India : “जिसके हाथ में डोई, उसका सब कोई होई”
भारतीय राजनीति में एक पुरानी कहावत अक्सर सुनाई देती है— “जिसके हाथ में डोई, उसका सब कोई होई”। अर्थात जिसके हाथ में सत्ता और संसाधन होते हैं, उसके साथ लोग स्वतः जुड़ने लगते हैं। वर्ष 2014 से 2026 तक का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य इस कहावत को काफी हद तक चरितार्थ करता दिखाई देता है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जिस प्रकार अपने संगठन, रणनीति और राजनीतिक प्रभाव का विस्तार किया, वह स्वतंत्र भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन चुका है। दूसरी ओर कभी पूरे देश की सबसे प्रभावशाली पार्टी रही कांग्रेस लगातार सिकुड़ती गई।
2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता संभाली, तब भाजपा और उसके सहयोगी दल सीमित राज्यों में ही सरकार चला रहे थे। उस समय भाजपा की ताकत मुख्यतः हिंदी पट्टी और कुछ पश्चिमी राज्यों तक सीमित मानी जाती थी। दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में उसकी उपस्थिति कमजोर थी। किंतु अगले बारह वर्षों में पार्टी ने जिस तेजी से अपना विस्तार किया, उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।
मई 2026 तक भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकारें लगभग 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहुंच गईं। यह केवल संख्या का विस्तार नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रभाव, प्रशासनिक नियंत्रण और संगठनात्मक मजबूती का भी संकेत था। भाजपा ने महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में या तो अपने दम पर या गठबंधन के सहारे सत्ता प्राप्त की। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भले वह सरकार न बना सकी, लेकिन वहां मुख्य विपक्ष के रूप में उभरकर उसने कांग्रेस और वाम दलों की जमीन लगभग समाप्त कर दी।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की सफलता केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं थी, बल्कि सत्ता और संगठन के समन्वय का उदाहरण भी थी। केंद्र में मजबूत सरकार होने का लाभ राज्यों में चुनावों के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, केंद्र सरकार की योजनाओं का प्रचार, सोशल मीडिया का आक्रामक उपयोग और विपक्ष की कमजोरी ने भाजपा को लगातार बढ़त दिलाई।
भाजपा ने अपने विस्तार के लिए केवल वैचारिक राजनीति पर निर्भरता नहीं रखी, बल्कि सामाजिक समीकरणों को भी नए तरीके से साधा। पिछड़े वर्ग, दलित, महिलाएं और युवा मतदाताओं को जोड़ने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किए गए। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, मुफ्त राशन, आयुष्मान भारत और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने गरीब तबकों में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाई। यही कारण है कि पार्टी केवल शहरी मध्यवर्ग की पार्टी न रहकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत होती चली गई।
दूसरी ओर कांग्रेस का लगातार कमजोर होना भारतीय राजनीति की बड़ी कहानी बन गया। आजादी के बाद दशकों तक देश पर शासन करने वाली कांग्रेस 2014 के बाद लगातार संकट में दिखाई दी। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व को लेकर असमंजस, क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव और लगातार चुनावी हार ने पार्टी को कमजोर किया। कई राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और जहां सत्ता में रही भी, वहां आंतरिक कलह से जूझती रही।कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि वह भाजपा के सामने एक वैकल्पिक राष्ट्रीय दृष्टि प्रस्तुत नहीं कर सकी। भाजपा जहां राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और विकास को केंद्र में रखकर राजनीति कर रही थी, वहीं कांग्रेस अपनी रणनीति को लेकर स्पष्ट नहीं दिखी। कई बार ऐसा लगा कि पार्टी केवल भाजपा विरोध तक सीमित होकर रह गई है। परिणामस्वरूप मतदाताओं का भरोसा धीरे-धीरे कम होता गया।
हालांकि यह भी सच है कि लोकतंत्र में किसी एक दल का अत्यधिक विस्तार कई सवाल भी खड़े करता है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि केंद्र की सत्ता का उपयोग राज्यों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए किया गया। कई विपक्षी नेताओं ने जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने और विधायकों की खरीद-फरोख्त जैसे आरोप लगाए। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में सरकारों के गिरने के बाद यह बहस और तेज हुई कि क्या भारतीय राजनीति में सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ रहा है।
भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती रही है कि उसकी सफलता जनता के विश्वास और संगठन की मेहनत का परिणाम है। पार्टी का दावा है कि उसने विकास, सुशासन और मजबूत नेतृत्व के आधार पर जनता का समर्थन प्राप्त किया है। भाजपा यह भी कहती है कि कांग्रेस की कमजोरी के लिए स्वयं कांग्रेस जिम्मेदार है, क्योंकि वह समय के साथ खुद को बदल नहीं सकी।
भारतीय राजनीति में यह परिवर्तन केवल दलों की संख्या का खेल नहीं है, बल्कि वैचारिक बदलाव का भी संकेत है। 2014 के बाद राजनीति अधिक व्यक्तित्व आधारित होती गई, जिसमें नरेंद्र मोदी केंद्र बिंदु बन गए। चुनाव स्थानीय मुद्दों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय नेतृत्व के नाम पर लड़े जाने लगे। भाजपा ने चुनावी मशीनरी, आईटी सेल, बूथ प्रबंधन और प्रचार के आधुनिक तरीकों का प्रभावी उपयोग किया।
इसके विपरीत विपक्ष बिखरा हुआ नजर आया। कई क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों तक सीमित रहे। विपक्षी एकता की कोशिशें हुईं, लेकिन नेतृत्व और रणनीति के सवालों पर मतभेद सामने आते रहे। यही कारण रहा कि भाजपा के सामने कोई मजबूत राष्ट्रीय चुनौती नहीं बन सकी।
फिर भी लोकतंत्र का स्वभाव परिवर्तनशील होता है। भारतीय राजनीति में जनता अंतिम निर्णायक होती है। इतिहास गवाह है कि देश में कोई भी राजनीतिक दल स्थायी रूप से अजेय नहीं रहा। कांग्रेस भी कभी अजेय मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ उसकी स्थिति बदल गई। उसी प्रकार भाजपा के सामने भी भविष्य में नई चुनौतियां आ सकती हैं। बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक तनाव और क्षेत्रीय असंतोष जैसे मुद्दे भविष्य की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
2014 से 2026 तक की राजनीति यह जरूर दिखाती है कि सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल अपने प्रभाव को बढ़ाने का हर संभव प्रयास करते हैं। भाजपा ने इस अवधि में अभूतपूर्व विस्तार किया, जबकि कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई। यह दौर भारतीय लोकतंत्र में शक्ति संतुलन के बदलते स्वरूप का प्रतीक बन चुका है। अंततः लोकतंत्र में जनता का विश्वास ही किसी दल की सबसे बड़ी ताकत होता है, और वही तय करती है कि किसके हाथ में “डोई” रहेगी और कब तक रहेगी।
आलोक कुमार
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