Bihar : बिहार विधानसभा का मुख्य सचेतक नियुक्त कर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी

 दीघा विधानसभा क्षेत्र से लगातार सक्रिय राजनीति करने वाले डॉ. संजीव चौरसिया संगठन और जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ के लिए जाने जाते हैं

बिहार की राजनीति में दीघा विधानसभा क्षेत्र का हमेशा एक विशेष महत्व रहा है। राजधानी पटना से जुड़ा यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय माना जाता है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में दीघा विधानसभा के विधायक डॉ. संजीव चौरसिया को मंत्री पद नहीं मिलने की चर्चा जरूर रही, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उन्हें बिहार विधानसभा का मुख्य सचेतक नियुक्त कर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। यह पद केवल सम्मान का प्रतीक नहीं होता, बल्कि विधानसभा की कार्यवाही और सरकार की रणनीति को सफलतापूर्वक संचालित करने में इसकी बड़ी भूमिका होती है।


दीघा विधानसभा क्षेत्र से लगातार सक्रिय राजनीति करने वाले डॉ. संजीव चौरसिया संगठन और जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ के लिए जाने जाते हैं। लंबे समय से वे क्षेत्र में सड़क, जलनिकासी, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंपर्क जैसे मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। मंत्री पद की उम्मीद रखने वाले समर्थकों को भले कुछ समय के लिए निराशा हुई हो, लेकिन मुख्य सचेतक का पद मिलने के बाद राजनीतिक जानकार इसे संगठन की ओर से विश्वास और जिम्मेदारी दोनों मान रहे हैं।

बिहार विधानसभा का मुख्य सचेतक बनना कोई साधारण दायित्व नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में सचेतक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। मुख्य सचेतक सदन में पार्टी के विधायकों को अनुशासन में रखने, महत्वपूर्ण विधेयकों के समय उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने तथा पार्टी की नीतियों और रणनीतियों को विधायकों तक पहुंचाने का कार्य करता है। विधानसभा में किस मुद्दे पर पार्टी का क्या रुख होगा, किस विधेयक पर समर्थन या विरोध करना है, इन सभी बातों का समन्वय मुख्य सचेतक के माध्यम से किया जाता है।

मुख्य सचेतक का सबसे बड़ा दायित्व यह होता है कि सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चले और सरकार को किसी प्रकार की असहज स्थिति का सामना न करना पड़े। यदि किसी महत्वपूर्ण बिल या विश्वास मत के दौरान विधायक अनुपस्थित रहते हैं, तो सरकार की स्थिति कमजोर हो सकती है। ऐसे में मुख्य सचेतक विधायकों से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं और उन्हें पार्टी लाइन के अनुसार मतदान करने के लिए निर्देशित करते हैं। राजनीतिक दृष्टि से यह पद मुख्यमंत्री और संसदीय कार्य मंत्री के बाद अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

डॉ. संजीव चौरसिया को यह जिम्मेदारी मिलना इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व उन्हें एक भरोसेमंद और संगठनात्मक क्षमता वाले नेता के रूप में देखता है। विधानसभा में सरकार और विधायकों के बीच बेहतर तालमेल बनाना आसान कार्य नहीं होता। विपक्ष के तीखे सवालों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सदन को व्यवस्थित रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में अनुभव, संयम और संवाद कौशल की आवश्यकता होती है।

दीघा क्षेत्र के लोगों में भी इस नियुक्ति को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि मंत्री पद भले नहीं मिला हो, लेकिन मुख्य सचेतक के रूप में डॉ. संजीव चौरसिया की भूमिका सरकार और संगठन दोनों में प्रभावशाली होगी। इससे दीघा विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक पहचान और मजबूत होगी।

डॉ. संजीव चौरसिया को नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्हें बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। भाजपा और सामाजिक संगठनों से जुड़े कई नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने उन्हें शुभकामनाएं दी हैं। बधाई देने वालों में संजय राय, अरविंद कुमार वर्मा, राजन क्लेमेंट साह, धर्मेंद्र यादव सहित अनेक नेताओं और समर्थकों के नाम प्रमुख हैं। सभी ने आशा व्यक्त की है कि उनके नेतृत्व में संगठन और विधानसभा दोनों में बेहतर कार्य होंगे।

समर्थकों का कहना है कि डॉ. संजीव चौरसिया हमेशा जनता के बीच रहने वाले नेता रहे हैं। क्षेत्र की समस्याओं को लेकर वे लगातार सक्रिय रहते हैं। यही कारण है कि उन्हें संगठन ने इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। लोगों को विश्वास है कि वे अपनी नई भूमिका में भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ कार्य करेंगे।

राजनीति में केवल मंत्री पद ही प्रभाव का माध्यम नहीं होता। कई बार संगठनात्मक और संसदीय जिम्मेदारियां अधिक महत्वपूर्ण साबित होती हैं। मुख्य सचेतक के रूप में डॉ. संजीव चौरसिया को सरकार और पार्टी के बीच सेतु की भूमिका निभानी होगी। विधानसभा के अंदर पार्टी की एकजुटता बनाए रखना और सरकार की नीतियों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी होगी।

दीघा विधानसभा क्षेत्र के लोगों के लिए यह गर्व का विषय है कि उनके विधायक को राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण दायित्व मिला है। आने वाले समय में उनकी कार्यशैली और नेतृत्व क्षमता की परीक्षा भी होगी। यदि वे इस जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाते हैं, तो भविष्य में उनकी राजनीतिक भूमिका और भी बड़ी हो सकती है।

फिलहाल समर्थकों और क्षेत्रवासियों की ओर से उन्हें लगातार शुभकामनाएं दी जा रही हैं। लोगों का कहना है कि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि डॉ. संजीव चौरसिया अपने अनुभव और नेतृत्व क्षमता के बल पर विधानसभा में पार्टी को मजबूती देंगे तथा जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे।

आलोक कुमार

Bihar: स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार स्वयं अस्पताल के प्राइवेट वार्ड नंबर 45 में पहुंचे

                 मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और बेहतर चिकित्सा सुविधा के निर्देश दिए

बिहार राज्य महादलित आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान में बिहार राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सम्मानित सदस्य डॉ. हुलेश मांझी आज बिहार की सामाजिक और राजनीतिक दुनिया में एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाते हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन दलित, महादलित और वंचित समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। वे जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के एक समर्पित और जमीनी नेता हैं। राजनीति और सामाजिक सेवा के लंबे अनुभव ने उन्हें समाज के गरीब, शोषित और उपेक्षित वर्गों के बीच विशेष पहचान दिलाई है।

डॉ. हुलेश मांझी का व्यक्तित्व सादगी, सेवा और संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने हमेशा यह कहा कि वे स्वयं को किसी बड़े पद का अधिकारी नहीं, बल्कि जदयू का एक साधारण कार्यकर्ता मानते हैं। यही विनम्रता और कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मान उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है। सामाजिक न्याय की भावना और गरीबों के प्रति संवेदनशीलता उनके कार्यों में स्पष्ट दिखाई देती है।

बिहार राज्य महादलित आयोग के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने महादलित समाज के अधिकारों और विकास के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार और सामाजिक सम्मान जैसे विषयों पर लगातार आवाज उठाई। महादलित समाज के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने, युवाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने तथा समाज में जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने कई कार्यक्रमों को गति प्रदान की। उनके प्रयासों से अनेक गरीब परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचा।

डॉ. मांझी हमेशा यह मानते रहे कि किसी भी समाज का विकास तभी संभव है, जब अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक न्याय और अवसर पहुंचे। इसी सोच के कारण उन्होंने महादलित समुदाय के बीच जाकर उनकी समस्याओं को नजदीक से समझा और सरकार तक उनकी आवाज पहुंचाने का काम किया। समाज के लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण उनका सहज व्यवहार और जनसरोकारों से जुड़ाव रहा है।


वर्तमान समय में वे बिहार राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। बच्चों के अधिकारों की रक्षा, बाल शिक्षा, बाल सुरक्षा तथा बाल श्रम जैसे मुद्दों पर उनकी गंभीर सोच दिखाई देती है। वे मानते हैं कि बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना ही समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

हाल ही में एक सड़क दुर्घटना में उनका बायां पैर फ्रैक्चर हो गया, जिसके बाद उन्हें पटना स्थित Indira Gandhi Institute of Medical Sciences में भर्ती कराया गया। इस खबर से उनके समर्थकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जदयू कार्यकर्ताओं में चिंता की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोगों ने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की।

इस दौरान बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री श्री निशांत कुमार ने स्वयं अस्पताल पहुंचकर डॉ. हुलेश मांझी का कुशलक्षेम जाना। उनके साथ स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव कुमार रवि जी एवं हरिद्वार सर जी भी उपस्थित थे। स्वास्थ्य मंत्री का यह मानवीय और संवेदनशील व्यवहार लोगों के बीच चर्चा का विषय बना। इससे यह संदेश गया कि सरकार अपने वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं और समर्पित नेताओं के प्रति संवेदनशील है।


अस्पताल में मुलाकात के दौरान निशांत कुमार ने डॉक्टरों से उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली तथा बेहतर इलाज सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। डॉ. हुलेश मांझी ने भी अस्पताल पहुंचकर उनका हालचाल जानने वाले सभी लोगों के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार, अधिकारियों, समर्थकों और शुभचिंतकों को धन्यवाद देते हुए कहा कि लोगों का स्नेह और आशीर्वाद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

डॉ. मांझी ने भावुक होकर कहा कि वे जीवनभर समाज और पार्टी के लिए कार्य करते रहेंगे। उन्होंने जदयू नेतृत्व और बिहार सरकार के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री Nitish Kumar के नेतृत्व में बिहार में सामाजिक न्याय और विकास की दिशा में लगातार काम हो रहा है, जिसका लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंच रहा है।

जदयू कार्यकर्ताओं ने भी डॉ. हुलेश मांझी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए उनके योगदान को याद किया। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने हमेशा गरीबों और दलितों की आवाज बुलंद की तथा संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी सादगी और संघर्षशील जीवनशैली आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

डॉ. हुलेश मांझी का जीवन यह बताता है कि सामाजिक सेवा केवल पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि समर्पण और संवेदनशीलता से होती है। उन्होंने समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सम्मान दिलाने के लिए निरंतर संघर्ष किया है। यही कारण है कि आज वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि समाज के प्रेरणास्रोत के रूप में देखे जाते हैं।

उनके समर्थक और शुभचिंतक ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे शीघ्र स्वस्थ होकर फिर से समाज सेवा और जनकल्याण के कार्यों में सक्रिय हों। बिहार की सामाजिक और राजनीतिक दुनिया में डॉ. हुलेश मांझी का योगदान हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा। “जय जदयू जिंदाबाद” के नारों के बीच उनके प्रति लोगों का स्नेह और सम्मान यह साबित करता है कि जनता के बीच उनकी मजबूत पहचान और लोकप्रियता आज भी कायम है।

आलोक कुमार

Bihar: डॉ. संजीव चौरसिया बिहार विधानसभा के मुख्य सचेतक नियुक्त

 डॉ. संजीव चौरसिया बिहार विधानसभा के मुख्य सचेतक नियुक्त

 बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार विधानसभा के सुचारू संचालन और सदन में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण सचेतकों की नियुक्ति की है। पत्रांक 4610116 दिनांक 15-05-2026 के तहत जारी इस अधिसूचना में डॉ. संजीव चौरसिया को मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है।आधिकारिक नियुक्ति विवरण:मुख्य सचेतक

डॉ. संजीव चौरसिया (181-दीघा)उप मुख्य सचेतक

श्री मंजीत कुमार सिंह (100-बैटरी)अन्य सचेतक  श्रीमती गायत्री देवी (25-बैरिया)  

श्री राजू तिवारी (14-मोतिहारी)  

श्री राम विलास कामत (42-पिपरा)  

श्री सुभाष शेखर (31-हरलाखी)  

श्री रामा रणजीत (18-मधुबन)  

श्री ललित नारायण मंडल (157-मुलानिया)  

श्री कृष्ण कुमार झा (59-बनमंझी)  

श्री अरुण मांझी (189-मसौढ़ी)  

श्री रमेश कुमार (184-पटना साहिब)

यह नियुक्ति बिहार विधानसभा में सत्तापक्ष (एनडीए) के सदस्यों को मजबूत संगठनात्मक ढांचा प्रदान करने के लिए की गई है। अधिसूचना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इनकी नियुक्ति सदन के कार्यों को सुव्यवस्थित करने, सदस्यों के बीच समन्वय बनाए रखने और पार्टी अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है।मुख्य सचेतक की भूमिकाडॉ. संजीव चौरसिया को मुख्य सचेतक बनाए जाने के साथ अब उनकी जिम्मेदारी सदन में सरकार की नीतियों का प्रभावी ढंग से बचाव करना, मत विभाजन के दौरान सदस्यों को निर्देशित करना, अनुपस्थिति पर नजर रखना और विपक्ष की किसी भी रणनीति का मुकाबला करना होगा। 

दीघा विधानसभा क्षेत्र से आने वाले डॉ. संजीव चौरसिया चिकित्सा पृष्ठभूमि से जुड़े नेता हैं और स्थानीय स्तर पर सक्रिय माने जाते हैं।उप मुख्य सचेतक श्री मंजीत कुमार सिंह मुख्य सचेतक की अनुपस्थिति में उनकी भूमिका संभालेंगे। शेष नौ सदस्य क्षेत्रीय स्तर पर सचेतक के रूप में काम करेंगे और अपने-अपने क्षेत्र के विधायकों के साथ समन्वय बनाए रखेंगे।राजनीतिक महत्वबिहार विधानसभा में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य काफी सक्रिय है। विपक्षी दलों (महागठबंधन) द्वारा अक्सर सदन में हंगामा और अड़ंगेबाजी की शिकायतें रहती हैं। ऐसे में मजबूत सचेतक दल की नियुक्ति सरकार के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम है। सम्राट चौधरी की सरकार बिहार को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दावा करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और रोजगार जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सदन में स्थिरता आवश्यक है।ये नियुक्तियां एनडीए के अंदरूनी


संगठन को भी मजबूती प्रदान करती हैं। विभिन्न जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए इन नामों का चयन किया गया प्रतीत होता है। पटना साहिब, दीघा, बैरिया, मोतिहारी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़े विधायकों को जिम्मेदारी दी गई है।अपेक्षाएं और चुनौतियांनई नियुक्त सचेतकों से अपेक्षा की जा रही है कि वे:सदस्यों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करें

मतदान के समय पार्टी लाइन का पालन करवाएं

क्षेत्रीय मुद्दों को सदन तक पहुंचाएं

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के विकास एजेंडे को मजबूती दें

बिहार में राजनीति हमेशा से गतिशील रही है। जाति, क्षेत्र और विकास के मुद्दे एक साथ चलते हैं। इन सचेतकों को इन जटिलताओं के बीच संतुलन बनाते हुए काम करना होगा।सम्राट चौधरी का नेतृत्वमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार प्रशासनिक और संगठनात्मक मजबूती पर जोर दे रहे हैं। हाल के महीनों में कई विभागों में सुधार और नई योजनाओं की घोषणा की गई है। इस अधिसूचना को उसी क्रम में देखा जा रहा है। विधानसभा के आगामी सत्र में इन सचेतकों की भूमिका निर्णायक साबित हो सकती है, खासकर बजट सत्र और महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान।सरकार की प्राथमिकताओं में बिहार को आत्मनिर्भर बनाने, युवाओं को रोजगार देने, महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण, कृषि सुधार और बुनियादी ढांचे के विकास शामिल हैं। 

सचेतक इन योजनाओं को सदन में प्रभावी बहस और पास कराने में सहायक सिद्ध होंगे।निष्कर्ष15 मई 2026 की यह अधिसूचना बिहार विधानसभा की कार्यप्रणाली को और अधिक अनुशासित और प्रभावी बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। डॉ. संजीव चौरसिया के नेतृत्व में गठित यह 11 सदस्यीय सचेतक दल सदन की गरिमा बनाए रखने और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देने का कार्य करेगा।जनता अब इन नए नियुक्त सचेतकों से अपेक्षा रखती है कि वे न केवल पार्टी अनुशासन बनाए रखें बल्कि आम आदमी की समस्याओं को भी सरकार तक पहुंचाएं। बिहार के विकास यात्रा में यह नियुक्ति एक सकारात्मक पहल साबित हो, यही कामना है।

आलोक कुमार

India : भारतीय संस्कृति और परंपराओं में पति-पत्नी के अटूट प्रेम

वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति में परिवार, प्रेम, निष्ठा और वैवाहिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक भी

भारतीय संस्कृति और परंपराओं में पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माने जाने वाले वट सावित्री व्रत को शनिवार को महिलाओं ने पूरे श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ मनाया। शहर से लेकर गांवों तक वट वृक्षों के नीचे सुबह से ही पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो गया था। सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत रखा तथा वट सावित्री माता की आराधना की। इस अवसर पर मंदिरों और वट वृक्षों के आसपास श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही। वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना हुआ था।

सूर्योदय होते ही महिलाएं नए वस्त्र और सोलह श्रृंगार धारण कर पूजा सामग्री के साथ वट वृक्ष के नीचे पहुंचने लगी थीं। महिलाओं के हाथों में पूजा की थालियां थीं, जिनमें हलवा-पूड़ी, गुड़, भीगा हुआ चना, आटे से बनी मिठाइयां, कुमकुम, रोली, अक्षत, धूप, घी का दीपक, जल, पान के पत्ते तथा विभिन्न प्रकार के फल शामिल थे। व्रती महिलाओं ने सबसे पहले वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर पूजा-अर्चना की। इसके बाद वृक्ष के तने पर कच्चे सूत या धागे को लपेटते हुए उसकी परिक्रमा की गई।

कई महिलाओं ने सात बार, कुछ ने 21 बार तो कई श्रद्धालुओं ने 51 और 108 बार तक वट वृक्ष की परिक्रमा कर अपने परिवार की खुशहाली और पति की दीर्घायु की कामना की। महिलाओं के चेहरे पर श्रद्धा और आस्था स्पष्ट दिखाई दे रही थी। पूजा के दौरान महिलाओं ने वट सावित्री माता के गीत भी गाए, जिससे वातावरण और भी आध्यात्मिक हो उठा।

पूजा स्थलों पर पुरोहितों द्वारा महिलाओं को वट सावित्री व्रत की कथा सुनाई गई। कथा में बताया गया कि किस प्रकार पतिव्रता सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता और अटूट प्रेम के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यह कथा भारतीय नारी के दृढ़ संकल्प, त्याग और पति के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। कथा सुनने के बाद महिलाओं ने सावित्री और सत्यवान की पूजा कर आशीर्वाद मांगा।

वट सावित्री व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत विशेष माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार वट वृक्ष को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास माना गया है। इसी कारण वट वृक्ष की पूजा करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

शहरों के पार्कों, मंदिर परिसरों और गांवों के पुराने बरगद के पेड़ों के नीचे सुबह से ही मेले जैसा दृश्य दिखाई दे रहा था। कहीं महिलाएं समूह बनाकर पूजा कर रही थीं तो कहीं कथा श्रवण में लीन थीं। पूजा स्थलों के आसपास श्रृंगार सामग्री, फल और प्रसाद की दुकानों पर भी अच्छी खासी भीड़ रही। बच्चों में भी उत्साह देखा गया। महिलाएं जहां पूजा-पाठ में व्यस्त थीं, वहीं उनके साथ आए बच्चे खेलकूद और उछलकूद में मग्न दिखाई दिए।

गांवों में यह पर्व पारंपरिक लोकगीतों और सामूहिक पूजा के साथ मनाया गया। कई स्थानों पर महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की शुभकामनाएं दीं। पूजा के बाद महिलाओं ने बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखने के बाद महिलाओं ने शाम अथवा तीसरे पहर पूजा संपन्न कर मीठा भोजन ग्रहण किया। कई घरों में खास तौर पर खीर, पूड़ी, पुआ और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। व्रत पूर्ण होने के बाद महिलाओं के चेहरे पर संतोष और श्रद्धा की चमक साफ दिखाई दे रही थी।

वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में परिवार, प्रेम, निष्ठा और वैवाहिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक भी है। आधुनिक समय में भी इस पर्व के प्रति महिलाओं की आस्था और उत्साह कम नहीं हुआ है। बदलते दौर में भी महिलाएं पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस परंपरा को निभा रही हैं, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और पारिवारिक मूल्यों को दर्शाता है।

आलोक कुमार

India : मानव सभ्यता का विकास विज्ञान और नवाचार के कारण संभव

 16 मई : इतिहास, प्रेरणा और संकल्प का दिवस

16 मई का दिन विश्व और भारत के इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं, महान व्यक्तित्वों और प्रेरणादायक प्रसंगों के कारण विशेष महत्व रखता है। यह दिन हमें इतिहास से सीख लेने, वर्तमान को समझने और भविष्य के लिए नए संकल्प लेने की प्रेरणा देता है। किसी भी दिन का महत्व केवल कैलेंडर की एक तारीख तक सीमित नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी घटनाएँ, उपलब्धियाँ और संदेश उसे यादगार बनाते हैं। 16 मई भी ऐसा ही एक दिन है, जो राजनीति, विज्ञान, समाज, संस्कृति और मानवता के अनेक आयामों को अपने भीतर समेटे हुए है।

भारत के लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण दिन

भारतीय राजनीति के इतिहास में 16 मई का विशेष स्थान है। वर्ष 2014 में इसी दिन लोकसभा चुनावों के परिणाम घोषित हुए थे, जिसने देश की राजनीति की दिशा बदल दी। भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया। यह चुनाव लोकतंत्र की शक्ति, जनता के विश्वास और परिवर्तन की आकांक्षा का प्रतीक माना गया। करोड़ों मतदाताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेकर यह साबित किया कि भारत का लोकतंत्र दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में से एक है।

लोकसभा चुनाव केवल सरकार बनाने का माध्यम नहीं होते, बल्कि यह जनता की भावनाओं, उम्मीदों और समस्याओं का प्रतिबिंब भी होते हैं। 16 मई हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च शक्ति है और प्रत्येक नागरिक का मत देश के भविष्य को निर्धारित करता है।

सिक्किम राज्य दिवस

16 मई को भारत के सुंदर और प्राकृतिक राज्य सिक्किम का स्थापना दिवस भी मनाया जाता है। वर्ष 1975 में सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना था। हिमालय की गोद में बसा सिक्किम अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जैव विविधता, स्वच्छता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ की शांत वादियाँ, बर्फ से ढके पर्वत और बौद्ध संस्कृति लोगों को आकर्षित करती है।

सिक्किम ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी उदाहरण प्रस्तुत किया है। यह भारत का पहला पूर्ण जैविक खेती वाला राज्य बना। यहाँ रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बंद कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया गया। इससे किसानों की आय बढ़ी और पर्यावरण को भी लाभ मिला। 16 मई का दिन हमें प्रकृति संरक्षण और सतत विकास का संदेश देता है।

विज्ञान और नवाचार की प्रेरणा

मानव सभ्यता का विकास विज्ञान और नवाचार के कारण संभव हुआ है। 16 मई हमें वैज्ञानिक सोच और नई खोजों के महत्व की याद दिलाता है। आज का युग तकनीक और डिजिटल क्रांति का युग है। मोबाइल, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष विज्ञान ने जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। विज्ञान ने चिकित्सा, शिक्षा, संचार और कृषि के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है।                                        

इस दिन हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अंधविश्वास से दूर रहकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँगे। भारत जैसे युवा देश के लिए विज्ञान और शिक्षा सबसे बड़ी शक्ति हैं। यदि युवाओं को सही दिशा और अवसर मिले तो वे देश को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।

समाज और मानवता का संदेश

16 मई केवल ऐतिहासिक घटनाओं का दिन नहीं, बल्कि समाज सेवा और मानवता के मूल्यों को याद करने का अवसर भी है। दुनिया में आज भी गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव और हिंसा जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। ऐसे समय में समाज के प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह जरूरतमंदों की सहायता करे और समाज में प्रेम, भाईचारा तथा सद्भाव बनाए रखे।

मानवता का सबसे बड़ा धर्म सेवा है। यदि हम किसी गरीब की मदद करते हैं, किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं या किसी बच्चे को शिक्षा दिलाने में सहयोग करते हैं, तो यही सच्ची राष्ट्र सेवा है। 16 मई हमें दूसरों के लिए जीने और समाज को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।

युवा शक्ति और नए अवसर

भारत विश्व का सबसे युवा देश माना जाता है। युवाओं के पास ऊर्जा, प्रतिभा और नवाचार की क्षमता होती है। 16 मई युवाओं को यह संदेश देता है कि वे केवल नौकरी पाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने कौशल और मेहनत से नए अवसर पैदा करें। आज स्टार्टअप, डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र युवाओं के लिए खुले हैं।

युवा यदि अनुशासन, ईमानदारी और मेहनत को अपनाएँ तो वे समाज और देश दोनों को बदल सकते हैं। खेल, शिक्षा, तकनीक, कला और सामाजिक सेवा—हर क्षेत्र में भारतीय युवाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। यह दिन युवाओं को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।

पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रही है। बढ़ते तापमान, घटते जंगल और दूषित नदियाँ मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं। 16 मई हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक होने का अवसर देता है।

हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने, जल संरक्षण करने और प्लास्टिक के उपयोग को कम करने का संकल्प लेना चाहिए। प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहेंगी।

निष्कर्ष

16 मई केवल एक साधारण तारीख नहीं, बल्कि इतिहास, लोकतंत्र, विज्ञान, मानवता और प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला प्रेरणादायक दिवस है। यह दिन हमें अपने कर्तव्यों को समझने, समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने और देश के विकास में योगदान देने की प्रेरणा देता है।

हमें इस दिन यह संकल्प लेना चाहिए कि हम शिक्षा, ईमानदारी, मेहनत और मानवता के मार्ग पर चलेंगे। लोकतंत्र को मजबूत बनाएँगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे और समाज में प्रेम तथा भाईचारे को बढ़ावा देंगे। जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य को समझेगा, तभी भारत एक मजबूत, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बन सकेगा।

आलोक कुमार

UP: सीएनआई के भूमाफिया ने मुर्दों को भी नहीं छोड़ा

ईसाई समुदाय से पत्रकार निर्दोष मोजेस हैं

ईसाई समुदाय से पत्रकार निर्दोष मोजेस हैं.इनके द्वारा खोजी पत्रकारिता की जाती है.प्रोटेस्टेट मिशन के पास काफी जमीन है.इन जमीनों को व्यवस्थित रखने की व्यवस्था सीएनआई के पास नहीं है.नतीजा जिसको हाथ लगता है वह जमीन बेचकर मालामाल हो जा रहा है.

नवीनतम खोज निर्दोष मोजेस का है.वे बताते है कि ये हैं गोरखपुर का ईसाई कब्रिस्तान जिसको गोरखपुर के प्रॉपर्टी ऑफिसर मॉरिस क्लाइमेंट ने बेच खाया,,आरोप है कि सीएनआई के इस भूमाफिया ने मुर्दों को भी नहीं छोड़ा और लगभग डेढ़ करोड़ रुपया एडवांस ले लिया है ऐसा आरोप इन पर है,,अरे भाई जिंदा लोगों को तो परेशान करते ही रहते हो मुर्दों को तो चैन से सोने दो,.

हाल के दिनों में चर्च संपत्तियों, मिशनरी संस्थाओं की जमीनों और कब्रिस्तानों को लेकर कई तरह के विवाद सामने आते रहे हैं। विशेष रूप से उत्तर भारत के कई शहरों में ईसाई संस्थाओं की जमीनों पर कब्जा, बिक्री, फर्जी दस्तावेज और प्रशासनिक लापरवाही जैसे आरोप लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। इसी क्रम में ईसाई समुदाय से जुड़े खोजी पत्रकार निर्दोष मोजेस ने एक गंभीर मामला उठाया है, जिसमें गोरखपुर स्थित ईसाई कब्रिस्तान की जमीन को लेकर बड़े आरोप लगाए गए हैं।

निर्दोष मोजेस लंबे समय से चर्च, मिशन और ईसाई संस्थाओं से जुड़े मामलों पर खोजी पत्रकारिता करते रहे हैं। उनका कहना है कि प्रोटेस्टेंट मिशन और चर्च से जुड़ी संस्थाओं के पास देशभर में बड़ी मात्रा में जमीनें हैं, लेकिन इन संपत्तियों को व्यवस्थित ढंग से सुरक्षित रखने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है। विशेष रूप से सीएनआई यानी Church of North India पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उसकी कई संपत्तियां उचित निगरानी के अभाव में विवादों में फंस गई हैं।

निर्दोष मोजेस के अनुसार, कई स्थानों पर चर्च की जमीनों का रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है। कहीं पुरानी फाइलें गायब हैं, तो कहीं सीमांकन नहीं हुआ है। इसका फायदा भूमाफिया, दलाल और कुछ प्रभावशाली लोग उठा रहे हैं। आरोप यह भी लगाया जाता है कि चर्च संपत्तियों की रक्षा करने वाले कुछ अधिकारी ही निजी लाभ के लिए जमीनों के सौदों में शामिल हो जाते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर चर्च की जमीनों की बिक्री और कब्जे के मामले सामने आते रहते हैं।

गोरखपुर का ताजा मामला भी इसी तरह के आरोपों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। निर्दोष मोजेस ने दावा किया है कि गोरखपुर स्थित ईसाई कब्रिस्तान की जमीन को बेचने की कोशिश की गई। आरोपों के केंद्र में मॉरिस क्लाइमेंट नामक व्यक्ति हैं, जिन्हें प्रॉपर्टी ऑफिसर बताया जा रहा है। मोजेस का आरोप है कि कब्रिस्तान जैसी पवित्र और संवेदनशील जगह को भी नहीं छोड़ा गया और वहां की जमीन का सौदा करने का प्रयास हुआ।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस कथित सौदे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये एडवांस लिए जाने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि न्यायालय या प्रशासनिक जांच से होना अभी बाकी है, लेकिन मामला सामने आने के बाद ईसाई समुदाय के बीच चिंता और आक्रोश दोनों दिखाई दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि कब्रिस्तान जैसी जगहों की सुरक्षा नहीं हो पाएगी, तो भविष्य में धार्मिक और सामाजिक तनाव भी पैदा हो सकता है।

ईसाई समुदाय में कब्रिस्तान केवल जमीन का टुकड़ा नहीं माना जाता, बल्कि वह श्रद्धा और स्मृति का स्थान होता है। वहां समुदाय के दिवंगत लोगों को दफनाया जाता है और परिवार वर्षों तक उनकी याद में प्रार्थना करने जाते हैं। ऐसे में यदि किसी कब्रिस्तान की जमीन की खरीद-बिक्री या अतिक्रमण की खबर आती है, तो यह लोगों की धार्मिक भावनाओं को गहराई से प्रभावित करती है। यही कारण है कि निर्दोष मोजेस ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “जिंदा लोगों को तो परेशान करते ही रहते हो, मुर्दों को तो चैन से सोने दो।” यह कथन केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि चर्च संपत्तियों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न भी खड़ा करता है।

दरअसल, भारत में कई चर्च और मिशनरी संस्थाओं के पास अंग्रेजों के समय से मिली बड़ी-बड़ी जमीनें हैं। समय बीतने के साथ इन जमीनों का मूल्य बहुत बढ़ गया है। शहरों के विस्तार और रियल एस्टेट कारोबार के बढ़ने के कारण इन संपत्तियों पर भूमाफियाओं की नजर रहती है। यदि रिकॉर्ड मजबूत न हो, तो विवाद पैदा होना आसान हो जाता है। कई मामलों में फर्जी कागजात बनाकर या अधिकारियों से सांठगांठ कर जमीनों को बेचने की कोशिशें की जाती रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि चर्च संस्थाओं को अपनी संपत्तियों का डिजिटलीकरण करना चाहिए। जमीनों का सही सीमांकन, अद्यतन रिकॉर्ड, कानूनी निगरानी और पारदर्शी प्रशासन आवश्यक है। केवल धार्मिक भावना के भरोसे संपत्तियों की रक्षा संभव नहीं है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में और भी विवाद सामने आ सकते हैं।

इस मामले का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति पर लगे आरोप तब तक अंतिम सत्य नहीं माने जा सकते, जब तक निष्पक्ष जांच पूरी न हो जाए। इसलिए आवश्यक है कि प्रशासन, चर्च प्रबंधन और संबंधित एजेंसियां मिलकर मामले की जांच करें। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार हों, तो सच्चाई भी सामने आनी चाहिए।

निर्दोष मोजेस की खोजी रिपोर्ट ने एक बार फिर चर्च संपत्तियों की सुरक्षा और पारदर्शिता का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। यह केवल गोरखपुर के कब्रिस्तान का मामला नहीं, बल्कि उन तमाम धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए चेतावनी है जिनकी संपत्तियां लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण खतरे में पड़ सकती हैं। धार्मिक स्थलों और कब्रिस्तानों की गरिमा बनाए रखना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है।


आलोक कुमार

Bihar : इन दिनों पेट्रोल की कालाबाजारी का एक नया और खतरनाक तरीका

यह पूरा खेल बेहद खतरनाक होने के बावजूद तेजी से फैलता जा रहा है।

राजधानी पटना के दीघा इलाके में इन दिनों पेट्रोल की कालाबाजारी का एक नया और खतरनाक तरीका सामने आया है। कभी मुख्य सड़क पर खुलेआम कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों में पेट्रोल बिकता दिखाई देता था, लेकिन प्रशासन की सख्ती और पेट्रोल पंपों पर प्लास्टिक के जार में तेल देने पर रोक लगने के बाद अब धंधेबाजों ने नया रास्ता निकाल लिया है। वे मोटरसाइकिल और अन्य वाहनों की टंकी को ओवरफुल कराकर पेट्रोल लाते हैं और फिर दुकानों या गुप्त ठिकानों पर पाइप की सहायता से उसे बोतलों में निकालकर बेचते हैं। यह पूरा खेल बेहद खतरनाक होने के बावजूद तेजी से फैलता जा रहा है।

दीघा और आसपास के क्षेत्रों में कई जगहों पर पान दुकानों, गुमटियों और छोटे ठेलों पर कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों में पेट्रोल छिपाकर रखा जाता है। ग्राहकों की पहचान के लिए दुकानदार बोतल के ढक्कन या टीप को ऊपर की ओर रखते हैं ताकि सामान्य लोगों को पता न चले, लेकिन जरूरतमंद ग्राहक आसानी से पहचान सकें। यह अवैध कारोबार अब गुप्त संकेतों और पहचान के आधार पर चलाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि पेट्रोल 120 से 130 रुपये प्रति लीटर तक बेचा जा रहा है, यानी सरकारी कीमत से काफी अधिक दर पर।

असल में यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई। पिछले कुछ समय से पटना के कई पेट्रोल पंपों पर तेल की सीमित आपूर्ति की खबरें सामने आ रही हैं। कुछ पंपों पर बाइक चालकों को केवल 300 से 400 रुपये तक का ही पेट्रोल दिया जा रहा है। इसी स्थिति का फायदा उठाकर कालाबाजारी करने वाले सक्रिय हो गए हैं। पहले वे प्लास्टिक के जार लेकर सीधे पेट्रोल पंप पहुंचते थे, लेकिन प्रशासन के निर्देश के बाद पंप मालिकों ने बोतलों और जार में पेट्रोल देना बंद कर दिया। इसके बाद धंधेबाजों ने नया तरीका निकाला—वाहन की टंकी फुल कराओ और फिर सुनसान जगह पर पेट्रोल निकालकर बोतलों में बेचो।

यह धंधा केवल गैरकानूनी ही नहीं बल्कि जानलेवा भी है। पेट्रोल अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ है। प्लास्टिक की बोतलों में पेट्रोल रखने से आग लगने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। गर्मी, धूप, स्थैतिक बिजली या मामूली चिंगारी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। किसी पान दुकान या भीड़भाड़ वाले इलाके में यदि आग लग जाए तो भारी जनहानि हो सकती है। इसके बावजूद कुछ लोग मामूली मुनाफे के लिए लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं।

बिहार सरकार और बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पहले ही इस मामले में सख्त निर्देश जारी कर चुके हैं। नियम स्पष्ट है कि प्लास्टिक की बोतलों, थैलियों या किसी भी अनधिकृत कंटेनर में पेट्रोल और डीजल बेचना पूरी तरह प्रतिबंधित है। पेट्रोल पंप मालिकों को साफ निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी ग्राहक को प्लास्टिक बोतल या जार में पेट्रोल न दें। केवल आपातकालीन स्थिति में ISI मार्क वाले धातु के कंटेनर में ही सीमित मात्रा में पेट्रोल दिया जा सकता है।

सरकार की इस सख्ती के पीछे केवल नियम नहीं बल्कि सुरक्षा की गंभीर चिंता है। कई बार पेट्रोल का इस्तेमाल आगजनी और आपराधिक गतिविधियों में भी होता रहा है। खुलेआम बोतलों में पेट्रोल बिकने से असामाजिक तत्वों को आसानी हो सकती है। यही कारण है कि पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है और अवैध बिक्री रोकने की कोशिश कर रही है। दीघा क्षेत्र में भी कई जगहों पर पुलिस की रेड हुई है, लेकिन धंधेबाज नए-नए तरीके अपनाकर बच निकलते हैं।

यह भी सच है कि पेट्रोल की कृत्रिम किल्लत और सीमित आपूर्ति जैसी स्थितियां ऐसे अवैध कारोबार को बढ़ावा देती हैं। जब आम लोगों को आसानी से पेट्रोल नहीं मिलता, तब मजबूरी में वे ऊंचे दाम पर भी खरीदने को तैयार हो जाते हैं। इस स्थिति का फायदा उठाकर कुछ लोग काला बाजार खड़ा कर देते हैं। इसलिए प्रशासन को केवल छापेमारी ही नहीं बल्कि नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने पर भी ध्यान देना होगा।

समाज के स्तर पर भी जागरूकता जरूरी है। कई लोग सुविधा के लिए बोतल में पेट्रोल खरीद लेते हैं, लेकिन वे शायद यह नहीं समझते कि यह कदम कितना खतरनाक हो सकता है। एक छोटी सी लापरवाही बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है। सड़क किनारे रखी पेट्रोल की बोतलें किसी बम से कम नहीं हैं। यदि किसी बच्चे ने शरारत में आग लगा दी या कोई वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया, तो पूरा इलाका खतरे में पड़ सकता है।

प्रशासन, पेट्रोल पंप संचालकों और आम जनता—तीनों की जिम्मेदारी है कि इस अवैध कारोबार को खत्म किया जाए। पुलिस को नियमित निगरानी बढ़ानी होगी, पेट्रोल पंपों को नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा और लोगों को भी ऐसे अवैध धंधे से दूरी बनानी होगी। कुछ रुपये बचाने या सुविधा के लिए बोतल में पेट्रोल खरीदना खुद अपने और दूसरों के जीवन को खतरे में डालना है।

पटना जैसे तेजी से बढ़ते शहर में सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखना बेहद जरूरी है। दीघा में पेट्रोल की बोतलबंदी का यह खेल केवल अवैध व्यापार नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। यदि समय रहते इस पर पूरी तरह रोक नहीं लगी, तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा पूरे शहर को हिला सकता है।

आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...