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बुधवार, 4 नवंबर 2026

Bihar : कल्याणकारी राज्य का मतलब एहसान नहीं

 


कल्याणकारी राज्य का मतलब एहसान नहीं, जनता के प्रति सरकार की जिम्मेदारी है!

 मुफ्त बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी जनकल्याणकारी योजनाओं को राजनीतिक उपकार के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और जनहित की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार को सुविधाओं के साथ अपनी जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी।

लोकतंत्र में सरकार जनता की मालिक नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह होती है। सत्ता जनता के मत और संवैधानिक व्यवस्था से मिलती है। इसलिए सरकार का मूल दायित्व नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना, उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना और समाज के कमजोर वर्गों को सम्मानजनक जीवन का अवसर उपलब्ध कराना है।

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया बयान के संदर्भ में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर चर्चा जरूरी हो गई है। एक नवंबर 2026 को पटना में आयोजित पाटलिपुत्र नेशनल यूथ पार्लियामेंट-2.0 में मुख्यमंत्री ने आर्थिक रूप से संपन्न और आयकर देने वाले लोगों से 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की अपील की थी। उन्होंने बिजली सब्सिडी पर राज्य सरकार के खर्च का भी उल्लेख किया था। इस अपील के पीछे सरकारी खर्च और राज्य के विकास के लिए संसाधनों के उपयोग का तर्क सामने आया है।

यहाँ एक बुनियादी सवाल उठता है कि क्या सरकार द्वारा नागरिकों को दी जाने वाली जनकल्याणकारी सुविधाओं को एहसान या राजनीतिक उपकार के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए? लोकतंत्र में सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जनता को लाभ पहुँचाना है, न कि नागरिकों को सरकार के प्रति कृतज्ञता के भाव में बाँधना।

लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का गठन जनता की इच्छा और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से होता है। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद का दायित्व राज्य के नागरिकों के हित में काम करना है।

जनता सरकार को अपने संसाधनों और करों के माध्यम से चलाती है। इसलिए सरकारी योजनाओं और सुविधाओं को किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की निजी उदारता नहीं माना जा सकता।

खाना, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी सुविधाएँ नागरिकों की बुनियादी जरूरतें हैं। इन्हें उपलब्ध कराने के लिए सरकार नीतियाँ बनाती है, बजट निर्धारित करती है और प्रशासनिक व्यवस्था संचालित करती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सुविधा हर परिस्थिति में बिना किसी शर्त के मुफ्त उपलब्ध कराना ही सरकार का दायित्व है। लेकिन सरकार की नीतियों का केंद्र नागरिकों का कल्याण, समान अवसर और सामाजिक न्याय होना चाहिए।

कल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा क्या है?

कल्याणकारी राज्य वह व्यवस्था है, जिसमें सरकार केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रशासन चलाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी सक्रिय भूमिका निभाती है।

भारतीय संविधान में भी इस अवधारणा को विशेष महत्व दिया गया है। संविधान के भाग चार में राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का उल्लेख है। अनुच्छेद 38 सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने तथा असमानताओं को कम करने की दिशा में राज्य को निर्देश देता है।

अनुच्छेद 39 में नागरिकों के जीवनयापन के पर्याप्त साधन, संसाधनों का व्यापक जनहित में वितरण और बच्चों के विकास से जुड़े सिद्धांत दिए गए हैं। अनुच्छेद 41 में राज्य की आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर काम, शिक्षा तथा सार्वजनिक सहायता से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है। अनुच्छेद 47 पोषण स्तर, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य का प्रमुख दायित्व मानता है।

इससे स्पष्ट होता है कि जनकल्याण भारतीय शासन व्यवस्था की महत्वपूर्ण संवैधानिक दिशा है। इन नीति-निदेशक तत्वों को न्यायालय में सीधे लागू कराने योग्य मौलिक अधिकारों के समान नहीं माना जाता, लेकिन वे शासन और नीतियों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक हैं।

मुफ्त बिजली की अपील और सरकारी जिम्मेदारी का सवाल

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आर्थिक रूप से सक्षम और आयकर देने वाले परिवारों से 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की अपील की है। उनका तर्क है कि बिजली सब्सिडी पर राज्य सरकार का बड़ा खर्च होता है और सक्षम लोग यदि इसका लाभ छोड़ते हैं, तो उपलब्ध संसाधनों का उपयोग अन्य विकास कार्यों में किया जा सकता है।

इस विषय पर सरकार की आर्थिक चिंता और नागरिकों के कल्याण, दोनों पक्षों पर विचार होना चाहिए।

सरकारी सब्सिडी का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को राहत देना है। यदि किसी योजना पर बहुत अधिक खर्च हो रहा है, तो उसकी समीक्षा करना सरकार का अधिकार और वित्तीय प्रबंधन की जिम्मेदारी है।

लेकिन ऐसी समीक्षा पारदर्शी होनी चाहिए। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सब्सिडी पर कितना खर्च हो रहा है, उसका लाभ किन वर्गों को मिल रहा है और यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से लाभ छोड़ता है तो उससे बचने वाली राशि का उपयोग किन कार्यों में किया जाएगा।

साथ ही, स्वैच्छिक अपील और अनिवार्य रूप से लाभ समाप्त करने के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है।

गरीब परिवारों के लिए योजनाओं का महत्व

बिहार जैसे राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जिनकी आय सीमित है। मजदूर, छोटे किसान, भूमिहीन परिवार, घरेलू कामगार और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले नागरिक अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करते हैं।

ऐसे परिवारों के लिए बिजली बिल में राहत, सरकारी राशन, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ महत्वपूर्ण सहारा बन सकती हैं।

यदि किसी गरीब परिवार को बिजली पर राहत मिलती है, तो उसकी बचत का उपयोग बच्चों की पढ़ाई, भोजन, दवाइयों या अन्य जरूरी जरूरतों में हो सकता है।

इसी तरह सरकारी राशन व्यवस्था गरीब परिवारों की खाद्य सुरक्षा में योगदान देती है। सरकारी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अस्पतालों में बेहतर इलाज उपलब्ध होना सामाजिक असमानता कम करने के लिए आवश्यक है।

इसलिए जनकल्याणकारी योजनाओं को केवल सरकारी खर्च के रूप में नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के जीवन में सुधार के माध्यम के रूप में भी देखना चाहिए।

क्या सभी योजनाओं का लाभ समान रूप से मिलना चाहिए?

यह भी एक महत्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न है कि सरकारी सब्सिडी और सुविधाओं का लाभ सभी आर्थिक वर्गों को समान रूप से मिलना चाहिए या जरूरत के आधार पर प्राथमिकता तय होनी चाहिए।

सरकार को किसी योजना का मूल्यांकन करते समय उसकी लागत, लाभार्थियों की आर्थिक स्थिति, वास्तविक जरूरत और सामाजिक प्रभाव का अध्ययन करना चाहिए।

कुछ सुविधाएँ सार्वभौमिक प्रकृति की हो सकती हैं, जबकि कुछ योजनाएँ विशेष रूप से गरीब, कमजोर और वंचित वर्गों के लिए बनाई जा सकती हैं।

लेकिन लाभार्थियों की पहचान की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि पात्र व्यक्ति केवल दस्तावेजों की कमी, तकनीकी समस्या या प्रशासनिक लापरवाही के कारण लाभ से वंचित रह जाए।

कल्याणकारी राज्य की सफलता इसी में है कि वास्तविक जरूरतमंद तक सरकारी सहायता पहुँचे।

बिहार में बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति पर भी हो चर्चा

सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल योजनाओं की घोषणा या बजट के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि आम नागरिकों को इन योजनाओं का वास्तविक लाभ कितना मिल रहा है।

क्या प्रत्येक गाँव में स्वच्छ पेयजल की नियमित आपूर्ति हो रही है? क्या सरकारी विद्यालयों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर, दवाइयाँ और जांच सुविधाएँ उपलब्ध हैं? क्या युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं?

क्या किसानों को समय पर सरकारी सहायता, सिंचाई और बाजार की सुविधा मिल रही है? क्या बुजुर्गों, दिव्यांगों और जरूरतमंद परिवारों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ नियमित रूप से मिल रहा है?

इन सवालों के जवाब सरकार के वास्तविक कामकाज का महत्वपूर्ण आधार हैं।

बिहार में विकास की चर्चा तभी सार्थक होगी, जब गाँव और शहर के बीच बुनियादी सुविधाओं का अंतर कम हो और गरीब परिवारों को भी सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर मिलें।

सरकारी योजनाओं के साथ जवाबदेही भी जरूरी

कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के बाद उनकी नियमित समीक्षा भी होनी चाहिए। सरकार को यह देखना चाहिए कि निर्धारित बजट का उपयोग किस प्रकार हो रहा है और लाभार्थियों तक सहायता पहुँचने में कौन-कौन सी बाधाएँ आ रही हैं।

योजनाओं में पारदर्शिता के लिए निम्नलिखित कदम महत्वपूर्ण हैं:

  1. प्रत्येक जनकल्याणकारी योजना का बजट और खर्च सार्वजनिक किया जाए।

  2. लाभार्थियों की पहचान के नियम स्पष्ट और सरल हों।

  3. पात्र नागरिकों को बिना अनावश्यक देरी के लाभ मिले।

  4. योजनाओं के क्रियान्वयन का नियमित सामाजिक और प्रशासनिक ऑडिट हो।

  5. शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।

  6. योजनाओं के वास्तविक परिणामों की सार्वजनिक समीक्षा हो।

  7. सरकारी सहायता के वितरण में भेदभाव और अनियमितताओं को रोकने के लिए निगरानी मजबूत की जाए।

इससे जनता को यह जानने का अवसर मिलेगा कि सरकार ने कौन-सी योजना बनाई, उस पर कितना खर्च किया और उसका वास्तविक लाभ किसे मिला।

जनता को भी जागरूक नागरिक की भूमिका निभानी होगी

लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका केवल मतदान तक सीमित नहीं है। जनता को सरकारी योजनाओं, बजट, सार्वजनिक सेवाओं और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।

नागरिक सूचना के अधिकार का उपयोग कर योजनाओं के खर्च और क्रियान्वयन से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। ग्रामसभा, स्थानीय बैठकों और जनसुनवाई के माध्यम से अपनी समस्याएँ उठा सकते हैं।

यदि किसी पात्र व्यक्ति को सरकारी सुविधा नहीं मिलती है, तो उसे उचित शिकायत माध्यम का उपयोग करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना और सरकारी कार्यों का मूल्यांकन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है।

सरकार और जनता के बीच संबंध उपकार और कृतज्ञता का नहीं, बल्कि अधिकार, कर्तव्य और जवाबदेही का होना चाहिए।

निष्कर्ष: जनता सर्वोपरि, सरकार जवाबदेह

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की मुफ्त बिजली का लाभ स्वेच्छा से छोड़ने की अपील पर वित्तीय प्रबंधन और सामाजिक कल्याण, दोनों दृष्टिकोणों से चर्चा हो सकती है। सक्षम परिवारों से स्वैच्छिक सहयोग माँगना एक नीतिगत पहल हो सकती है, लेकिन इसके साथ सरकार को यह भी बताना चाहिए कि बचने वाले संसाधनों का उपयोग किस प्रकार जनहित में किया जाएगा।

लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन भाषणों, घोषणाओं या राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से होना चाहिए।

गरीब को भोजन, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बीमार को इलाज, किसानों को सहयोग, युवाओं को रोजगार और बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराने की दिशा में निरंतर प्रयास करना सरकार की जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री जी, कल्याणकारी योजनाओं को जनता पर एहसान नहीं, बल्कि जनहित में शासन की जिम्मेदारी समझा जाना चाहिए। जनता सरकार से उपकार नहीं, अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव और अपने संसाधनों के उचित उपयोग का हिसाब चाहती है।

लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन जनता की सर्वोच्चता और उसके प्रति शासन की जवाबदेही स्थायी संवैधानिक मूल्य हैं।

लेखक: आलोक कुमार | Chingari Prime News

Bihar : कल्याणकारी राज्य का मतलब एहसान नहीं

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