India : भारतीय संस्कृति और परंपराओं में पति-पत्नी के अटूट प्रेम
सूर्योदय होते ही महिलाएं नए वस्त्र और सोलह श्रृंगार धारण कर पूजा सामग्री के साथ वट वृक्ष के नीचे पहुंचने लगी थीं। महिलाओं के हाथों में पूजा की थालियां थीं, जिनमें हलवा-पूड़ी, गुड़, भीगा हुआ चना, आटे से बनी मिठाइयां, कुमकुम, रोली, अक्षत, धूप, घी का दीपक, जल, पान के पत्ते तथा विभिन्न प्रकार के फल शामिल थे। व्रती महिलाओं ने सबसे पहले वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर पूजा-अर्चना की। इसके बाद वृक्ष के तने पर कच्चे सूत या धागे को लपेटते हुए उसकी परिक्रमा की गई।
कई महिलाओं ने सात बार, कुछ ने 21 बार तो कई श्रद्धालुओं ने 51 और 108 बार तक वट वृक्ष की परिक्रमा कर अपने परिवार की खुशहाली और पति की दीर्घायु की कामना की। महिलाओं के चेहरे पर श्रद्धा और आस्था स्पष्ट दिखाई दे रही थी। पूजा के दौरान महिलाओं ने वट सावित्री माता के गीत भी गाए, जिससे वातावरण और भी आध्यात्मिक हो उठा।
पूजा स्थलों पर पुरोहितों द्वारा महिलाओं को वट सावित्री व्रत की कथा सुनाई गई। कथा में बताया गया कि किस प्रकार पतिव्रता सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता और अटूट प्रेम के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यह कथा भारतीय नारी के दृढ़ संकल्प, त्याग और पति के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। कथा सुनने के बाद महिलाओं ने सावित्री और सत्यवान की पूजा कर आशीर्वाद मांगा।
वट सावित्री व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत विशेष माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार वट वृक्ष को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास माना गया है। इसी कारण वट वृक्ष की पूजा करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
शहरों के पार्कों, मंदिर परिसरों और गांवों के पुराने बरगद के पेड़ों के नीचे सुबह से ही मेले जैसा दृश्य दिखाई दे रहा था। कहीं महिलाएं समूह बनाकर पूजा कर रही थीं तो कहीं कथा श्रवण में लीन थीं। पूजा स्थलों के आसपास श्रृंगार सामग्री, फल और प्रसाद की दुकानों पर भी अच्छी खासी भीड़ रही। बच्चों में भी उत्साह देखा गया। महिलाएं जहां पूजा-पाठ में व्यस्त थीं, वहीं उनके साथ आए बच्चे खेलकूद और उछलकूद में मग्न दिखाई दिए।
गांवों में यह पर्व पारंपरिक लोकगीतों और सामूहिक पूजा के साथ मनाया गया। कई स्थानों पर महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की शुभकामनाएं दीं। पूजा के बाद महिलाओं ने बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखने के बाद महिलाओं ने शाम अथवा तीसरे पहर पूजा संपन्न कर मीठा भोजन ग्रहण किया। कई घरों में खास तौर पर खीर, पूड़ी, पुआ और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। व्रत पूर्ण होने के बाद महिलाओं के चेहरे पर संतोष और श्रद्धा की चमक साफ दिखाई दे रही थी।
वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में परिवार, प्रेम, निष्ठा और वैवाहिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक भी है। आधुनिक समय में भी इस पर्व के प्रति महिलाओं की आस्था और उत्साह कम नहीं हुआ है। बदलते दौर में भी महिलाएं पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस परंपरा को निभा रही हैं, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और पारिवारिक मूल्यों को दर्शाता है।
आलोक कुमार



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