🔴 ताजा खबर

Jharkhand : झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर बढ़ा विवाद

 झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर बढ़ा विवाद


रांची।
झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान, पारंपरिक पर्व-त्योहार और पूजा-पद्धति को लेकर नया विवाद सामने आया है। केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने चर्चों और गिरजाघरों में पारंपरिक आदिवासी पर्वों को ईसाई धार्मिक पद्धति के अनुरूप मनाए जाने पर आपत्ति जताई है। समिति ने इस संबंध में 16 सितंबर 2026 को रांची के उपायुक्त को लिखित शिकायत देकर मामले की जांच और कथित आयोजनों पर रोक लगाने की मांग की।

मामले को लेकर 18 सितंबर को रांची प्रेस क्लब में केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने संयुक्त प्रेस वार्ता भी की। इसमें संगठनों ने विशेष रूप से करम पर्व और करम देवता से जुड़े आयोजनों का मुद्दा उठाया। समिति का आरोप है कि कुछ चर्च परिसरों में पारंपरिक आदिवासी पर्व को ईसाई धार्मिक तरीके से मनाने की कोशिश की जा रही है।

चर्च परिसरों में करम पर्व मनाने पर आपत्ति

केन्द्रीय सरना समिति की ओर से लगाए गए आरोपों में कहा गया है कि कुछ चर्च या गिरजाघर परिसरों में बालू का टीला बनाकर करम देवता से संबंधित आयोजन किए जा रहे हैं। समिति इसे आदिवासी धार्मिक परंपराओं के स्वरूप में बदलाव और पारंपरिक मान्यताओं के साथ खिलवाड़ के रूप में देखती है।

प्रेस वार्ता में समिति और सहयोगी संगठनों ने कहा कि उन्हें किसी समुदाय के अपने धार्मिक पर्व मनाने पर आपत्ति नहीं है। उनका विरोध उस स्थिति से है, जिसमें उनके अनुसार आदिवासी पर्वों को दूसरे धार्मिक तरीके से मनाया जाता है। समिति ने आदिवासी पर्वों की मूल परंपराओं और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का सम्मान किए जाने की मांग की है।

हालांकि, इन आरोपों के संबंध में संबंधित चर्चों या ईसाई आदिवासी समुदाय का पक्ष इस रिपोर्ट में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए आरोपों को अंतिम तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित संगठनों द्वारा लगाए गए आरोप के रूप में देखना जरूरी है।

आदिवासी समाज में धार्मिक विविधता

झारखंड का आदिवासी समाज धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से एकरूप नहीं है। विभिन्न आदिवासी समुदायों के बीच परंपराओं, आस्थाओं और धार्मिक व्यवहार में अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में आदिवासी पहचान और धार्मिक पहचान के संबंध को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ सकते हैं।

यही कारण है कि इस विवाद को केवल दो धार्मिक समूहों के बीच टकराव के रूप में देखने के बजाय इसके सांस्कृतिक और सामाजिक पक्ष को भी समझना जरूरी है।

करम और सरहुल जैसे पर्व झारखंड की आदिवासी सांस्कृतिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दूसरी ओर, ईसाई आदिवासी समुदाय के लिए अपनी धार्मिक आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को किस रूप में जोड़ा जाए, यह भी उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जुड़ा प्रश्न हो सकता है।

इसलिए विवाद के किसी भी समाधान के लिए सभी संबंधित पक्षों की बात सुना जाना और वास्तविक आयोजनों की प्रकृति की जांच किया जाना महत्वपूर्ण होगा।

प्रशासन से जांच की मांग

केन्द्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों ने रांची के उपायुक्त को दिए गए पत्र में मामले की जांच कराने की मांग की है। संगठनों की अपेक्षा है कि प्रशासन यह स्पष्ट करे कि संबंधित धार्मिक स्थलों पर किस प्रकार के आयोजन किए जा रहे हैं और उनकी प्रकृति क्या है।

समिति का कहना है कि आदिवासी धार्मिक प्रतीकों और पर्वों के मूल स्वरूप का सम्मान किया जाना चाहिए। संगठनों ने यह भी कहा है कि ईसाई समुदाय अपने धार्मिक पर्व मनाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उनके अनुसार आदिवासी पर्वों को अलग धार्मिक पद्धति में मनाए जाने पर आपत्ति है।

अब निगाह प्रशासन की ओर है कि शिकायत पर क्या जांच होती है और संबंधित पक्षों से क्या जानकारी ली जाती है।

धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकार का सवाल

इस विवाद का एक व्यापक पहलू धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ा है। भारत में विभिन्न समुदायों को अपनी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार जीवन जीने का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में किसी भी विवाद में यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित गतिविधि किस प्रकृति की है और उससे किसी समुदाय के अधिकारों पर वास्तविक प्रभाव पड़ रहा है या नहीं।

साथ ही, आदिवासी समुदायों की पारंपरिक संस्कृति और धार्मिक विरासत के संरक्षण का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। करम, सरहुल और अन्य पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कई समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हुए हैं।

इसी कारण ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई से पहले तथ्यों की पुष्टि, संबंधित पक्षों की सुनवाई और स्थानीय परिस्थितियों की समझ जरूरी हो जाती है।

विवाद से आगे संवाद की जरूरत

झारखंड में आदिवासी धार्मिक पहचान का प्रश्न नया नहीं है। समय-समय पर आदिवासी परंपरा, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर विभिन्न संगठन अपनी मांगें और आपत्तियां सामने रखते रहे हैं। हाल के वर्षों में भी केन्द्रीय सरना समिति ने सरहुल और अन्य आदिवासी धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी मांगें रखी हैं।

मौजूदा विवाद में भी सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आरोपों की स्वतंत्र जांच हो और सभी संबंधित समुदायों को अपनी बात रखने का अवसर मिले। धार्मिक पहचान जैसे संवेदनशील विषय में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले वास्तविक घटनाओं और उनके संदर्भ को समझना जरूरी है।

केन्द्रीय सरना समिति की ओर से 16 सितंबर को दिए गए ज्ञापन और 18 सितंबर की प्रेस वार्ता के बाद अब प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार है।

यह विवाद झारखंड में आदिवासी धार्मिक परंपरा, सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और सामुदायिक सह-अस्तित्व से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल सामने लाता है। इन सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से अधिक संवाद, तथ्य-जांच और सभी पक्षों की संवेदनशील भागीदारी से खोजा जा सकता है।

झारखंड में करम पर्व और आदिवासी धार्मिक पहचान को लेकर विवाद सामने आया है। केंद्रीय सरना समिति ने रांची उपायुक्त से जांच और कार्रवाई की मांग की है।

आलोक कुमार

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/

India: महिला क्रिकेट में भारत का स्वर्णिम वार, श्रीलंका को हराकर एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार गोल्ड

  महिला क्रिकेट में भारत का स्वर्णिम वार, श्रीलंका को हराकर एशियन गेम्स में लगातार दूसरी बार गोल्ड  भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने एक बार फिर ए...