“जान है तो जहान—सुरक्षित बचपन, मजबूत भारत”

 “जान है तो जहान—सुरक्षित बचपन, मजबूत भारत”


“टीकाकरण और जागरूकता से बदल रही है बच्चों की दुनिया”

रिपोर्टः आलोक कुमार


“जान है तो जहान” — तब जाकर भारत बनेगा महान

“जान है तो जहान” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दर्शन है। जब तक देश के बच्चे सुरक्षित, स्वस्थ और जीवित नहीं रहेंगे, तब तक किसी भी विकास का दावा अधूरा ही रहेगा। यही कारण है कि आज भारत सरकार और अनेक गैर-सरकारी संस्थाएं बाल स्वास्थ्य, टीकाकरण और बाल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही हैं।

पिछले तीन दशकों में भारत ने बाल मृत्यु दर को कम करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। 1990 से 2024 के बीच 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) में लगभग 79% की गिरावट आई है—यह 127 से घटकर 27 प्रति 1000 जीवित जन्म हो गई है। इसी तरह नवजात मृत्यु दर (NMR) भी 57 से घटकर 17 तक पहुंच गई है। यह उपलब्धि यूं ही नहीं मिली; इसके पीछे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, संस्थागत प्रसव, टीकाकरण अभियान और जन-जागरूकता की बड़ी भूमिका है।

अगर बिहार की बात करें, तो यहां भी स्थिति में सुधार देखने को मिला है। 2009 में जहां शिशु मृत्यु दर (IMR) 52 थी, वहीं NFHS-5 (2019-20) में यह घटकर 46.8 हो गई और हाल के वर्षों में यह 27-32 के बीच आंकी जा रही है। यह राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंचने का संकेत है। लेकिन यह भी सच है कि कुपोषण और बाल मृत्यु दर अभी भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं, खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों में।

यहीं से “बाल संरक्षण” की अवधारणा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बाल संरक्षण का मतलब सिर्फ बच्चों को हिंसा या शोषण से बचाना नहीं है, बल्कि उनके जीवन, स्वास्थ्य और समुचित विकास के अधिकार को सुनिश्चित करना भी है। एक स्वस्थ बच्चा ही आगे चलकर एक सशक्त नागरिक बन सकता है।

इस संदर्भ में टीकाकरण (Immunization) बाल संरक्षण का सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक उपाय बनकर सामने आता है। भारत सरकार का यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (UIP) बच्चों को 12 गंभीर और जानलेवा बीमारियों से मुफ्त सुरक्षा प्रदान करता है। इनमें पोलियो, खसरा, रूबेला, टेटनस और हेपेटाइटिस-बी जैसी बीमारियां शामिल हैं।

टीकाकरण का सबसे बड़ा लाभ है—जीवन की सुरक्षा। एक छोटा सा टीका बच्चे को मृत्यु के खतरे से बचा सकता है। इसके साथ ही यह विकलांगता को भी रोकता है। उदाहरण के तौर पर पोलियो से लकवा और खसरे से अंधापन जैसी स्थायी समस्याएं हो सकती हैं, जिन्हें टीकाकरण के जरिए रोका जा सकता है।

इसके अलावा टीकाकरण कुपोषण और बीमारी के दुष्चक्र को तोड़ने में भी मदद करता है। बार-बार बीमार होने वाला बच्चा न तो ठीक से बढ़ पाता है और न ही उसका मानसिक विकास सही तरीके से हो पाता है। टीके उसे स्वस्थ रखते हैं, जिससे उसका संपूर्ण विकास संभव हो पाता है।

टीकाकरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू है “सामुदायिक सुरक्षा” (Herd Immunity)। जब किसी समुदाय के अधिकांश बच्चों को टीका लग जाता है, तो बीमारियों का प्रसार स्वतः ही कम हो जाता है। इससे उन बच्चों को भी सुरक्षा मिलती है जो किसी कारणवश टीका नहीं लगवा पाते।

भारत में एक बच्चे को “पूर्ण प्रतिरक्षित” तब माना जाता है जब उसे जन्म के पहले वर्ष में सभी आवश्यक टीके समय पर मिल जाते हैं। यह केवल एक स्वास्थ्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि बच्चे का मौलिक अधिकार है और माता-पिता की जिम्मेदारी भी।

इस दिशा में जमीनी स्तर पर भी सराहनीय कार्य हो रहे हैं। पटना नगर निगम के वार्ड नंबर-1 स्थित शबरी कॉलोनी, दीघा मुसहरी में कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल के सामुदायिक स्वास्थ्य एवं ग्रामीण विकास केंद्र द्वारा टीकाकरण कार्यक्रम का प्रभावी संचालन किया गया। इसका सकारात्मक असर यह हुआ कि जच्चा और बच्चा दोनों की सेहत में सुधार हुआ और मृत्यु दर में कमी आई।

एक समय था जब स्वास्थ्यकर्मी गांवों में जाते थे और उन्हें यह सुनने को मिलता था कि “बबुआ मु गया है”—यानी बच्चे की मृत्यु हो चुकी है। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उस दर्दनाक हकीकत का प्रतीक था, जिसमें जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण मासूम जानें चली जाती थीं। आज वही स्थिति बदल रही है, और इसका श्रेय टीकाकरण व स्वास्थ्य जागरूकता को जाता है।

कानूनी स्तर पर भी भारत ने बाल संरक्षण के लिए मजबूत कदम उठाए हैं। POCSO Act 2012 (Protection of Children from Sexual Offences Act) बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) भी बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है। ये कानून बच्चों के लिए एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अंततः, यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसकी आने वाली पीढ़ी होती है। अगर बच्चे सुरक्षित, स्वस्थ और शिक्षित होंगे, तभी देश प्रगति करेगा। “जान है तो जहान” का अर्थ यही है कि पहले जीवन की रक्षा हो, फिर विकास की बात हो।

आज जरूरत है कि हर माता-पिता, हर समाज और हर संस्था इस जिम्मेदारी को समझे। टीकाकरण को आदत बनाए, जागरूकता फैलाए और यह सुनिश्चित करे कि कोई भी बच्चा स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।

जब हर बच्चा सुरक्षित होगा, तभी भारत वास्तव में महान बनेगा।

“ट्रांसजेंडर विधेयक 2026: पहचान पर कानून या अधिकारों पर नियंत्रण?”

 “ट्रांसजेंडर विधेयक 2026: पहचान पर कानून या अधिकारों पर नियंत्रण?”


“Self-Identification से Medical Verification तक—बदल गया नियम”

रिपोर्टः आलोक कुमार


ट्रांसजेंडर विधेयक 2026: अधिकार, पहचान और विवाद का नया अध्याय

मार्च 2026 में भारतीय संसद द्वारा पारित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 ने देश में जेंडर पहचान और मानवाधिकार के मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह विधेयक 2019 के मूल कानून में महत्वपूर्ण बदलाव करता है और खासकर “स्व-पहचान” (Self-identification) के अधिकार को सीमित करने के कारण व्यापक विवाद का विषय बन गया है।

यह कानून एक ओर जहां सरकार के अनुसार पहचान की प्रक्रिया को “संगठित और प्रमाणिक” बनाने का प्रयास है, वहीं दूसरी ओर ट्रांसजेंडर समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे उनकी गरिमा और स्वतंत्रता के खिलाफ कदम मान रहे हैं।

क्या है नया बदलाव?

2019 के कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी पहचान स्वयं घोषित करने का अधिकार दिया गया था। यानी किसी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार था कि वह स्वयं को किस जेंडर के रूप में पहचानता है, बिना किसी मेडिकल या प्रशासनिक हस्तक्षेप के।

लेकिन 2026 के संशोधन ने इस व्यवस्था को बदल दिया है। अब:

ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दिया गया है।
यह प्रमाण पत्र मेडिकल सुपरिटेंडेंट या CMO द्वारा जारी होगा।
इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट (DM) द्वारा सत्यापन के बाद ही आधिकारिक पहचान पत्र मिलेगा।

इस प्रकार, अब पहचान एक व्यक्तिगत अधिकार न होकर एक प्रशासनिक और चिकित्सीय प्रक्रिया बन गई है।

परिभाषा में बदलाव: कौन है ट्रांसजेंडर?

2019 के अधिनियम में ट्रांसजेंडर की परिभाषा काफी व्यापक थी। इसमें ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला, इंटरसेक्स व्यक्ति, जेंडरक्वीर और हिजड़ा, किन्नर जैसी पारंपरिक पहचानें शामिल थीं — चाहे उन्होंने कोई मेडिकल प्रक्रिया करवाई हो या नहीं।

लेकिन नए संशोधन में परिभाषा को सीमित कर दिया गया है:

अब केवल सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान (जैसे किन्नर, हिजड़ा, अरवानी, जोगता) वाले लोग शामिल हैं।
इंटरसेक्स व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है, लेकिन जन्मजात जैविक विशेषताओं के आधार पर।
“स्वयं-अनुभूत जेंडर पहचान” (Self-perceived identity) को इस परिभाषा से बाहर कर दिया गया है।

यानी, जो व्यक्ति केवल अपनी आंतरिक पहचान के आधार पर खुद को ट्रांसजेंडर मानते हैं, उन्हें अब कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी।

अपराध और सजा: कड़े प्रावधान

विधेयक में एक और महत्वपूर्ण बदलाव है — दंडात्मक प्रावधानों का सख्त होना।

अब यदि कोई व्यक्ति:

धोखे से
जबरदस्ती
प्रलोभन या दबाव देकर

किसी को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर करता है, तो उसके खिलाफ कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। इसमें अंग-भंग (mutilation), बधियाकरण (castration) या किसी भी प्रकार की जबरन मेडिकल प्रक्रिया शामिल है।

सरकार का तर्क है कि यह प्रावधान उन अपराधों को रोकने के लिए है, जिनमें कमजोर लोगों को जबरन इस पहचान में धकेला जाता है।

संसद में क्या हुआ?

इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया:

लोकसभा ने इसे पहले ही मंजूरी दे दी थी।
राज्यसभा में इसे ध्वनि मत से पारित किया गया।

DMK सांसद तिरुचि शिवा ने इसे प्रवर समिति (Select Committee) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन यह प्रस्ताव खारिज कर दिया गया।

यह भी आलोचना का विषय बना कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर विस्तृत चर्चा और समीक्षा का अवसर नहीं दिया गया।

विरोध और आलोचना

विपक्षी दलों, सामाजिक संगठनों और ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं ने इस विधेयक का तीखा विरोध किया है। उनकी मुख्य आपत्तियाँ हैं:

1. स्व-पहचान के अधिकार का हनन

यह विधेयक व्यक्ति की आत्म-पहचान के मूल अधिकार को खत्म करता है, जो कि मानव गरिमा का आधार है।

2. मेडिकल और प्रशासनिक बोझ

अब ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान साबित करने के लिए अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने होंगे, जिससे उनका उत्पीड़न बढ़ सकता है।

3. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ?

आलोचकों का कहना है कि यह संशोधन NALSA बनाम भारत सरकार फैसला 2014 की भावना के विपरीत है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जेंडर पहचान को मौलिक अधिकार माना था।

4. सामाजिक कलंक में वृद्धि

जब पहचान के लिए “प्रमाण” की जरूरत होगी, तो समाज में यह संदेश जाएगा कि ट्रांसजेंडर होना एक “संदेहास्पद” या “असामान्य” स्थिति है।

सरकार का पक्ष

सरकार इस विधेयक का बचाव करते हुए कहती है कि:

यह कानून फर्जी पहचान और दुरुपयोग को रोकने के लिए जरूरी है।
इससे ट्रांसजेंडर पहचान की प्रक्रिया में स्पष्टता और पारदर्शिता आएगी।
कड़े दंडात्मक प्रावधान से कमजोर वर्गों को जबरन इस पहचान में धकेले जाने से बचाया जा सकेगा।

सरकार का यह भी कहना है कि सामाजिक न्याय और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

जमीनी हकीकत और सामाजिक पहलू

समाज में ट्रांसजेंडर समुदाय पहले से ही हाशिए पर है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक स्वीकृति — हर स्तर पर उन्हें संघर्ष करना पड़ता है।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह नया कानून उनकी स्थिति को बेहतर करेगा या और जटिल बना देगा?

दीघा थाना क्षेत्र का उदाहरण (जैसे इंदल मांझी का मामला) यह दिखाता है कि समाज में जेंडर पहचान को लेकर कितनी भ्रम और संवेदनशीलता है। लेकिन ऐसे व्यक्तिगत मामलों के आधार पर पूरी समुदाय की पहचान को नियंत्रित करना कितना उचित है — यह एक बड़ा सवाल है।

आगे का रास्ता

यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह समाज के उस नजरिए को भी दर्शाता है, जिससे हम जेंडर और पहचान को देखते हैं।

जरूरत है कि:

ट्रांसजेंडर समुदाय की भागीदारी से नीतियां बनाई जाएं
कानून में मानव गरिमा और स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए
समाज में जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ाई जाए
निष्कर्ष

ट्रांसजेंडर विधेयक 2026 भारत में जेंडर पहचान की बहस को एक नए मोड़ पर ले आया है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जहां कानून, समाज, नैतिकता और मानवाधिकार आपस में टकराते नजर आते हैं।

एक लोकतांत्रिक समाज में यह जरूरी है कि कानून केवल व्यवस्था बनाए रखने का साधन न हो, बल्कि वह हर व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और पहचान का सम्मान भी सुनिश्चित करे।

अंततः सवाल यही है — क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां पहचान को “प्रमाणित” करना पड़े, या एक ऐसे समाज की ओर जहां हर व्यक्ति को अपनी पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार हो?


महावीर मंदिर का ‘नैवेद्यम’—प्रसाद नहीं, आस्था की पहचान”

 महावीर मंदिर का ‘नैवेद्यम’—प्रसाद नहीं, आस्था की पहचान”


“स्वाद, शुद्धता और सेवा का अद्भुत संगम”

रिपोर्टः आलोक कुमार


पटना स्थित महावीर मंदिर केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सेवा, श्रद्धा और गुणवत्ता का अद्भुत संगम भी है। यहां मिलने वाला “नैवेद्यम लड्डू” प्रसाद आज देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है। यह प्रसाद केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपनी पवित्रता, निर्माण प्रक्रिया और सामाजिक उपयोगिता के कारण भी विशेष महत्व रखता है।

मंदिर में चढ़ाया जाने वाला यह नैवेद्यम प्रसाद भक्तों के लिए किसी साधारण मिठाई से कहीं अधिक है। जब श्रद्धालु इसे भगवान को अर्पित कर घर ले जाते हैं, तो यह उनके लिए आशीर्वाद का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि लोग कहते हैं—“भगवान को भोग लगने के बाद इस प्रसाद के स्वाद का मुकाबला कोई मिठाई नहीं कर सकती।”

कीमत और उपलब्धता

अप्रैल 2025 से लागू दरों के अनुसार नैवेद्यम प्रसाद की कीमत इस प्रकार है—

1 किलो (प्लास्टिक पैक): ₹380
1 किलो (कार्टन बॉक्स): ₹360
500 ग्राम (कार्टन बॉक्स): ₹180
250 ग्राम (कार्टन बॉक्स): ₹90

मंदिर परिसर के बाहर 12 से अधिक काउंटरों पर यह प्रसाद उपलब्ध रहता है, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती। आंकड़ों के अनुसार, हर महीने लगभग 1 लाख किलोग्राम नैवेद्यम लड्डू की बिक्री होती है, जो इसकी लोकप्रियता का स्पष्ट प्रमाण है।

निर्माण की प्रक्रिया: पवित्रता और अनुशासन

नैवेद्यम लड्डू का निर्माण अत्यंत स्वच्छ और अनुशासित वातावरण में किया जाता है। इसके लिए पटना के बुद्ध मार्ग में एक विशेष कारखाना स्थापित किया गया है, जहां प्रतिदिन लगभग 64 कारीगर अलग-अलग शिफ्ट में कार्य करते हैं।

कारीगरों की दिनचर्या भी अत्यंत अनुशासित होती है। वे सुबह या रात के समय स्नान कर, पूजा-पाठ करने के बाद ही प्रसाद निर्माण में जुटते हैं। कई बार यह प्रक्रिया रात दो बजे से ही शुरू हो जाती है, ताकि दिनभर की मांग को पूरा किया जा सके।

इस कारखाने की उत्पादन क्षमता भी उल्लेखनीय है—यह प्रतिदिन लगभग 10,000 किलोग्राम नैवेद्यम तैयार कर सकता है। विशेष अवसरों, जैसे रामनवमी, पर यह उत्पादन 24,000 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।

सामग्री की गुणवत्ता

नैवेद्यम लड्डू को तैयार करने में उपयोग की जाने वाली सामग्री अत्यंत उच्च गुणवत्ता की होती है। इसमें शामिल हैं—

शुद्ध देसी घी
बेसन
चीनी
काजू
किशमिश
इलायची
केसर

विशेष रूप से घी कर्नाटक से “नंदिनी” ब्रांड के रूप में मंगवाया जाता है, जबकि काजू, किशमिश और इलायची केरल से लाए जाते हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर सामग्री शुद्ध और ताज़ी हो।

बनाने की विधि

नैवेद्यम बनाने की प्रक्रिया भी वैज्ञानिक और पारंपरिक विधियों का मिश्रण है। सबसे पहले कारखाने में ही दाल को पीसकर ताजा बेसन तैयार किया जाता है। इसके बाद बेसन को पानी के साथ 5-7 मिनट तक अच्छी तरह मिलाया जाता है।

फिर इस मिश्रण से बूँदी बनाई जाती है, जिसे घी में तलकर तैयार किया जाता है। इसके बाद इस बूँदी को चीनी की चाशनी में मिलाया जाता है और उसमें सूखे मेवे एवं मसाले डालकर लड्डू का आकार दिया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में स्वच्छता और गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे हर लड्डू स्वाद और पवित्रता दोनों में उत्कृष्ट हो।

विशेषता और स्वाद

महावीर मंदिर का नैवेद्यम लड्डू सामान्य बूंदी लड्डू से अलग होता है। इसकी बनावट अंदर से नरम और बाहर से हल्की दानेदार होती है। इसमें घी की सुगंध, इलायची की खुशबू और सूखे मेवों का स्वाद एक साथ मिलता है, जो इसे अनोखा बनाता है।

यह प्रसाद FSSAI द्वारा प्रमाणित भी है, जो इसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की पुष्टि करता है।

सामाजिक सेवा से जुड़ाव

नैवेद्यम लड्डू की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इससे प्राप्त होने वाला लाभ समाज सेवा में लगाया जाता है। मंदिर द्वारा संचालित महावीर कैंसर संस्थान में कैंसर मरीजों को निःशुल्क या सस्ती दरों पर इलाज और भोजन उपलब्ध कराया जाता है।

इस प्रकार, जब कोई श्रद्धालु नैवेद्यम खरीदता है, तो वह केवल प्रसाद नहीं लेता, बल्कि एक सामाजिक सेवा में भी योगदान देता है।

आस्था और परंपरा का संगम

महावीर मंदिर का नैवेद्यम लड्डू केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सेवा का प्रतीक है। यह श्रद्धालुओं के लिए भगवान का आशीर्वाद है, जो उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का संदेश लाता है।

हालांकि इसे घर पर भी बनाया जा सकता है, लेकिन मंदिर के नैवेद्यम का स्वाद और उसकी पवित्रता अलग ही अनुभव देती है। यही कारण है कि पटना आने वाला लगभग हर श्रद्धालु इस प्रसाद को अपने साथ अवश्य ले जाता है।

अंततः कहा जा सकता है कि महावीर मंदिर का नैवेद्यम लड्डू न केवल स्वाद का आनंद देता है, बल्कि यह आस्था, अनुशासन और मानव सेवा का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।

“संविधान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय—बदलते सवाल”

 “संविधान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय—बदलते सवाल”


“एंग्लो-इंडियन मनोनयन से आरक्षण बहस तक”

रिपोर्टः आलोक कुमार

भारतीय संविधान की रचना केवल एक कानूनी दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह विविधताओं से भरे समाज को न्याय, समानता और प्रतिनिधित्व देने का एक ऐतिहासिक प्रयास था। इसी दृष्टि से संविधान सभा में विभिन्न समुदायों की आवाज़ को सुनिश्चित करने के लिए कई विशेष प्रावधान किए गए। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रावधान एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए था, जिसकी पैरवी फ्रैंक एंथनी जैसे नेताओं ने प्रभावी ढंग से की थी।

संविधान के अनुच्छेद 331 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया था कि यदि एंग्लो-इंडियन समुदाय को लोकसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो वह अधिकतम दो सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं। इसी प्रकार, राज्यों में भी राज्यपालों को विधानसभा में एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार था। यह व्यवस्था उस समय की सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, जब यह समुदाय संख्या में कम होने के कारण लोकतांत्रिक चुनावों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पा रहा था।

हालांकि, समय के साथ इस प्रावधान पर पुनर्विचार हुआ और 2019 में पारित 104वां संविधान संशोधन के माध्यम से एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए मनोनयन की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। सरकार का तर्क था कि अब इस समुदाय की जनसंख्या और सामाजिक स्थिति में बदलाव आ चुका है, और उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं रह गई है। लेकिन इस निर्णय ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या केवल जनसंख्या के आधार पर किसी समुदाय के राजनीतिक अधिकारों को समाप्त करना उचित है?

इसी प्रकार, अनुसूचित जाति के आरक्षण को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है। प्रारंभ में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के तहत यह व्यवस्था केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों तक सीमित थी। बाद में 1956 में सिखों और 1990 में बौद्ध धर्म के अनुयायियों को भी इस दायरे में शामिल किया गया। आलोचकों का आरोप है कि यह विस्तार राजनीतिक तुष्टिकरण की नीति का हिस्सा था, जबकि समर्थकों का कहना है कि इन धर्मों में शामिल हुए लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि वही रही, इसलिए उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।

धर्म परिवर्तन और सामाजिक भेदभाव का प्रश्न आज भी जटिल बना हुआ है। उदाहरण के तौर पर, बक्सर धर्मप्रांत से जुड़े एक ईसाई व्यक्ति का उल्लेख किया जाता है, जो आपके मोहल्ले मखदुमपुर दीघा में जूता-चप्पल बनाने और मरम्मत का कार्य करता है। यह उदाहरण इस बात की ओर संकेत करता है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में तत्काल परिवर्तन नहीं होता। पारंपरिक पेशे और सामाजिक पहचान कई बार लंबे समय तक बनी रहती है।

इसी तरह, धार्मिक संस्थानों के भीतर भी विभाजन के उदाहरण देखने को मिलते हैं। राजधानी दिल्ली में भाषा के आधार पर अलग-अलग चर्चों का निर्माण किया गया है, जैसे कि मलयालम भाषी समुदाय के लिए अलग चर्च। दिल्ली जैसे महानगर में यह व्यवस्था एक ओर सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का प्रयास है, तो दूसरी ओर यह भी प्रश्न उठता है कि क्या यह विभाजन सामाजिक एकता को कमजोर करता है।

केरल में भी चर्चों के भीतर जातिगत विभाजन की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि ईसाई धर्म समानता और भाईचारे का संदेश देता है, लेकिन सामाजिक वास्तविकताओं का प्रभाव धार्मिक संस्थानों पर भी पड़ता है। यह स्थिति केवल एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय समाज के व्यापक ढांचे का प्रतिबिंब है।

इन सभी उदाहरणों के बीच मूल प्रश्न यही है कि क्या संविधान द्वारा दी गई विशेष सुविधाएं और आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य—सामाजिक न्याय—को पूरा कर पा रही हैं, या फिर वे राजनीतिक और सामाजिक जटिलताओं में उलझ गई हैं। एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए मनोनयन समाप्त करना हो या सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को आरक्षण देना—हर निर्णय के पीछे अपने तर्क और विरोध दोनों मौजूद हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इन मुद्दों को भावनाओं और राजनीतिक दृष्टिकोण से ऊपर उठकर देखा जाए। सामाजिक न्याय का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई करना नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य में समान अवसर सुनिश्चित करना भी है। यदि धर्म परिवर्तन के बाद भी भेदभाव जारी रहता है, तो उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

अंततः, भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह समय-समय पर अपनी नीतियों की समीक्षा करता रहे। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, और इसकी आत्मा तभी सशक्त रहेगी जब उसमें निहित मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को वास्तविक जीवन में लागू किया जाए।


“न्याय यात्रा से समृद्धि यात्रा—21 साल, 16 पड़ाव, बदलता जनसंवाद”

 “टेंट से हेलीकॉप्टर तक: नीतीश की ‘यात्रा राजनीति’ का बदलता चेहरा”

“न्याय यात्रा से समृद्धि यात्रा—21 साल, 16 पड़ाव, बदलता जनसंवाद”

रिपोर्टः आलोक कुमार

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की “यात्रा राजनीति” एक अनोखा अध्याय रही है। वर्ष 2005 की पहली न्याय यात्रा से लेकर 2026 की समृद्धि यात्रा तक, लगभग 21 वर्षों में उनकी 16 यात्राएं केवल राजनीतिक अभियान नहीं रहीं, बल्कि शासन, विकास और जनसंवाद का माध्यम बनीं। इन यात्राओं ने बिहार के प्रशासनिक ढांचे और विकास मॉडल को जमीन से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

यात्रा की शुरुआत: संघर्ष और जनसंवाद

साल 2005 में जब बिहार में राजनीतिक अस्थिरता थी और राष्ट्रपति शासन लागू था, तब नीतीश कुमार ने न्याय यात्रा की शुरुआत की। उस समय उनका उद्देश्य था—जनता के बीच जाकर “सुशासन” का भरोसा दिलाना।

उस दौर की यात्राएं बेहद साधारण और जमीन से जुड़ी थीं। वे गांवों में टेंट लगाकर रुकते थे, खेतों में बैठकर लोगों से बात करते थे और कई बार सड़कें खराब होने पर नाव से सफर करते थे। सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकलकर सीधे लोगों के घर पहुंच जाना उनकी पहचान बन गया था।

इस शैली का सबसे बड़ा फायदा यह था कि जनता की समस्याएं बिना किसी फिल्टर के सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचती थीं। यही कारण रहा कि 2005 के चुनाव में उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिला और वे पहली बार मुख्यमंत्री बने।

विकास और विश्वास की राजनीति


मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी यात्राओं का स्वरूप बदलते हुए भी जनहित पर केंद्रित रहा। विकास यात्रा (2009), धन्यवाद यात्रा, प्रवास यात्रा और विश्वास यात्रा (2010) के माध्यम से उन्होंने सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को परखा।

इन यात्राओं के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले भी लिए गए। उदाहरण के लिए, साइकिल योजना में बदलाव एक साधारण बातचीत से प्रेरित था, जब एक छात्रा ने बताया कि उसे साइकिल मिली, लेकिन उसके भाई को नहीं। बाद में यह योजना लड़कों तक भी विस्तारित की गई।

इसके बाद सेवा यात्रा (2011) और अधिकार यात्रा (2012) ने प्रशासनिक सुधार और विशेष राज्य के दर्जे की मांग को केंद्र में रखा। यह दौर नीतीश कुमार के “विकास पुरुष” वाली छवि को मजबूत करने वाला था।

राजनीतिक उतार-चढ़ाव और यात्राएं

2014 के बाद की यात्राओं—संकल्प यात्रा और संपर्क यात्रा—में राजनीतिक परिस्थितियों का असर साफ दिखा। भाजपा से अलगाव और चुनावी हार के बाद इन यात्राओं का मकसद संगठन को मजबूत करना और जनता से फिर से जुड़ना था।

इसके बाद निश्चय यात्रा (2016), समीक्षा यात्रा (2017) और जल-जीवन-हरियाली यात्रा (2019) ने विकास के साथ-साथ पर्यावरण, जल संरक्षण और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया।

2021 की समाज सुधार अभियान यात्रा ने सामाजिक कुरीतियों—जैसे दहेज प्रथा, बाल विवाह और शराबबंदी—के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम किया। वहीं समाधान यात्रा (2023) और प्रगति यात्रा (2024-25) में प्रशासनिक जवाबदेही और विकास कार्यों की समीक्षा प्रमुख रही।

बदला हुआ पैटर्न: टेंट से हेलीकॉप्टर तक

2026 की समृद्धि यात्रा तक आते-आते यात्रा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से एक दिन में कई जिलों का दौरा करते हैं और कुछ घंटों में वापस पटना लौट आते हैं।

पहले जहां वे तीन-तीन दिन एक जिले में बिताते थे, अब कुछ घंटों में कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। सुरक्षा व्यवस्था भी काफी कड़ी हो गई है—करीब 2000 जवानों के घेरे में वे रहते हैं।

सबसे बड़ा बदलाव जनसंवाद के तरीके में आया है। पहले वे सीधे लोगों के बीच जाकर बात करते थे, अब अक्सर दूर से नमस्कार करते नजर आते हैं। आम जनता ही नहीं, कई बार स्थानीय नेता भी उनसे सीधे नहीं मिल पाते।

जनता की धारणा और प्रभाव

इन यात्राओं का एक दिलचस्प सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिला है। बिहार के कई गांवों में लोग कहते हैं—“हमारे गांव में भी मुख्यमंत्री की यात्रा हो जाए, तो विकास हो जाएगा।”

इसका कारण यह है कि जिन जिलों या गांवों में मुख्यमंत्री का दौरा होता है, वहां सड़कों, साफ-सफाई, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं में तेजी से सुधार किया जाता है। यानी यात्रा एक तरह से “त्वरित विकास अभियान” बन जाती है।

निष्कर्ष: बदलती राजनीति का आईना

नीतीश कुमार की 16 यात्राएं केवल व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति और प्रशासनिक शैली का आईना हैं।

2005 में नाव पर बैठकर गांव-गांव घूमने वाले नेता से लेकर 2026 में हेलीकॉप्टर और भारी सुरक्षा घेरे में यात्रा करने वाले मुख्यमंत्री तक का यह सफर समय, सत्ता और व्यवस्था के बदलाव को दर्शाता है।

जहां शुरुआती दौर में सीधा जनसंवाद उनकी सबसे बड़ी ताकत था, वहीं आज प्रशासनिक दक्षता और त्वरित समीक्षा उनकी प्राथमिकता बन गई है।

फिर भी, इन यात्राओं का मूल उद्देश्य आज भी वही है—जनता से जुड़ना, समस्याओं को समझना और विकास को गति देना। फर्क सिर्फ इतना है कि तरीका बदल गया है, लेकिन राजनीति की धुरी अब भी जनता ही है।


“नीतीश जी, हमें छोड़कर मत जाइए”

“नीतीश जी, हमें छोड़कर मत जाइए”

रिपोर्टः आलोक कुमार

बिहार की राजनीति में Nitish Kumar एक ऐसा नाम है, जिसने पिछले दो दशकों में शासन, स्थिरता और विकास की एक अलग पहचान बनाई। 2005 से लेकर 2026 तक का उनका सफर केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि बिहार के सामाजिक-आर्थिक बदलाव की कहानी भी है। यही कारण है कि जब उनके राज्यसभा जाने की खबर सामने आई, तो यह केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं रहा, बल्कि भावनात्मक बहस का विषय बन गया।

मार्च 2026 में जब Amit Shah की मौजूदगी में उन्होंने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया, तो इसे एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत के रूप में देखा गया। खुद नीतीश कुमार ने भी यह कहा कि उनकी इच्छा रही है कि वे संसद के दोनों सदनों का हिस्सा बनें। लोकसभा में छह बार प्रतिनिधित्व करने के बाद अब राज्यसभा का अनुभव लेना उनके लिए एक स्वाभाविक कदम बताया गया। लेकिन यह तर्क जनता के दिल को पूरी तरह नहीं छू पाया।

बिहार के गांव-गांव से जो आवाज उठी, वह भावनाओं से भरी थी। समृद्धि यात्रा के दौरान नालंदा, आरा और अन्य जिलों में लोगों ने उनसे अपील की—“दिल्ली मत जाइए, बिहार में ही रहिए।” यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक था, जो लोगों ने वर्षों में उनके नेतृत्व पर बनाया है। खासकर महिलाओं, जीविका समूहों से जुड़ी दीदियों और बुजुर्गों के बीच यह भावना और गहरी दिखी।

इस भावनात्मक जुड़ाव की वजह भी साफ है। नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार ने कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे। सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार हुआ। ‘सात निश्चय’ जैसी योजनाओं ने ग्रामीण जीवन को नई दिशा दी। कानून-व्यवस्था में सुधार ने राज्य की छवि को बदला। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में जीविका योजना एक मिसाल बनी। इन सब कारणों से लोग उन्हें केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपने ‘अभिभावक’ के रूप में देखने लगे।

यही कारण है कि जब उन्होंने दिल्ली जाने का फैसला लिया, तो लोगों को लगा जैसे उनका संरक्षक उनसे दूर जा रहा है। “नीतीश ठहरे परदेशी, साथ क्या निभाएंगे”—यह पंक्ति इसी मनोभाव को व्यक्त करती है। यहां ‘परदेशी’ शब्द भौगोलिक नहीं, बल्कि भावनात्मक दूरी का प्रतीक बन गया है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह फैसला कई तरह से महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार की उम्र 75 वर्ष हो चुकी है। ऐसे में यह कदम उनकी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हो सकता है। साथ ही, यह एनडीए गठबंधन की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। Janata Dal (United) की दूसरी पंक्ति अभी उतनी मजबूत नहीं दिखती, जबकि Bharatiya Janata Party का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

नई नेतृत्व व्यवस्था को लेकर भी अटकलें तेज हैं। Samrat Choudhary और Nitin Nabin जैसे नाम सामने आ रहे हैं। वहीं विपक्ष में Tejashwi Yadav की भूमिका और आक्रामक हो सकती है। ऐसे में बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है, जहां संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दिल्ली जाकर नीतीश कुमार बिहार से दूर हो जाएंगे? इसका जवाब सीधा नहीं है। राज्यसभा सांसद के रूप में वे राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। वे बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा, निवेश और रोजगार जैसे मुद्दों को संसद में मजबूती से उठा सकते हैं। केंद्र सरकार के साथ उनके अनुभव का फायदा भी राज्य को मिल सकता है।

लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि मुख्यमंत्री के रूप में उनकी सीधी निगरानी और प्रशासनिक पकड़ का विकल्प खोजना आसान नहीं होगा। बिहार अभी भी बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा-स्वास्थ्य की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन का असर विकास की गति पर पड़ सकता है।

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर हमेशा लचीला और व्यावहारिक रहा है। उन्होंने समय-समय पर गठबंधन बदले, लेकिन हर बार बिहार को केंद्र में रखा। यही वजह है कि जनता को उम्मीद है कि वे दिल्ली में रहकर भी बिहार के हितों की अनदेखी नहीं करेंगे। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया है कि नई सरकार को मार्गदर्शन देते रहेंगे।

अंततः, यह पूरा घटनाक्रम लोकतंत्र में जनता और नेता के रिश्ते को उजागर करता है। जनता की गुहार केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि विकास की निरंतरता की मांग है। लोग चाहते हैं कि जो बदलाव शुरू हुआ है, वह रुकना नहीं चाहिए।

अगर नीतीश कुमार राज्यसभा जाते हैं, तो उनके सामने दोहरी जिम्मेदारी होगी—राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना और बिहार के विकास को दिशा देते रहना। यह संतुलन आसान नहीं होगा, लेकिन उनके अनुभव को देखते हुए असंभव भी नहीं कहा जा सकता।

बिहार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां नेतृत्व का हर फैसला आने वाले वर्षों की दिशा तय करेगा। जनता की निगाहें नीतीश कुमार पर टिकी हैं—चाहे वे पटना में रहें या दिल्ली में। सवाल वही है: क्या ‘परदेश’ जाकर भी वे अपने प्रदेश का साथ निभा पाएंगे? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा, लेकिन फिलहाल बिहार की आवाज साफ है—“नीतीश जी, हमें छोड़कर मत जाइए।”

“जब दुनिया हथियारों में उलझी है, तब भी अहिंसा ही मानवता की असली ताकत है”

 “जब दुनिया हथियारों में उलझी है, तब भी अहिंसा ही मानवता की असली ताकत है”

रिपोर्टः आलोक कुमार

हिंसा के उद्योग के बीच अहिंसा की पुकार आज का वैश्विक परिदृश्य एक चिंताजनक दिशा की ओर संकेत करता है, जहां हिंसा केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित प्रवृत्ति का रूप लेती जा रही है। यह धारणा कि दुनिया में हिंसा और अशांति को बढ़ावा देने के पीछे संगठित आर्थिक शक्तियां सक्रिय हैं, अब केवल एक विचार नहीं बल्कि गहन विमर्श का विषय बन चुकी है। विशेष रूप से हथियार निर्माण से जुड़ी कंपनियों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज के विभिन्न स्तरों पर हिंसात्मक प्रवृत्तियों को पोषित करती दिखाई देती हैं। इस प्रक्रिया की शुरुआत बचपन से ही हो जाती है। 

आज के बाजार में उपलब्ध अधिकांश खिलौने बंदूक, युद्ध या आक्रमण से जुड़े होते हैं। बच्चे खेल-खेल में हिंसा को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकारने लगते हैं। यही नहीं, मनोरंजन उद्योग—विशेषकर फिल्में और ऑनलाइन गेम्स—भी हिंसा को आकर्षक और रोमांचक रूप में प्रस्तुत करते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे खेलों की भरमार है, जिनका मूल आधार युद्ध, हथियार और आक्रामकता है। यह एक ऐसी मानसिकता का निर्माण करता है, जिसमें संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व के मूल्य पीछे छूटते जाते हैं। इसके विपरीत, अहिंसा के प्रचार-प्रसार के लिए इस स्तर पर कोई संगठित और व्यापक प्रयास नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि समाज में आक्रोश, असहिष्णुता और संघर्ष की प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं। 

ऐसे समय में महात्मा गांधी और पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे विचारकों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, जिन्होंने अहिंसा को केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया। इसी संदर्भ में गायत्री शक्तिपीठ पर आयोजित स्वर्गीय रनसिंह परमार जी की श्रद्धांजलि सभा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम के अध्यक्ष पी. वी. राजगोपाल ने अपने विचार रखते हुए इस गंभीर विषय को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिंसा का स्वरूप समय के साथ और अधिक विनाशकारी होता गया है—तीर-कमान से लेकर बंदूक, और फिर परमाणु तथा हाइड्रोजन बम तक। यह प्रगति मानवता के लिए खतरे की घंटी है, न कि गर्व का विषय। 

प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान की उपलब्धियां यदि मानवता के विनाश का कारण बनें, तो वे महानता का प्रतीक नहीं हो सकतीं। इसके विपरीत, एक अकेले महात्मा गांधी ने अहिंसा के माध्यम से जो परिवर्तन किया, वह आज भी विश्व के लिए प्रेरणा है, भले ही उन्हें नोबेल पुरस्कार न मिला हो। डॉ. राजगोपालन ने यह भी बताया कि दुनिया के कई देशों—जैसे अमेरिका और जर्मनी—में ‘पीस कॉर्नर’ और ‘पीस क्लब’ जैसी पहलें की जा रही हैं, जहां बच्चों और युवाओं को संवाद और सहमति के माध्यम से विवाद सुलझाने की शिक्षा दी जाती है। यह एक सकारात्मक पहल है, जिसे भारत में भी अपनाने की आवश्यकता है। 

कार्यक्रम में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के सत्संकल्पों और बापू के आदर्शों को समाज परिवर्तन का आधार बताया गया। श्रद्धांजलि सभा के दौरान उपस्थित जनों ने स्व. रनसिंह परमार को पुष्पांजलि अर्पित की और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के रूप में पौधारोपण भी किया। अंततः, यह समय आत्ममंथन का है। यदि हिंसा को बढ़ावा देने वाली शक्तियां संगठित हैं, तो अहिंसा के पक्षधर लोगों को भी संगठित और सक्रिय होना होगा। शिक्षा, संस्कार और सामाजिक पहल के माध्यम से ही हम एक शांतिपूर्ण और समरस समाज की कल्पना को साकार कर सकते हैं।


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  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...