पति की मौत के 42 दिन बाद पत्नी के मोबाइल पर आया ‘स्वस्थ होकर घर लौटने’ का बधाई संदेश! आयुष्मान सिस्टम में मृत मरीज जीवित कैसे दिखा—डेटा एंट्री, अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल।
छत्तीसगढ़ में एक परिवार को पति की मौत के 42 दिन बाद आयुष्मान योजना से मिला ऐसा संदेश, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के डिजिटल रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मृत व्यक्ति को ‘स्वस्थ होकर घर लौटने’ की सूचना कैसे मिली, इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
रायपुर। सरकारी योजनाओं का उद्देश्य आम लोगों को सुविधा, सुरक्षा और भरोसा देना है। लेकिन जब किसी सरकारी डिजिटल सिस्टम से ऐसी सूचना सामने आए, जो परिवार के वास्तविक अनुभव से बिल्कुल उलट हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ में सामने आया एक मामला इसी वजह से चर्चा में है। एक महिला का दावा है कि उनके पति की अस्पताल में मृत्यु के करीब 42 दिन बाद आयुष्मान योजना से उनके मोबाइल पर ऐसा संदेश आया, जिसमें मरीज के अस्पताल से स्वस्थ होकर घर जाने की सूचना दी गई।
मामला राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री आवास से करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर रहने वाली स्टाफ नर्स सीमा कुजूर से जुड़ा बताया जा रहा है। सीमा कुजूर के अनुसार, उनके पति आरक्षी देवनारायण राम बीमारी के बाद 26 अगस्त को अम्बिकापुर के एक अस्पताल में भर्ती हुए थे। इलाज के दौरान 30 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई। परिवार के लिए यह बेहद दुखद घटना थी। पति को खोने के बाद परिवार अपने शोक से गुजर रहा था।
लेकिन करीब 42 दिन बाद उनके मोबाइल पर आया एक संदेश परिवार के लिए बेहद चौंकाने वाला था। संदेश में देवनारायण राम के अस्पताल से स्वस्थ होकर घर लौटने की जानकारी दी गई और परिवार को बधाई दी गई। परिवार के अनुसार, जिस व्यक्ति की अस्पताल में मृत्यु हो चुकी थी, सरकारी स्वास्थ्य योजना के डिजिटल रिकॉर्ड में उसे स्वस्थ होकर डिस्चार्ज दिखाया गया।
यहीं से कई गंभीर सवाल सामने आते हैं।
मौत के बाद ‘डिस्चार्ज’ कैसे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अस्पताल के मूल रिकॉर्ड में देवनारायण राम की मृत्यु दर्ज थी, तो आयुष्मान से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड में उनका स्टेटस ‘डिस्चार्ज’ कैसे दिखाई दिया?
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी मरीज की मृत्यु और अस्पताल से स्वस्थ होकर डिस्चार्ज होना दो बिल्कुल अलग स्थितियां हैं। इसलिए यदि रिकॉर्ड में वास्तव में ऐसी विसंगति हुई है, तो इसे केवल सामान्य तकनीकी गलती कहकर समाप्त करना उचित नहीं होगा।
मरीज के इलाज, मृत्यु, डिस्चार्ज और योजना से जुड़े दावे की जानकारी कई स्तरों पर दर्ज होती है। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि गलत जानकारी कहां दर्ज हुई और किस स्तर पर उसकी पुष्टि हुई।
डेटा एंट्री की गलती या सिस्टम की समस्या?
इस मामले में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू डेटा एंट्री हो सकता है। अस्पतालों में मरीजों से जुड़ी जानकारी डिजिटल पोर्टल पर दर्ज की जाती है। यदि देवनारायण राम की मृत्यु के बाद उनके रिकॉर्ड में ‘Death’ के स्थान पर ‘Discharged’ दर्ज किया गया, तो यह पता लगाना होगा कि यह एंट्री किसने की।
क्या यह मानवीय भूल थी? क्या रिकॉर्ड अपडेट करने में जल्दबाजी हुई? क्या किसी कर्मचारी ने गलत विकल्प चुन दिया? या फिर अस्पताल और आयुष्मान पोर्टल के बीच डेटा ट्रांसफर के दौरान कोई तकनीकी समस्या हुई?
इन सवालों के जवाब बिना रिकॉर्ड की जांच किए नहीं दिए जा सकते।
42 दिन बाद संदेश क्यों आया?
मामले को और गंभीर बनाने वाला पहलू संदेश का 42 दिन बाद आना है। यदि यह एक स्वचालित संदेश था, तो यह जानना जरूरी है कि संदेश किस रिकॉर्ड के आधार पर जनरेट हुआ।
क्या अस्पताल के पोर्टल पर मरीज को डिस्चार्ज दिखाया गया था? क्या आयुष्मान सिस्टम ने उसी जानकारी को आधार बनाकर स्वचालित संदेश भेजा? या किसी अन्य प्रक्रिया के कारण यह संदेश जारी हुआ?
यदि संदेश किसी गलत डिजिटल एंट्री के आधार पर गया, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए उस डिजिटल ट्रेल की जांच की जानी चाहिए।
आज लगभग हर डिजिटल सरकारी व्यवस्था में यह पता लगाने की तकनीकी क्षमता होती है कि किसी रिकॉर्ड में बदलाव कब और किस लॉगिन या यूजर आईडी से किया गया। इसलिए इस मामले में अनुमान लगाने के बजाय डिजिटल रिकॉर्ड की जांच सबसे महत्वपूर्ण होगी।
‘सॉफ्टवेयर की गलती’ कहकर मामला खत्म नहीं होना चाहिए
अक्सर सरकारी व्यवस्थाओं में किसी विसंगति के सामने आने पर उसे तकनीकी समस्या या सॉफ्टवेयर की गलती बताकर मामला शांत करने की कोशिश की जाती है। लेकिन इस मामले में ऐसा जवाब पर्याप्त नहीं होगा।
यदि सॉफ्टवेयर ने गलत संदेश भेजा, तो यह पता लगाना होगा कि सॉफ्टवेयर को गलत डेटा किसने दिया। और यदि डेटा सही था, लेकिन संदेश गलत जनरेट हुआ, तो तकनीकी प्रणाली की जिम्मेदारी तय करनी होगी।अर्थात जांच का दायरा केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं होना चाहिए।
जांच में किन सवालों के जवाब जरूरी?
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए कम से कम इन बिंदुओं को देखा जाना चाहिए—
* अस्पताल के मूल मेडिकल रिकॉर्ड में देवनारायण राम का अंतिम स्टेटस क्या दर्ज था?
* मृत्यु प्रमाणपत्र और अस्पताल के डिस्चार्ज रिकॉर्ड में क्या जानकारी है?
* आयुष्मान पोर्टल पर मरीज की अंतिम स्थिति क्या दर्ज हुई?
* रिकॉर्ड में बदलाव किस तारीख को किया गया?
* संबंधित एंट्री किस यूजर आईडी से हुई?
* मृत्यु के बाद डिस्चार्ज स्टेटस किस प्रक्रिया से स्वीकृत हुआ?
* 42 दिन बाद संदेश किस डेटा के आधार पर भेजा गया?
* क्या अस्पताल के आयुष्मान नोडल अधिकारी ने रिकॉर्ड का सत्यापन किया था?
* क्या सिस्टम में ‘मृत्यु’ और ‘डिस्चार्ज’ के बीच पर्याप्त सत्यापन व्यवस्था मौजूद है?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि गलती मानवीय थी, प्रशासनिक थी या तकनीकी।
परिवार के लिए यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं
सरकारी रिकॉर्ड में एक गलत एंट्री अधिकारियों के लिए शायद एक डेटा संबंधी समस्या हो सकती है, लेकिन किसी शोकाकुल परिवार के लिए इसका भावनात्मक असर कहीं बड़ा होता है।
जिस व्यक्ति को परिवार अंतिम विदाई दे चुका हो, उसके नाम से कई सप्ताह बाद यह संदेश आना कि वह स्वस्थ होकर घर लौट गया है, परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक और विचलित करने वाला अनुभव हो सकता है।
सीमा कुजूर द्वारा संदेश का स्क्रीनशॉट सार्वजनिक किए जाने के बाद मामला चर्चा में आया है। अब जरूरी है कि सोशल मीडिया की बहस से आगे बढ़कर संबंधित विभाग पूरे मामले की आधिकारिक जांच करे।
सरकार और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही जरूरी
यह मामला किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि रिकॉर्ड में गलती हुई है तो उसे स्पष्ट रूप से सामने लाया जाना चाहिए। यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी की लापरवाही सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि तकनीकी प्रणाली में खामी है तो उसे दूर करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
आयुष्मान जैसी योजनाओं में करोड़ों लोगों का भरोसा डिजिटल रिकॉर्ड और अस्पतालों की रिपोर्टिंग व्यवस्था पर टिका है। इसलिए मरीज की मृत्यु, इलाज और डिस्चार्ज जैसी संवेदनशील जानकारी में किसी भी तरह की गंभीर विसंगति को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
देवनारायण राम की मृत्यु के बाद यदि सिस्टम ने उन्हें स्वस्थ होकर घर लौटने की बधाई दी, तो इसका जवाब केवल परिवार को नहीं चाहिए। इसका जवाब उस पूरी व्यवस्था को देना होगा, जिसके डिजिटल रिकॉर्ड पर देश के करोड़ों लाभार्थी भरोसा करते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
जिस व्यक्ति की अस्पताल में मौत हो चुकी थी, उसे 42 दिन बाद आयुष्मान सिस्टम ने ‘स्वस्थ होकर घर लौटने’ की बधाई क्यों दी?
गलती कहां हुई, रिकॉर्ड किसने बदला और जिम्मेदार कौन है—इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आना चाहिए।
आलोक कुमार
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