Bihar : लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया

 दियारा के विकास की आवाज बना दियारा विकास संघर्ष समिति, 14 जून को होगा विशाल महाधरना

पटना के दियारा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास को लेकर लंबे समय से संघर्षरत दियारा विकास संघर्ष समिति एक बार फिर जनहित के मुद्दों को लेकर आंदोलन की राह पर आगे बढ़ रही है। समिति ने शुरुआत से ही जनता की समस्याओं को सुनने, समझने और उन्हें प्रशासन तथा जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाने का कार्य किया है। केवल शिकायत करने तक सीमित रहने के बजाय संगठन ने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया, उनकी भागीदारी सुनिश्चित की और फिर संवाद तथा संपर्क के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास किया। जब इन प्रयासों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले तो समिति ने लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया।

इसी क्रम में दिनांक 14 जून 2026, रविवार को अपराह्न 1 बजे से दीघा स्थित जेपी सेतु गोलंबर के समीप दियारा विकास संघर्ष समिति के तत्वावधान में एक विशाल महाधरना आयोजित किया जाएगा। यह धरना दियारा क्षेत्र के लोगों की वर्षों पुरानी मांग को लेकर आयोजित किया जा रहा है। समिति की मुख्य मांग है कि जेपी सेतु के समानांतर निर्मित एनएच-139डब्ल्यू सिक्स लेन पथ से ग्राम पंचायत नकटा दियारा को जोड़ने के लिए एक सुलभ और स्थायी अप्रोच रोड का निर्माण कराया जाए।

दियारा क्षेत्र के लोगों का कहना है कि आधुनिक सिक्स लेन सड़क उनके इलाके के पास से गुजर रही है, लेकिन उससे जुड़ने के लिए उचित संपर्क मार्ग उपलब्ध नहीं है। इसके कारण हजारों ग्रामीणों को आवागमन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि उत्पादों के विपणन और रोजगार के अवसरों तक पहुंच भी प्रभावित होती है। ऐसे में अप्रोच रोड की मांग केवल सड़क निर्माण का विषय नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा मुद्दा बन गया है।

महाधरना की तैयारी को लेकर हाल ही में श्री राधे कृष्ण उत्सव हॉल, दीघा में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में हजारों लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने, उनके आने-जाने तथा भोजन-पानी सहित अन्य व्यवस्थाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता नकटा दियारा के मुखिया श्री रामावधेश सिंह यादव ने की, जबकि संचालन की जिम्मेदारी श्री त्रिभुवन प्रसाद यादव ने निभाई।

बैठक में क्षेत्र के अनेक जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बुद्धिजीवियों ने भाग लिया और अपने विचार रखे। पटना महानगर के उपमेयर प्रतिनिधि सह दीघा विधानसभा के भावी प्रत्याशी श्री पप्पू राय ने कहा कि दियारा क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि विकास का लाभ तभी सार्थक होगा जब अंतिम व्यक्ति तक उसकी पहुंच सुनिश्चित हो। नकटा दियारा और आसपास के गांवों के लोगों को सड़क संपर्क उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

बैठक में उपस्थित पूर्व दानापुर विधानसभा प्रत्याशी सुश्री वर्षा ने कहा कि दियारा क्षेत्र के लोग वर्षों से मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने आंदोलन को जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला अभियान बताते हुए अधिकाधिक लोगों से महाधरना में भाग लेने की अपील की।              

पुरानी पानापुर के मुखिया श्री सुभाष यादव, कसमर पंचायत के मुखिया श्री अनिल राय, पूर्व पंचायत समिति सदस्य श्री रामशंकर सिंह, श्री जनार्दन राय तथा श्री यदु प्रसाद सिंह ने भी अपने संबोधन में कहा कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि पूरे दियारा क्षेत्र के विकास का आंदोलन है। उन्होंने कहा कि जब तक क्षेत्र की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।

बैठक में प्रोफेसर बेनीमाधव सिंह, श्यामबहादुर राय, कामता प्रसाद, ईश्वरधारी सिंह, दशरथ प्रसाद यादव, भोजपुरी फिल्म जगत के लोकप्रिय कलाकार डॉक्टर सन्नी सरगम यादव, पूर्व उप प्रमुख रामबलक राय सहित दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं और समिति के सदस्यों ने भाग लिया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि दियारा क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सड़क संपर्क अत्यंत आवश्यक है।

दियारा विकास संघर्ष समिति का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनसमस्याओं के समाधान के लिए शांतिपूर्ण और संगठित जनआंदोलन प्रभावी माध्यम होता है। समिति ने पहले जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांग रखी। विभिन्न स्तरों पर संवाद और संपर्क भी स्थापित किया गया। लेकिन जब मांगों पर ठोस पहल नहीं हुई तो समिति ने जनता की आवाज को और मजबूती से उठाने के लिए महाधरना का निर्णय लिया।

विशेष बात यह है कि इस महाधरना को देश के लोकप्रिय सांसद श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव भी संबोधित करेंगे। उनके आगमन से आंदोलन को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि पप्पू यादव हमेशा जनसरोकारों के मुद्दों को मजबूती से उठाते रहे हैं और दियारा क्षेत्र की समस्याओं के प्रति भी गंभीर हैं।

अब पूरे दियारा क्षेत्र की निगाहें 14 जून को होने वाले इस महाधरना पर टिकी हैं। लोगों को उम्मीद है कि यह आंदोलन सरकार और प्रशासन का ध्यान उनकी समस्याओं की ओर आकर्षित करेगा तथा नकटा दियारा को एनएच-139डब्ल्यू सिक्स लेन सड़क से जोड़ने की मांग को नई गति मिलेगी। यदि यह मांग पूरी होती है तो न केवल आवागमन आसान होगा बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे, जिससे पूरे दियारा क्षेत्र के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।

आलोक कुमार

Bihar : नकटा दियारा की उम्मीदें और नेताओं के पत्र: क्या अब बनेगा एप्रोच रोड?

 नकटा दियारा की उम्मीदें और नेताओं के पत्र: क्या अब बनेगा एप्रोच रोड?

लोकतंत्र में जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जनप्रतिनिधियों और सरकार की ओर आशा भरी निगाहों से देखती है। जब कोई समस्या वर्षों तक बनी रहती है और उसके समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठते हैं, तब लोगों में निराशा और असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है। कुछ ऐसी ही स्थिति पटना और सारण जिले के बीच स्थित नकटा दियारा क्षेत्र के लोगों की दिखाई दे रही है। यहां के ग्रामीणों का कहना है कि जिस प्रकार अदालतों में किसी मामले की सुनवाई के दौरान बार-बार "तारीख पर तारीख" मिलने से न्याय में देरी होती है, उसी प्रकार उनकी समस्या के समाधान के लिए केवल "लेटर पर लेटर" भेजे जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर कोई परिणाम दिखाई नहीं दे रहा है।

नकटा दियारा नया टोला से पिलर संख्या-16 के बीच एप्रोच रोड अथवा रैम्प निर्माण की मांग कोई नई नहीं है। यह मांग वर्षों से स्थानीय लोगों द्वारा उठाई जाती रही है। क्षेत्र के ग्रामीणों का मानना है कि यदि दीघा-सोनपुर छह लेन पुल के साथ इस स्थान पर एप्रोच रोड और रैम्प का निर्माण हो जाए तो हजारों लोगों का जीवन आसान हो जाएगा। इससे न केवल आवागमन की सुविधा बढ़ेगी बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार से जुड़े अवसर भी विकसित होंगे।

इस मुद्दे को लेकर दियारा विकास संघर्ष समिति लगातार सक्रिय रही है। समिति ने जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों के समक्ष अपनी बात रखी है। आंदोलन, ज्ञापन और पत्राचार के माध्यम से इस मांग को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। समिति का तर्क है कि जब इतना बड़ा राष्ट्रीय महत्व का पुल बन रहा है तो उसके आसपास रहने वाले लोगों को भी उसका लाभ मिलना चाहिए। यदि स्थानीय लोगों के लिए पहुंच मार्ग ही उपलब्ध नहीं होगा तो विकास की इस विशाल परियोजना का पूरा लाभ क्षेत्रवासियों तक नहीं पहुंच पाएगा।


इस मामले में पहले पटना साहिब संसदीय क्षेत्र के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर इस मांग का समर्थन किया था। इससे क्षेत्र के लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब उनकी समस्या का समाधान होगा। हालांकि समय बीतता गया और निर्माण कार्य को लेकर कोई स्पष्ट प्रगति सामने नहीं आई। परिणामस्वरूप लोगों की बेचैनी बढ़ती गई।

अब इस मुद्दे को एक नया राजनीतिक और सामाजिक समर्थन तब मिला है जब पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने भी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को स्मरण पत्र भेजा है। 1 जून 2026 को भेजे गए इस पत्र में उन्होंने ग्राम पंचायत नकटा दियारा नया टोला से पिलर संख्या-16 के बीच एप्रोच रोड और रैम्प निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह पत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि स्थानीय जनता की वर्षों पुरानी मांग को फिर से राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास माना जा रहा है।

पप्पू यादव ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि दियारा विकास संघर्ष समिति द्वारा पूर्व में भी इस विषय पर निवेदन किया गया था। उन्होंने कहा कि दीघा-सोनपुर छह लेन पुल के निर्माण के साथ यदि स्थानीय लोगों के लिए उचित संपर्क मार्ग नहीं बनाया गया तो क्षेत्र की बड़ी आबादी विकास की मुख्यधारा से जुड़ने से वंचित रह जाएगी। उन्होंने इस समस्या को जनहित से जुड़ा विषय बताते हुए शीघ्र प्रशासनिक और तकनीकी कार्रवाई की मांग की है।

वास्तव में दियारा क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति ऐसी होती है कि वहां रहने वाले लोगों को वर्षभर अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बाढ़, कटाव, परिवहन की कमी और सीमित सरकारी सुविधाएं यहां के जीवन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। ऐसे में यदि कोई बड़ा पुल या सड़क परियोजना उनके निकट बन रही हो तो स्वाभाविक रूप से लोगों को उससे काफी उम्मीदें होती हैं। नकटा दियारा के लोगों की भी यही अपेक्षा है कि विकास की इस परियोजना से उन्हें सीधे लाभ मिले।

स्थानीय लोगों का कहना है कि एप्रोच रोड और रैम्प नहीं होने के कारण उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में समय लगता है, विद्यार्थियों को शिक्षा संस्थानों तक पहुंचने में परेशानी होती है और किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। आपातकालीन परिस्थितियों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। इसलिए ग्रामीण इसे केवल सड़क निर्माण का विषय नहीं बल्कि जीवन और विकास से जुड़ा मुद्दा मानते हैं।                                                                          

हालांकि यह भी सच है कि किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग या पुल परियोजना में तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक प्रक्रियाएं होती हैं। कई बार भूमि, डिजाइन, लागत और स्वीकृति जैसी वजहों से परियोजनाओं में देरी हो जाती है। लेकिन जब किसी मांग को लेकर लगातार जनप्रतिनिधि पत्र लिख रहे हों और जनता लंबे समय से आवाज उठा रही हो, तब सरकार से अपेक्षा बढ़ जाती है कि वह स्थिति स्पष्ट करे और आवश्यक निर्णय ले।

आज नकटा दियारा के लोग केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई देखना चाहते हैं। रविशंकर प्रसाद के पत्र के बाद अब पप्पू यादव का स्मरण पत्र इस मांग को और मजबूती प्रदान करता है। यह दर्शाता है कि राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर विभिन्न जनप्रतिनिधि इस विषय को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। अब निगाहें केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय पर टिकी हैं कि वह इस मांग पर क्या निर्णय लेता है।

यदि एप्रोच रोड और रैम्प का निर्माण होता है तो यह केवल एक निर्माण कार्य नहीं होगा, बल्कि दियारा क्षेत्र के हजारों लोगों के लिए विकास का नया द्वार खुलेगा। इसलिए क्षेत्रवासियों की अपेक्षा है कि "लेटर पर लेटर" की प्रक्रिया अब समाप्त हो और उसकी जगह "एक्शन पर एक्शन" दिखाई दे, ताकि वर्षों से लंबित यह मांग वास्तविकता का रूप ले सके।

आलोक कुमार

India : पत्रकारिता पर दबाव और सच बोलने की कीमत

 पत्रकारिता पर दबाव और सच बोलने की कीमत

लोकतंत्र के चार स्तंभों में पत्रकारिता को विशेष स्थान दिया गया है। पत्रकार का काम केवल समाचार लिखना या प्रसारित करना नहीं होता, बल्कि समाज और सत्ता के बीच एक सेतु का कार्य करना भी होता है। वह जनता की समस्याओं को सामने लाता है, प्रशासन से सवाल पूछता है और जनहित के मुद्दों को बहस का विषय बनाता है। लेकिन वर्तमान समय में पत्रकारिता का यह आदर्श स्वरूप कई प्रकार के दबावों के बीच संघर्ष करता दिखाई दे रहा है।

अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि आज के पत्रकार पहले की तरह निर्भीक नहीं रहे। वे सरकार से तीखे सवाल नहीं पूछते, बड़े संस्थानों के खिलाफ खबरें नहीं चलाते और कई बार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं। यह आलोचना पूरी तरह गलत भी नहीं है, लेकिन इसके पीछे की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। पत्रकारिता केवल कलम और कैमरे का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे नौकरी, परिवार, आर्थिक सुरक्षा और संस्थागत दबाव जैसी अनेक वास्तविकताएं भी जुड़ी होती हैं।

एक उदाहरण के रूप में देखा जाए तो किसी अस्पताल, सरकारी विभाग या प्रभावशाली संस्था के खिलाफ प्रकाशित एक समाचार कई बार संबंधित संस्थान में हलचल पैदा कर देता है। यदि खबर तथ्यात्मक हो और जनहित में हो, तब भी उससे नाराज लोग पत्रकार पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। कई बार यह दबाव सीधे पत्रकार पर नहीं, बल्कि उसके संस्थान पर डाला जाता है। परिणामस्वरूप पत्रकार को स्पष्टीकरण देना पड़ता है, चेतावनी मिलती है या कुछ मामलों में नौकरी तक खतरे में पड़ जाती है।                          

स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब पत्रकारों के बीच भी पद और प्रभाव का अंतर सामने आने लगता है। कई संस्थानों में वरिष्ठ पत्रकारों की राय को अंतिम माना जाता है। यदि किसी जूनियर पत्रकार की रिपोर्ट किसी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्था को असहज करती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की संभावना बढ़ जाती है। इससे युवा पत्रकारों में एक संदेश जाता है कि जोखिम उठाने से बेहतर है कि सुरक्षित और सामान्य खबरें की जाएं।

पत्रकारिता पर दबाव का एक बड़ा कारण आर्थिक ढांचा भी है। अधिकांश मीडिया संस्थान विज्ञापन से संचालित होते हैं। विज्ञापनदाता यदि नाराज हो जाएं तो संस्थान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी प्रकार सरकारी विज्ञापन भी कई समाचार संस्थानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। ऐसे में संस्थान कई बार टकराव से बचने की नीति अपनाते हैं। इसका सीधा असर रिपोर्टरों और संवाददाताओं की कार्यशैली पर पड़ता है।

हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग या किसी प्रेस वार्ता में पूछे गए सवाल को विवाद का विषय बना दिया गया। उत्तर प्रदेश में एक संवाददाता के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई का अनुरोध किए जाने का मामला भी इसी बहस को जन्म देता है। पत्र में आरोप लगाया गया कि संवाददाता ने प्रेस वार्ता में व्यवधान डाला और कानून-व्यवस्था प्रभावित करने का प्रयास किया। ऐसे मामलों की सच्चाई और निष्पक्ष जांच अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन जब किसी पत्रकार के खिलाफ सरकारी स्तर पर पत्राचार होता है तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पूरे पत्रकार समुदाय पर पड़ता है।

हर पत्रकार यह सोचने लगता है कि यदि किसी सवाल के कारण उसके खिलाफ शिकायत हो सकती है, तो क्या भविष्य में वह उसी निर्भीकता से सवाल पूछ पाएगा? यह डर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पेशे के वातावरण को प्रभावित करता है। पत्रकारिता में भय का माहौल जितना बढ़ेगा, उतना ही जनहित के मुद्दे पीछे छूटते जाएंगे।

दूसरी ओर यह भी सच है कि पत्रकारिता के नाम पर अनुशासनहीनता या व्यक्तिगत एजेंडा चलाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। पत्रकारों को भी पेशेवर मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। तथ्यों की जांच, भाषा की शालीनता और संस्थागत नियमों का सम्मान पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि किसी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई केवल इसलिए हो कि उसने असुविधाजनक सवाल पूछे या किसी प्रभावशाली व्यवस्था की खामियों को उजागर किया, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

आज सोशल मीडिया ने पत्रकारों को एक वैकल्पिक मंच उपलब्ध कराया है। अनेक पत्रकार पारंपरिक संस्थानों की सीमाओं से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने लगे हैं। हालांकि वहां भी चुनौतियां कम नहीं हैं, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक नया रास्ता अवश्य खुला है। फिर भी संगठित मीडिया की भूमिका को कोई विकल्प पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।

समाज को यह समझना होगा कि मजबूत लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता आवश्यक है। पत्रकार से निर्भीक सवालों की अपेक्षा करने से पहले उसे सुरक्षित वातावरण देना भी उतना ही जरूरी है। यदि हर खबर के बाद कार्रवाई, हर सवाल के बाद शिकायत और हर आलोचना के बाद दंड की आशंका बनी रहेगी, तो पत्रकारिता का स्वाभाविक साहस कमजोर पड़ता जाएगा।

अंततः पत्रकारिता केवल पत्रकारों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का विषय है। जब पत्रकार स्वतंत्र होकर काम करता है तो जनता को सच्चाई जानने का अवसर मिलता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारों की जवाबदेही के साथ-साथ उनकी स्वतंत्रता और सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए। तभी लोकतंत्र का यह महत्वपूर्ण स्तंभ अपनी वास्तविक भूमिका निभा सकेगा और जनता के हितों की रक्षा कर पाएगा।

आलोक कुमार

World : ईसाई धर्म में संस्कारों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है

ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर के साथ संबंध को सुदृढ़ करने के माध्यम माने जाते हैं


ईसाई धर्म
में संस्कारों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर के साथ संबंध को सुदृढ़ करने के माध्यम माने जाते हैं। इनमें बपतिस्मा (Baptism) और परमप्रसाद (Holy Communion या Eucharist) विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। किसी भी ईसाई बच्चे के धार्मिक जीवन की शुरुआत बपतिस्मा से होती है, जबकि परमप्रसाद उसे मसीह के साथ गहरे आध्यात्मिक संबंध में प्रवेश कराने वाला संस्कार माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न ईसाई परंपराओं में बच्चों को परमप्रसाद देने की आयु, प्रक्रिया और नियमों को लेकर अलग-अलग मान्यताएं विकसित हुई हैं।

बपतिस्मा संस्कार को ईसाई जीवन का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इस संस्कार के माध्यम से व्यक्ति को पापों से शुद्ध माना जाता है और उसे कलीसिया का सदस्य स्वीकार किया जाता है। अधिकांश ईसाई संप्रदायों में बपतिस्मा के बाद ही व्यक्ति अन्य संस्कारों को ग्रहण करने का अधिकारी बनता है। हालांकि, परमप्रसाद प्राप्त करने के लिए केवल बपतिस्मा पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि बच्चे की धार्मिक समझ, तैयारी और विश्वास की परिपक्वता को भी महत्व दिया जाता है।

कैथोलिक चर्च में प्रथम परमप्रसाद (First Holy Communion) एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर होता है। सामान्यतः सात या आठ वर्ष की आयु को "विवेक की आयु" माना जाता है। इस उम्र में यह माना जाता है कि बच्चा सही और गलत के बीच अंतर समझने लगता है तथा यूखारिस्ट के महत्व को ग्रहण करने में सक्षम हो जाता है। प्रथम परमप्रसाद से पहले बच्चों को विशेष धार्मिक शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें यीशु मसीह, अंतिम भोज, पवित्र मिस्सा और परमप्रसाद के महत्व के बारे में बताया जाता है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश स्थानों पर बच्चों को पहली बार स्वीकारोक्ति या पापस्वीकार (Confession) का संस्कार भी ग्रहण कराना आवश्यक माना जाता है। इसके बाद एक विशेष समारोह में बच्चे पहली बार प्रभु के शरीर और रक्त के प्रतीक स्वरूप पवित्र प्रसाद ग्रहण करते हैं। 


एंग्लिकन परंपरा, जो कई मामलों में कैथोलिक परंपरा से मिलती-जुलती है, में भी बच्चों को धार्मिक शिक्षा और तैयारी के बाद प्रथम परमप्रसाद दिया जाता है। हालांकि विभिन्न देशों और चर्च प्रांतों में नियमों में कुछ भिन्नता देखने को मिल सकती है। कई एंग्लिकन चर्चों में पुष्टिकरण (Confirmation) के बाद ही नियमित रूप से परमप्रसाद ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है, जबकि कुछ स्थानों पर बपतिस्मा प्राप्त बच्चों को पहले ही परमप्रसाद दिया जाने लगा है।

रूढ़िवादी या ऑर्थोडॉक्स ईसाई परंपरा इस विषय में एक अलग दृष्टिकोण रखती है। यहाँ यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर की कृपा आयु या बौद्धिक समझ पर निर्भर नहीं करती। इसलिए शिशु के बपतिस्मा के तुरंत बाद ही दृढ़ीकरण (Chrismation) और परमप्रसाद के संस्कार भी प्रदान कर दिए जाते हैं। इस प्रकार एक नवजात शिशु भी कलीसिया के पूर्ण सदस्य के रूप में सभी प्रमुख संस्कारों में सहभागी बन जाता है। ऑर्थोडॉक्स चर्चों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी अधिकांश रूढ़िवादी समुदायों में इसका पालन किया जाता है।

प्रोटेस्टेंट परंपराओं में इस विषय पर अधिक विविधता देखने को मिलती है। कई प्रोटेस्टेंट चर्च यह मानते हैं कि परमप्रसाद ग्रहण करने से पहले व्यक्ति को अपने विश्वास की व्यक्तिगत और सचेत घोषणा करनी चाहिए। इसलिए बच्चों को तब तक परमप्रसाद नहीं दिया जाता जब तक वे स्वयं यीशु मसीह में अपने विश्वास को समझकर स्वीकार न कर लें। कुछ चर्चों में किशोरावस्था के दौरान विशेष कक्षाओं और प्रशिक्षण के बाद बच्चों को परमप्रसाद ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है। वहीं कुछ अन्य प्रोटेस्टेंट समुदायों में बपतिस्मा प्राप्त बच्चों को उनके माता-पिता और पादरी के मार्गदर्शन में अपेक्षाकृत कम आयु में भी परमप्रसाद दिया जा सकता है।

बैपटिस्ट और स्वतंत्र इंजीलवादी कलीसियाओं में तो और भी अधिक व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाया जाता है। यहाँ परमप्रसाद को विश्वासियों की स्मृति और प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए जब कोई बच्चा या युवा अपने विश्वास को समझकर सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता है, तभी उसे प्रभुभोज में भाग लेने योग्य माना जाता है। इस कारण कोई निश्चित आयु सीमा निर्धारित नहीं होती।

भारतीय ईसाई समाज में भी प्रथम परमप्रसाद एक महत्वपूर्ण धार्मिक और पारिवारिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बच्चे विशेष सफेद वस्त्र पहनते हैं, चर्च में सामूहिक प्रार्थना होती है और परिवारजन इस अवसर को खुशी और आशीर्वाद के साथ मनाते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि बच्चे के आध्यात्मिक जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जाता है।


इस प्रकार देखा जाए तो ईसाई धर्म की विभिन्न परंपराओं में परमप्रसाद ग्रहण करने की आयु और प्रक्रिया भिन्न हो सकती है, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है—विश्वासी को प्रभु यीशु मसीह के और अधिक निकट लाना तथा उसके विश्वास को मजबूत बनाना। चाहे वह शिशु अवस्था में दिया जाए, बचपन में या फिर युवावस्था में, परमप्रसाद ईसाई जीवन का एक पवित्र और अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार बना रहता है।

आलोक कुमार

World : प्रत्येक वर्ष 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है

 विश्व साइकिल दिवस: स्वास्थ्य, पर्यावरण और जागरूकता का संदेश

प्रत्येक वर्ष 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस साइकिल जैसे सरल, सुलभ, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन साधन के महत्व को रेखांकित करने के लिए मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त इस दिवस का उद्देश्य लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, प्रदूषण कम करने तथा सतत विकास की दिशा में प्रेरित करना है। वर्ष 2026 में विश्व साइकिल दिवस की थीम “हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना” रखी गई है, जो पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य के बीच गहरे संबंध को उजागर करती है।

इसी अवसर पर कटिहार जिले के समेली प्रखंड में यूथ पावर स्वयंसेवी संगठन तथा मेरा युवा भारत (माय भारत) कटिहार के संयुक्त तत्वावधान में फिट इंडिया जागरूकता साइकिल रैली का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं और आम नागरिकों को फिटनेस, पर्यावरण संरक्षण तथा नियमित शारीरिक गतिविधियों के प्रति जागरूक करना था।                                                                           

कार्यक्रम की अध्यक्षता यूथ पावर के अध्यक्ष हरि प्रसाद मंडल ने की। उद्घाटन समारोह में जिला खेल पदाधिकारी संजीव कुमार सिंह, पंचायती राज पदाधिकारी मोहम्मद आसीम तथा मलहरिया पंचायत के युवा मुखिया राज कुमार भारती मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अतिथियों ने नारियल फोड़कर और फीता काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया तथा हरी झंडी दिखाकर साइकिल रैली को रवाना किया।

अपने संबोधन में जिला खेल पदाधिकारी संजीव कुमार सिंह ने कहा कि स्वस्थ व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र के विकास में अधिक प्रभावी योगदान दे सकता है। उन्होंने युवाओं से सक्रिय जीवनशैली अपनाने की अपील करते हुए कहा कि यदि हम आलस्य छोड़कर नियमित शारीरिक गतिविधियों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें तो न केवल हमारा स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि हमारी कार्यक्षमता और उत्पादकता में भी वृद्धि होगी। उन्होंने इस आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि स्वस्थ भारत के निर्माण का संकल्प बताया।

रैली के दौरान माय भारत के युवा स्वयंसेवक शिवम कुमार और स्वयंसेविका कृति भारती ने आकर्षक नारों के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया। “आओ जरा सेहत बनाएं, सब मिलकर साइकिल चलाएं”, “न बाइक न कार भली, सेहत कहती है साइकिल भली”, “सेहत को दे दो कुछ पल, आओ मिलकर चलाएं साइकिल” तथा “फिटनेस का डोज, आधा घंटा रोज” जैसे नारों ने पूरे वातावरण को उत्साह और जागरूकता से भर दिया।

विश्व साइकिल दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन की उन सरल आदतों की याद दिलाता है जो हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभदायक हैं। आधुनिक जीवनशैली में बढ़ती निष्क्रियता, मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी समस्याएं गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। ऐसे समय में साइकिल चलाना एक आसान और प्रभावी समाधान के रूप में सामने आता है।

नियमित साइकिल चलाने से हृदय और फेफड़े मजबूत होते हैं, शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है तथा वजन नियंत्रित रहता है। यह मांसपेशियों को सक्रिय रखती है और शरीर में रक्त संचार को बेहतर बनाती है। साथ ही यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। साइकिल चलाने से तनाव कम होता है, मन प्रसन्न रहता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी साइकिल का महत्व अत्यधिक है। यह शून्य-उत्सर्जन वाला परिवहन साधन है, जिससे न तो वायु प्रदूषण होता है और न ही ध्वनि प्रदूषण। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब साइकिल का अधिक उपयोग एक सकारात्मक और जिम्मेदार कदम माना जा सकता है।

आर्थिक दृष्टि से भी साइकिल आम लोगों के लिए बेहद उपयोगी साधन है। इसके रखरखाव का खर्च बहुत कम होता है और ईंधन पर निर्भरता भी समाप्त हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक, साइकिल आज भी लाखों लोगों की दैनिक जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

समेली में आयोजित यह साइकिल रैली केवल एक खेल गतिविधि नहीं थी, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण और सामाजिक जागरूकता का सशक्त संदेश देने वाला अभियान था। सैकड़ों प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि युवा पीढ़ी फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीरता से सोच रही है।

विश्व साइकिल दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि हम प्रतिदिन कुछ समय साइकिल चलाने की आदत विकसित करें तो न केवल अपना स्वास्थ्य बेहतर बना सकते हैं, बल्कि स्वच्छ, हरित और स्वस्थ समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन, स्वच्छ पर्यावरण और उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ता एक सशक्त कदम है।

आलोक कुमार 

World : हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है

 विश्व पर्यावरण दिवस : धरती को बचाने का संकल्प

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि मानव समाज को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद इसकी शुरुआत की गई थी और 1973 से यह दिवस विश्व स्तर पर मनाया जाने लगा। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक बनाना है।

आज जब हम विकास और आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं, तब पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के संतुलन को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के ह्रास जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं। ऐसे समय में विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

पर्यावरण केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं है। इसमें हवा, पानी, मिट्टी, पर्वत, नदियाँ, जीव-जंतु और मनुष्य सहित सभी जैविक एवं अजैविक तत्व शामिल हैं। ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और जीवन का आधार बनाते हैं। यदि इनमें से किसी एक घटक को नुकसान पहुँचता है तो उसका प्रभाव पूरे पर्यावरणीय तंत्र पर पड़ता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि प्रकृति के हर घटक के प्रति संवेदनशील होना है।

आज पर्यावरण प्रदूषण सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन चुका है। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, कारखानों का उत्सर्जन, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक अपशिष्ट वायु, जल तथा भूमि को प्रदूषित कर रहे हैं। शहरों में बढ़ती आबादी के कारण हरित क्षेत्र कम होते जा रहे हैं। जंगलों की कटाई से न केवल वन्यजीवों का आवास नष्ट हो रहा है, बल्कि पृथ्वी की कार्बन अवशोषित करने की क्षमता भी घट रही है। इसका सीधा प्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है।

ग्लोबल वार्मिंग वर्तमान समय की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके कारण हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और मौसम के स्वरूप में तेजी से बदलाव हो रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। हीट वेव, चक्रवात और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ पहले की तुलना में अधिक तीव्र और बार-बार होने लगी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

जल संरक्षण भी पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पृथ्वी पर उपलब्ध मीठे पानी की मात्रा सीमित है, लेकिन हम इसका उपयोग अक्सर लापरवाही से करते हैं। नल खुला छोड़ देना, आवश्यकता से अधिक पानी खर्च करना और वर्षा जल का संरक्षण न करना जल संकट को बढ़ावा देता है। आज कई क्षेत्रों में पीने के पानी की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों की रक्षा और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को जीवनशैली का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

प्लास्टिक प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती है। एक बार उपयोग होने वाला प्लास्टिक वर्षों तक नष्ट नहीं होता और मिट्टी, जल तथा जीव-जंतुओं के लिए खतरा बन जाता है। बाजार जाते समय कपड़े के थैले का उपयोग, प्लास्टिक बोतलों और अन्य वस्तुओं का सीमित प्रयोग तथा कचरे का उचित प्रबंधन इस समस्या को कम करने में सहायक हो सकता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण एक प्रभावी उपाय है, लेकिन केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। उनकी देखभाल और संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि लगाए गए पौधे जीवित नहीं रहेंगे तो वृक्षारोपण अभियान का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम कुछ पौधे लगाने और उन्हें पेड़ बनने तक सुरक्षित रखने का संकल्प लेना चाहिए।

कृषि क्षेत्र में भी पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अपनाने की आवश्यकता है। जैविक खेती, प्राकृतिक खाद, देशी बीजों का संरक्षण और रासायनिक उर्वरकों के सीमित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है तथा पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव कम पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों और स्थानीय ज्ञान को पुनर्जीवित करना भी समय की मांग है।

विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि पृथ्वी केवल हमारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। यदि हम आज प्रकृति का सम्मान करेंगे, संसाधनों का संतुलित उपयोग करेंगे और पर्यावरण संरक्षण को अपनी आदत बनाएंगे, तभी भविष्य सुरक्षित रह सकेगा। पर्यावरण की रक्षा किसी एक सरकार, संस्था या संगठन की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

आइए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हम संकल्प लें कि जल बचाएंगे, प्लास्टिक का कम उपयोग करेंगे, अधिक से अधिक पेड़ लगाएंगे, ऊर्जा की बचत करेंगे और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का प्रयास करेंगे। यही धरती के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि और आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ा उपहार होगा।

आलोक कुमार

Kolkata: दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन से उत्पन्न शून्य को भरना आसान नहीं

 दिलीप एंथनी रोजारियो : एक समर्पित संगीतकार और चर्च सेवक को श्रद्धांजलि

कोलकाता
महाधर्मप्रांत (आर्चडायोसिस ऑफ कलकत्ता) के लिए 2 जून 2026 का दिन अत्यंत दुखद रहा। चर्च, संगीत और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन का समाचार मिलते ही शोक की लहर दौड़ गई। वे केवल एक प्रतिभाशाली संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि एक समर्पित ले-विश्वासी (Lay Faithful) और चर्च के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। उनके निधन से चर्च समुदाय ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जिसने अपना जीवन सेवा, संगीत और सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था।

दिलीप एंथनी रोजारियो का जन्म 17 जून 1962 को हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत के प्रति विशेष लगाव था। उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर चर्च संगीत के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई। उनके नेतृत्व और योगदान से अनेक धार्मिक कार्यक्रमों तथा प्रार्थना सभाओं को नई ऊँचाइयाँ मिलीं। वे कोलकाता क्रिश्चियन कॉयर से भी जुड़े रहे और अपनी मधुर प्रस्तुति तथा संगीत निर्देशन के लिए व्यापक रूप से सम्मानित किए जाते थे।

चर्च के प्रति उनकी निष्ठा केवल संगीत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महाधर्मप्रांत के लेटी आयोग (Laity Commission) के प्रमुख के रूप में भी कार्य किया। इस जिम्मेदारी के दौरान उन्होंने आम विश्वासियों को चर्च की गतिविधियों से जोड़ने, युवाओं को प्रेरित करने और समाज में ईसाई मूल्यों के प्रसार के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। उनका व्यक्तित्व सरल, विनम्र और प्रेरणादायक था, जिसके कारण वे सभी आयु वर्ग के लोगों के प्रिय बने रहे।

उनके निधन की सूचना मिलने के बाद सोशल मीडिया पर शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। अनेक लोगों ने उन्हें एक दयालु, सहृदय और समर्पित व्यक्ति बताया। जिन्होंने उनके साथ कार्य किया था, वे उनकी सादगी और सेवा भावना को याद कर रहे हैं। कई लोगों ने कहा कि वे चर्च और समाज के लिए सदैव उपलब्ध रहने वाले व्यक्ति थे। दूसरों की सहायता करना और समुदाय को जोड़कर रखना उनकी विशेष पहचान थी।

उनके एक परिचित ने लिखा कि यह समाचार सुनकर उन्हें गहरा आघात लगा है। उन्होंने कहा कि दिलीप रोजारियो एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सुसमाचार के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया। वहीं अन्य श्रद्धांजलि संदेशों में उन्हें एक उत्कृष्ट संगीतकार, संवेदनशील इंसान और प्रेरणास्रोत बताया गया। लोगों ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

दिलीप रोजारियो का जीवन इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा और सेवा भावना जब एक साथ आती हैं, तो समाज पर गहरा सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं। उन्होंने संगीत को केवल कला के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे ईश्वर की महिमा और लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया। उनके गीत, उनकी प्रस्तुतियाँ और उनका मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

आज जब चर्च समुदाय उन्हें याद कर रहा है, तब उनके जीवन की सबसे बड़ी विरासत उनकी सेवा, समर्पण और प्रेम की भावना है। उन्होंने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए निस्वार्थ कार्यों में होती है। उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी, लेकिन उनके द्वारा छोड़े गए आदर्श और मूल्य सदैव जीवित रहेंगे।                                                         

दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन से उत्पन्न शून्य को भरना आसान नहीं होगा। फिर भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर चर्च और समाज के लोग उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। उनकी स्मृतियाँ, उनका संगीत और उनकी सेवा भावना सदैव लोगों के हृदय में जीवित रहेगी।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को अनंत शांति प्रदान करें तथा उनके परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों को इस कठिन समय में धैर्य और शक्ति दें। दिलीप एंथनी रोजारियो को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी आत्मा चिरशांति में विश्राम करे। (RIP)

आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...