Jharkhand : रांची के कोकर स्थित डॉन बॉस्को चर्च से जुड़ा गेट विवाद
रांची के कोकर स्थित डॉन बॉस्को चर्च से जुड़ा गेट विवाद अब केवल एक जमीन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक अधिकार, निजी संपत्ति, धार्मिक संस्थानों की गरिमा और आम लोगों की भावनाओं से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। चर्च प्रबंधन और स्थानीय ईसाई समुदाय का आरोप है कि नगर निगम के अधिकारी एक प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में आकर चर्च की निजी जमीन को “आम रास्ता” घोषित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि इस जमीन के स्वामित्व से जुड़े सभी वैध दस्तावेज चर्च के पास मौजूद हैं।
इस विवाद के केंद्र में जॉर्ज कुजूर नामक व्यक्ति का नाम सामने आया है। चर्च प्रबंधन का कहना है कि जॉर्ज कुजूर ने चर्च की निजी जमीन को सार्वजनिक रास्ता बताकर प्रशासन पर दबाव बनाया। आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि सरकारी रसूख और आर्थिक प्रभाव के कारण नगर निगम के कुछ अधिकारी निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी निजी धार्मिक संस्था की जमीन को इस प्रकार जबरन सार्वजनिक घोषित किया जाने लगे, तो भविष्य में किसी भी संस्था की संपत्ति सुरक्षित नहीं रह जाएगी।
मामला उस समय और गंभीर हो गया जब रांची नगर निगम की टीम पुलिस बल और जेसीबी मशीन के साथ चर्च परिसर पहुंची और गेट हटाने की कार्रवाई करने लगी। इससे पहले भी निगम द्वारा चर्च के पिछले गेट को उखाड़ा गया था। हाल के दिनों में फिर से गेट तोड़ने का प्रयास हुआ, जिसका स्थानीय ईसाई समुदाय ने कड़ा विरोध किया। बड़ी संख्या में लोग चर्च परिसर के बाहर जमा हो गए और प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई।
चर्च प्रबंधन का कहना है कि यह रास्ता मूल रूप से चर्च की निजी संपत्ति का हिस्सा है। चर्च के अधिकारियों ने मानवता और सामाजिक सहयोग की भावना से स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए पिछले गेट को खोल दिया था ताकि लोगों को आवाजाही में परेशानी न हो। लेकिन अब उसी सुविधा को आधार बनाकर प्रशासन इस रास्ते को सार्वजनिक घोषित करने की कोशिश कर रहा है। चर्च से जुड़े लोगों का कहना है कि सद्भावना में दिया गया रास्ता अब विवाद का कारण बना दिया गया है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमीन की नापी में संबंधित जमीन चर्च की निजी संपत्ति पाई गई है। चर्च प्रबंधन का दावा है कि उनके पास जमीन के मालिकाना हक से जुड़े सभी वैध दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद नगर निगम द्वारा लगातार दबाव बनाना कई सवाल खड़े करता है। यदि सरकारी सर्वेक्षण में जमीन निजी पाई गई है, तो फिर प्रशासन किस आधार पर इसे आम रास्ता बता रहा है? यही सवाल अब स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
स्थानीय ईसाई धर्मावलंबियों का मानना है कि यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि धार्मिक स्थल की गरिमा से जुड़ा मामला भी है। उनका कहना है कि किसी चर्च के गेट को बुलडोजर से तोड़ने की कोशिश लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती है। कई लोगों ने इसे प्रशासनिक मनमानी और शक्ति प्रदर्शन का उदाहरण बताया है। चर्च से जुड़े वरिष्ठ लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन को कोई आपत्ति थी, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत समाधान निकालना चाहिए था, न कि जेसीबी और पुलिस बल के सहारे कार्रवाई करनी चाहिए थी।
नगर निगम का पक्ष इससे अलग है। निगम अधिकारियों का कहना है कि जिस रास्ते पर चर्च का पिछला गेट खुलता है, वह आम जनता के उपयोग का रास्ता है और वहां किसी प्रकार का अवरोध हटाना प्रशासन का कर्तव्य है। निगम का तर्क है कि वे केवल सार्वजनिक मार्ग को मुक्त कराने की कार्रवाई कर रहे हैं। हालांकि, चर्च प्रबंधन इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रहा है और इसे तथ्यों के विपरीत बता रहा है।
इस विवाद ने रांची शहर में प्रशासन और धार्मिक संस्थाओं के संबंधों पर भी बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि यदि किसी विवादित जमीन का मामला है, तो उसका समाधान अदालत या सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। सीधे बुलडोजर कार्रवाई से तनाव और अविश्वास बढ़ता है। झारखंड में पहले भी कई भूमि विवादों में अदालतों ने प्रशासनिक कार्रवाई पर रोक लगाई है, जब मापी और दस्तावेजों में खामियां पाई गईं। इसलिए चर्च प्रबंधन भी अब कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार चर्च प्रबंधन झारखंड उच्च न्यायालय या संबंधित न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाने पर विचार कर रहा है। उनका उद्देश्य प्रशासनिक कार्रवाई पर रोक लगवाना और जमीन के मालिकाना हक को कानूनी रूप से सुरक्षित करना है। दूसरी ओर नगर निगम ने संकेत दिया है कि शहर में सार्वजनिक रास्तों से अतिक्रमण हटाने का अभियान जारी रहेगा।
फिलहाल यह विवाद केवल एक गेट या रास्ते का नहीं रह गया है। यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, धार्मिक संस्थाओं के अधिकार, निजी संपत्ति की सुरक्षा और कानून के निष्पक्ष उपयोग की परीक्षा बन चुका है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि अदालत, प्रशासन और समाज इस संवेदनशील विवाद का समाधान किस प्रकार निकालते हैं।
आलोक कुमार
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