बिहार में शिक्षा की जंग: हाशिए के समुदायों के लिए हर दाखिला एक क्रांति

 बिहार में शिक्षा की जंग: हाशिए के समुदायों के लिए हर दाखिला एक क्रांति

रिपोर्टः आलोक कुमार


बिहार की धरती ने कभी ज्ञान और शिक्षा की महान परंपरा को जन्म दिया था, लेकिन आज विडंबना यह है कि यही राज्य शिक्षा के कई बुनियादी मानकों पर राष्ट्रीय औसत से पीछे दिखाई देता है। खासकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), मुस्लिम समुदाय, और सबसे अधिक उपेक्षित नॉमेडिक ट्राइब्स (NT) तथा डिनोटिफाइड एंड नॉमेडिक ट्राइब्स (DNT) के लिए शिक्षा अब भी एक दूर का सपना है—एक ऐसा सपना, जिसे पाने के लिए हर दिन संघर्ष करना पड़ता है।

बिहार के जाति-आधारित सर्वेक्षण के आंकड़े इस असमानता की गहराई को स्पष्ट करते हैं। पूरे राज्य में जहां केवल लगभग 9.19% लोग ही हायर सेकेंडरी (+2) तक पहुंच पाते हैं, वहीं SC समुदाय में यह आंकड़ा करीब 7% और ST में 8% तक सीमित है। मुस्लिम समुदाय की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है, जहां लगभग 10% ही इस स्तर तक पहुंच पाते हैं। इन आंकड़ों में भी लड़कियों की स्थिति और अधिक चिंताजनक है—SC लड़कियों में केवल 4.4% और ST लड़कियों में 5.8% ही +2 तक पढ़ पाती हैं।

जब बात NT और DNT समुदायों की आती है, तो तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है। इन समुदायों में शिक्षा का स्तर लगभग नगण्य है। महादलितों में सबसे पिछड़ा माने जाने वाले मुसहर समुदाय की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है—यहां हायर सेकेंडरी पास करने वाले लड़कों का प्रतिशत लगभग 2% है, जबकि लड़कियों में यह 1% से भी कम है। साक्षरता दर भी मुश्किल से 22% के आसपास सिमटी हुई है।

ये आंकड़े महज संख्याएं नहीं हैं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक उपेक्षा, भेदभाव और आर्थिक विषमता की कहानी कहते हैं। जब कोई बच्चा स्कूल छोड़कर मजदूरी करने लगता है, या किसी लड़की की कम उम्र में शादी कर दी जाती है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—पूरे समुदाय की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं।

बिहार के लाखों परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं—कच्चे मकान, स्वच्छता की कमी और अनिश्चित आय। ऐसे माहौल में शिक्षा उनके लिए विकल्प नहीं, बल्कि संघर्ष बन जाती है। इसलिए जब इन समुदायों का कोई युवा उच्च शिक्षा तक पहुंचता है, तो वह सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होती है।

इसी संदर्भ में National Youth Equity Forum (NYEF) जैसी पहलें उम्मीद की किरण बनकर सामने आई हैं। यह संगठन उन युवाओं को सहयोग देता है, जो अपने परिवार में पहली बार स्कूल या कॉलेज तक पहुंचते हैं। “अंबेडकर फेलो” और “CLAY फेलोशिप” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से यह न केवल शिक्षा को प्रोत्साहित करता है, बल्कि नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जागरूकता को भी विकसित करता है।

इन कार्यक्रमों के तहत युवाओं को मेंटरशिप, छात्रवृत्ति सहायता और सामुदायिक संगठन का प्रशिक्षण दिया जाता है। नतीजतन, ये युवा अपने गांवों और मोहल्लों में लौटकर दूसरों के लिए प्रेरणा बनते हैं। आज बिहार के कई जिलों में NYEF के हजारों सदस्य सक्रिय हैं, जो शिक्षा के अधिकार को लेकर जन-जागरूकता अभियान चला रहे हैं।

NT और DNT समुदायों की पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। ये वे समुदाय हैं, जो पारंपरिक रूप से घुमंतू जीवनशैली अपनाते आए हैं—जैसे कलाकार, बाजीगर और हस्तशिल्पी। ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 के Criminal Tribes Act के तहत इन्हें “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया गया था। हालांकि 1952 में यह कानून समाप्त कर दिया गया, लेकिन इसका सामाजिक कलंक आज भी इनके साथ जुड़ा हुआ है।

घुमंतू जीवन, स्थायी निवास की कमी, दस्तावेजों का अभाव और सामाजिक पूर्वाग्रह—ये सभी कारण इन समुदायों के बच्चों को शिक्षा से दूर रखते हैं। परिणामस्वरूप, कई बच्चे प्राथमिक स्तर पर ही स्कूल छोड़ देते हैं।

सरकार ने इन समुदायों के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें SEED Scheme प्रमुख है। इस योजना के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और आवास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा छात्रवृत्ति, मुफ्त कोचिंग और हॉस्टल जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

फिर भी, इन योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। दस्तावेजों की कमी, जानकारी का अभाव और प्रशासनिक जटिलताएं इनकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती हैं।

इस स्थिति को बदलने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार जरूरी है। रेजिडेंशियल स्कूल, मोबाइल स्कूलिंग और पारंपरिक कौशलों को आधुनिक व्यावसायिक प्रशिक्षण से जोड़ने जैसे कदम उठाने होंगे। साथ ही, NT/DNT समुदायों के लिए अलग नीति और मजबूत संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है।

यह समझना बेहद जरूरी है कि शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, सशक्तिकरण और सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है। जब इन समुदायों का कोई युवा डॉक्टर, शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी बनता है, तो वह पूरे समाज के लिए एक नई दिशा तय करता है।

B. R. Ambedkar ने कहा था कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे समाज में समानता लाई जा सकती है। आज उनके इस विचार को धरातल पर उतारने की आवश्यकता है।

आइए, हम उन युवाओं के संघर्ष और सफलता का सम्मान करें, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा का रास्ता चुना। हर दाखिला, हर सफलता—एक नई क्रांति की शुरुआत है। जब समाज के सबसे कमजोर वर्ग का बच्चा आगे बढ़ेगा, तभी बिहार सच्चे अर्थों में प्रगति करेगा।

यह संघर्ष जारी है—और यह क्रांति भी, हर एक दाखिले के साथ।

टेस्ट क्रिकेट की 150वीं वर्षगांठ

टेस्ट क्रिकेट की 150वीं वर्षगांठ

रिपोर्टः आलोक कुमार


टेस्ट क्रिकेट, जिसे खेल की आत्मा कहा जाता है, 2027 में अपने इतिहास के एक असाधारण पड़ाव पर पहुंचने जा रहा है। Cricket Australia ने इस ऐतिहासिक अवसर—टेस्ट क्रिकेट की 150वीं वर्षगांठ—को भव्य और यादगार बनाने का निर्णय लिया है। यह केवल एक खेल आयोजन नहीं, बल्कि क्रिकेट की परंपरा, संघर्ष, कौशल और विरासत का उत्सव होगा, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक सूत्र में जोड़ता है।


टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत 15 मार्च 1877 को Melbourne Cricket Ground में हुई थी, जब Australia national cricket team और England national cricket team के बीच पहला टेस्ट मैच खेला गया। इस ऐतिहासिक मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने 45 रनों से जीत दर्ज की थी। इसी मैच में Charles Bannerman ने टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक लगाया—एक उपलब्धि जो आज भी इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है। 

इस गौरवपूर्ण यात्रा के 150 वर्ष पूरे होने पर, 11 से 15 मार्च 2027 के बीच एमसीजी में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच एक विशेष टेस्ट मैच खेला जाएगा। यह मुकाबला कई मायनों में अनूठा होगा, क्योंकि यह पुरुष टीमों के बीच एमसीजी पर खेला जाने वाला पहला डे-नाइट टेस्ट होगा, जिसमें पिंक बॉल का इस्तेमाल किया जाएगा। यह आयोजन 1977 में खेले गए प्रसिद्ध Centenary Test की यादों को भी ताजा करेगा, जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को ठीक 45 रनों से हराया था—एक ऐसा ऐतिहासिक संयोग, जिसने क्रिकेट प्रेमियों को आज भी रोमांचित कर रखा है।


शौचालय बने, लेकिन सोच कब बदलेगी?

 शौचालय बने, लेकिन सोच कब बदलेगी?

रिपोर्ट: आलोक कुमार



बिहार में खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई योजनाएं चलाई हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत व्यक्तिगत घरेलू शौचालय (IHHL) योजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति खुले में शौच करने के लिए मजबूर न हो।


इस योजना के तहत पात्र ग्रामीण और शहरी निवासी ऑनलाइन स्वच्छ भारत मिशन पोर्टल पर आवेदन कर सकते हैं या ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत और स्वच्छग्राही के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। पात्र लाभार्थियों को शौचालय निर्माण के लिए ₹12,000 की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जो सीधे उनके बैंक खाते में दो किश्तों में जमा होती है।

योजना का ढांचा स्पष्ट है—आवेदक के घर में पहले से शौचालय नहीं होना चाहिए और वह बीपीएल या विशेष एपीएल श्रेणी (जैसे अनुसूचित जाति, भूमिहीन, दिव्यांग या महिला मुखिया) में होना चाहिए। आवेदन के लिए आधार कार्ड, बैंक पासबुक और फोटो जैसे दस्तावेज जरूरी होते हैं। आवेदन के बाद भौतिक सत्यापन किया जाता है और स्वीकृति मिलने पर शौचालय का निर्माण कराया जाता है।

कागजों पर यह योजना जितनी सुदृढ़ दिखती है, जमीनी हकीकत उतनी ही जटिल नजर आती है—खासतौर पर बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में।

पटना जिले के मोकामा प्रखंड और नालंदा के हरनौत, राजगीर और बिंद जैसे क्षेत्रों में चलाए गए एक जागरूकता अभियान के दौरान यह सामने आया कि कई जगहों पर शौचालयों का उपयोग उनके मूल उद्देश्य के लिए नहीं हो रहा है। कहीं शौचालय में जलावन रखा गया है, तो कहीं उसे पशुओं के चारे का गोदाम बना दिया गया है। कई घरों में तो शौचालय के भीतर बकरियां बांधी जा रही हैं।

यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और व्यवहारिक समस्या का संकेत है।

ग्रामीणों की शिकायतें भी कम नहीं हैं। उनका कहना है कि शौचालयों की गुणवत्ता ठीक नहीं है। कई जगहों पर ढक्कन कमजोर हैं, जो पशुओं के चढ़ने से टूट जाते हैं। सबसे बड़ी समस्या पानी की कमी है। जब शौचालय में पानी की सुविधा ही नहीं होगी, तो उसका उपयोग कैसे संभव होगा?

यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है—क्या केवल शौचालय बना देना ही स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है? स्पष्ट रूप से नहीं। स्वच्छता केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक बदलाव का विषय है। जब तक लोगों की आदतें और सोच नहीं बदलेंगी, तब तक योजनाएं अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगी।

योजना के क्रियान्वयन में भी कई कमियां सामने आती हैं। कई बार लाभार्थियों को समय पर पूरी राशि नहीं मिलती, या निर्माण कार्य जल्दबाजी में और निम्न गुणवत्ता के साथ किया जाता है। स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी के कारण शौचालय निर्माण कई बार केवल “टारगेट पूरा करने” तक सीमित रह जाता है।

जागरूकता की कमी भी एक बड़ी वजह है। सरकारी अभियान चलते हैं, लेकिन अक्सर वे सतही स्तर तक ही सीमित रह जाते हैं। जब तक गांवों में लगातार संवाद और सहभागिता नहीं होगी, तब तक स्थायी बदलाव संभव नहीं है।

इसमें एनजीओ और स्थानीय संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वे लोगों तक सीधे पहुंचकर न केवल जागरूकता बढ़ाते हैं, बल्कि उनकी वास्तविक समस्याओं को भी समझते हैं। लेकिन केवल बाहरी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं—समुदाय के भीतर से भी पहल जरूरी है।

सरकार को भी अपनी रणनीति में सुधार करना होगा। केवल निर्माण पर ध्यान देने के बजाय उपयोग, रखरखाव, पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता पर समान जोर देना होगा।

अंततः, स्वच्छ भारत का सपना केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन है। जब तक हर व्यक्ति यह नहीं समझेगा कि शौचालय का उपयोग उसकी सेहत, सम्मान और पर्यावरण के लिए जरूरी है, तब तक यह लक्ष्य अधूरा रहेगा।

बिहार में शौचालय बन चुके हैं—अब असली चुनौती है उन्हें जीवन का हिस्सा बनाना। यही बदलाव इस अभियान की वास्तविक सफलता तय करेगा।

गरीबों के हक का अनाज—नीति, नीयत और बाजार का खेल

गरीबों के हक का अनाज—नीति, नीयत और बाजार का खेल

रिपोर्ट: आलोक कुमार


कोविड-19 महामारी के दौर में, जब देश की बड़ी आबादी रोज़गार, आय और भोजन की असुरक्षा से जूझ रही थी, तब केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के रूप में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। यह योजना आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य प्रवासी मजदूरों और गरीब तबकों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराना था।

अप्रैल 2020 में शुरू हुई यह योजना कई चरणों में आगे बढ़ती रही और अब 1 जनवरी 2024 से इसे अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया है। इस दौरान लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया गया—जो अपने आप में दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा पहलों में से एक है। आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न चरणों में 1118 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न वितरित किया गया और सरकार ने करीब 3.91 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।

यह योजना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत संचालित होती है। इसके अंतर्गत प्राथमिकता वाले परिवारों (PHH) को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम अनाज मिलता है, जबकि अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत सबसे गरीब परिवारों को प्रति परिवार 35 किलोग्राम राशन दिया जाता है। उद्देश्य स्पष्ट है—समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।

लेकिन जमीनी हकीकत इस आदर्श तस्वीर से अलग नजर आती है, खासकर पटना और आसपास के इलाकों में। यहां इस योजना के तहत मिलने वाले चावल—चाहे अरवा हो या उसना—का एक समानांतर बाजार विकसित हो चुका है। लाभार्थी, जिन्हें यह अनाज मुफ्त में मिलता है, अक्सर इसे 10–15 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच देते हैं और उस पैसे से बेहतर गुणवत्ता का चावल खरीदते हैं।

दीघा हाट जैसे बाजारों में यह प्रवृत्ति खुले तौर पर देखी जा सकती है। स्थानीय दुकानदार गरीबों से सस्ते दाम पर चावल खरीदते हैं और फिर उसे बड़े व्यापारियों या राइस मिलों तक पहुंचाते हैं। दानापुर की राइस मिलों में यह अनाज रिफाइन और पैकेजिंग के बाद ऊंचे दाम पर दोबारा बाजार में बिकता है। इस पूरी प्रक्रिया में गरीबों के हिस्से का अनाज एक तरह से “रिसाइकिल” होकर मुनाफे का जरिया बन जाता है।

यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। पहला—क्या योजना का मूल उद्देश्य पूरा हो रहा है? जब लाभार्थी खुद ही अनाज बेच रहे हैं, तो यह संकेत है कि उनकी जरूरतें केवल खाद्यान्न तक सीमित नहीं हैं। उन्हें नकदी की जरूरत है—दवा, शिक्षा, कपड़े और अन्य जरूरी खर्चों के लिए। ऐसे में मुफ्त अनाज उनकी समस्या का आंशिक समाधान ही बन पाता है।

दूसरा सवाल निगरानी और पारदर्शिता का है। यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का अनाज खुले बाजार में बेचा जा रहा है, तो यह न केवल योजना की प्रभावशीलता को कमजोर करता है, बल्कि एक समानांतर काला बाजार भी तैयार करता है। इसमें स्थानीय स्तर पर दुकानदार, बिचौलिए और मिल मालिक जैसे कई हितधारक शामिल होते हैं।

तीसरा और महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक है। इतनी बड़ी योजना, जो 80 करोड़ लोगों को सीधे प्रभावित करती है, स्वाभाविक रूप से एक बड़ी राजनीतिक पूंजी भी बनती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि PMGKAY ने सरकार के लिए एक मजबूत जनाधार तैयार किया है। लेकिन जब इसके क्रियान्वयन में खामियां सामने आती हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल कल्याणकारी नीति है या एक दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति भी?

हालांकि, आलोचना के बीच इसके सकारात्मक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोविड काल में जब लाखों लोग बेरोजगार हो गए थे, तब इस योजना ने भूख और कुपोषण के खतरे को काफी हद तक कम किया। यह भारत की प्रशासनिक क्षमता और संसाधन प्रबंधन का एक बड़ा उदाहरण भी है।

फिर भी, अब समय आ गया है कि इस योजना की गंभीर समीक्षा की जाए। क्या इसे केवल मुफ्त अनाज वितरण तक सीमित रखा जाए, या नकद हस्तांतरण (DBT) जैसे विकल्पों के साथ जोड़ा जाए? क्या लाभार्थियों को अपनी जरूरत के अनुसार विकल्प चुनने की स्वतंत्रता दी जा सकती है? और सबसे अहम—क्या वितरण प्रणाली को इतना पारदर्शी बनाया जा सकता है कि दुरुपयोग को रोका जा सके?

अंततः, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना एक नेक इरादे से शुरू की गई पहल है, जिसने कठिन समय में करोड़ों लोगों को सहारा दिया। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता केवल वितरण के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि यह गरीबों के जीवन में कितना स्थायी बदलाव ला पाती है।

अगर गरीब अपने हिस्से का अनाज बेचने को मजबूर हैं, तो यह संकेत है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है—और उसका समाधान भी उतना ही व्यापक होना चाहिए।

समय की गणना और राजनीति का नया पैमाना

 समय की गणना और राजनीति का नया पैमाना

रिपोर्ट: आलोक कुमार


मानव सभ्यता ने समय को समझने और व्यवस्थित करने के लिए अनेक प्रणालियाँ विकसित की हैं। इतिहास को “ईसा पूर्व (BC)” और “ईस्वी (AD)” में विभाजित करने की परंपरा भी इसी क्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। “बिफोर क्राइस्ट” और “ऐनो डोमिनी” के रूप में प्रचलित यह कालगणना केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि वैश्विक इतिहास को एक साझा संदर्भ देने का माध्यम रही है।

लेकिन आज भारत में एक नई तरह की समय-रेखा उभरती दिख रही है—“2014 से पहले” और “2014 के बाद”।

साल 2014 भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हुआ, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक विमर्श की भाषा, शैली और संदर्भ में भी बड़े बदलाव का संकेत था। इसके बाद से राजनीतिक चर्चाओं में “2014 पूर्व” और “2014 बाद” की तुलना एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है।

यह तुलना कई स्तरों पर की जाती है—आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचा, विदेश नीति, सामाजिक योजनाएं, और यहां तक कि राष्ट्रवाद की परिभाषा तक। समर्थकों के लिए 2014 एक “नवयुग” की शुरुआत है, जहां भारत ने वैश्विक मंच पर नई पहचान बनाई। वहीं आलोचकों के लिए यह विभाजन एक राजनीतिक रणनीति है, जो अतीत की जटिलताओं को सरल बनाकर वर्तमान को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करता है।

समस्या तब पैदा होती है जब “2014 पूर्व और 2014 बाद” की यह सोच एक स्थायी मानसिकता बन जाती है। इतिहास को समझने के लिए जरूरी है कि उसे निरंतरता में देखा जाए, न कि किसी एक वर्ष को अंतिम सत्य मानकर। जिस तरह “BC” और “AD” केवल समय का संदर्भ हैं, उसी तरह 2014 भी एक राजनीतिक संदर्भ भर होना चाहिए—न कि पूरे इतिहास का केंद्र।

भारत का इतिहास हजारों वर्षों में फैला हुआ है—सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक। इसमें अनेक उपलब्धियां, संघर्ष और परिवर्तन शामिल हैं। यदि हर उपलब्धि को “2014 के बाद” और हर समस्या को “2014 के पहले” से जोड़ दिया जाए, तो यह न केवल इतिहास के साथ अन्याय होगा, बल्कि समाज को भी एक सीमित दृष्टिकोण में बांध देगा।

इस तरह की समय-रेखा का एक बड़ा प्रभाव विचारधारात्मक ध्रुवीकरण के रूप में सामने आता है। जब समय को ही राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे, तो संवाद की गुंजाइश कम हो जाती है। एक पक्ष हर उपलब्धि का श्रेय वर्तमान को देता है, जबकि दूसरा हर समस्या के लिए उसी को जिम्मेदार ठहराता है। इस द्वंद्व में वस्तुनिष्ठता कहीं खो जाती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि वैश्विक स्तर पर “BC” और “AD” की जगह अब “BCE” (Before Common Era) और “CE” (Common Era) जैसे अधिक समावेशी शब्दों का उपयोग बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य समय को धार्मिक सीमाओं से मुक्त कर एक सार्वभौमिक संदर्भ देना है। लेकिन भारत में इसके उलट, हम एक ऐसी समय-रेखा की ओर बढ़ते दिख रहे हैं, जो अधिक राजनीतिक और विभाजनकारी हो सकती है।

ऐसे में सवाल उठता है—क्या हम समय को समझने के अपने संतुलित दृष्टिकोण को खो रहे हैं? क्या इतिहास को निष्पक्ष अध्ययन के बजाय राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या यह प्रवृत्ति आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित और व्यापक इतिहास दे पाएगी?

निस्संदेह, हर युग का अपना महत्व होता है। 2014 भी भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन इसे “शून्य बिंदु” के रूप में स्थापित करना, जहां से सब कुछ शुरू होता है, एक खतरनाक सरलीकरण हो सकता है। इतिहास न तो किसी एक व्यक्ति का होता है और न ही किसी एक सरकार का—यह एक सतत प्रवाह है, जिसमें हर दौर का अपना योगदान होता है।

अंततः, समय की गणना केवल तारीखों और वर्षों का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच और दृष्टिकोण का प्रतिबिंब भी है। यदि हम इसे संकीर्ण राजनीतिक सीमाओं में बांध देंगे, तो हम न केवल अपने अतीत को सीमित करेंगे, बल्कि अपने भविष्य को भी।

इसलिए जरूरत है कि हम “2014 पूर्व और 2014 बाद” की बहस से आगे बढ़ें और इतिहास को उसकी व्यापकता और गहराई में समझने का प्रयास करें। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पाएंगे, जो अपने अतीत से सीखता है, वर्तमान को समझता है और भविष्य की ओर संतुलित दृष्टि से आगे बढ़ता है।

विकास की दीवारें, जिम्मेदारी की दरारें

 विकास की दीवारें, जिम्मेदारी की दरारें

रिपोर्टः आलोक कुमार


पटना नगर निगम के वार्ड संख्या 22ए स्थित लालू नगर के बालूपर मुसहरी इलाके में एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है—क्या केवल निर्माण ही विकास है, या उसके उपयोग और संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है? करीब 20 मुसहर परिवारों की इस बस्ती में सातवीं बार शौचालय का निर्माण होना अपने आप में एक विडंबना को दर्शाता है।

एक समय था जब यहां शौचालय नहीं था और लोग खुले में शौच के लिए मजबूर थे। स्वच्छता और गरिमा के नाम पर जब पहली बार शौचालय बना, तो लोगों में उम्मीद जगी कि अब जीवन स्तर सुधरेगा। लेकिन यह उम्मीद धीरे-धीरे लापरवाही और अव्यवस्था के कारण टूटती गई। पहले बनाए गए छह शौचालयों का सही उपयोग और रखरखाव नहीं हो सका, जिसके कारण वे धीरे-धीरे बेकार हो गए और हर बार नई शुरुआत करनी पड़ी।

अब सातवीं बार बना शौचालय भी उसी स्थिति की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। दरवाजे टूट चुके हैं और सबसे बुनियादी जरूरत—पानी की व्यवस्था—अब भी नहीं है। लोग आज भी बाल्टी में पानी भरकर ले जाने को मजबूर हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी है, या निर्माण कराने वाली एजेंसियों और प्रशासन की भी जवाबदेही बनती है?

स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य सिर्फ शौचालय बनाना नहीं, बल्कि स्वच्छता की आदत विकसित करना और सुविधाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है। जब तक जागरूकता, जिम्मेदारी और आधारभूत सुविधाओं का संतुलन नहीं बनेगा, तब तक ऐसे प्रयास अधूरे ही रहेंगे।

बालूपर मुसहरी की यह कहानी एक बड़ी सीख देती है—विकास केवल ईंट और सीमेंट से नहीं होता, बल्कि सोच, जिम्मेदारी और सहभागिता से होता है। अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और स्थानीय समुदाय मिलकर इस स्थिति को बदलें, ताकि सातवीं बार की यह कोशिश अंतिम साबित हो, न कि अगली विफलता की शुरुआत।

गिरता रुपया: बदलती भाषा, स्थिर सवाल

 गिरता रुपया: बदलती भाषा, स्थिर सवाल

रिपोर्टः आलोक कुमार


“तब” और “अब” की राजनीति में सबसे बड़ा अंतर अक्सर भाषा का होता है, तथ्यों का नहीं। जब नरेंद्र मोदी विपक्ष में थे, तब डॉलर के मुकाबले रुपए की हर गिरावट को वे सीधे सरकार की साख से जोड़ते थे। 2013 के उनके भाषणों में यह साफ दिखता था कि कमजोर रुपया, कमजोर नेतृत्व का प्रतीक है।

लेकिन आज, जब रुपया करीब ₹93–94 प्रति डॉलर के स्तर के आसपास है, वही बहस अब वैश्विक कारणों की ओर मुड़ गई है।

सवाल यह नहीं है कि तब कौन सही था और अब कौन; असली प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक सच्चाइयों को राजनीतिक सुविधानुसार बदला जा सकता है?

गिरते रुपए की हकीकत

रुपए की मौजूदा कमजोरी को केवल घरेलू नीतियों से नहीं समझा जा सकता। वैश्विक स्तर पर मजबूत डॉलर, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव—खासतौर पर पश्चिम एशिया की अस्थिरता—इस दबाव के प्रमुख कारण हैं।

भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए, विशेषकर ऊर्जा के क्षेत्र में, यह स्थिति स्वाभाविक रूप से मुद्रा पर दबाव डालती है।

इसके अलावा, घरेलू कारक भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उच्च मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा और विदेशी निवेश के उतार-चढ़ाव भी रुपए की स्थिति को प्रभावित करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार और मौद्रिक नीतियों के जरिए स्थिति को संतुलित करने की कोशिश करता है, लेकिन बाजार की ताकतें अक्सर केंद्रीय हस्तक्षेप से बड़ी साबित होती हैं।

आम आदमी की जेब पर असर

रुपए की गिरावट का सबसे सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां—लगभग हर आयातित वस्तु महंगी हो जाती है।

यह असर धीरे-धीरे महंगाई के रूप में सामने आता है, जो रोजमर्रा के खर्च को बढ़ा देता है और मध्यम वर्ग तथा गरीब वर्ग की क्रय शक्ति को कमजोर करता है।

राजनीति का बदलता नजरिया

यहीं पर राजनीतिक विमर्श दिलचस्प हो जाता है। विपक्ष आज वही सवाल उठा रहा है, जो कभी नरेंद्र मोदी ने उठाए थे—क्या गिरता रुपया सरकार की नीतिगत कमजोरी का संकेत है?

सरकार का पक्ष यह है कि आज की वैश्विक परिस्थितियां 2013 से अलग हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और वैश्विक अनिश्चितता ने डॉलर को असाधारण रूप से मजबूत बना दिया है। यह तर्क अपने स्थान पर सही हो सकता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में दिए गए बयान समय के साथ गायब नहीं होते, बल्कि संदर्भ बदलते ही फिर सामने आ जाते हैं।

क्या गिरता रुपया हमेशा बुरा है?

आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो मुद्रा का कमजोर होना हमेशा नकारात्मक नहीं होता। इससे निर्यात सस्ता होता है, जिससे आईटी, फार्मा और कुछ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लाभ मिल सकता है।

लेकिन जब गिरावट तेज और लगातार हो, तो यह आर्थिक असंतुलन और अनिश्चितता का संकेत भी बन जाती है।

निष्कर्ष

रुपए की गिरावट केवल एक आर्थिक घटना नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक विमर्श का आईना भी है। “तब” और “अब” के बीच की भाषा का अंतर हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम आर्थिक मुद्दों को स्थायी दृष्टिकोण से देख पाते हैं या उन्हें परिस्थितियों के अनुसार बदल देते हैं।

सरकार हो या विपक्ष, दोनों के लिए जरूरी है कि वे इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बहस तक सीमित न रखें। क्योंकि अंततः गिरता रुपया किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा चुनौती है।


Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...