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Bihar : सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की फीस भले न लगे


सरकारी अस्पताल में इलाज मुफ्त होने के बावजूद मरीज का खर्च क्यों बढ़ जाता है?

सरकारी अस्पतालों में गरीब और जरूरतमंद लोगों को कम खर्च या कई सेवाओं में निःशुल्क इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। फिर भी अस्पताल पहुंचने के बाद मरीज और उसके परिवार का खर्च कई बार बढ़ता चला जाता है। सवाल यह है कि जब इलाज मुफ्त या कम खर्च में उपलब्ध कराने का उद्देश्य है, तो मरीज की जेब पर आर्थिक बोझ क्यों पड़ता है?

सरकार अस्पतालों के भवन, डॉक्टर, नर्स, दवाइयों, जांच सुविधाओं और विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं पर बड़ी राशि खर्च करती है। इसके बावजूद इलाज की वास्तविक लागत केवल डॉक्टर की फीस या अस्पताल की पर्ची से तय नहीं होती।

मरीज के घर से अस्पताल तक पहुंचने, पंजीकरण, जांच, दवा, भोजन, रहने, निजी जांच और बार-बार अस्पताल आने-जाने तक कई छोटे-बड़े खर्च जुड़ते जाते हैं। गरीब परिवार के लिए यही अतिरिक्त खर्च इलाज को आर्थिक रूप से कठिन बना सकता है।

अस्पताल तक पहुंचने में ही शुरू हो जाता है खर्च

किसी ग्रामीण मरीज को गंभीर बीमारी के इलाज के लिए जिला अस्पताल या बड़े सरकारी अस्पताल तक पहुंचने में कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ सकती है। उसके साथ एक या दो परिजन भी आते हैं।

बस, ऑटो, ई-रिक्शा या अन्य वाहन का किराया अलग खर्च है। गंभीर स्थिति में समय पर एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने पर निजी वाहन का सहारा लेना पड़ सकता है।

यदि मरीज को कई दिनों तक अस्पताल आना पड़े या भर्ती रहना पड़े, तो परिवहन का खर्च लगातार बढ़ सकता है।

इसलिए मरीज के लिए इलाज की वास्तविक लागत केवल अस्पताल में जमा होने वाली राशि नहीं है।

दवा अस्पताल में न मिले तो बाहर से खरीदनी पड़ सकती है

सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था होती है। लेकिन किसी समय किसी दवा का स्टॉक उपलब्ध न हो या आवश्यक दवा अस्पताल में न मिल पाए, तो मरीज के परिजन उसे बाहर से खरीदने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

एक गरीब परिवार के लिए कुछ दवाओं की खरीद भी आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है। लंबे समय तक चलने वाली बीमारी में यह खर्च और बढ़ सकता है।

यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मरीज को सरकारी अस्पताल में इलाज तो मिला, लेकिन क्या इलाज से जुड़ी आवश्यक दवाएं भी उसे आसानी से मिल पाईं?

जांच की सुविधा उपलब्ध न होने पर बढ़ता खर्च

सरकारी अस्पतालों में कई प्रकार की जांच की सुविधा होती है, लेकिन हर जांच हर समय उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं है।

मशीन खराब होने, तकनीकी समस्या, आवश्यक सामग्री की कमी, स्टाफ की अनुपलब्धता या मरीजों की अधिक संख्या के कारण जांच में देरी हो सकती है।

यदि डॉक्टर को किसी जांच की तत्काल आवश्यकता है और अस्पताल में वह सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो मरीज को निजी जांच केंद्र जाना पड़ सकता है। निजी जांच की कीमत गरीब परिवार के बजट पर सीधा असर डालती है।

इलाज के साथ मेडिकल सामग्री का खर्च

कुछ परिस्थितियों में मरीज को इलाज के दौरान ऐसी मेडिकल सामग्री की जरूरत पड़ सकती है जो उस समय अस्पताल में उपलब्ध न हो।

पट्टी, कुछ उपकरण या अन्य आवश्यक सामग्री बाहर से खरीदने की स्थिति बन सकती है। हर सरकारी अस्पताल और हर मरीज के मामले में ऐसा हो, यह कहना उचित नहीं होगा, लेकिन जहां ऐसी स्थिति आती है वहां मरीज का जेब खर्च बढ़ सकता है।

बीमारी की गंभीर स्थिति में परिजन अक्सर कीमत पर ज्यादा सवाल नहीं कर पाते। उनके लिए उस समय मरीज का इलाज सबसे महत्वपूर्ण होता है।

भर्ती होने के बाद बढ़ता है अप्रत्यक्ष खर्च

मरीज अस्पताल में भर्ती हो गया तो परिवार के सामने केवल इलाज का खर्च नहीं रहता।

दूर से आए परिजन के रहने की व्यवस्था नहीं है तो बाहर कमरा लेना पड़ सकता है। भोजन, पानी और स्थानीय परिवहन का खर्च अलग होता है।

कई गरीब परिवारों में मरीज के साथ रहने वाला व्यक्ति दिहाड़ी मजदूर होता है। अस्पताल में कई दिन रहने के कारण उसकी मजदूरी भी प्रभावित हो सकती है।

इस तरह अस्पताल में प्रत्यक्ष खर्च कम होने के बावजूद परिवार की कुल आर्थिक हानि बढ़ सकती है।

गरीब परिवार के लिए समय भी पैसा है

दिहाड़ी मजदूर के लिए अस्पताल में बिताया गया एक दिन केवल समय की कीमत नहीं रखता। उस दिन काम पर नहीं जाने का अर्थ मजदूरी का नुकसान भी हो सकता है।

यदि मरीज के साथ दो परिजन कई दिनों तक अस्पताल में रहते हैं, तो परिवार की आय पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है।

इसलिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल मुफ्त दवा और जांच की संख्या से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि मरीज को इलाज लेने में कितने दिन, कितनी यात्राएं और कितना अप्रत्यक्ष खर्च करना पड़ा।

रेफरल से बढ़ सकती है यात्रा की परेशानी

कई बार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या अनुमंडलीय अस्पताल से मरीज को जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है। चिकित्सकीय दृष्टि से रेफरल आवश्यक हो सकता है, लेकिन गरीब परिवार के लिए इसका मतलब अतिरिक्त यात्रा और परिवहन खर्च भी हो सकता है।

यदि मरीज को अलग-अलग जांच या विशेषज्ञ चिकित्सक के लिए बार-बार बुलाया जाए, तो आने-जाने और रहने का खर्च बढ़ता जाता है।

इसलिए रेफरल व्यवस्था को मरीज-केंद्रित और बेहतर समन्वित बनाना जरूरी है।

स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी का अभाव

सरकार की विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के तहत पात्र मरीजों को अलग-अलग सुविधाएं मिल सकती हैं। लेकिन हर मरीज को यह जानकारी हो, जरूरी नहीं है।

किस योजना के तहत कौन-सी सुविधा मिलेगी, कौन-से दस्तावेज चाहिए और किस काउंटर पर संपर्क करना है—यदि इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो पात्र व्यक्ति भी सुविधा का पूरा लाभ नहीं ले पाता।

अस्पतालों में सक्रिय हेल्प डेस्क और प्रशिक्षित सहायता कर्मी इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

निःशुल्क सेवा के नाम पर अनौपचारिक भुगतान की शिकायतों पर निगरानी

यदि किसी ऐसी सेवा के लिए मरीज से पैसा मांगा जाता है जिसे निर्धारित रूप से निःशुल्क होना चाहिए, तो शिकायत और निगरानी की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।

गरीब मरीज कई बार शिकायत करने से इसलिए भी डर सकता है कि कहीं उसके इलाज पर असर न पड़े।

अस्पताल प्रशासन को स्पष्ट सूचना बोर्ड, शिकायत हेल्पलाइन और अन्य शिकायत माध्यम उपलब्ध कराने चाहिए। शिकायत करने वाले मरीज को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी शिकायत के कारण उसके इलाज में कोई भेदभाव नहीं होगा।

खर्च कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?

सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज को वास्तव में आर्थिक रूप से सुलभ बनाने के लिए केवल मुफ्त सेवाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है।

दवाओं और जांचों की उपलब्धता को बेहतर बनाए रखना जरूरी है। अस्पताल में आवश्यक दवाओं की आपूर्ति और जांच व्यवस्था नियमित रूप से मजबूत की जानी चाहिए।

मरीज सहायता केंद्र सक्रिय होने चाहिए, जहां मरीज को मुफ्त सेवाओं, स्वास्थ्य योजनाओं और आवश्यक दस्तावेजों की स्पष्ट जानकारी मिले।

दूरदराज से आने वाले गरीब मरीजों और उनके परिजनों के लिए सस्ती भोजन व्यवस्था, विश्राम स्थल या अन्य सहायता उपलब्ध कराने पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

रेफरल व्यवस्था को बेहतर बनाकर अनावश्यक रूप से एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल जाने की स्थिति कम की जा सकती है।

मुफ्त इलाज का मतलब सिर्फ शून्य बिल नहीं

स्वास्थ्य सेवा की वास्तविक पहुंच का सवाल केवल यह नहीं है कि अस्पताल ने मरीज से कितनी फीस ली। सवाल यह भी है कि मरीज को इलाज पाने के लिए कुल कितना खर्च करना पड़ा।

यदि दवा बाहर से खरीदनी पड़ी, जांच निजी केंद्र में करानी पड़ी, आने-जाने में पैसा लगा, परिजन की मजदूरी गई और रहने-खाने का खर्च बढ़ गया, तो गरीब परिवार के लिए इलाज का आर्थिक बोझ वास्तविक रूप से बढ़ चुका है।

इसलिए सरकारी अस्पतालों की सफलता का मूल्यांकन मुफ्त इलाज की घोषणा से आगे बढ़कर मरीज के कुल जेब खर्च और उसके इलाज के अनुभव के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य केवल बीमारी का उपचार करना नहीं, बल्कि बीमारी के कारण परिवार को अनावश्यक आर्थिक संकट से बचाना भी होना चाहिए।

जब दवा, जांच, जानकारी, रेफरल और आवश्यक सहायता एक समन्वित व्यवस्था के रूप में उपलब्ध होगी, तब सरकारी अस्पताल का इलाज गरीब और आम नागरिक के लिए वास्तविक राहत बन सकेगा। मुफ्त इलाज की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि मरीज अस्पताल से इलाज लेकर लौटे, लेकिन इलाज के खर्च के कारण उसका परिवार आर्थिक संकट में न डूबे।


आलोक कुमार

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