दावा किया जा रहा है कि राहुल गांधी ने पिछले 22 वर्षों में 54 विदेश यात्राएं कीं और इन पर लगभग 60 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह आंकड़ा मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और समर्थकों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। कहा जाता है कि यह “bottom-up estimation” यानी अनुमानित गणना पर आधारित है। इन यात्राओं को निजी या पारिवारिक दौरे बताया जाता है। हालांकि, इन खर्चों का कोई आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, क्योंकि राहुल गांधी सरकार का हिस्सा नहीं रहे और उनकी यात्राएं सरकारी विदेश नीति मिशन का हिस्सा नहीं थीं।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों पर 2014 से 2026 तक लगभग 762 करोड़ से 800 करोड़ रुपये तक खर्च होने की बात सामने आई है। यह जानकारी विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए जवाबों और मीडिया रिपोर्टों में दर्ज है। इन खर्चों में सुरक्षा व्यवस्था, विशेष विमान, प्रतिनिधिमंडल, मीडिया टीम, होटल, स्थानीय परिवहन और कूटनीतिक व्यवस्थाएं शामिल होती हैं। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं किसी निजी उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि भारत की विदेश नीति, व्यापार, रणनीतिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए होती हैं।
यहीं सबसे बड़ा अंतर पैदा होता है। राहुल गांधी की यात्राओं को यदि निजी माना जाए और मोदी की यात्राओं को सरकारी जिम्मेदारी का हिस्सा, तो दोनों की तुलना सीधी नहीं हो सकती। यह वैसा ही है जैसे किसी निजी व्यक्ति की विदेश यात्रा की तुलना किसी राष्ट्राध्यक्ष के आधिकारिक वैश्विक मिशन से करना। प्रधानमंत्री जब विदेश जाते हैं तो उनके साथ कई मंत्रालयों के अधिकारी, सुरक्षा एजेंसियां, उद्योग प्रतिनिधि और मीडिया दल भी शामिल होते हैं। इसलिए खर्च स्वाभाविक रूप से अधिक होता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल में लगभग 99 विदेश यात्राएं की हैं और करीब 79 देशों का दौरा किया है। इन दौरों में G20 शिखर सम्मेलन, Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD बैठकें, संयुक्त राष्ट्र महासभा, द्विपक्षीय समझौते और व्यापारिक सम्मेलन शामिल रहे हैं। भारत की विदेश नीति को आक्रामक और सक्रिय बनाने में इन दौरों की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। सरकार का तर्क है कि इन यात्राओं के जरिए भारत को निवेश, रक्षा साझेदारी, तकनीकी सहयोग और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने में मदद मिली।
विपक्ष हालांकि इस खर्च पर सवाल उठाता रहा है। आलोचकों का कहना है कि विदेश यात्राओं की संख्या बहुत अधिक रही है और इन पर खर्च होने वाला पैसा टैक्सपेयर्स के धन से आता है। कुछ लोग यह भी पूछते हैं कि क्या हर यात्रा का प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ देश को मिला। वहीं समर्थकों का तर्क है कि वैश्विक राजनीति में मजबूत उपस्थिति बनाए रखने के लिए सक्रिय कूटनीति जरूरी है और बड़े देशों के नेताओं के विदेश दौरों पर भारी खर्च सामान्य बात है।
राहुल गांधी की विदेश यात्राओं को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी रहते हैं। भाजपा अक्सर सवाल उठाती है कि उनकी यात्राओं का उद्देश्य क्या था, खर्च किसने उठाया और कई बार महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं के दौरान वे विदेश क्यों चले जाते थे। कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताती है और कहती है कि किसी भी नागरिक या नेता को निजी यात्रा का अधिकार है। कांग्रेस यह भी कहती है कि राहुल गांधी की यात्राओं को लेकर जो आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, वे प्रमाणित सरकारी डेटा नहीं हैं।यदि औसत खर्च का हिसाब लगाया जाए तो राहुल गांधी की कथित विदेश यात्राओं पर लगभग 2.7 करोड़ रुपये प्रति वर्ष का अनुमान निकलता है, जबकि प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों पर औसतन 70 से 80 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च बताए जाते हैं। लेकिन यह तुलना केवल संख्यात्मक है, वास्तविक परिस्थितियों में दोनों की प्रकृति अलग है। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में विशेष विमान, SPG सुरक्षा, उच्च स्तरीय प्रोटोकॉल और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति शामिल होती है। इसलिए खर्च का स्तर भी अलग होना स्वाभाविक है।
भारत जैसे लोकतंत्र में सार्वजनिक धन के उपयोग पर सवाल उठाना गलत नहीं है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार किस मद में कितना खर्च कर रही है। इसी कारण संसद में विदेश मंत्रालय समय-समय पर प्रधानमंत्री के विदेश दौरों का खर्च बताता है। पारदर्शिता लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। दूसरी ओर निजी यात्राओं को लेकर राजनीतिक बयानबाजी अक्सर चुनावी रणनीति का हिस्सा बन जाती है।
अंततः यह समझना जरूरी है कि दोनों मामलों की तुलना “apples-to-oranges” यानी दो बिल्कुल अलग प्रकृति की चीजों की तुलना जैसी है। एक तरफ निजी या व्यक्तिगत यात्राओं के अनुमानित खर्च हैं, दूसरी ओर एक प्रधानमंत्री के आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय मिशन। इसलिए केवल आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। असली बहस इस बात पर होनी चाहिए कि विदेश यात्राओं से देश को क्या लाभ मिला, विदेश नीति कितनी मजबूत हुई और जनता के पैसे का उपयोग कितना प्रभावी ढंग से किया गया।
आलोक कुमार