रोजगार योजनाओं पर अतिरिक्त खर्च हुआ।
2020 के बाद महंगाई और आर्थिक दबाव के कारण राज्यों की वित्तीय स्थिति कमजोर हुई। बिहार जैसे गरीब राज्य पर इसका असर ज्यादा पड़ा। अब हालात ऐसे हैं कि कई बार कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और सामाजिक योजनाओं के लिए भी कर्ज लेने की नौबत आ जाती है।
क्या केवल बिहार ही कर्ज में है?
नहीं, लगभग सभी राज्य कर्ज लेते हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों पर भी भारी कर्ज है। फर्क सिर्फ इतना है कि विकसित राज्यों की अपनी आय अधिक होती है, इसलिए वे कर्ज संभाल लेते हैं। बिहार की चुनौती यह है कि यहां आय कम और जरूरतें ज्यादा हैं।
“एक बिहारी सौ पर भारी” का वास्तविक अर्थ
यह नारा बिहारी लोगों की क्षमता को दर्शाता है। बिहारी छात्र देश की बड़ी परीक्षाओं में सफल होते हैं। मजदूर देश के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रशासनिक सेवाओं में भी बिहार के युवाओं की मजबूत उपस्थिति है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस प्रतिभा से दूसरे राज्य मजबूत हो रहे हैं, वही प्रतिभा बिहार से बाहर जा रही है।
यदि बिहार में ही उद्योग, शिक्षा और रोजगार का बेहतर माहौल बने तो यही युवा राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। इसलिए यह नारा तभी सार्थक होगा जब बिहार आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बने।
समाधान क्या संभव है?
1. उद्योगों को बढ़ावा
बिहार में उद्योग लगाने के लिए बेहतर नीति, बिजली, सड़क और सुरक्षा की जरूरत है। फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल, कृषि आधारित उद्योग और आईटी सेक्टर में बड़ी संभावनाएं हैं।
2. कृषि सुधार
बिहार कृषि प्रधान राज्य है। यदि आधुनिक खेती, कोल्ड स्टोरेज और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विकसित किए जाएं तो किसानों की आय बढ़ेगी और सरकार को भी राजस्व मिलेगा।
3. शिक्षा और कौशल विकास
केवल डिग्री नहीं, बल्कि तकनीकी और रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान देना होगा। स्किल डेवलपमेंट से युवाओं को स्थानीय रोजगार मिल सकता है।
4. भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची पर नियंत्रण
सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता जरूरी है। यदि भ्रष्टाचार कम हो और योजनाओं का पैसा सही जगह खर्च हो तो कर्ज का बोझ कम किया जा सकता है।
5. स्थानीय रोजगार सृजन
छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देकर गांव और कस्बों में रोजगार पैदा करना होगा ताकि पलायन कम हो।
निष्कर्ष
बिहार का बढ़ता कर्ज केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चुनौती भी है। बिहारी समाज मेहनती और प्रतिभाशाली है, लेकिन राज्य की आर्थिक कमजोरी उस क्षमता को पूरी तरह उभरने नहीं दे रही। यदि सरकार दीर्घकालिक आर्थिक नीति, उद्योग, शिक्षा और रोजगार पर गंभीरता से काम करे तो स्थिति बदल सकती है। “एक बिहारी सौ पर भारी” का नारा तभी वास्तविकता बनेगा जब बिहार केवल श्रम देने वाला राज्य नहीं, बल्कि अवसर और विकास देने वाला राज्य भी बने।
आलोक कुमार