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बुधवार, 29 जुलाई 2026

India : दीवारें नहीं, पुल बनाइए: एशिया के लिए FABC का ऐतिहासिक संदेश


जब दुनिया दीवारें ऊंची कर रही है, तब एशिया के कैथोलिक बिशपों का संदेश है—अगर भविष्य सुरक्षित करना है, तो पुल बनाइए, क्योंकि संवाद ही शांति का सबसे मजबूत रास्ता है।

"तुम इससे भी बड़े कार्य देखोगे।" (यूहन्ना 1:50) यही बाइबिल वचन एशिया के कैथोलिक बिशपों के महासंघ (FABC) की 12वीं महासभा का केंद्रीय संदेश बना। 20 से 26 जुलाई 2026 तक इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित इस महासभा ने केवल कलीसिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे एशिया के समाज के लिए एक ऐसी दिशा प्रस्तुत की है, जिसकी प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक है।

आज का एशिया अभूतपूर्व चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। युद्ध और हिंसा, धार्मिक ध्रुवीकरण, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट, तेज़ तकनीकी बदलाव, पलायन और लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण समाज को भीतर से प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में FABC ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कलीसिया का मिशन केवल अपने अनुयायियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे "पुल बनाने वाली कलीसिया" बनना होगा।

यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया आज दीवारें खड़ी करने की राजनीति से जूझ रही है। जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति और विचारधारा के नाम पर समाज लगातार बंट रहा है। ऐसे माहौल में FABC का यह कहना कि विश्वास का उद्देश्य दीवारें नहीं, बल्कि पुल बनाना है, केवल धार्मिक उपदेश नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय आवश्यकता है।

महासभा ने विशेष रूप से "सिनोडल कलीसिया" की अवधारणा पर बल दिया। इसका अर्थ है—साथ चलना, एक-दूसरे को सुनना, संवाद करना और साझा जिम्मेदारी निभाना। यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन की प्रक्रिया है। यदि समाज और संस्थाएं भी इसी भावना को अपनाएं, तो अनेक संघर्षों का समाधान संवाद के माध्यम से निकल सकता है।

दस्तावेज़ का एक साहसिक पक्ष यह भी है कि उसने कलीसिया के भीतर मौजूद क्लेरिकलिज़्म जैसी चुनौती को स्वीकार किया। यह आत्ममंथन बताता है कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। जब कोई संस्था अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार का संकल्प लेती है, तभी उसका संदेश विश्वसनीय बनता है।

जकार्ता की "टनल ऑफ फ्रेंडशिप", जो कैथोलिक कैथेड्रल और इस्तिकलाल मस्जिद को जोड़ती है, इस महासभा का जीवंत प्रतीक बनी। यह केवल एक सुरंग नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रतीक है कि विभिन्न धर्म और संस्कृतियां संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग और सम्मान के साथ आगे बढ़ सकती हैं। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश के लिए यह संदेश विशेष रूप से प्रेरणादायक है।

महासभा ने गरीबों, वंचितों, युवाओं और पर्यावरण को अपनी प्राथमिकता में रखा है। यह स्वीकार किया गया कि विकास तभी सार्थक होगा जब उसमें मानव गरिमा, सामाजिक न्याय और प्रकृति के संरक्षण का संतुलन बना रहे। आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी मानवता के सामने संकट बनकर खड़ा है, तब "हमारे साझा घर" की रक्षा का यह आह्वान समय की मांग है।

पोप लियो XIV के संदेश का उल्लेख करते हुए महासभा ने स्थानीय कलीसियाओं के बीच अधिक सहभागिता और एकता पर बल दिया। यह केवल धार्मिक नेतृत्व के लिए नहीं, बल्कि हर संस्था के लिए सीख है कि सामूहिक नेतृत्व और सहभागिता ही भविष्य का मार्ग है।

FABC का अंतिम संदेश केवल एशिया के कैथोलिक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए आशा का संदेश है जो शांति, न्याय और मानवीय गरिमा में विश्वास रखते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि विभाजन की राजनीति चाहे जितनी प्रबल हो जाए, अंततः समाज को आगे बढ़ाने का काम संवाद, विश्वास और प्रेम ही करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने-अपने परिवार, समाज, संस्थाओं और राष्ट्र में दीवारें खड़ी करने के बजाय पुल बनाने की संस्कृति विकसित करें। यदि हम दूसरों को सुनना, स्वीकार करना और उनके साथ मिलकर चलना सीख जाएं, तो वास्तव में हम वे "बड़े कार्य" देख सकेंगे जिनका उल्लेख प्रभु यीशु ने किया था।

FABC की 12वीं महासभा का संदेश केवल एक धार्मिक घोषणा नहीं, बल्कि वर्तमान समय के लिए शांति, संवाद, सह-अस्तित्व और मानवीय एकता का घोषणापत्र है। यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता और सबसे बड़ी शक्ति है।

आलोक कुमार

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