संविधान ने हर नागरिक को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता दी
भारत एक विविधताओं वाला देश है, जहां धर्म, भाषा, जाति और संस्कृति की अनेक धाराएं मिलकर समाज का निर्माण करती हैं। संविधान ने हर नागरिक को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने और अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता दी है। यही कारण है कि अलग-अलग समुदायों के बीच विवाह कोई नई बात नहीं है। राजनीति, फिल्म, खेल और समाज के कई प्रतिष्ठित लोगों ने अंतरधार्मिक विवाह किए हैं। बिहार की राजनीति में भी इसके उदाहरण देखने को मिले हैं। दिवंगत भाजपा नेता एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री Sushil Kumar Modi ने मलयाली ईसाई परिवार में विवाह किया था। वहीं राजद नेता एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री Tejashwi Yadav ने भी अलग समुदाय में विवाह किया। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि इंसानियत, प्रेम और व्यक्तिगत निर्णय किसी एक धर्म या जाति की सीमाओं में बंधे नहीं होते।
समाज में अक्सर यह देखा जाता है कि आम लोगों के निजी संबंधों और विवाह को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगता है। “लव जिहाद”, “धर्मांतरण” और “सांस्कृतिक खतरे” जैसे शब्दों का प्रयोग कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। लेकिन जब वही स्थिति प्रभावशाली या राजनीतिक परिवारों में दिखाई देती है, तब कई लोग अलग रवैया अपनाते हैं। इसी कारण समाज में दोहरे मापदंडों को लेकर सवाल उठते हैं। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है कि नागरिक राजनीतिक दलों और नेताओं की कथनी और करनी पर सवाल उठाएं।
हालांकि इस बहस में यह भी जरूरी है कि किसी भी समुदाय, जाति या धर्म के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग न हो। भारत का संविधान हर व्यक्ति को समान अधिकार देता है। किसी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति या विवाह के आधार पर नीचा दिखाना सामाजिक सौहार्द के लिए उचित नहीं माना जा सकता। अंतरधार्मिक विवाह करने वाले सभी लोग किसी साजिश या राजनीतिक एजेंडे के तहत ऐसा करते हैं, यह मान लेना भी उचित नहीं है। अधिकांश मामलों में यह व्यक्तिगत पसंद, प्रेम और पारिवारिक सहमति का विषय होता है।
आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दे जरूर गंभीर हैं और उन पर संवेदनशील चर्चा होनी चाहिए। आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष करता आया है। संविधान ने अनुसूचित जनजातियों को विशेष अधिकार और आरक्षण इसलिए दिया ताकि ऐतिहासिक रूप से पिछड़े समुदायों को सामाजिक और आर्थिक न्याय मिल सके। कई राज्यों में आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर विशेष कानून भी बनाए गए हैं ताकि बाहरी लोगों द्वारा शोषण न हो सके। इसलिए जब जमीन, आरक्षण या सांस्कृतिक पहचान से जुड़े प्रश्न उठते हैं, तब समाज में चिंता होना स्वाभाविक है।
लेकिन इन मुद्दों का समाधान किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाकर नहीं निकाला जा सकता। यदि कहीं कानून का दुरुपयोग हो रहा है, तो उसके लिए कानूनी और प्रशासनिक उपाय मौजूद हैं। अदालतें और सरकारें इस प्रकार के मामलों की जांच कर सकती हैं। किसी एक वर्ग को दोषी ठहराने से सामाजिक तनाव बढ़ता है और वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं निकलता।
भारत की ताकत उसकी विविधता और सह-अस्तित्व में है। यहां सदियों से अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते आए हैं। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे समाज में विश्वास और भाईचारा मजबूत करें, न कि विभाजन और द्वेष को बढ़ावा दें। लोकतंत्र में असहमति और बहस का अधिकार सभी को है, लेकिन वह संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि समाज व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामुदायिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए। किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है, वहीं आदिवासी समाज की जमीन, संस्कृति और अधिकारों की रक्षा भी महत्वपूर्ण है। दोनों विषयों पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना ही बेहतर रास्ता हो सकता है।अंततः यह समझना जरूरी है कि धर्म, जाति और राजनीति से ऊपर इंसानियत का स्थान होना चाहिए। जब नेता और आम नागरिक अपने निजी जीवन में विविधता को स्वीकार करते हैं, तो समाज को भी सहिष्णुता और संवाद की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। नफरत और आरोपों की राजनीति से ज्यादा जरूरी है कि देश में समानता, न्याय और सामाजिक सद्भाव की भावना मजबूत हो।
आलोक कुमार