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गुरुवार, 13 अगस्त 2026

India : सवालों से भागती संसद या जवाबदेही से बचती सत्ता?

 सवालों से भागती संसद या जवाबदेही से बचती सत्ता?


राष्ट्रगीत का सम्मान जरूरी है, लेकिन क्या उसके बाद जनता के सवाल भी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जा सकते हैं?

13 अगस्त 2026 का दिन भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए कई सवाल छोड़ गया। मानसून सत्र के अंतिम दिन लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों का निर्धारित संस्करण प्रस्तुत किया गया और इसके बाद सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत कई प्रमुख नेता उस समय सदन में मौजूद थे।

‘वंदे मातरम्’ का सम्मान होना चाहिए। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा ऐतिहासिक गीत है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—**क्या राष्ट्रगीत के सम्मान के साथ-साथ संसद में उठ रहे गंभीर सवालों का जवाब भी मिला?**

यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

संसद केवल रस्मों, नारों और औपचारिकताओं का मंच नहीं है। संसद वह जगह है जहां सरकार अपने फैसलों का हिसाब देती है, विपक्ष सवाल उठाता है और जनता की समस्याएं राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनती हैं। लोकतंत्र में बहुमत सरकार बनाने के लिए जरूरी है, लेकिन जवाबदेही लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए उससे भी ज्यादा जरूरी है।

अगर सरकार मजबूत है, तो सवालों से डर कैसा?

अगर सरकार के पास अपने फैसलों का जवाब है, तो विपक्ष की आलोचना से असहजता कैसी?

और अगर बहुमत ही लोकतंत्र की पूरी ताकत है, तो फिर उस बहुमत को तीखे सवालों का सामना करने में परेशानी क्यों होनी चाहिए?

यह कहना भी सही नहीं होगा कि संसद में व्यवधान की सारी जिम्मेदारी केवल सरकार की है। विपक्ष द्वारा लगातार हंगामा करना, नारेबाजी करना और कार्यवाही बाधित करना भी संसदीय लोकतंत्र के लिए गंभीर समस्या है। सदन को चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

लेकिन यही बात सरकार पर भी लागू होती है।

विपक्ष के सवालों को केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता। सरकार को यह बताना होगा कि जिन मुद्दों पर देश में चिंता है, उन पर उसका पक्ष क्या है।

मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने छात्र आंदोलनों, NEET से जुड़े कथित प्रश्नपत्र लीक, दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और अन्य मुद्दों को लेकर सरकार से जवाब मांगा। दूसरी ओर सरकार की ओर से भी यह कहा गया कि कुछ मुद्दों पर चर्चा के लिए वह तैयार है। गृह मंत्री अमित शाह ने छात्र प्रदर्शन के मुद्दे पर चर्चा के लिए समय देने का आग्रह किया था।

फिर भी पूरे सत्र की तस्वीर बेहद असहज रही।

रिपोर्टों के अनुसार लोकसभा अपने निर्धारित समय का लगभग 15 प्रतिशत ही प्रभावी रूप से काम कर सकी और कई विधेयक व्यापक बहस के बिना पारित हुए। 12 विधेयक पारित किए गए, लेकिन केवल दो पर बहस हुई।

यहीं से असली चिंता पैदा होती है।

संसद में कानून बनना जरूरी है, लेकिन कानून पर बहस होना उससे कम जरूरी नहीं है।

एक विधेयक केवल कागज पर लिखे शब्द नहीं होते। उसके पीछे करोड़ों नागरिकों का जीवन प्रभावित हो सकता है। इसलिए संसद में चर्चा, संशोधन, सवाल और सरकार का जवाब लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनिवार्य हिस्से हैं।

विपक्ष कमजोर हो सकता है। विपक्ष की रणनीति गलत हो सकती है। विपक्ष के आरोपों में राजनीति हो सकती है। लेकिन विपक्ष का अस्तित्व संसदीय लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।

सरकार को विपक्ष पसंद आए, यह जरूरी नहीं।

लेकिन विपक्ष के सवालों का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी जरूर है।

इसी तरह विपक्ष को भी यह समझना होगा कि संसद सड़क का मंच नहीं है। लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन सदन को लगातार बाधित करना जनता के अधिकारों को ही नुकसान पहुंचाता है।

आखिर संसद में बैठा हर सांसद किसी न किसी नागरिक का प्रतिनिधि है।

किसान जानना चाहता है कि उसकी फसल का उचित मूल्य क्यों नहीं मिल रहा।

युवा पूछता है कि रोजगार के अवसर कब बढ़ेंगे।

छात्र शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था पर जवाब चाहता है।

गरीब महंगाई और सामाजिक सुरक्षा पर सरकार की नीति जानना चाहता है।

मध्यम वर्ग टैक्स और आर्थिक दबाव को लेकर सवाल करता है।

राज्य सरकारें केंद्र से वित्तीय और प्रशासनिक सहयोग के बारे में जवाब चाहती हैं।

इन सवालों को संसद में जगह मिलनी चाहिए।

‘वंदे मातरम्’ राष्ट्र की भावना है। तिरंगा राष्ट्र की पहचान है। संविधान लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है और संसद उस संविधान के तहत जनता की संप्रभु इच्छा को अभिव्यक्त करने वाला प्रमुख मंच है।

इसलिए राष्ट्रगीत का सम्मान और संसदीय जवाबदेही—इन दोनों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना उचित नहीं है।

राष्ट्रगीत के सम्मान के बाद संसद स्थगित हो सकती है, लेकिन जनता के सवाल स्थगित नहीं होते।

वे सवाल संसद के बाहर भी मौजूद रहते हैं।

मीडिया उन्हें पूछता है।

विपक्ष उन्हें उठाता है।

नागरिक समाज उन्हें सामने लाता है।

और अंततः मतदाता चुनाव के समय उनका हिसाब मांगता है।

यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है और उसकी ताकत भी।

आज विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी तथा उसके बाद कार्यवाही स्थगित होने को लेकर राजनीतिक सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़ रहा है। लेकिन किसी भी राजनीतिक आरोप को अंतिम सत्य मानने के बजाय यह देखना जरूरी है कि वास्तव में सदन में चर्चा के लिए कौन-कौन से अवसर उपलब्ध थे और किन कारणों से वे इस्तेमाल नहीं हो सके।

क्योंकि लोकतंत्र में केवल आरोप महत्वपूर्ण नहीं होते, रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण होता है।

सरकार के लिए भी यही अवसर है कि वह विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक नारों से नहीं, तथ्यों और बहस से जवाब दे।

यदि सरकार के पास जवाब है तो उसे सदन में रखना चाहिए।

यदि विपक्ष के आरोप गलत हैं तो उन्हें सदन के भीतर तथ्यों के साथ खारिज किया जाना चाहिए।

यदि कोई मुद्दा गंभीर है तो उस पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए।

और यदि कोई आरोप निराधार है तो जनता को यह बताया जाना चाहिए कि वह निराधार क्यों है।

यही जवाबदेही है।

‘56 इंच’ की राजनीतिक छवि केवल ताकत दिखाने से मजबूत नहीं होती। असली राजनीतिक ताकत तब दिखाई देती है जब सत्ता अपने सबसे कठिन आलोचक के सामने बैठकर उसके सबसे कठिन सवाल का जवाब देती है।

सवाल का सामना करना कमजोरी नहीं, लोकतांत्रिक आत्मविश्वास है।

संसद की कार्यवाही स्थगित की जा सकती है।

बहस टाली जा सकती है।

सदन में हंगामा हो सकता है।

माइक बंद हो सकता है।

लेकिन जनता की जिज्ञासा को स्थगित नहीं किया जा सकता।

इसलिए आज आवश्यकता किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने की है।

सवाल सरकार से भी होना चाहिए और विपक्ष से भी।

क्या सरकार ने हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर पर्याप्त जवाब दिया?

क्या विपक्ष ने सवाल पूछने के लिए संसदीय रास्ते का पर्याप्त इस्तेमाल किया?

क्या महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त बहस हुई?

क्या जनता के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला?

अगर इन सवालों का जवाब ‘हां’ है तो लोकतंत्र मजबूत है।

अगर जवाब ‘नहीं’ है तो सुधार की जरूरत है।

क्योंकि संसद को स्थगित किया जा सकता है, लेकिन जनता के सवालों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता।

और यही किसी भी सत्ता की असली परीक्षा है—

सवाल से भागना ताकत नहीं है।

सवाल का सामना करना ही असली ताकत है।**

आलोक कुमार

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