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मंगलवार, 9 जून 2026

Bihar : मानसून की दस्तक और किसानों की उम्मीदें: खेती की तैयारी में जुटा बिहार

 

बिहार में मानसून की आहट के साथ किसान खरीफ फसलों की तैयारी में जुट गए 

बिहार में मानसून की आहट के साथ किसान खरीफ फसलों की तैयारी में जुट गए हैं। जानिए खेती, सिंचाई, बीज और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मानसून का प्रभाव।

"आसमान में दिखने वाले हर बादल के साथ बिहार के किसानों की उम्मीदें भी उड़ान भरने लगती हैं। क्योंकि यहां मानसून सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि खेतों की हरियाली, घरों की खुशहाली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई शुरुआत का संदेश लेकर आता है।"

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। जून का महीना शुरू होते ही गांवों में खेती की तैयारियां तेज हो गई हैं। खेतों की जुताई, बीजों की व्यवस्था और सिंचाई संसाधनों की तैयारी के बीच किसानों की निगाहें अब मानसून पर टिकी हुई हैं।

राज्य के अधिकांश किसान खरीफ फसलों, विशेष रूप से धान की खेती पर निर्भर हैं। धान उत्पादन का बड़ा हिस्सा समय पर होने वाली वर्षा पर आधारित होता है। यही कारण है कि मानसून की पहली बारिश किसानों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं मानी जाती।

इन दिनों बिहार के विभिन्न जिलों में किसान खेतों की मेड़बंदी, जुताई और बुआई की तैयारियों में जुटे हुए हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य और समय पर रहता है, तो इस वर्ष कृषि उत्पादन बेहतर हो सकता है। वहीं बारिश में देरी या असमान वितरण खेती के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।

कृषि विभाग भी किसानों को उन्नत बीज, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से किसानों को सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके और लागत को नियंत्रित रखा जा सके।

हालांकि किसानों की चिंताएं भी कम नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में मौसम की अनिश्चितता ने खेती को प्रभावित किया है। कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी सूखे जैसी परिस्थितियों ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण किसान अब पहले की तुलना में अधिक सतर्क दिखाई दे रहे हैं।

सिंचाई व्यवस्था खेती की सफलता का एक महत्वपूर्ण आधार है। जिन क्षेत्रों में नहर, तालाब और भूजल आधारित सिंचाई की बेहतर सुविधा उपलब्ध है, वहां किसान अपेक्षाकृत अधिक आश्वस्त हैं। लेकिन अभी भी कई इलाकों में खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। ऐसे क्षेत्रों में मानसून की देरी किसानों की चिंता बढ़ा देती है।

मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण बाजार, कृषि मजदूर, पशुपालन और स्थानीय व्यापार भी इससे सीधे प्रभावित होते हैं। अच्छी वर्षा होने पर किसानों की आय बढ़ती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को गांव स्तर पर जनआंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए। तालाबों, पोखरों और पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण भविष्य की जल चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बदलते समय के साथ बिहार का किसान भी बदल रहा है। मोबाइल फोन, मौसम पूर्वानुमान सेवाओं और कृषि सलाह ऐप्स का उपयोग कर किसान खेती से जुड़े निर्णय अधिक वैज्ञानिक तरीके से लेने लगे हैं। डिजिटल तकनीक और कृषि नवाचार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का कार्य कर रहे हैं।

फिलहाल किसानों की निगाहें आसमान पर टिकी हुई हैं। हर बादल उन्हें बेहतर फसल और खुशहाल भविष्य की उम्मीद देता है। यदि मानसून अनुकूल रहा, तो यह केवल खेतों में हरियाली ही नहीं लाएगा, बल्कि ग्रामीण बिहार की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

निष्कर्ष

मानसून बिहार की कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा है। समय पर और संतुलित वर्षा लाखों किसानों के सपनों को साकार कर सकती है, जबकि मौसम की अनिश्चितता चुनौतियां बढ़ा सकती है। ऐसे में वैज्ञानिक खेती, जल संरक्षण और आधुनिक कृषि प्रबंधन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में पूरे बिहार की नजरें मानसून की चाल पर टिकी रहेंगी, क्योंकि इसी पर किसानों की मेहनत और उम्मीदों का भविष्य निर्भर करता है।


आलोक कुमार

सोमवार, 8 जून 2026

Bihar : बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से शिष्टाचार मुलाकात

  बिहार के भविष्य की नई तस्वीर: जब शिक्षा और नेतृत्व एक मंच पर आए

किसी भी राज्य की वास्तविक ताकत उसकी सड़कों, इमारतों या प्राकृतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके शिक्षित, जागरूक और सशक्त युवाओं में निहित होती है। जब शिक्षा जगत और शासन व्यवस्था भविष्य की दिशा तय करने के लिए एक साथ आते हैं, तब ऐसी मुलाकातें केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं रह जातीं, बल्कि विकास की नई संभावनाओं का आधार बनती हैं।

पटना में ऐसा ही एक प्रेरणादायक अवसर देखने को मिला, जब पटना वीमेंस कॉलेज (स्वायत्त) के प्रतिनिधिमंडल ने  बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से शिष्टाचार मुलाकात की है। इस दौरान राज्य में शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और शैक्षणिक विकास के विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा हुई।नेतृत्व से शिष्टाचार भेंट कर शिक्षा, कौशल विकास और महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया।

कॉलेज की प्राचार्या डॉ. सिस्टर एम. रश्मि ए.सी. के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने पदभार ग्रहण करने पर शुभकामनाएं प्रेषित कीं। इस प्रतिनिधिमंडल में उप-प्राचार्या डॉ. सिस्टर एम. तनिशा ए.सी. तथा श्री आलोक जॉन, डीन – नेशनल एंड इंटरनेशनल कोलैबोरेशन्स एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज (NICCS) भी शामिल थे।

मुलाकात के दौरान उच्च शिक्षा के बदलते स्वरूप, छात्राओं को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने तथा रोजगारोन्मुख शिक्षा की आवश्यकता पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रतिनिधिमंडल ने कॉलेज की नवीनतम शैक्षणिक, शोध एवं विकासात्मक पहलों की जानकारी साझा करते हुए बताया कि आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि युवाओं को कौशल, नेतृत्व और नवाचार से सशक्त बनाना भी है।

आज के प्रतिस्पर्धी युग में उद्योग जगत और संस्थानों की अपेक्षाएं तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक शिक्षा पर्याप्त नहीं मानी जाती। व्यावहारिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता, समस्या समाधान की क्षमता और नेतृत्व कौशल अब सफलता के महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए कॉलेज छात्राओं को भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है।

बैठक में महिला सशक्तिकरण, कौशल आधारित शिक्षा, उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप नए पाठ्यक्रमों के विकास तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार किया गया। प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।

राज्य नेतृत्व ने शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कॉलेज द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की तथा भविष्य की योजनाओं के लिए सकारात्मक सहयोग का आश्वासन दिया। शिक्षा संस्थानों और शासन व्यवस्था के बीच इस प्रकार का संवाद राज्य के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

यह मुलाकात केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और महिला सशक्तिकरण को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक भी थी। जब सरकार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर कार्य करते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन की गति और अधिक तेज हो जाती है।

पटना वीमेंस कॉलेज लंबे समय से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। संस्थान का उद्देश्य केवल छात्राओं को शिक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, सक्षम और समाज का नेतृत्व करने योग्य नागरिक बनाना भी है।

यह मुलाकात एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि बिहार का भविष्य केवल विकास परियोजनाओं से नहीं, बल्कि शिक्षित, आत्मविश्वासी और सशक्त बेटियों के सपनों को उड़ान देने से उज्ज्वल बनेगा। शिक्षा और नेतृत्व का यह संगम निश्चित रूप से राज्य के विकास की नई कहानी लिखने की क्षमता रखता है।

India : 12 साल का इंतज़ार, हजार रुपये की पेंशन और बुजुर्गों की उम्मीदें

 12 साल का इंतज़ार, हजार रुपये की पेंशन और बुजुर्गों की उम्मीदें: क्या 9 जुलाई की बैठक से निकलेगा कोई रास्ता?

जिस उम्र में व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और सुकून मिलना चाहिए, उस उम्र में यदि उसे दवा, भोजन और जीवनयापन के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है।

देश के लाखों ईपीएस-95 (EPS-95) पेंशनभोगी पिछले एक दशक से अधिक समय से इसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक ओर महंगाई लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर हजार से डेढ़ हजार रुपये मासिक पेंशन पाने वाले अनेक बुजुर्ग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए सं
घर्ष कर रहे हैं। न्यूनतम पेंशन को 7,500 रुपये प्रतिमाह करने, महंगाई भत्ता लागू करने तथा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग को लेकर वर्षों से आंदोलन जारी है।

12 वर्षों से जारी है संघर्ष

ईपीएफओ पेंशनभोगियों की विभिन्न मांगों को लेकर वर्ष 2013-14 के दौरान राष्ट्रीय संघर्ष समिति का गठन किया गया था। इसके बाद देशभर में पेंशनभोगियों ने धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन और जनजागरण अभियान चलाए।

समिति के अध्यक्ष अशोक राउत के नेतृत्व में पेंशनभोगियों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया। लाखों सेवानिवृत्त कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान नियमित अंशदान देकर देश की औद्योगिक और आर्थिक प्रगति में योगदान दिया है, इसलिए वृद्धावस्था में उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

क्यों उठ रही है 7,500 रुपये न्यूनतम पेंशन की मांग?

पेंशनभोगियों का कहना है कि वर्तमान न्यूनतम पेंशन आज की आर्थिक परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं है। दवाइयों, स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली, भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच 1,000 या 1,500 रुपये मासिक पेंशन में जीवनयापन करना बेहद कठिन हो गया है।

उनका तर्क है कि यदि न्यूनतम पेंशन को 7,500 रुपये तक बढ़ाया जाता है, तो लाखों बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है और वे अपनी बुनियादी जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी कर सकेंगे।

 महंगाई भत्ते की मांग भी प्रमुख मुद्दा

पेंशनभोगियों की दूसरी प्रमुख मांग परिवर्तनीय महंगाई भत्ता (DA) लागू करने की है।

वर्तमान व्यवस्था में पेंशन राशि वर्षों तक स्थिर बनी रहती है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि समय के साथ पेंशन की वास्तविक क्रय शक्ति घटती चली जाती है।

पेंशनभोगियों का मानना है कि यदि महंगाई भत्ता लागू किया जाए, तो बढ़ती कीमतों का प्रभाव कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है।

 स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ती जरूरत

वृद्धावस्था में स्वास्थ्य संबंधी खर्च सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होता है। राष्ट्रीय संघर्ष समिति लंबे समय से पति-पत्नी दोनों के लिए समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग करती रही है।

उनका कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ नियमित जांच, दवाइयां और अस्पताल सेवाएं आवश्यक हो जाती हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सुरक्षा का दायरा बढ़ाना लाखों परिवारों को राहत दे सकता है।

आश्वासन बहुत मिले, समाधान अब भी बाकी

पिछले कई वर्षों में पेंशनभोगियों के प्रतिनिधिमंडलों और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच अनेक दौर की बातचीत हुई है। कई बार मांगों पर सकारात्मक विचार करने का आश्वासन भी दिया गया।

हालांकि अब तक ऐसा कोई व्यापक निर्णय सामने नहीं आया है जिससे सभी पेंशनभोगियों को अपेक्षित राहत मिल सके। यही कारण है कि बुजुर्गों के बीच उम्मीद और निराशा दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं।

9 जुलाई की बैठक पर टिकी हैं निगाहें

पेंशनभोगियों के बीच चर्चा है कि पेंशन संबंधी मुद्दों पर आगामी 9 जुलाई को एक महत्वपूर्ण बैठक हो सकती है, जिसमें विभिन्न मांगों पर विचार-विमर्श किया जा सकता है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय या आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

यही वजह है कि देशभर के लाखों पेंशनभोगियों की निगाहें इस संभावित बैठक पर टिकी हुई हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार केवल चर्चा नहीं, बल्कि कोई ठोस पहल देखने को मिल सकती है।

केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक प्रश्न भी

यह मुद्दा केवल पेंशन राशि का नहीं है। यह उन लोगों के सम्मान, सुरक्षा और जीवन की गरिमा का भी प्रश्न है, जिन्होंने अपने जीवन के सबसे सक्रिय वर्ष देश के विकास और उद्योगों की प्रगति में लगाए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे में पेंशनभोगियों की समस्याओं को केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

ईपीएस-95 पेंशनभोगियों का संघर्ष अब 12 वर्ष से अधिक पुराना हो चुका है। न्यूनतम पेंशन वृद्धि, महंगाई भत्ता और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग लगातार उठाई जाती रही है। आने वाले समय में सरकार इस दिशा में क्या निर्णय लेती है, इस पर लाखों परिवारों की उम्मीदें टिकी हुई हैं।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि उन बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन का है जिन्होंने अपने श्रम और योगदान से देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आलोक कुमार

India : "हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए

         "हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,  इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए..."

महान कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ "हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए..." — श्रीगंगानगर से उठी एक नई क्रिकेट क्रांति का नाम है मानव सुथार। उस युवा क्रिकेटर पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जिसने वर्षों की मेहनत, संघर्ष और धैर्य के बाद भारतीय क्रिकेट के दरवाजे पर ऐसी दस्तक दी कि पूरा देश उसकी ओर देखने लगा। जून 2026 की वह सुबह भारतीय क्रिकेट के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी, जब मुल्लांपुर (न्यू चंडीगढ़) के मैदान पर भारत और अफगानिस्तान के बीच खेले जा रहे टेस्ट मैच में 23 वर्षीय मानव सुथार ने भारतीय टेस्ट टीम की कैप पहनकर अपने सपनों को हकीकत में बदल दिया।

जब कुलदीप यादव ने उनके सिर पर भारत की 319वीं टेस्ट कैप सजाई, तब यह केवल एक खिलाड़ी का डेब्यू नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट को एक नए स्पिन ऑलराउंडर की सौगात मिलने का क्षण था। यह उस युवा की कहानी थी जिसने राजस्थान की धरती से निकलकर राष्ट्रीय टीम तक का सफर अपने प्रदर्शन के दम पर तय किया।

डेब्यू मैच में ही बना दिया इतिहास

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करना हर खिलाड़ी का सपना होता है, लेकिन बहुत कम खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो अपने पहले ही मैच में इतिहास रच देते हैं। मानव सुथार ने अफगानिस्तान के खिलाफ अपने पहले टेस्ट में यही कर दिखाया।

अपने करियर के पहले ही ओवर की चौथी गेंद पर उन्होंने अफगानिस्तान के सलामी बल्लेबाज अब्दुल मलिक को आउट कर दिया। इसके साथ ही वे टेस्ट क्रिकेट में अपने पहले ओवर में विकेट लेने वाले भारत के चुनिंदा गेंदबाजों की सूची में शामिल हो गए।

यह विकेट केवल एक आंकड़ा नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा खिलाड़ी मिल गया है जो बड़े मंच पर दबाव से घबराने वाला नहीं है।

गेंदबाजी में दिखी अनुभवी खिलाड़ी जैसी परिपक्वता

डेब्यू मैच में अक्सर खिलाड़ी घबराहट का शिकार हो जाते हैं, लेकिन मानव सुथार ने जिस संयम और नियंत्रण के साथ गेंदबाजी की, उसने सभी को प्रभावित किया।                             


दूसरे दिन तक उनके आंकड़े बेहद प्रभावशाली रहे—

15.5 ओवर

7 मेडन

21 रन

3 विकेट

इकोनॉमी रेट 1.33

उन्होंने सिर्फ विकेट ही नहीं लिए, बल्कि अफगानिस्तान के बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का कोई मौका भी नहीं दिया। अब्दुल मलिक, रहमानुल्लाह गुरबाज और अफसर जजई जैसे बल्लेबाजों के विकेट लेकर उन्होंने साबित कर दिया कि उनकी फिरकी में दम है।

उनकी गेंदबाजी में धैर्य, सटीक लाइन-लेंथ और स्पष्ट रणनीति दिखाई दी, जो किसी भी सफल टेस्ट गेंदबाज की सबसे बड़ी पहचान होती है।

बल्ले से भी दिखाया दम

मानव सुथार केवल एक स्पिनर नहीं हैं। वे आधुनिक क्रिकेट की सबसे बड़ी जरूरत—एक भरोसेमंद ऑलराउंडर—के रूप में उभर रहे हैं।

भारत की पहली पारी जब 564/8 पर घोषित हुई, तब निचले क्रम में उन्होंने 41 गेंदों में 28 रन बनाए। उनकी पारी में दो चौके और दो शानदार छक्के शामिल थे।

उनकी बल्लेबाजी में आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच साफ दिखाई दी। उन्होंने संकेत दे दिया कि जरूरत पड़ने पर वे बल्ले से भी मैच का रुख बदल सकते हैं।

घरेलू क्रिकेट में पहले ही बजा चुके थे सफलता का बिगुल

टीम इंडिया तक पहुंचने का रास्ता कभी आसान नहीं होता। मानव सुथार ने भी घरेलू क्रिकेट के कठिन संघर्षों से गुजरकर यह मुकाम हासिल किया है।

उनके प्रथम श्रेणी क्रिकेट के आंकड़े उनकी प्रतिभा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं—

फॉर्मेट मैच विकेट औसत सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी रन बल्लेबाजी औसत सर्वोच्च स्कोर

फर्स्ट क्लास 29 129 25.76 8/33 945 25.54 120

ये आंकड़े बताते हैं कि मानव केवल विकेट लेने वाले गेंदबाज नहीं हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर शतक लगाने की क्षमता भी रखते हैं।

रणजी ट्रॉफी से शुरू हुई पहचान

मानव सुथार पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आए जब उन्होंने रणजी ट्रॉफी 2022-23 में शानदार प्रदर्शन किया।

उस सीजन में उन्होंने केवल 6 मैचों में 39 विकेट हासिल किए और 20.33 की औसत से बल्लेबाजों को परेशान किया। वे राजस्थान के सबसे सफल गेंदबाज बने और चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे।

यहीं से भारतीय क्रिकेट के गलियारों में उनका नाम गूंजने लगा।

संकट में टीम को बचाने वाला शतक

एक सच्चे ऑलराउंडर की पहचान यह होती है कि वह मुश्किल परिस्थितियों में टीम को संभाल सके।


हिमाचल प्रदेश के खिलाफ एक मुकाबले में राजस्थान की टीम 98 रन पर 5 विकेट गंवाकर संकट में थी। ऐसे समय में मानव सुथार ने जिम्मेदारी उठाई और शानदार 120 रन की पारी खेली।

उनकी इस पारी ने न केवल टीम को संकट से बाहर निकाला बल्कि यह भी साबित कर दिया कि वे केवल गेंदबाज नहीं, बल्कि भरोसेमंद बल्लेबाज भी हैं।

दिलीप ट्रॉफी में मचाया तहलका

2024 की दिलीप ट्रॉफी मानव सुथार के करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई।

इंडिया-सी के लिए खेलते हुए उन्होंने एक पारी में 7 विकेट लेकर विरोधी टीम की बल्लेबाजी को तहस-नहस कर दिया। उनका 7/49 का शानदार स्पेल चयनकर्ताओं को यह संदेश देने के लिए काफी था कि वे अगले स्तर के लिए तैयार हैं।

आईपीएल ने दिया नया आत्मविश्वास

घरेलू क्रिकेट में सफलता के बाद मानव को आईपीएल में भी अवसर मिला। गुजरात टाइटन्स के साथ जुड़कर उन्हें विश्व स्तरीय खिलाड़ियों के साथ काम करने का मौका मिला।

राशिद खान और नूर अहमद जैसे दिग्गज स्पिनरों के साथ समय बिताने से उनकी गेंदबाजी में और निखार आया। उन्होंने दबाव में प्रदर्शन करना सीखा और अपनी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

भारत को मिला भविष्य का ऑलराउंडर

भारतीय क्रिकेट में समय-समय पर ऐसे खिलाड़ी उभरते रहे हैं जिन्होंने अपने प्रदर्शन से नई उम्मीदें जगाई हैं। मानव सुथार का नाम भी अब उसी सूची में तेजी से शामिल होता दिखाई दे रहा है।

श्रीगंगानगर की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, अनुशासन और निरंतर मेहनत की मिसाल है। डेब्यू टेस्ट में गेंद और बल्ले दोनों से प्रभाव छोड़कर उन्होंने यह संकेत दे दिया है कि वे केवल एक उभरते हुए स्पिनर नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के संभावित ऑलराउंडर भी हैं।

क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानव सुथार इसी निरंतरता और समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में वे भारतीय टीम के अहम स्तंभ बन सकते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान की धरती से निकला यह युवा खिलाड़ी करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की उम्मीदों का नया चेहरा बन चुका है। मानव सुथार की कहानी यह साबित करती है कि सपने बड़े हों, मेहनत सच्ची हो और हौसला अडिग हो, तो श्रीगंगानगर की गलियों से भी भारतीय क्रिकेट के शिखर तक पहुंचा जा सकता है।

उनकी कहानी अभी शुरू हुई है, लेकिन शुरुआत इतनी शानदार है कि भविष्य सुनहरा दिखाई देता है।


आलोक कुमार 

India : ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीक की पहुंच बढ़ाकर विकास की नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए

भारत आज तेजी से डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा

भारत
आज तेजी से डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। इंटरनेट, मोबाइल तकनीक और डिजिटल सेवाओं ने देश के विकास को नई दिशा दी है। एक समय था जब डिजिटल सुविधाओं को केवल शहरों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब गांव भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं। डिजिटल भारत अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीक की पहुंच बढ़ाकर विकास की नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

डिजिटल भारत अभियान का उद्देश्य देश के प्रत्येक नागरिक को तकनीक से जोड़ना, सरकारी सेवाओं को सरल बनाना और डिजिटल माध्यमों के जरिए पारदर्शिता तथा सुगमता सुनिश्चित करना है। इसका प्रभाव अब ग्रामीण भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ-साथ लोगों की सोच और जीवनशैली में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है।

कुछ वर्ष पहले तक ग्रामीण नागरिकों को सरकारी प्रमाण पत्र, पेंशन, बैंकिंग सेवाओं या अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए शहरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई बार एक छोटे से कार्य के लिए पूरा दिन खर्च हो जाता था। लेकिन आज डिजिटल सेवाओं की उपलब्धता ने इस स्थिति को काफी हद तक बदल दिया है। अब अनेक सरकारी सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं, जिससे समय, श्रम और धन की बचत हो रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) डिजिटल क्रांति के महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से आधार अपडेट, पेंशन आवेदन, आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र, बिजली बिल भुगतान, बीमा योजनाओं और बैंकिंग सेवाओं जैसी अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे ग्रामीण नागरिकों की सरकारी योजनाओं तक पहुंच पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आसान हो गई है।

डिजिटल भुगतान प्रणाली ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। पहले अधिकांश लेन-देन नकद आधारित होते थे, लेकिन अब मोबाइल आधारित भुगतान और यूपीआई जैसी सुविधाओं ने भुगतान व्यवस्था को सरल बना दिया है। छोटे दुकानदार, सब्जी विक्रेता और ग्रामीण बाजारों के व्यापारी भी QR कोड के माध्यम से भुगतान स्वीकार कर रहे हैं। इससे वित्तीय पारदर्शिता बढ़ी है और नकदी पर निर्भरता कम हुई है।

शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल तकनीक ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। ऑनलाइन कक्षाएं, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म, डिजिटल पुस्तकालय और शैक्षणिक वीडियो के माध्यम से विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षिक संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र अब शहरों के विद्यार्थियों की तरह विभिन्न ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर पा रहे हैं। हालांकि इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता अभी भी कई क्षेत्रों में चुनौती बनी हुई है, फिर भी स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है।

कृषि क्षेत्र में भी डिजिटल तकनीक किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रही है। किसान मोबाइल एप और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से मौसम की जानकारी, कृषि विशेषज्ञों की सलाह, उन्नत खेती की तकनीक और मंडियों के ताजा बाजार भाव प्राप्त कर रहे हैं। इससे उन्हें खेती से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सहायता मिल रही है और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अवसर मिल रहे हैं।

महिलाओं के जीवन में भी डिजिटल क्रांति सकारात्मक बदलाव लेकर आई है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अब डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान और सरकारी योजनाओं की जानकारी का लाभ उठा रही हैं। कई महिलाएं सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने उत्पादों का प्रचार-प्रसार कर अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है।

हालांकि डिजिटल भारत अभियान की सफलता के बावजूद कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की गति और नेटवर्क कनेक्टिविटी संतोषजनक नहीं है। डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण कई लोग तकनीक का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इसके अलावा साइबर अपराध, ऑनलाइन धोखाधड़ी और डिजिटल सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इंटरनेट पहुंच उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। लोगों को डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और तकनीकी उपयोग के बारे में भी जागरूक करना आवश्यक है। स्कूलों, पंचायतों, स्वयंसेवी संस्थाओं और सामुदायिक संगठनों की भूमिका इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।

सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर ग्रामीण डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी, फाइबर नेटवर्क और नई तकनीकों के विस्तार से गांवों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच और अधिक बढ़ने की संभावना है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे।

डिजिटल भारत अभियान ने यह साबित कर दिया है कि तकनीक केवल शहरी विकास का माध्यम नहीं बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण का भी प्रभावी उपकरण है। जब गांव डिजिटल रूप से मजबूत होंगे, तभी देश का समग्र और संतुलित विकास संभव होगा। ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि तकनीक और जागरूकता मिलकर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की नई कहानी लिख सकती हैं।

डिजिटल भारत अभियान केवल तकनीकी बदलाव का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे भारत के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जहां विकास की रोशनी गांव-गांव तक पहुंचे और प्रत्येक नागरिक आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठा सके।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में बढ़ती गर्मी और जल संकट

  बिहार में बढ़ती गर्मी और जल संकट: समय रहते चेतने की जरूरत

जून का महीना शुरू होते ही बिहार के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी का असर दिखाई देने लगा है। कई जिलों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। तेज धूप, गर्म हवाओं और उमस भरे मौसम ने लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित कर दिया है। शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अधिक चिंताजनक है, जहां पेयजल की उपलब्धता और जल संरक्षण की व्यवस्था पहले से ही सीमित है।

गर्मी बढ़ने के साथ-साथ जल संकट भी गहराता जा रहा है। गांवों में रहने वाले लोगों का जीवन खेती, पशुपालन और प्राकृतिक जल स्रोतों पर काफी हद तक निर्भर करता है। ऐसे में जब जलस्तर नीचे जाने लगता है और बारिश समय पर नहीं होती, तो इसका सीधा प्रभाव ग्रामीण जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

जलस्तर गिरने से बढ़ी ग्रामीणों की परेशानी

बिहार के कई गांवों में हैंडपंप और चापाकल गर्मी के दिनों में पर्याप्त पानी नहीं दे पा रहे हैं। भूजल स्तर नीचे जाने के कारण लोगों को पीने और घरेलू उपयोग के लिए पानी जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

पानी की कमी केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पशुपालन पर भी पड़ रहा है। पशुओं के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध न होने से ग्रामीण परिवारों की आय पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

बदलता मौसम और जलवायु परिवर्तन की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां जून के शुरुआती दिनों में बारिश की संभावना बन जाती थी, वहीं अब कई क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है।

अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और मौसम की अनिश्चितता किसानों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही है। यदि यह स्थिति लगातार बनी रहती है तो कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकते हैं।


स्वास्थ्य पर पड़ रहा गंभीर प्रभाव

भीषण गर्मी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में लू, डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, कमजोरी और थकावट जैसी समस्याओं से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों को अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दोपहर के समय अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें, पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और शरीर को ठंडा रखने का प्रयास करें।

जल संरक्षण की उपेक्षा बनी बड़ी वजह

ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट केवल मौसमी समस्या नहीं है। वर्षों से जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोतों की अनदेखी भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल है।

कई गांवों में तालाब और पोखर अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। वर्षा जल संचयन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और भूजल का लगातार बढ़ता दोहन स्थिति को और गंभीर बना रहा है। यदि इन समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गहरा सकता है।

सरकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत

राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा पेयजल उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। "हर घर नल का जल" जैसी योजनाओं से कई क्षेत्रों में लोगों को राहत मिली है। हालांकि अभी भी अनेक गांव ऐसे हैं जहां नियमित और पर्याप्त जल आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो सकी है।

योजनाओं की सफलता केवल उनके निर्माण तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनका प्रभावी संचालन और नियमित रखरखाव भी उतना ही आवश्यक है।

सामुदायिक भागीदारी से मिल सकता है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट से निपटने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज और समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।

गांव स्तर पर निम्नलिखित कदम प्रभावी साबित हो सकते हैं—

तालाबों और जलाशयों की नियमित सफाई।

वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना।

अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना।

जल के अनावश्यक उपयोग को रोकना।

स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाना।

पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करना।

किसानों के सामने बढ़ती चिंता

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। धान की खेती की तैयारी शुरू हो चुकी है, लेकिन पर्याप्त पानी की उपलब्धता को लेकर किसानों में चिंता बनी हुई है।

यदि मानसून समय पर नहीं पहुंचा या सामान्य से कम वर्षा हुई, तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर केवल किसानों की आय पर ही नहीं बल्कि पूरे ग्रामीण बाजार और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भविष्य के लिए चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पानी को केवल वर्तमान जरूरत नहीं बल्कि भविष्य की सुरक्षा के रूप में देखना होगा। जल संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना समय की मांग है।

छोटे-छोटे प्रयास, जैसे नल बंद रखना, वर्षा जल का संग्रह करना, पेड़ लगाना और जल स्रोतों की रक्षा करना, भविष्य में बड़े बदलाव ला सकते हैं। यदि आज प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

निष्कर्ष

बिहार में बढ़ती गर्मी और जल संकट केवल मौसम से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण विकास से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। सरकार, समाज और आम नागरिकों को मिलकर जल संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। समय रहते की गई पहल न केवल वर्तमान संकट को कम करेगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित जल संसाधन सुनिश्चित कर सकेगी।


आलोक कुमार 

रविवार, 7 जून 2026

World : आज के आधुनिक युग में समय की बर्बादी के साधन

 समय की कीमत: जो इसे समझ गया, वह जीवन की दौड़ में आगे निकल गया

दुनिया में हर व्यक्ति को प्रतिदिन 24 घंटे ही मिलते हैं। चाहे वह कोई बड़ा उद्योगपति हो, वैज्ञानिक हो, खिलाड़ी हो या एक सामान्य व्यक्ति, समय सभी के लिए समान होता है। फिर भी कुछ लोग जीवन में असाधारण सफलता प्राप्त कर लेते हैं, जबकि कुछ लोग लगातार संघर्ष करते रहते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण समय का उपयोग है। जो व्यक्ति समय की कीमत समझ लेता है, वह अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है।

समय एक ऐसी संपत्ति है जिसे न खरीदा जा सकता है, न जमा किया जा सकता है और न ही वापस पाया जा सकता है। धन खो जाए तो दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन एक बार बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। यही कारण है कि दुनिया के सफल लोग समय को सबसे मूल्यवान संसाधन मानते हैं।

आज के आधुनिक युग में समय की बर्बादी के साधन पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गए हैं। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और मनोरंजन के अनगिनत विकल्प लोगों का बहुत सारा समय अपने साथ ले जाते हैं। कई बार लोग यह महसूस भी नहीं कर पाते कि वे दिन के कितने घंटे ऐसे कार्यों में खर्च कर रहे हैं, जिनका उनके जीवन के लक्ष्यों से कोई संबंध नहीं होता।

समय प्रबंधन का अर्थ केवल व्यस्त रहना नहीं है। कई लोग पूरे दिन काम में लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। दूसरी ओर कुछ लोग सीमित समय में भी महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर लेते हैं। इसका कारण यह है कि वे अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रखते हैं और जरूरी कार्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय का सही उपयोग करने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को अपने लक्ष्य स्पष्ट करने चाहिए। जब लक्ष्य स्पष्ट होते हैं, तब यह तय करना आसान हो जाता है कि किस कार्य पर कितना समय देना है। बिना लक्ष्य के जीवन ऐसा है जैसे बिना दिशा के यात्रा करना। व्यक्ति चलता तो रहता है, लेकिन उसे पता नहीं होता कि उसे पहुंचना कहाँ है।

समय का महत्व छात्रों के जीवन में विशेष रूप से दिखाई देता है। परीक्षा के दिनों में अक्सर वही छात्र बेहतर प्रदर्शन करते हैं जिन्होंने पूरे वर्ष नियमित अध्ययन किया होता है। जो छात्र अंतिम समय तक तैयारी टालते रहते हैं, उन्हें अधिक तनाव का सामना करना पड़ता है। यह केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है।

व्यापार और रोजगार के क्षेत्र में भी समय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय पर लिया गया निर्णय सफलता का कारण बन सकता है, जबकि देरी कई अवसरों को समाप्त कर सकती है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने सही समय पर सही कदम उठाकर बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं।             

समय का संबंध केवल कार्यक्षमता से ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से भी है। यदि कोई व्यक्ति अपना सारा समय केवल काम में ही लगा दे और परिवार, स्वास्थ्य तथा सामाजिक संबंधों के लिए समय न निकाले, तो उसका जीवन असंतुलित हो सकता है। इसलिए समय प्रबंधन का अर्थ जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में समय का महत्व और भी बढ़ जाता है। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और संतुलित दिनचर्या के लिए समय निकालना आवश्यक है। कई लोग व्यस्तता का बहाना बनाकर स्वास्थ्य की उपेक्षा करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। इसलिए समय का एक हिस्सा स्वयं की देखभाल के लिए भी सुरक्षित रखना चाहिए।

आज की तेज रफ्तार दुनिया में टालमटोल की आदत एक बड़ी समस्या बन चुकी है। कई लोग महत्वपूर्ण कार्यों को बाद के लिए छोड़ देते हैं। धीरे-धीरे यही आदत तनाव और असफलता का कारण बन जाती है। सफल लोग कार्यों को टालने के बजाय समय पर पूरा करने की कोशिश करते हैं। वे जानते हैं कि आज का काम कल पर छोड़ना भविष्य की समस्याओं को आमंत्रित करना है।

समय का सदुपयोग करने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं। प्रतिदिन की योजना बनाना, प्राथमिकताएं तय करना, अनावश्यक गतिविधियों को सीमित करना और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। छोटी-छोटी आदतें लंबे समय में बड़े परिणाम देती हैं।

महान वैज्ञानिक, खिलाड़ी और सफल उद्यमी अक्सर एक बात पर जोर देते हैं कि सफलता किसी चमत्कार का परिणाम नहीं होती। यह अनुशासन, निरंतर प्रयास और समय के सही उपयोग का परिणाम होती है। उन्होंने भी दिन के वही 24 घंटे प्राप्त किए जो हमें मिलते हैं, लेकिन उन्होंने उन घंटों का उपयोग अलग तरीके से किया।

समय हमें हर दिन एक नया अवसर देता है। बीता हुआ कल बदल नहीं सकता और आने वाला कल हमारे नियंत्रण में नहीं है। हमारे पास केवल आज है। यदि हम आज का सही उपयोग कर लें, तो भविष्य अपने आप बेहतर बन सकता है।

अंततः समय जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी है। इसे समझना और इसका सम्मान करना ही सफलता की पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति समय को महत्व देता है, समय भी उसे महत्व देता है। जीवन की दौड़ में वही आगे निकलता है जो हर क्षण का सदुपयोग करना सीख लेता है। इसलिए आज ही यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाएंगे, बल्कि उसे अपने सपनों और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उपयोग करेंगे। यही सफलता, संतुलन और संतोषपूर्ण जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।


आलोक कुमार