अटल जी की प्रतिमा पर कथित छल: क्या भ्रष्टाचार ने आदर्शों को भी नहीं छोड़ा?
भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही नेताओं में गिने जाते हैं। वे केवल भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता या देश के पूर्व प्रधानमंत्री भर नहीं थे, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, राजनीतिक शालीनता, संवाद की संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक माने जाते हैं। उनके व्यक्तित्व का सम्मान राजनीतिक मतभेदों से परे जाकर किया जाता है। ऐसे नेता की प्रतिमा के निर्माण में यदि भ्रष्टाचार या अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो यह केवल आर्थिक गड़बड़ी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह समाज की नैतिक संवेदनाओं को भी झकझोर देता है।
भारतीय जनता पार्टी स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने का दावा करती है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसके लाखों समर्पित कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन को मजबूत बनाने में वर्षों का परिश्रम लगाया है। इन्हीं कार्यकर्ताओं के समर्पण और जनता के विश्वास के आधार पर पार्टी लगातार चुनावी सफलताएं प्राप्त करती रही है। ऐसे में यदि संगठन या उससे जुड़े किसी तंत्र पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग अथवा राष्ट्रपुरुषों के सम्मान से जुड़े कार्यों में कथित अनियमितता के आरोप लगते हैं, तो उसका प्रभाव केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरे संगठन की विश्वसनीयता और नैतिक छवि पर प्रश्न उठने लगते हैं।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले से सामने आया मामला इसी कारण गंभीर माना जा रहा है। आरोप है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जिस प्रतिमा को निर्धारित मानकों के अनुसार तांबे या कांस्य जैसी धातु से बनाया जाना था, उसकी जगह सीमेंट या प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमा पर धातु जैसा रंग चढ़ाकर स्थापित कर दिया गया। बताया जाता है कि बारिश के बाद जब रंग की परत उखड़ने लगी, तब कथित अनियमितता उजागर हुई और इसने राजनीतिक तथा सामाजिक बहस को जन्म दे दिया।
यह उल्लेख करना आवश्यक है कि फिलहाल यह मामला आरोपों के दायरे में है और अंतिम सत्य किसी निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों और जांच प्रक्रिया का सम्मान करना अनिवार्य है। लेकिन यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल निर्माण कार्य में लापरवाही या वित्तीय गड़बड़ी नहीं होगी, बल्कि उस राष्ट्रीय व्यक्तित्व के सम्मान के साथ भी अन्याय होगा, जिसने अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, सादगी और राजनीतिक मर्यादा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
सार्वजनिक धन से बनने वाली प्रतिमाएं केवल पत्थर, धातु या सीमेंट की संरचनाएं नहीं होतीं। वे इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय स्मृति का प्रतीक होती हैं। इनके निर्माण में गुणवत्ता, पारदर्शिता और निर्धारित मानकों का पालन केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का प्रश्न होता है। यदि किसी परियोजना में घटिया सामग्री का उपयोग किया गया हो या अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन हुआ हो, तो यह सीधे-सीधे करदाताओं के धन के साथ विश्वासघात माना जाएगा।
इस घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। अक्सर देखा जाता है कि परियोजनाओं की घोषणा बड़े उत्साह से होती है, लेकिन उनके क्रियान्वयन और गुणवत्ता की नियमित जांच उतनी गंभीरता से नहीं होती। यदि समय-समय पर तकनीकी परीक्षण, स्वतंत्र निरीक्षण और सामाजिक ऑडिट की व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू हो, तो ऐसी कथित अनियमितताओं की संभावना काफी हद तक कम की जा सकती है।
यदि जांच में ठेका शर्तों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों, निर्माण एजेंसी और ठेकेदार की जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय की जानी चाहिए। केवल बयानबाजी या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से समस्या का समाधान नहीं होगा। गुणवत्ता परीक्षण, भुगतान की समीक्षा, सरकारी धन की वसूली, दोषी एजेंसियों की ब्लैकलिस्टिंग और आवश्यक होने पर आपराधिक कार्रवाई जैसे कदम निष्पक्ष जांच के आधार पर उठाए जाने चाहिए। इससे जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सार्वजनिक धन और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के साथ किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
भ्रष्टाचार का कोई राजनीतिक रंग नहीं होता। यह किसी एक दल, सरकार या विचारधारा तक सीमित समस्या नहीं है। जब भी सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग होता है, उसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। इसलिए ऐसे मामलों में राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर सच्चाई सामने लाने और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की आवश्यकता होती है। किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक पहचान केवल चुनावी जीत से नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील मामलों में उसकी नैतिक जवाबदेही और पारदर्शी कार्रवाई से होती है।
अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में राजनीति को संवाद, सहमति और मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। वे अक्सर कहते थे कि सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन राष्ट्र और लोकतंत्र सर्वोपरि हैं। यही कारण है कि उनके राजनीतिक विरोधी भी उनके व्यक्तित्व का सम्मान करते थे। यदि उनके नाम पर स्थापित किसी स्मारक या प्रतिमा में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो यह उनके आदर्शों के विपरीत प्रतीत होता है।
आज आवश्यकता केवल दोषारोपण की नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की भी है। सरकारी निर्माण कार्यों में ई-टेंडरिंग, थर्ड पार्टी ऑडिट, निर्माण सामग्री की वैज्ञानिक जांच, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और नागरिक निगरानी जैसी व्यवस्थाओं को और अधिक प्रभावी बनाना होगा। इससे न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
अंततः यह मामला किसी एक प्रतिमा या एक जिले तक सीमित नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि क्या हम अपने राष्ट्रपुरुषों के सम्मान को केवल भाषणों और स्मरण दिवसों तक सीमित रखना चाहते हैं, या उनके नाम पर होने वाले प्रत्येक सार्वजनिक कार्य में ईमानदारी और गुणवत्ता सुनिश्चित करना चाहते हैं। यदि जांच निष्पक्ष हो, दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिले और भविष्य के लिए मजबूत व्यवस्था बनाई जाए, तभी यह अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान नेता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। लोकतंत्र की गरिमा भी इसी में है कि कानून सब पर समान रूप से लागू हो और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता केवल भाषणों का विषय न रहकर व्यवहार का आधार बने।
आलोक कुमार