रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन, मजदूरी का भुगतान, काम की अनिश्चितता और सरकारी योजनाओं तक सीमित पहुंच बिहार के ग्रामीण मजदूरों की बड़ी समस्याएँ हैं। स्थानीय रोजगार और श्रमिक अधिकारों को मजबूत करना समय की जरूरत है।
नई व्यवस्था के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के अकुशल मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी दी गई है।
इस व्यवस्था का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब ग्रामीण मजदूरों को काम की मांग दर्ज कराने, निर्धारित समय में रोजगार प्राप्त करने और मजदूरी का भुगतान हासिल करने में कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
सरकारी प्रावधान के अनुसार रोजगार की मांग के 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। ऐसा नहीं होने पर नियमानुसार बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान भी है।
ग्राम पंचायतों को रोजगार की मांग दर्ज करने, कार्यों की योजना बनाने और मजदूरों को जानकारी देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। कार्यस्थलों पर पेयजल, छाया और प्राथमिक उपचार जैसी सुविधाएं भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
ग्रामसभा और सामाजिक अंकेक्षण के माध्यम से यह जांच जरूरी है कि स्वीकृत कार्य वास्तव में हुए या नहीं, मजदूरों की उपस्थिति सही दर्ज हुई या नहीं और भुगतान समय पर हुआ या नहीं।
इस नई व्यवस्था की सफलता का मूल्यांकन केवल रोजगार के दिनों की संख्या से नहीं, बल्कि मजदूरों को वास्तव में मिले काम, समय पर भुगतान और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव से किया जाना चाहिए।
लेखक: आलोक कुमार | Chingari Prime News
