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India : हर साल जलजमाव के बाद निरीक्षण और समीक्षा की घोषणाएं होती हैं

 

शहरों में जलजमाव की समस्या हर साल क्यों लौटती है? विकास के दावों और शहरी व्यवस्था की खुलती पोल

 बारिश के मौसम में सड़कें तालाब बन जाती हैं, घरों और दुकानों में पानी घुस जाता है तथा यातायात ठप पड़ जाता है। सवाल यह है कि हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर जलजमाव से मुक्त क्यों नहीं हो पाते?

 बारिश की पहली तेज बौछार के साथ जब सड़कें डूबने लगती हैं, घरों में पानी घुस जाता है और लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है, तब एक सवाल सामने आता है—आखिर हर साल जलनिकासी पर खर्च होने के बावजूद शहर जलजमाव से परेशान क्यों रहते हैं? क्या समस्या केवल बारिश की है, या शहरी नियोजन, नालों की क्षमता और प्रशासनिक जवाबदेही में भी सुधार की जरूरत है?

यहाँ आपका पूरा मूल लेख रहेगा—अनियोजित शहरीकरण, नालों की सफाई, पुराने जलनिकासी तंत्र, अतिक्रमण, गरीब परिवारों पर असर, स्थायी समाधान और जवाबदेही वाले सभी अनुभाग सहित।

हर साल वही परेशानी, फिर भी स्थायी समाधान नहीं

देश के अधिकांश शहरों में मानसून आते ही जलजमाव की समस्या सामने आने लगती है। कहीं मुख्य सड़कें पानी में डूब जाती हैं, तो कहीं रिहायशी मोहल्लों में लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। निचले इलाकों में पानी कई दिनों तक जमा रहता है। दुकानदारों का कारोबार प्रभावित होता है, विद्यार्थियों को स्कूल-कॉलेज पहुंचने में कठिनाई होती है और कार्यालय जाने वाले लोगों को घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है।

बिहार की राजधानी पटना सहित अनेक शहरों में बारिश के दौरान यह समस्या शहरी व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है। बरसात के बाद नगर निकायों की सक्रियता दिखाई देती है, नालों की सफाई के दावे किए जाते हैं और जलनिकासी सुधारने की घोषणाएं होती हैं। लेकिन अगली बारिश आते ही वही दृश्य लौट आता है।

इस स्थिति में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जलजमाव केवल प्राकृतिक आपदा है, या इसके पीछे वर्षों की प्रशासनिक लापरवाही, अनियोजित शहरीकरण और कमजोर बुनियादी ढांचे की भी बड़ी भूमिका है?

1. अनियोजित शहरीकरण ने बढ़ाई समस्या

शहरों का विस्तार तेजी से हो रहा है। नई कॉलोनियां, अपार्टमेंट, व्यावसायिक परिसर, सड़कें और बाजार बन रहे हैं। लेकिन जिस गति से निर्माण कार्य हो रहे हैं, उस अनुपात में जलनिकासी की व्यवस्था विकसित नहीं हो रही है।

पहले जिन क्षेत्रों में खेत, तालाब, पोखर और खाली जमीन होती थी, वहां अब कंक्रीट की इमारतें खड़ी हैं। ये प्राकृतिक जलसंग्रह क्षेत्र बारिश के पानी को अपने भीतर समाहित करने में मदद करते थे। उनके समाप्त होने से पानी के जमीन में समाने की क्षमता घट गई है।

जब वर्षा का पानी जमीन में नहीं समाता और उसे बाहर निकालने के लिए पर्याप्त नाले नहीं होते, तो वह सड़कों और घरों में जमा होने लगता है।

इसलिए शहरी विकास का मूल्यांकन केवल चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों और चमकदार बाजारों से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि शहर बारिश के पानी को संभालने में कितना सक्षम है।

2. नालों की सफाई में लापरवाही

जलजमाव के प्रमुख कारणों में नालों का जाम होना शामिल है। प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, घरेलू कचरा, निर्माण सामग्री और गाद जलनिकासी को बाधित करते हैं। कई जगह नालों की नियमित सफाई नहीं होती या सफाई के बाद निकाली गई गाद सड़क किनारे छोड़ दी जाती है, जो दोबारा नालों में पहुंच सकती है।

कभी-कभी कागजों पर सफाई पूरी होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति का निरीक्षण नहीं होता। कुछ नालों के ढक्कन बंद होने या उन तक पहुंचने का रास्ता अवरुद्ध होने के कारण भी सफाई प्रभावी नहीं हो पाती।

हालांकि, हर जलजमाव का कारण केवल कचरा नहीं है। यदि नाले की क्षमता कम है, उसका ढलान गलत है या पानी निकलने का अंतिम रास्ता बंद है, तो साफ नाला भी भारी बारिश में पर्याप्त साबित नहीं होगा।

इसलिए सफाई अभियान को केवल मौसमी औपचारिकता नहीं, बल्कि नियमित और जवाबदेह व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

3. पुराने नाले और नई आबादी

कई शहरों की जलनिकासी व्यवस्था उस समय की आबादी और निर्माण को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, जब शहर आज जितने बड़े नहीं थे। अब आबादी बढ़ गई है, नई बस्तियां बस गई हैं और सड़कों पर पक्की सतह का विस्तार हो गया है। इसके बावजूद पुराने नालों पर ही अतिरिक्त पानी निकालने का दबाव बना हुआ है।

तेज बारिश के दौरान नालों में पानी उनकी क्षमता से अधिक पहुंचता है। नतीजतन, पानी बाहर निकलने के बजाय सड़कों पर फैल जाता है।

समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब अलग-अलग विभाग अपने स्तर पर निर्माण करते हैं, लेकिन उनके बीच समन्वय नहीं होता। सड़क बनाने वाला विभाग, जलापूर्ति विभाग, नगर निकाय और विकास प्राधिकरण यदि एक साझा योजना के बिना काम करें, तो कहीं सड़क ऊंची हो जाती है और कहीं नाले का स्तर नीचे रह जाता है।

शहर को जलजमाव से बचाने के लिए पूरे क्षेत्र की ऊंचाई, ढलान, वर्षा की मात्रा और जलनिकासी के मार्ग का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।

4. अतिक्रमण और प्राकृतिक जलमार्गों का विनाश

तालाबों, नालों, जलाशयों और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण होने से पानी के बहाव में बाधा आती है। कई स्थानों पर नालों के किनारे निर्माण हो जाते हैं या उनका रास्ता धीरे-धीरे संकरा हो जाता है। कुछ इलाकों में प्राकृतिक जलनिकासी के पुराने रास्ते सड़क, भवन और अन्य संरचनाओं के नीचे दब जाते हैं।

जब बारिश का पानी अपने पुराने रास्ते से आगे नहीं बढ़ पाता, तो वह आसपास की बस्तियों में फैल जाता है।

इस समस्या के समाधान के लिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन वह निष्पक्ष और कानूनसम्मत होनी चाहिए। प्रशासन को पहले सरकारी अभिलेखों, जमीन की स्थिति और जलनिकासी के वास्तविक मार्ग की जांच करनी चाहिए। प्रभावशाली लोगों के अवैध निर्माणों की अनदेखी करके केवल कमजोर परिवारों के खिलाफ कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं होगा।

जलनिकासी के प्राकृतिक रास्तों को बचाना शहर की सुरक्षा से जुड़ा विषय है, न कि केवल सौंदर्यीकरण का मामला।

5. जलजमाव का सबसे अधिक नुकसान किसे होता है?

जलजमाव का प्रभाव सभी नागरिकों पर पड़ता है, लेकिन गरीब और निम्न आय वाले परिवार इसकी सबसे भारी कीमत चुकाते हैं। झुग्गी-बस्तियों, निचले इलाकों और कमजोर आवासों में रहने वाले लोगों के घरों में पानी घुस जाता है। घरेलू सामान खराब हो जाता है और कई परिवारों को अस्थायी रूप से दूसरी जगह शरण लेनी पड़ती है।

दिहाड़ी मजदूर काम पर नहीं पहुंच पाते तो उनकी दैनिक कमाई प्रभावित होती है। छोटे दुकानदारों की बिक्री घटती है और कई बार सामान नष्ट हो जाता है। स्कूली बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। बुजुर्गों, दिव्यांगों और बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई होती है।

गंदे पानी के लंबे समय तक जमा रहने से मच्छरों के प्रजनन और संक्रमण के जोखिम बढ़ सकते हैं। दूषित पानी पेयजल स्रोतों तक पहुंच जाए, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

इसलिए जलजमाव को केवल यातायात की समस्या मानना गलत है। यह जनस्वास्थ्य, आजीविका, शिक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़ा सवाल भी है।

6. समाधान के लिए क्या करना चाहिए?

सबसे पहले प्रत्येक नगर निकाय को जलजमाव वाले क्षेत्रों का विस्तृत नक्शा तैयार करना चाहिए। इसमें उन सड़कों, मोहल्लों, निचले इलाकों और नालों की पहचान होनी चाहिए जहां हर साल पानी जमा होता है।

दूसरा, नालों की सफाई मानसून से पहले पूरी की जाए और सफाई के बाद उसकी गुणवत्ता की जांच हो। संवेदनशील स्थानों पर पंप, जलस्तर मापने की व्यवस्था और आपातकालीन दल तैनात किए जाएं। पंपिंग की क्षमता के साथ यह भी सुनिश्चित हो कि निकाला गया पानी कहां जाएगा।

तीसरा, पुराने नालों की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। जहां जरूरत हो, वहां जलनिकासी मार्गों का विस्तार, मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जाए। तालाबों, पोखरों और प्राकृतिक जलसंग्रह क्षेत्रों को बचाया जाए। नए निर्माण की अनुमति देते समय वर्षाजल निकासी और वर्षाजल संचयन की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाए।

चौथा, नगर निकायों को बारिश के दौरान जलजमाव की स्थिति और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। शिकायत दर्ज करने के लिए हेल्पलाइन या डिजिटल माध्यम उपलब्ध हों और शिकायत के समाधान की समयसीमा तय हो।

पांचवां, नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है। कचरा नालों में नहीं फेंकना चाहिए, निर्माण सामग्री जलनिकासी मार्गों पर नहीं छोड़नी चाहिए और स्थानीय स्तर पर समस्या की सूचना प्रशासन को देनी चाहिए। लेकिन नागरिक जिम्मेदारी का अर्थ प्रशासन को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त करना नहीं है।

7. जवाबदेही तय किए बिना नहीं बदलेगी तस्वीर

हर साल जलजमाव के बाद निरीक्षण और समीक्षा की घोषणाएं होती हैं। जरूरत इस बात की है कि पिछली बारिश में सामने आई कमियों का हिसाब अगली बारिश से पहले लिया जाए। किस नाले की सफाई हुई, कहां निर्माण अधूरा है, किस स्थान पर पानी निकासी बाधित है और किस अधिकारी या एजेंसी की क्या जिम्मेदारी है—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

सरकारी धन खर्च करना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। असली उपलब्धि तब होगी, जब उस खर्च से नागरिकों को राहत मिले और समस्या बार-बार पैदा न हो।

निष्कर्ष: जलजमाव से मुक्ति केवल पानी निकालने से नहीं, बल्कि उन गलतियों को दूर करने से मिलेगी जिनके कारण पानी हर साल जमा होता है। शहरों का विकास तभी सार्थक होगा, जब नागरिकों को सुरक्षित सड़कें, प्रभावी जलनिकासी और बेहतर जनजीवन मिल सके।

 शहरों में हर साल जलजमाव क्यों होता है? जानिए अनियोजित शहरीकरण, नालों की समस्या, अतिक्रमण, गरीब परिवारों पर असर और स्थायी समाधान के उपाय।

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आलोक कुमार

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