🔴 ताजा खबर
खबरें लोड हो रही हैं...
राशन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राशन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 1 नवंबर 2026

Bihar : डिजिटल इंडिया की सफलता केवल ऑनलाइन सेवाओं की संख्या से नहीं

 


डिजिटल सेवाओं से वंचित ग्रामीण बुजुर्ग: तकनीकी विकास की चमक के पीछे छूटती एक पीढ़ी

 डिजिटल इंडिया की सफलता केवल ऑनलाइन सेवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि गांव का बुजुर्ग नागरिक बिना परेशानी अपने अधिकार और सरकारी सुविधाएं हासिल कर पा रहा है या नहीं।

 देश तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। बैंकिंग, पेंशन, राशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ा है। लेकिन इसी डिजिटल विकास के बीच ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों बुजुर्ग ऐसे भी हैं, जिनके लिए मोबाइल, ओटीपी, आधार प्रमाणीकरण और ऑनलाइन आवेदन नई परेशानी बन गए हैं। सवाल यह है कि क्या तकनीकी विकास की दौड़ में समाज की एक पूरी पीढ़ी पीछे छूटती जा रही है?

डिजिटल सुविधा या नई मजबूरी?

भारत में डिजिटल सेवाओं का विस्तार नागरिकों को सुविधाजनक और पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया जा रहा है। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान और सरकारी पोर्टल ने कई काम आसान किए हैं। लेकिन इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए डिजिटल जानकारी, मोबाइल फोन और इंटरनेट की उपलब्धता भी जरूरी है।

ग्रामीण बुजुर्गों के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। जिन लोगों ने अपना अधिकांश जीवन खेती, मजदूरी, छोटे कारोबार और घरेलू जिम्मेदारियों में बिताया है, उनके लिए अचानक स्मार्टफोन और ऑनलाइन प्रक्रियाओं को समझना आसान नहीं है।

कई बुजुर्गों के पास स्मार्टफोन नहीं है। जिनके पास मोबाइल है, वे भी उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बातचीत के लिए करते हैं। अंग्रेजी में आने वाले संदेश, ओटीपी और वेबसाइटों के निर्देश समझना उनके लिए कठिन हो सकता है।

इस स्थिति में डिजिटल सुविधा उनके लिए सुविधा के बजाय दूसरों पर निर्भरता का कारण बन जाती है।

पेंशन और बैंकिंग सेवाओं में बढ़ती निर्भरता

वृद्धावस्था पेंशन अनेक गरीब बुजुर्गों के लिए भोजन, दवा और रोजमर्रा की जरूरतों का महत्वपूर्ण सहारा है। पेंशन की राशि सीमित होने के बावजूद इसका नियमित भुगतान उनके लिए बहुत मायने रखता है।

लेकिन बैंक खाते, आधार प्रमाणीकरण, केवाईसी, मोबाइल नंबर और जीवन प्रमाण से जुड़ी प्रक्रियाओं में समस्या आने पर उन्हें परेशानी उठानी पड़ सकती है।

कई बार अंगुलियों के निशान का मिलान नहीं होता, बैंकिंग सेवा केंद्र पर नेटवर्क उपलब्ध नहीं रहता या खाते में किसी तकनीकी कारण से भुगतान अटक जाता है।

ऐसी स्थिति में बुजुर्ग को बैंक, बैंक मित्र या प्रखंड कार्यालय तक बार-बार जाना पड़ सकता है। उनके साथ कोई परिवार का सदस्य न हो तो परेशानी और बढ़ जाती है।

इसलिए जरूरी है कि तकनीकी सत्यापन में विफलता को नागरिक की अपात्रता न माना जाए। समस्या की जांच और वैकल्पिक सत्यापन की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।

अशिक्षा, भाषा और डिजिटल जानकारी का अभाव

डिजिटल व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए केवल मोबाइल फोन होना पर्याप्त नहीं है। उसके इस्तेमाल की जानकारी और सुरक्षा संबंधी समझ भी जरूरी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे बुजुर्ग मौजूद हैं, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की। उनके लिए मोबाइल स्क्रीन पर लिखे निर्देश, बैंक के संदेश और सरकारी वेबसाइटों पर उपलब्ध जानकारी समझना कठिन हो सकता है।

कई बार उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि कौन-सा संदेश सरकारी है और कौन-सा फर्जी। ओटीपी और बैंकिंग जानकारी मांगने वाले फोन कॉल उन्हें साइबर ठगी का शिकार बना सकते हैं।

डिजिटल साक्षरता की कमी इसलिए केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक असमानता से जुड़ा विषय भी है।

बुजुर्ग महिलाओं और अकेले रहने वालों की कठिनाई

ग्रामीण बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। कई वृद्ध महिलाएं विधवा हैं या उनके परिवार के युवा सदस्य रोजगार के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं।

उन्हें पेंशन, राशन, बैंकिंग और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है। मोबाइल चलाने की जानकारी नहीं होने या बैंक तक पहुँचने में कठिनाई के कारण वे अपने अधिकारों का लाभ समय पर नहीं उठा पातीं।

यदि मोबाइल नंबर बदल जाए, बैंक खाते में समस्या आ जाए या ऑनलाइन आवेदन लंबित हो जाए तो उनकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।

ऐसे लोगों के लिए घर के नजदीक सहायता और जरूरत पड़ने पर घर तक सेवा पहुँचाने की व्यवस्था जरूरी है।

सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी

सरकार का उद्देश्य सरकारी सेवाओं को सरल, पारदर्शी और सुविधाजनक बनाना है। डिजिटल तकनीक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन केवल पोर्टल बना देना या मोबाइल एप जारी कर देना पर्याप्त नहीं है।

सरकारी व्यवस्था को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि गांव का बुजुर्ग उन सेवाओं का इस्तेमाल कर सके।

यदि किसी पात्र व्यक्ति की पेंशन केवल ओटीपी, नेटवर्क या बायोमेट्रिक समस्या के कारण रुक जाती है तो उसके समाधान के लिए स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

किसी नागरिक को केवल तकनीकी जानकारी नहीं होने के कारण उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। ऑनलाइन सेवाओं के साथ ऑफलाइन आवेदन, सहायता केंद्र और शिकायत निवारण के विकल्प भी उपलब्ध रहने चाहिए।

समाधान: तकनीक के साथ मानवीय व्यवस्था जरूरी

ग्रामीण बुजुर्गों को डिजिटल सेवाओं से जोड़ने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होगा। पंचायत, बैंक और प्रशासन को मिलकर व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।

1. पंचायत स्तर पर डिजिटल सहायता केंद्र: प्रत्येक पंचायत में ऐसा केंद्र हो, जहां बुजुर्गों को पेंशन, राशन, बैंकिंग और सरकारी योजनाओं से जुड़े कामों में सहायता मिले। शुल्क और सेवाओं की जानकारी सार्वजनिक हो।

2. ऑफलाइन विकल्प जारी रहें: ऑनलाइन आवेदन के साथ लिखित आवेदन और व्यक्तिगत शिकायत का विकल्प भी उपलब्ध कराया जाए। बुजुर्गों को केवल डिजिटल माध्यम अपनाने के लिए मजबूर न किया जाए।

3. घर तक सरकारी सहायता: अत्यंत वृद्ध, दिव्यांग और अकेले रहने वाले नागरिकों के लिए विशेष सहायता दल बनाया जाए, जो आवश्यक सेवाओं तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करे।

4. स्थानीय भाषा में डिजिटल प्रशिक्षण: गांवों में सरल हिंदी और स्थानीय भाषा में प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाएं। मोबाइल इस्तेमाल, बैंकिंग सुरक्षा और सरकारी पोर्टल की जानकारी दी जाए।

5. पेंशन भुगतान की वैकल्पिक व्यवस्था: आधार या बायोमेट्रिक सत्यापन में समस्या होने पर वैकल्पिक पहचान और मानवीय सत्यापन का रास्ता उपलब्ध हो।

6. साइबर ठगी से सुरक्षा: बुजुर्गों को ओटीपी, एटीएम पिन, बैंक खाते की गोपनीय जानकारी और संदिग्ध फोन कॉल से बचने के बारे में समझाया जाए।

7. जवाबदेही और शिकायत निवारण: पंचायत, बैंक और संबंधित विभागों में बुजुर्गों की शिकायतों के लिए जिम्मेदार अधिकारी और समयबद्ध समाधान की व्यवस्था हो।

तकनीकी विकास की कसौटी बुजुर्गों का सम्मान भी हो

यह समझना जरूरी है कि डिजिटल इंडिया का उद्देश्य नागरिकों का जीवन सरल बनाना है, न कि उन्हें तकनीकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए बाध्य करना।

आज के बुजुर्गों ने खेतों में काम किया, मजदूरी की, परिवार का पालन-पोषण किया और समाज के निर्माण में अपना योगदान दिया। जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें सम्मान, सुरक्षा और सहायता मिलनी चाहिए।

भारत की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विविधता को देखते हुए यह मान लेना उचित नहीं है कि प्रत्येक नागरिक के पास स्मार्टफोन, तेज इंटरनेट और डिजिटल जानकारी उपलब्ध है।

डिजिटल व्यवस्था बनाते समय गरीब, अशिक्षित, दिव्यांग और वृद्ध नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।

निष्कर्ष: तकनीक आधुनिक हो, लेकिन व्यवस्था संवेदनशील रहे

डिजिटल विकास तभी वास्तविक विकास कहलाएगा, जब गांव का सबसे गरीब बुजुर्ग भी बिना बिचौलिए, अनावश्यक खर्च और अपमान के अपनी पेंशन प्राप्त कर सके, राशन ले सके, बैंक में अपना काम करा सके और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच सके।

देश की प्रगति का मूल्यांकन केवल इंटरनेट की गति, ऑनलाइन लेन-देन और डिजिटल पोर्टलों की संख्या से नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह है कि क्या समाज का सबसे कमजोर नागरिक भी इन सुविधाओं का लाभ उठा पा रहा है?

जिस डिजिटल भारत में युवा आगे बढ़ रहे हों, लेकिन बुजुर्ग अपने ही अधिकार पाने के लिए भटक रहे हों, वहां डिजिटल समावेशन का लक्ष्य अभी अधूरा है।

तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, उसे मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं बनना चाहिए। बुजुर्गों को डिजिटल व्यवस्था के पीछे छोड़ने के बजाय व्यवस्था को उनके करीब लाना ही समावेशी विकास की पहचान है।

लेखक: आलोक कुमार | Chingari Prime News

Bihar : आखिर कहाँ जाता है चर्च के चंदे का पैसा?

बेतिया ईसाई कब्रिस्तान की बदहाली पर उठे सवाल: आखिर कहाँ जाता है चर्च के चंदे का पैसा?  हर साल 2 नवंबर को मृत विश्वासियों की कब्रों पर फूल चढ...