जब नरेंद्र मोदी की राजनीति में ‘विश्वकर्मा’ का रूपक चर्चा में आया
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नरेंद्र मोदी को आधिकारिक रूप से ‘विश्वकर्मा’ कोई पदवी नहीं मिली है और न ही यह कोई संवैधानिक या ऐतिहासिक उपाधि है। विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोतों में अधिक स्पष्ट रूप से यह दिखाई देता है कि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने विश्वकर्मा को श्रम, कौशल, शिल्प और निर्माण से जोड़ा है।
17 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार ने PM Vishwakarma योजना शुरू की थी। इस योजना का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को प्रशिक्षण, प्रमाण-पत्र, ऋण और अन्य सहायता उपलब्ध कराना है। योजना में 18 पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है।
विश्वकर्मा का प्रतीक और राजनीति
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प, वास्तु और सृजन से जोड़ा जाता है। इसलिए ‘विश्वकर्मा’ शब्द केवल धार्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं रहता। आधुनिक सार्वजनिक विमर्श में यह मेहनत, हुनर और निर्माण की प्रतीकात्मक भाषा भी बन सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कारीगरों और कुशल श्रमिकों के योगदान को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा है। 2022 में उन्होंने विश्वकर्मा जयंती को मेहनत और श्रम के सम्मान से संबंधित बताया तथा कहा कि भारत में श्रमिक के कौशल में भी विश्वकर्मा का स्वरूप देखा गया है।
इस दृष्टि से ‘विश्वकर्मा’ रूपक को समझने का एक रास्ता यह है कि इसे किसी एक व्यक्ति के बजाय निर्माण और कौशल की राजनीति के रूप में देखा जाए।
मोदी की सार्वजनिक छवि और निर्माण का विमर्श
2014 के बाद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली में विकास, बुनियादी ढांचे, तकनीक, आत्मनिर्भरता और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। सरकार की ओर से भी विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं को आधुनिक भारत के निर्माण से जोड़ा जाता रहा है।
लेकिन किसी भी सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल राजनीतिक प्रतीकों से नहीं किया जा सकता। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, डिजिटल सेवाएं, उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में वास्तविक परिणामों को अलग-अलग आंकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों के आधार पर देखना पड़ता है।
यही वह बिंदु है जहां ‘विश्वकर्मा’ का रूपक राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर सार्वजनिक बहस का विषय बन सकता है।
प्रधानमंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण है कारीगर
विश्वकर्मा के प्रतीक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका संबंध मूल रूप से कौशल और निर्माण से है। इसलिए यदि इस प्रतीक का इस्तेमाल राजनीतिक संदर्भ में किया जाता है तो चर्चा केवल प्रधानमंत्री या किसी नेता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
देश के वास्तविक निर्माण में राजमिस्त्री, बढ़ई, लोहार, सुनार, कुम्हार, दर्जी, मोची, नाव निर्माता, मूर्तिकार, नाई, धोबी और ऐसे अनेक पारंपरिक कारीगरों की भूमिका है। PM Vishwakarma योजना में इन्हीं 18 पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है।
2026 में केंद्र सरकार ने भी PM Vishwakarma योजना के तहत 24 लाख से अधिक पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक कौशल, ऋण और बाजार सहायता से जोड़ने की जानकारी दी है।
इसलिए ‘विश्वकर्मा’ शब्द का सबसे व्यापक अर्थ उस श्रम और हुनर में दिखाई देता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को वास्तविक रूप से बनाता और चलाता है।
दाढ़ी से लेकर राजनीतिक प्रतीक तक
नरेंद्र मोदी की दाढ़ी भी उनकी सार्वजनिक छवि का एक चर्चित हिस्सा रही है। उनके पहनावे और व्यक्तिगत शैली पर अकादमिक और मीडिया विश्लेषण भी प्रकाशित हुए हैं।
लेकिन दाढ़ी की किसी पारंपरिक विश्वकर्मा चित्रात्मक छवि से समानता को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। ऐसी समानताएं यदि राजनीतिक या सोशल मीडिया विमर्श में सामने आती हैं तो उन्हें रूपक या प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए, ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं।
यही अंतर पत्रकारिता में महत्वपूर्ण है—किसी राजनीतिक प्रतीक की चर्चा की जा सकती है, लेकिन प्रतीक को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
विश्वकर्मा जयंती का राजनीतिक संदर्भ
17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती और नरेंद्र मोदी के जन्मदिन का अवसर एक ही दिन पड़ता है। 17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी संदेश में मोदी ने कारीगरों, शिल्पकारों और निर्माण से जुड़े कुशल श्रमिकों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया तथा उनके कौशल और मेहनत को विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से जोड़ा।
यह संयोग राजनीतिक संचार के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि एक ही दिन प्रधानमंत्री का जन्मदिन और विश्वकर्मा जयंती होने से नेतृत्व, श्रम, कौशल और निर्माण जैसे विषय एक ही सार्वजनिक विमर्श में दिखाई देते हैं।
लेकिन इसका अर्थ निकालते समय तथ्य और राजनीतिक प्रस्तुति के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
असली सवाल उपमा का नहीं, काम का है
किसी नेता को ‘विश्वकर्मा’ कहना हो या किसी दूसरे सांस्कृतिक प्रतीक से जोड़ना—यह राजनीतिक भाषा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन देश निर्माण किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है।
भारत को बनाने में किसान खेत में काम करता है, मजदूर निर्माण स्थल पर श्रम करता है, इंजीनियर डिजाइन तैयार करता है, वैज्ञानिक शोध करता है, शिक्षक नई पीढ़ी तैयार करता है और उद्यमी रोजगार पैदा करता है। सरकारी कर्मचारी प्रशासन चलाते हैं और करोड़ों नागरिक अपने-अपने क्षेत्र में योगदान देते हैं।
इसलिए विश्वकर्मा का रूपक यदि इस्तेमाल किया जाए तो उसकी सबसे व्यापक व्याख्या सामूहिक राष्ट्र निर्माण और श्रम के सम्मान में होनी चाहिए।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में ‘निर्माण’ और ‘विकास’ की भाषा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण रही है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दावे की अंतिम कसौटी प्रतीक या उपमा नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद नीतियां, आंकड़े और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम होते हैं।
आखिरकार, विश्वकर्मा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि निर्माण केवल कल्पना से नहीं होता। उसके लिए कौशल, श्रम, साधन और निरंतर प्रयास चाहिए। राजनीति में किसी नेता को इस प्रतीक से जोड़ना एक बात है, लेकिन उस प्रतीक से जुड़े श्रम और कारीगरों को सम्मान, अवसर और आर्थिक सुरक्षा देना उससे कहीं अधिक ठोस प्रश्न है।
यही वह जगह है जहां राजनीतिक प्रतीकवाद और वास्तविक राष्ट्र निर्माण के बीच अंतर दिखाई देता है।
आलोक कुमार