भारतीय क्रिकेट का भविष्य अब नए और दृढ़ खिलाड़ियों के हाथों में

 ध्रुव जुरेल — भारतीय क्रिकेट का नया भरोसा

पटना.भारत ‘ए’ और दक्षिण अफ्रीका ‘ए’ के बीच जारी अनौपचारिक टेस्ट ने भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को मिश्रित भावनाओं का अनुभव कराया. जहां एक ओर ध्रुव जुरेल के बल्ले से लगातार दो शतक निकलने ने उम्मीदों को नई उड़ान दी, वहीं अभिमन्यु ईश्वरन का दोनों पारियों में शून्य पर आउट होना निराशाजनक रहा. मगर इस मुकाबले ने एक बात साफ कर दी — भारतीय क्रिकेट का भविष्य अब नए और दृढ़ खिलाड़ियों के हाथों में है, और उस सूची में सबसे ऊपर नाम है ध्रुव जुरेल का.   ध्रुव जुरेल का यह प्रदर्शन किसी संयोग का परिणाम नहीं है.यह एक युवा क्रिकेटर के धैर्य, अनुशासन और निरंतर परिश्रम का प्रमाण है.उन्होंने पहली पारी में नाबाद 132 रन और दूसरी पारी में नाबाद 127 रन बनाकर न सिर्फ मैच को भारत ‘ए’ के पक्ष में मोड़ा, बल्कि यह भी साबित किया कि वह लंबे प्रारूप के लिए बने हैं. नमन ओझा के बाद वह भारत ‘ए’ के लिए दोनों पारियों में शतक जमाने वाले सिर्फ दूसरे खिलाड़ी बने हैं — यह उपलब्धि अपने आप में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है.

    साल 2001 में आगरा में जन्मे इस युवा विकेटकीपर-बल्लेबाज ने अंडर-19 वर्ल्ड कप 2020 में उप-कप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाई थी. घरेलू क्रिकेट में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने जल्द ही खुद को एक भरोसेमंद खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया.2022 में रणजी ट्रॉफी डेब्यू और नागालैंड के खिलाफ 249 रनों की पारी उनके प्रतिभा के शुरुआती संकेत थे.आज, उनके नाम 30 प्रथम श्रेणी मैचों में 51 से अधिक के औसत से लगभग 1,900 रन दर्ज हैं — एक शानदार उपलब्धि.

     इंडियन प्रीमियर लीग में राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलते हुए भी उन्होंने सीमित ओवरों के खेल में अपनी उपयोगिता सिद्ध की. 2023 में आईपीएल डेब्यू के साथ ही 172.73 के स्ट्राइक रेट ने उन्हें चर्चा में ला दिया. इसके बाद 2024 में टेस्ट डेब्यू करते हुए इंग्लैंड के खिलाफ राजकोट और रांची में शानदार पारियां खेलीं. रांची टेस्ट में 90 और 39 रनों की पारी ने भारत को जीत दिलाई और उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच का सम्मान भी मिला.जुरेल की बल्लेबाजी में सबसे उल्लेखनीय पहलू है उनकी परिस्थिति को समझने की परिपक्वता। वह न तो जल्दबाजी करते हैं और न ही रक्षात्मक रवैया अपनाते हैं — बल्कि ज़रूरत के अनुसार खेल की गति तय करते हैं.

     यह गुण उन्हें आने वाले समय में भारतीय टेस्ट टीम का स्थायी हिस्सा बना सकता है.आज जब भारतीय क्रिकेट टीम में बदलाव की नई लहर चल रही है, ध्रुव जुरेल जैसे खिलाड़ी ही उस स्थिरता और संतुलन के प्रतीक बन सकते हैं, जिसकी टेस्ट टीम को आवश्यकता है. उनकी ताज़ा उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत के पास ऋषभ पंत के बाद भी विकेटकीपिंग विभाग में भविष्य सुरक्षित है.ध्रुव जुरेल की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता — निरंतरता ही असली पूंजी है.आगरा से शुरू हुई यह यात्रा अब भारतीय क्रिकेट के भविष्य की रेखाओं को आकार दे रही है। और शायद यही वह क्षण है जब हम निश्चिंत होकर कह सकते हैं — भारतीय टेस्ट क्रिकेट को उसका अगला ध्रुव मिल गया है.


आलोक कुमार


<span style="background-color: #e9eef6; color: #1f1f1f; font-family: &quot;Google Sans&quot;, Roboto, Arial, sans-serif; font-size: 14px;">&gt;AdSense&lt;https://chingariprimenews.blogspot.com/&lt;</span>




<span style="background-color: #e9eef6; color: #1f1f1f; font-family: &quot;Google Sans&quot;, Roboto, Arial, sans-serif; font-size: 14px;">&gt;AdSense&lt;https://chingariprimenews.blogspot.com/&lt;</span>


इतिहास का वह स्वर्ण क्षण

 

पटना.वर्ष 2025 भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज होने जा रहा है. यह वह वर्ष है जब भारत का राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है — एक ऐसा गीत जिसने न केवल भारत की स्वतंत्रता की ललकार दी, बल्कि देशभक्ति की भावना को भी अमर बना दिया.बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत आज भी भारत की आत्मा में उसी तीव्रता से गूंजता है, जैसे आजादी के रण में गूंजा था.

इतिहास का वह स्वर्ण क्षण

अक्षय नवमी, 7 नवंबर 1875 — बंगाल के साहित्यिक आकाश पर यह दिन सदा-सदा के लिए अमर हो गया. इसी दिन बंकिम चंद्र चटर्जी ने “वंदे मातरम” की रचना की. यह गीत पहली बार उनकी साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ और बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना.इस उपन्यास के माध्यम से बंकिम चंद्र ने भारत माता की आराधना को राष्ट्रवाद की भावना से जोड़ा, जिससे यह गीत मात्र शब्द न रहकर क्रांति का प्रतीक बन गया.

“वंदे मातरम” शब्दों का शाब्दिक अर्थ है — “मैं मातृभूमि को नमन करता हूँ”.

संस्कृत का “वंदे” यानी नमन करना और “मातरम” यानी माता.यह मातृभूमि के प्रति भक्ति, सम्मान और समर्पण का ऐसा गीत है जिसने हर भारतीय को अपनी मिट्टी से जोड़ दिया.

पहली सार्वजनिक गूंज

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार “वंदे मातरम” सार्वजनिक रूप से गाया गया.65 सेकंड (1 मिनट 5 सेकंड) के इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों के दिलों में जोश भर दिया. यह केवल गीत नहीं, बल्कि एक नारा बन गया — “वंदे मातरम” की गूंज सुनते ही स्वतंत्रता सेनानियों की नसों में रक्त नहीं, बिजली दौड़ जाती थी.

2025: 150 वर्षों का गौरव

अब, जब इसकी रचना के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, पूरा देश “वंदे मातरम स्मरणोत्सव” मना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्षव्यापी कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि “यह गीत भारत की आत्मा का स्वर है, जो हर पीढ़ी को राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देता रहेगा.”इस अवसर पर सरकार ने एक विशेष डाक टिकट जारी किया है.देशभर के स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में सामूहिक गायन, विचार गोष्ठियों और प्रदर्शनी कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है.

गीत का भावार्थ और सांस्कृतिक अर्थ

“वंदे मातरम” की हर पंक्ति भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक गौरव और आध्यात्मिक एकता का बखान करती है—

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,

शस्यश्यामलां मातरम्.

यह भारत माता की उस धरती का वर्णन है जो जल से समृद्ध है, अन्न से परिपूर्ण है, और जिसकी हवाएँ शीतल मलय बयार सी हैं.बंकिम चंद्र ने भारत को एक जीवंत देवी स्वरूपा के रूप में चित्रित किया — जो करुणा, शक्ति और सौंदर्य की मूर्ति है.

स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्रोत

ब्रिटिश शासन के समय “वंदे मातरम” ने देशभक्ति की ऐसी लहर जगाई कि इसे क्रांतिकारियों का युद्ध नाद कहा जाने लगा.लाठी, गोली और जेल के बीच भी “वंदे मातरम” की आवाज दबाई नहीं जा सकी। इसे गाने मात्र से हजारों युवाओं ने आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

आज के भारत में ‘वंदे मातरम’ का अर्थ

आज जब भारत विश्व मंच पर अपनी पहचान नए आत्मविश्वास के साथ बना रहा है, “वंदे मातरम” हमें याद दिलाता है कि यह मिट्टी केवल भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और पहचान का प्रतीक है.स्कूलों की असेंबली में, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोहों में, या खेल के मैदानों में जब यह गीत गूंजता है — तो हर भारतीय की रगों में गर्व की लहर दौड़ जाती है.

समान विचार

150 वर्षों के बाद भी “वंदे मातरम” उतना ही जीवंत, उतना ही प्रभावशाली है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि सच्ची देशभक्ति नारे में नहीं, बल्कि मातृभूमि की सेवा में है.“वंदे मातरम” केवल एक राष्ट्रगान नहीं, यह भारत की आत्मा का अनंत स्वर है — जो हमें बार-बार झुकने, नमन करने और अपनी मिट्टी को प्रणाम करने की प्रेरणा देता है. वंदे मातरम — यह भारत का शाश्वत प्रणाम है.

आलोक कुमार


https://adsense.google.com/adsense/u/0/pub-4394035046473735/myads/sites/preview?url=chingariprimenews.blogspot.com

पहले फेज में कुल 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई


 पटना.बिहार विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण में कुल 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर 6 नवंबर को वोट डाले गए. बिहार विधानसभा चुनाव के पहले फेज में कुल 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई. पहले चरण में 121 सीटों पर 64.66 फीसदी मतदान दर्ज किया गया.

       राजधानी पटना (14 सीटें), भोजपुर (7 सीटें), बक्सर (4 सीटें) , गोपालगंज (6 सीटें) ,सिवान (8 सीटें) ,सारण (10 सीटें) ,मुजफ्फरपुर (11 सीटें) ,वैशाली (8 सीटें) ,दरभंगा (10 सीटें) ,समस्तीपुर (10 सीटें) ,मधेपुरा (4 सीटें) ,सहरसा (4 सीटें) ,खगड़िया (4 सीटें) ,बेगूसराय (7 सीटें) ,मुंगेर (3 सीटें) ,लखीसराय (2 सीटें) ,शेखपुरा (2 सीटें) और नालंदा (7 सीटें) पर शांतिपूर्ण मतदान हुआ.

  यहां के विधानभा में चुनाव आलमनगर, बिहारीगंज, सिंघेश्वर, मधेपुरा, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिशी, कुशेश्वर स्थान, गौड़ाबौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, केवटी, जाले, गायघाट , औराई, मीनापुर, बोचहां, सकरा, कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, कांटी, बरुराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट, भोरे, हथुआ, सिवान, जीरादेई, दरौली, रघुनाथपुर, दरौंदा, बड़हरिया, गोरेयाकोठी, महाराजगंज, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा, अमनौर, परसा, सोनपुर, हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, महुआ, राजा पाकार, राघोपुर, महनार, पातेपुर, कल्याणपुर, वारिसनगर, समस्तीपुर, उजियारपुर, मोरवा, सरायरंजन, मोहिउद्दीननगर, विभूतिपुर, रोसड़ा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी, अलौली, खगड़िया, बेलदौर,परबत्ता, तारापुर, मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, शेखपुरा, बरबीघा, अस्थावां, बिहार शरीफ, राजगीर, इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, हरनौत, मोकामा, बाढ़, बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा, दानापुर, मनेर, फुलवारी, मसौढ़ी, पालीगंज, बिक्रम, संदेश, बड़हरा, आरा, अगिआंव, तरारी, जगदीशपुर, शाहपुर, ब्रह्मपुर, बक्सर, डुमरांव और राजपुर.हुआ.

  पटना जिला (औसतन 55.02 फीसदी वोटिंग).मोकामा-62.16%, बाढ़-59.56%, बख्तियारपुर-62.55%, दीघा-39.10%,बांकीपुर-40.00%,कुम्हरार-39.52%.,साहिब-58.51%,फतुहा-59.32%,दानापुर-55.27%,मनेर-58.12%, फुलवारीशरीफ-62.14%,मसौढ़ी-59.91%, पालीगंज-63.20% और बिक्रम-66.95% मतदान दर्ज किया गया.

  जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिलाधिकारी, पटना एवं वरीय पुलिस अधीक्षक, पटना द्वारा बिहार विधान सभा आम निर्वाचन, 2025 के आलोक में 6 नवम्बर को मतदान की समाप्ति के पश्चात प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को संबोधित किया गया.मतदान की पूर्णतः शांतिपूर्ण समाप्ति एवं विगत चुनावों की तुलना में मतदान प्रतिशत में अच्छी वृद्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए पटना जिला के सभी निर्वाचकों-निवासियों, अधिकारियों, मीडिया बंधुओं, सिविल सोसाइटी के सदस्यों सहित सभी स्टेकहोल्डर्स के प्रति आभार व्यक्त किया गया.


आलोक कुमार


<p>&nbsp;<a href="https://support.google.com/adsense/answer/9274516" rel="noopener" style="background-color: white; color: #0b57d0; font-family: &quot;Google Sans Text&quot;, Roboto, &quot;Helvetica Neue&quot;, Helvetica, sans-serif, &quot;Noto Color Emoji&quot;; font-size: 16px; letter-spacing: 0.08px; text-decoration-line: none;">&nbsp;AdSense ad code</a></p>

पश्चिम चम्पारण जिले के प्रत्येक मतदाता 11 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करे : जिला निर्वाचन पदाधिकारी


 शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को लेकर पश्चिम चम्पारण में जागरूकता की नई लहर.जिला निर्वाचन पदाधिकारी के दिशा-निर्देश में लगातार आयोजित किए जा रहे हैं मतदाता जागरूकता कार्यक्रम.महिला और युवा मतदाताओं पर दिया जा रहा है विशेष ध्यान......

बेतिया.बिहार विधान सभा आम निर्वाचन-2025 के अवसर पर पश्चिम चम्पारण जिला प्रशासन द्वारा शत-प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मतदाता जागरूकता अभियान को व्यापक स्तर पर चलाया जा रहा है.इसके तहत स्वीप कोषांग द्वारा जिला मुख्यालय से लेकर पंचायत एवं ग्राम स्तर तक निरंतर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.

       नोडल पदाधिकारी, जिला स्वीप कोषांग, श्रीमती नगमा तबस्सुम ने बताया कि ये सभी गतिविधियाँ जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिला पदाधिकारी, श्री धर्मेन्द्र कुमार के दिशा-निर्देश एवं मार्गदर्शन में संचालित की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि स्वीप अभियान के तहत जिले के विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों के सहयोग से रैलियाँ, जागरूकता मार्च, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर प्रतियोगिता, वॉल पेंटिंग, साइकिल रैली, और हस्ताक्षर अभियान जैसे आयोजन लगातार किए जा रहे हैं.

           उन्होंने बताया कि जिले के सभी विभागों, कार्यालयों एवं कर्मियों का सक्रिय सहयोग इस अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इसके साथ ही कई स्वयंसेवी संस्थाएँ, सामाजिक संगठन, एनएसएस, एनसीसी कैडेट्स, स्काउट एंड गाइड्स तथा स्थानीय कलाकार भी मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं.

       उन्होंने बताया कि मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों में विशेष रूप से महिला मतदाताओं, युवा मतदाताओं और प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं पर फोकस किया जा रहा है. इसके लिए स्कूल-कॉलेजों और ग्राम पंचायत स्तर पर विशेष संवाद एवं जनसंपर्क कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं.

           जिला निर्वाचन पदाधिकारी श्री धर्मेन्द्र कुमार ने कहा कि मतदान लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है. हमारा लक्ष्य है कि पश्चिम चम्पारण जिले का प्रत्येक मतदाता 11 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करे और शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त किया जाए.

आलोक कुमार

<p>&nbsp;<a href="https://support.google.com/adsense/answer/9274516" rel="noopener" style="background-color: white; color: #0b57d0; font-family: &quot;Google Sans Text&quot;, Roboto, &quot;Helvetica Neue&quot;, Helvetica, sans-serif, &quot;Noto Color Emoji&quot;; font-size: 16px; letter-spacing: 0.08px; text-decoration-line: none;">&nbsp;AdSense ad code</a></p>

“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”

 


“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”

पूर्णिया का अस्पताल, आईसीयू के बिना — वादों और उद्घाटनों के बीच दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था

पूर्णिया. बिहार के पूर्वोत्तर का प्रमुख जिला, जहाँ अब गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GMCH) की स्थापना को विकास की दिशा में मील का पत्थर बताया गया था, आज भी सबसे बुनियादी सुविधा — आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) — से वंचित है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है जो आंकड़ों और उद्घाटनों में तो आगे है, पर जमीन पर अब भी जर्जर है.

वादों की फेहरिस्त, हकीकत में सन्नाटा

पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की नींव 2019 में रखी गई थी. मशीनें खरीदी गईं, बेड लगाए गए, लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ की कमी ने पूरे प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. अब, नवंबर 2025 तक, वही हालात हैं — मशीनें धूल खा रही हैं और मरीजों को रेफर करने का सिलसिला जारी है. हर दिन औसतन आठ गंभीर मरीजों को भागलपुर, सिलीगुड़ी या पटना भेजा जाता है, जिनमें से कई रास्ते में दम तोड़ देते हैं.नई बिल्डिंग में 30 बेड का अत्याधुनिक आईसीयू निर्माणाधीन है, पर यह निर्माण वर्षों से अधूरा है. विडंबना यह है कि इस बीच ट्रॉमा सेंटर का छह बार उद्घाटन हो चुका है — हर बार नई तारीख, नया नेता और नई घोषणा; लेकिन मरीजों के लिए अब भी कोई बदलाव नहीं.

ढांचा है, सिस्टम नहीं

अस्पताल में उपकरण हैं, जगह है, और अब तो मेडिकल कॉलेज का दर्जा भी है, लेकिन संचालन के लिए डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों की भारी कमी है.रिपोर्टों के अनुसार, बीएमएसआईसीएल और अस्पताल प्रशासन के बीच आईसीयू की लोकेशन को लेकर विवाद ने स्थिति और बिगाड़ दी.कहा गया कि प्रस्तावित जगह अस्पताल से थोड़ी दूरी पर है, इसलिए निर्माण एजेंसी ने हाथ खींच लिया. परिणामस्वरूप, न तो पुराना आईसीयू चला और न नया बन पाया. यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन और जवाबदेही की अनुपस्थिति का परिणाम है. जब स्वास्थ्य व्यवस्था “कागज़ी अस्पतालों” तक सिमट जाए, तो मरीजों के लिए अस्पताल का नाम सिर्फ एक रेफरल सेंटर बन जाता है.

सिस्टम का मौन और जनता की विवशता

पूर्णिया सदर अस्पताल का आईसीयू वर्षों से बंद है, लेकिन किसी स्तर पर कोई जवाबदेही तय नहीं हुई. प्रशासन की ओर से हर बार वही बयान — “स्टाफ की कमी है, जल्द समाधान होगा.” लेकिन “जल्द” का यह वादा अब छह साल पुराना हो चुका है. इस बीच न जाने कितनी जानें गईं, कितने परिवार उम्मीदों के साथ अस्पताल पहुंचे और निराश होकर लौट गए.स्वास्थ्य सेवा का अर्थ केवल भवन और उपकरण नहीं होता; उसका अर्थ होता है प्रशिक्षित हाथों में जीवन की सुरक्षा. जब सरकार और विभाग उस मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं, तो परिणाम यही होता है — एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल, लेकिन आईसीयू के बिना.

आवश्यक है जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई

अब समय आ गया है कि सरकार इस संकट को केवल “विकासाधीन” कहकर टालने की बजाय, इसे मानव जीवन से जुड़ा आपात मामला माने.

तुरंत प्रशिक्षित स्टाफ की नियुक्ति की जाए,

निर्माणाधीन आईसीयू को प्राथमिकता से पूरा किया जाए,

और यह सुनिश्चित किया जाए कि उपकरण और भवन केवल दिखावा न रहें, बल्कि वास्तव में काम करें.

पूर्णिया का अस्पताल अब “उद्घाटन” नहीं, “उपचार” चाहता है। यह वह समय है जब स्वास्थ्य व्यवस्था को राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, मानवता और जिम्मेदारी से संचालित होने की आवश्यकता है.

आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...