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सोमवार, 28 सितंबर 2026

Bihar : स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या केवल गरीबी तक सीमित क्यों नहीं है?

 स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या केवल गरीबी तक सीमित क्यों नहीं है?


स्कूल छोड़ने वाला हर बच्चा गरीब नहीं होता, फिर बच्चे पढ़ाई से दूर क्यों हो जाते हैं?
अगर किसी बच्चे के परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी हो रही हैं, फिर भी वह धीरे-धीरे स्कूल जाना बंद कर देता है, तो इसके पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं हो सकते। पढ़ाई समझ में न आना, लगातार असफल होना, घर की जिम्मेदारियां, स्कूल की दूरी, सुरक्षा, बुलिंग, भाषा की समस्या, स्वास्थ्य, डिजिटल आदतें और भविष्य को लेकर निराशा जैसे कई कारण बच्चे को शिक्षा से दूर कर सकते हैं।

जब कोई बच्चा स्कूल छोड़ देता है तो सबसे आसान निष्कर्ष यही निकाला जाता है कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होगी। गरीबी निश्चित रूप से बच्चों के स्कूल छोड़ने का एक बड़ा कारण है, लेकिन हर ड्रॉपआउट के पीछे केवल पैसों की कमी हो, यह जरूरी नहीं है। कई बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं जहां बुनियादी जरूरतें पूरी हो रही होती हैं, फिर भी वे धीरे-धीरे पढ़ाई से दूर हो जाते हैं।

स्कूल छोड़ने की समस्या वास्तव में आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, शैक्षणिक, मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक कारणों का मिश्रण है। इसलिए यदि समाधान केवल छात्रवृत्ति या आर्थिक सहायता तक सीमित रखा जाएगा तो समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

गरीबी एक कारण है, पूरी कहानी नहीं

गरीब परिवारों में बच्चों के स्कूल छोड़ने की संभावना बढ़ सकती है। घर की आय कम होने पर बच्चा मजदूरी, खेती, दुकान, घरेलू काम या छोटे-मोटे रोजगार में हाथ बंटाने लगता है। कई परिवारों में किशोर उम्र में बच्चे की कमाई परिवार के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

लेकिन आर्थिक सहायता मिलने के बावजूद यदि स्कूल में पढ़ाई का वातावरण कमजोर है, बच्चा लगातार असफल हो रहा है या उसे कक्षा में समझ नहीं आ रहा है, तो वह स्कूल से दूर हो सकता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि बच्चा गरीब है या नहीं, बल्कि यह भी होना चाहिए कि वह स्कूल में टिक क्यों नहीं पा रहा है?

पढ़ाई समझ में न आना भी बड़ा कारण

कई बच्चे शुरुआती कक्षाओं में किसी कारण से पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं। अगर उनकी सीखने की कमी समय रहते दूर नहीं होती तो अगली कक्षाओं में पाठ्यक्रम और कठिन लगने लगता है।

बच्चा किताब पढ़ने, लिखने या गणित के सामान्य सवाल हल करने में कठिनाई महसूस करता है। धीरे-धीरे उसे कक्षा में शर्मिंदगी महसूस होने लगती है। दूसरे बच्चे आगे बढ़ते जाते हैं और वह स्वयं को कमजोर समझने लगता है।

यही स्थिति स्कूल से दूरी की शुरुआत कर सकती है।

इसलिए स्कूल में केवल उपस्थिति दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि बच्चा वास्तव में क्या सीख रहा है।

बार-बार फेल होने का असर

लगातार परीक्षा में खराब प्रदर्शन बच्चे के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। जब उसे लगता है कि वह चाहे जितनी मेहनत करे, परिणाम अच्छा नहीं आएगा, तो पढ़ाई के प्रति रुचि कम हो सकती है।

कुछ बच्चे स्कूल जाने से बचने के लिए बीमारी, घरेलू काम या अन्य बहाने बनाने लगते हैं। शुरुआत में यह अनियमित उपस्थिति होती है और बाद में स्थायी रूप से स्कूल छोड़ने की स्थिति बन सकती है।

इसलिए स्कूल प्रशासन को केवल अनुपस्थित बच्चों की सूची बनाने के बजाय यह समझना चाहिए कि कोई बच्चा लगातार अनुपस्थित क्यों हो रहा है।

परिवार का माहौल भी महत्वपूर्ण है

घर का वातावरण बच्चे की शिक्षा पर सीधा असर डालता है। माता-पिता के बीच लगातार विवाद, घरेलू जिम्मेदारियां, माता-पिता का अलगाव, किसी सदस्य की गंभीर समस्या या परिवार में अस्थिरता जैसी परिस्थितियां बच्चे के मन और पढ़ाई दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

कई परिवारों में माता-पिता स्वयं शिक्षा के महत्व को पर्याप्त महत्व नहीं देते। उन्हें लगता है कि बच्चा कुछ कक्षाएं पढ़ लेने के बाद काम सीख ले और कमाई शुरू कर दे।

ऐसी सोच में बदलाव केवल आर्थिक सहायता से नहीं आएगा। इसके लिए परिवार और समुदाय के स्तर पर शिक्षा के दीर्घकालिक महत्व को समझाना जरूरी है।

किशोरियों के सामने अलग चुनौतियां

लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे कई विशिष्ट कारण हो सकते हैं। घर के काम की जिम्मेदारी, छोटे भाई-बहनों की देखभाल, सुरक्षित परिवहन की कमी, स्कूल में अलग शौचालय की अनुपलब्धता, मासिक धर्म के दौरान सुविधाओं का अभाव और कम उम्र में विवाह जैसी परिस्थितियां उनकी शिक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।

कई बार परिवार लड़की की पढ़ाई की तुलना में घरेलू जिम्मेदारियों को अधिक प्राथमिकता देता है।

इसलिए लड़कियों के स्कूल ड्रॉपआउट को केवल आर्थिक समस्या मानना वास्तविक स्थिति को अधूरा समझना होगा।

स्कूल की दूरी और परिवहन

कई ग्रामीण या दूरदराज के क्षेत्रों में माध्यमिक विद्यालय घर से काफी दूर हो सकता है। छोटी कक्षाओं में बच्चा नजदीकी स्कूल में पढ़ता है, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उसे दूसरे गांव या कस्बे में जाना पड़ता है।

यदि सुरक्षित और नियमित परिवहन उपलब्ध नहीं है तो अभिभावक विशेषकर बेटियों को आगे पढ़ाने में हिचक सकते हैं।

यहां स्कूल की उपलब्धता और शिक्षा की निरंतरता के बीच का अंतर सामने आता है। प्राथमिक विद्यालय का पास होना पर्याप्त नहीं है; आगे की कक्षाओं के लिए भी व्यवस्था जरूरी है।

स्कूल का वातावरण भी जिम्मेदार हो सकता है

बच्चे के लिए स्कूल केवल किताब और शिक्षक का स्थान नहीं है। वह वहां सम्मान, सुरक्षा और अपनापन भी चाहता है।

यदि किसी बच्चे को बार-बार डांटा जाता है, उसकी तुलना दूसरे बच्चों से की जाती है, उसे अपमानित महसूस कराया जाता है या उसकी समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तो उसका स्कूल से भावनात्मक जुड़ाव कमजोर हो सकता है।

बुलिंग भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। सहपाठियों द्वारा मजाक उड़ाना, मारपीट, जातीय या सामाजिक पहचान को लेकर भेदभाव अथवा कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन के कारण उपहास बच्चे को स्कूल से दूर कर सकता है।

ऐसे मामलों में केवल माता-पिता को दोष देना उचित नहीं है। स्कूल को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करना होगा।

भाषा और सीखने का अंतर

कई बच्चों की घरेलू भाषा और स्कूल में इस्तेमाल होने वाली भाषा अलग होती है। शुरुआत में बच्चा शिक्षक की बात पूरी तरह नहीं समझ पाता। यदि उसे अतिरिक्त सहायता नहीं मिलती तो वह धीरे-धीरे कक्षा से कटने लगता है।

यह समस्या विशेष रूप से उन बच्चों के लिए गंभीर हो सकती है जो पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं और जिन्हें घर पर पढ़ाई में सहायता देने वाला कोई नहीं है।

ऐसे बच्चों के लिए सरल भाषा, स्थानीय संदर्भ और अतिरिक्त सीखने की सहायता बेहद महत्वपूर्ण है।

बाल श्रम केवल गरीबी का परिणाम नहीं

बच्चों का काम में लगना अक्सर गरीबी से जुड़ा होता है, लेकिन इसके पीछे पारिवारिक परंपरा, स्थानीय रोजगार व्यवस्था और शिक्षा के प्रति धारणा भी हो सकती है।

कुछ परिवारों में माना जाता है कि स्कूल में कई साल पढ़ने के बजाय बच्चे को कोई हुनर सिखाकर जल्दी काम पर लगा देना अधिक उपयोगी है।

यदि शिक्षा के बाद रोजगार के अवसर स्पष्ट दिखाई नहीं देते, तो किशोर के मन में भी यह सवाल पैदा हो सकता है कि पढ़ाई जारी रखने से उसे वास्तविक लाभ क्या मिलेगा।

इसलिए स्कूली शिक्षा को कौशल, करियर मार्गदर्शन और भविष्य के अवसरों से जोड़ना भी जरूरी है।

डिजिटल दुनिया का दोहरा प्रभाव

मोबाइल और इंटरनेट ने शिक्षा के नए अवसर खोले हैं, लेकिन इनके गलत या अत्यधिक इस्तेमाल से पढ़ाई प्रभावित भी हो सकती है।

कुछ किशोर ऑनलाइन मनोरंजन, गेमिंग या सोशल मीडिया में इतना समय बिताने लगते हैं कि उनकी पढ़ाई पीछे छूट जाती है। दूसरी तरफ डिजिटल संसाधनों की कमी भी गरीब और ग्रामीण बच्चों को पीछे कर सकती है।

इसलिए डिजिटल शिक्षा का मतलब केवल मोबाइल देना नहीं है। बच्चों को डिजिटल अनुशासन और सुरक्षित उपयोग की समझ भी देना आवश्यक है।

बीमारी और विशेष जरूरतें

लंबी बीमारी, शारीरिक अक्षमता, सीखने से जुड़ी विशेष जरूरतें या मानसिक दबाव जैसी परिस्थितियां भी बच्चे की नियमित शिक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।

यदि स्कूल में बच्चे की जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध नहीं है, तो वह बार-बार अनुपस्थित हो सकता है। लंबे अंतराल के बाद वापस स्कूल लौटना उसके लिए और कठिन हो जाता है।

ऐसे बच्चों के लिए स्कूल, परिवार और संबंधित विभागों के बीच समन्वय जरूरी है।

समाधान केवल छात्रवृत्ति नहीं

स्कूल ड्रॉपआउट रोकने के लिए एक बहुस्तरीय व्यवस्था की जरूरत है।

स्कूल स्तर पर हर लगातार अनुपस्थित बच्चे की पहचान होनी चाहिए। शिक्षक को परिवार से संपर्क कर वास्तविक कारण जानना चाहिए।

शैक्षणिक स्तर पर कमजोर बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं और सीखने की सहायता उपलब्ध होनी चाहिए।

परिवार स्तर पर अभिभावकों को समझाना होगा कि बच्चे की शिक्षा केवल तत्काल कमाई का विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य में बेहतर अवसरों का आधार है।

प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षित परिवहन, पर्याप्त स्कूल, छात्रवृत्ति, शौचालय, पेयजल और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।

समुदाय स्तर पर ऐसे बच्चों की पहचान करनी होगी जो लंबे समय से स्कूल से बाहर हैं और उन्हें दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा में लाने का प्रयास करना होगा।

स्कूल छोड़ने के बाद वापसी का रास्ता भी जरूरी

कई बार बच्चा किसी कारण से स्कूल छोड़ देता है। इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि उसकी शिक्षा हमेशा के लिए समाप्त हो गई।

ऐसे बच्चों के लिए पुनः नामांकन, विशेष शिक्षण कार्यक्रम, कौशल आधारित शिक्षा और वैकल्पिक शिक्षा के रास्ते उपलब्ध होने चाहिए। उम्र बढ़ जाने के कारण बच्चे को शिक्षा के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

स्कूल छोड़ने वाला हर बच्चा गरीब हो, यह मान लेना समस्या को बहुत छोटा करके देखना है। गरीबी एक महत्वपूर्ण कारण है, लेकिन स्कूल ड्रॉपआउट के पीछे सीखने की कठिनाई, पारिवारिक परिस्थितियां, बाल श्रम, स्कूल की दूरी, सुरक्षा, शौचालय, किशोरावस्था, बुलिंग, भाषा, स्वास्थ्य, डिजिटल आदतें और भविष्य को लेकर निराशा जैसे अनेक कारण हो सकते हैं।

इसलिए किसी बच्चे के स्कूल छोड़ने पर पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “इसके माता-पिता गरीब हैं क्या?” बल्कि यह होना चाहिए—“यह बच्चा स्कूल से क्यों जुड़ा नहीं रह पा रहा है?”

जब प्रशासन, शिक्षक, परिवार और समाज इस सवाल का वास्तविक उत्तर खोजेंगे, तभी ड्रॉपआउट रोकने की नीति प्रभावी बन सकती है। हर बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है उसे स्कूल में बनाए रखना, सीखने का अवसर देना और जरूरत पड़ने पर दोबारा शिक्षा से जोड़ना।

शिक्षा की सफलता केवल नामांकन की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। असली सफलता तब होगी जब आर्थिक या सामाजिक परिस्थिति चाहे जैसी हो, बच्चा अपनी पढ़ाई पूरी कर सके और अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने की स्थिति में पहुंचे।

आलोक कुमार

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

Bihar : स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या को सिर्फ परिवार की गलती क्यों न मानें

 


स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की समस्या को सिर्फ परिवार की गलती क्यों न मानें

जब कोई बच्चा स्कूल छोड़ देता है तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि उसके माता-पिता ने उसे पढ़ाया क्यों नहीं। यह भी देखना जरूरी है कि क्या गरीबी, स्कूल की दूरी, घरेलू जिम्मेदारियां, पढ़ाई में पिछड़ना, सामाजिक दबाव या स्कूल का माहौल उसे शिक्षा से दूर करने में कहीं न कहीं जिम्मेदार रहा है।

स्कूल छोड़ने वाला बच्चा केवल एक छात्र नहीं होता, जो पढ़ाई के बीच रास्ते में रुक गया। उसके पीछे परिवार की आर्थिक स्थिति, घर का माहौल, स्कूल की व्यवस्था, सामाजिक परिस्थितियां और कई बार सार्वजनिक व्यवस्था की कमियां भी छिपी होती हैं। ऐसे में हर मामले में माता-पिता को दोषी ठहराना समस्या को समझने के बजाय उसे सरल बनाकर देखने जैसा है।

स्कूल छोड़ना अक्सर अचानक होने वाली घटना नहीं होती। इसके पीछे कई छोटी-बड़ी परेशानियां लंबे समय तक जमा होती रहती हैं। इसलिए जरूरी है कि बच्चे के स्कूल से बाहर होने की वजह को समझा जाए और परिवार के साथ-साथ स्कूल तथा व्यवस्था की भूमिका पर भी विचार किया जाए।

गरीबी और पढ़ाई के बीच संघर्ष

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में बच्चों की पढ़ाई और परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों के बीच संघर्ष बना रहता है। भोजन, इलाज, किराया, रोजगार और घरेलू खर्च की चिंता के बीच शिक्षा का खर्च कई परिवारों के लिए चुनौती बन जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में खेती, पशुपालन, मजदूरी या घरेलू कामों में बच्चों की भागीदारी बढ़ सकती है। कई बार बच्चा परिवार की आर्थिक मदद के लिए काम करने लगता है। ऐसी स्थिति में स्कूल छोड़ना केवल माता-पिता की अनिच्छा नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी का परिणाम भी हो सकता है।

यदि परिवार के सामने राशन की जरूरत और बच्चे की पढ़ाई के खर्च के बीच कठिन चुनाव हो, तो केवल परिवार को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी।

स्कूल की दूरी भी बन सकती है बाधा

कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में माध्यमिक या उच्च माध्यमिक विद्यालय घर से काफी दूर होते हैं। छोटी उम्र के बच्चों के लिए लंबी दूरी तय करना मुश्किल हो सकता है। लड़कियों के मामले में सुरक्षा और परिवहन की चिंता भी परिवार के निर्णय को प्रभावित कर सकती है।

यदि नजदीक पर्याप्त स्कूल उपलब्ध नहीं है, परिवहन की सुविधा कमजोर है या रास्ता सुरक्षित नहीं है, तो बच्चे की शिक्षा जारी रखने की जिम्मेदारी केवल परिवार पर डालना उचित नहीं होगा। शिक्षा की पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी परिवार की इच्छा।

स्कूल का माहौल भी महत्वपूर्ण है

बच्चा स्कूल में केवल किताब पढ़ने नहीं जाता। वह वहां सम्मान, सुरक्षा और अपनापन भी चाहता है। यदि उसे बार-बार अपमानित किया जाए, उसकी आर्थिक स्थिति का मजाक बनाया जाए या उसकी सामाजिक और भाषाई पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव महसूस हो, तो स्कूल से उसका जुड़ाव कमजोर हो सकता है।

सीखने में पीछे रह जाने वाले बच्चों की समस्या और गंभीर हो सकती है। यदि बच्चा लगातार कक्षा में मौजूद रहे लेकिन विषयों को समझ न पाए, तो पढ़ाई उसके लिए बोझ बन सकती है। ऐसे बच्चों को “पढ़ने में मन नहीं लगता” कहकर छोड़ देने के बजाय अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता देना जरूरी है।

किशोरावस्था में बढ़ती चुनौतियां

कक्षा बढ़ने के साथ बच्चों की जिम्मेदारियां और दबाव भी बढ़ सकते हैं। परीक्षा का डर, पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां, साथियों का प्रभाव और भविष्य को लेकर चिंता कई बच्चों को प्रभावित करती है।

लड़कियों के सामने कुछ अतिरिक्त चुनौतियां हो सकती हैं। स्कूल में पर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं का अभाव, सुरक्षित शौचालय की कमी, घरेलू काम का बोझ और कम उम्र में विवाह का सामाजिक दबाव उनकी शिक्षा को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए स्कूल छोड़ने की समस्या को केवल “परिवार जागरूक नहीं है” कहकर समझना वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा।

प्रवासी परिवारों के बच्चों की चुनौती

मजदूरी या रोजगार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाने वाले परिवारों के बच्चों के लिए पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखना कठिन हो सकता है। परिवार बिहार से पंजाब, झारखंड से दिल्ली या किसी दूसरे राज्य में चला गया तो बच्चे का पुराना स्कूल छूट सकता है।

नए स्थान पर प्रवेश, दस्तावेज, भाषा और पढ़ाई के स्तर में अंतर जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। कई बार बच्चा कुछ महीनों तक स्कूल से बाहर रहता है और फिर धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है।

ऐसे बच्चों के लिए शिक्षा व्यवस्था में ऐसी सुविधाओं की जरूरत है, जिससे परिवार के स्थान बदलने के बावजूद बच्चे की पढ़ाई बाधित न हो।

स्वास्थ्य और विशेष जरूरतों को भी समझना होगा

लंबी बीमारी, दिव्यांगता या सीखने से जुड़ी कठिनाइयां भी बच्चे को स्कूल से दूर कर सकती हैं। यदि स्कूल में आवश्यक सहयोग उपलब्ध नहीं है, तो नियमित उपस्थिति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

ऐसे मामलों में परिवार को दोष देने के बजाय स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष शिक्षण सहायता और स्कूल की जिम्मेदारी पर भी ध्यान देना जरूरी है।

स्कूल छोड़ने से पहले मिलते हैं संकेत

बच्चा अक्सर एक दिन में स्कूल छोड़ने का फैसला नहीं करता। उससे पहले कई संकेत दिखाई दे सकते हैं—लगातार अनुपस्थिति, पढ़ाई में गिरावट, किताब-कॉपी की कमी, कक्षा में चुप रहना, शिक्षकों से दूरी, साथियों से अलगाव या परिवार की आर्थिक समस्या।

यदि स्कूल इन संकेतों को समय रहते पहचान ले, तो बच्चे को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए हस्तक्षेप किया जा सकता है। शिक्षक, प्रधानाध्यापक, अभिभावक, पंचायत और स्थानीय प्रशासन के बीच संवाद इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

परिवार के साथ व्यवस्था की भी जिम्मेदारी

परिवार की जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता। माता-पिता को बच्चों की शिक्षा के महत्व को समझना चाहिए और उन्हें नियमित स्कूल भेजने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन परिवार को अकेला छोड़कर पूरी जिम्मेदारी उसी पर डाल देना भी उचित नहीं है।

जरूरतमंद बच्चों की पहचान, छात्रवृत्ति, परिवहन, स्कूल की आधारभूत सुविधाएं, परामर्श, स्वास्थ्य सहायता और पुनःनामांकन जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाना जरूरी है। स्कूलों को भी बच्चों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सीखने योग्य वातावरण तैयार करना होगा।

हर बच्चे की कहानी अलग होती है

स्कूल छोड़ने वाले हर बच्चे की कहानी एक जैसी नहीं होती। कोई आर्थिक परेशानी के कारण बाहर हुआ हो सकता है, कोई परिवार के स्थानांतरण के कारण, कोई पढ़ाई में लगातार पिछड़ने के कारण और कोई घरेलू जिम्मेदारियों या स्कूल के खराब अनुभव के कारण।

इसलिए “बच्चे के माता-पिता दोषी हैं” जैसे एक वाक्य में पूरी समस्या को समेट देना उचित नहीं होगा। हमें यह पूछना चाहिए कि बच्चा स्कूल से क्यों दूर हुआ और उसे वापस शिक्षा से जोड़ने के लिए कौन-कौन से रास्ते उपलब्ध हैं।

शिक्षा केवल बच्चे और परिवार की निजी जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज और व्यवस्था की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। जिस दिन कोई बच्चा स्कूल छोड़ता है, उस दिन केवल उसकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होती, बल्कि उसके भविष्य के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।

इसलिए स्कूल छोड़ने वाले बच्चों को दोष देने या उनके परिवार को कटघरे में खड़ा करने से पहले उनकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है। सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “बच्चे ने स्कूल क्यों छोड़ दिया?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि “ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं, जिनमें बच्चा शिक्षा से दूर हो गया?”

यही सवाल समस्या की जड़ तक पहुंचने में मदद करेगा और यहीं से बच्चे को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के वास्तविक प्रयास की शुरुआत हो सकती है।

आलोक कुमार


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