India : दो जून की रोटी का संघर्ष: भारत के मेहनतकश वर्ग की कड़वी हकीकत

 दो जून की रोटी का संघर्ष: भारत के मेहनतकश वर्ग की कड़वी हकीकत

“दो जून की रोटी” केवल एक मुहावरा नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। इसका अर्थ है दिन में दो समय भरपेट भोजन की व्यवस्था करना। सुनने में यह एक सामान्य आवश्यकता लगती है, लेकिन भारत के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों, भूमिहीन किसानों, प्रवासी श्रमिकों और गरीब परिवारों के लिए यह आज भी एक कठिन चुनौती बनी हुई है। वर्ष 2026 में भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी रोज़ी-रोटी की चिंता में अपना जीवन गुजार रहा है।

भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र पर आधारित है। निर्माण कार्य, कृषि, ईंट-भट्ठे, घरेलू कामकाज, रिक्शा-चालन, छोटे दुकानों और कारखानों में काम करने वाले करोड़ों लोग इसी क्षेत्र से जुड़े हैं। इन श्रमिकों की सबसे बड़ी समस्या अनियमित आय है। दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलने पर ही मजदूरी मिलती है। यदि किसी दिन काम नहीं मिला, बारिश हो गई या तबीयत खराब हो गई, तो उस दिन परिवार के चूल्हे पर संकट खड़ा हो जाता है। यही कारण है कि उनके जीवन में आर्थिक सुरक्षा लगभग नहीं के बराबर होती है।

महँगाई ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में खाद्यान्न, सब्जियों, दालों, रसोई गैस, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। गरीब परिवारों की आय जिस गति से नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक तेजी से खर्च बढ़ गया। परिणामस्वरूप उन्हें अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है। कई परिवार पौष्टिक भोजन से वंचित रह जाते हैं और केवल पेट भरने के लिए सस्ते खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। बच्चों और महिलाओं में कुपोषण की समस्या भी इसी आर्थिक असमानता का परिणाम है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसर भी लोगों को पलायन के लिए मजबूर करते हैं। खेती पर निर्भर लाखों परिवारों को वर्षभर पर्याप्त काम नहीं मिल पाता। छोटे और सीमांत किसानों की आय अक्सर खेती की लागत भी नहीं निकाल पाती। ऐसे में गांवों से बड़ी संख्या में लोग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और अन्य महानगरों की ओर रोजगार की तलाश में निकल पड़ते हैं। लेकिन शहरों में भी उनका जीवन आसान नहीं होता। उन्हें झुग्गी-झोपड़ियों में रहना पड़ता है, जहां स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित आवास का अभाव होता है। कई बार उन्हें न्यूनतम मजदूरी से भी कम भुगतान किया जाता है और श्रम कानूनों का लाभ नहीं मिल पाता।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के सामने सामाजिक सुरक्षा का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। अधिकांश मजदूरों के पास स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, भविष्य निधि या दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। यदि परिवार का कमाने वाला सदस्य बीमार पड़ जाए या किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए, तो पूरा परिवार आर्थिक संकट में डूब जाता है। कोरोना महामारी के दौरान देश ने देखा कि लाखों प्रवासी मजदूर किस प्रकार भोजन और रोजगार के संकट से जूझ रहे थे। उस अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया कि गरीब वर्ग की आर्थिक स्थिति कितनी अस्थिर है।

इन चुनौतियों को कम करने के लिए सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन कार्ड धारकों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से रियायती दरों पर गेहूं और चावल उपलब्ध कराया जाता है। इससे करोड़ों गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिली है। कई राज्यों में अतिरिक्त राशन और अन्य खाद्य सामग्री भी वितरित की जाती है, जिससे गरीबों को राहत मिलती है।

इसी प्रकार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योजना है। इसके तहत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार देने का प्रावधान है। इससे गांवों में आय के अवसर बढ़े हैं और पलायन को कुछ हद तक रोकने में मदद मिली है। हालांकि कई क्षेत्रों में समय पर भुगतान न होना और कार्यों की कमी जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं।

युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना और अन्य कौशल विकास कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को आधुनिक उद्योगों और सेवाओं की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण देकर बेहतर रोजगार से जोड़ना है। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो, तो गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार लाया जा सकता है।

हालांकि सरकारी प्रयासों के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। योजनाओं की जानकारी का अभाव, भ्रष्टाचार, बिचौलियों की भूमिका, पात्र लोगों तक लाभ न पहुंचना और प्रशासनिक लापरवाही जैसी समस्याएं अक्सर इनके प्रभाव को कम कर देती हैं। कई जरूरतमंद परिवार आज भी सरकारी सहायता से वंचित हैं।

“दो जून की रोटी” का संघर्ष केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा का प्रश्न भी है। जब तक प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक रोजगार, उचित मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। भारत के विकास का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब देश का कोई भी नागरिक भूखा सोने के लिए मजबूर न हो। इसके लिए सरकार, समाज, उद्योग जगत और नागरिक संगठनों को मिलकर कार्य करना होगा। तभी करोड़ों मेहनतकश लोगों का जीवन बेहतर बनेगा और “दो जून की रोटी” का संघर्ष इतिहास का विषय बन सकेगा।

आलोक कुमार

India : कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चैटबॉट्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है

 लोग समाचार, इतिहास, धर्म, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने के लिए इनका उपयोग कर रहे हैं


हाल के
समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चैटबॉट्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। लोग समाचार, इतिहास, धर्म, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने के लिए इनका उपयोग कर रहे हैं। लेकिन एआई की बढ़ती उपयोगिता के साथ-साथ उसकी सीमाएँ भी सामने आ रही हैं। पोप फ्रांसिस, पोप लियो XIV और वेटिकन न्यूज़ से जुड़ा एक संवाद इसी तथ्य को उजागर करता है कि एआई कभी-कभी आत्मविश्वास के साथ गलत जानकारी भी प्रस्तुत कर सकता है और कई बार नए प्रमाणों को स्वीकार करने में भी देर कर देता है।

इस पूरे प्रकरण की शुरुआत तब हुई जब एक चर्चा में यह दावा सामने आया कि पोप फ्रांसिस का निधन हो चुका है और उनके स्थान पर रॉबर्ट फ्रांसिस प्रीवोस्ट को नया पोप चुना गया है, जिन्होंने पोप लियो XIV नाम धारण किया है। इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए एआई मॉडल ने शुरुआत में इसे पूरी तरह गलत बताया। उसने कहा कि पोप फ्रांसिस जीवित हैं, वेटिकन के प्रमुख हैं और "पोप लियो XIV" नाम का कोई वास्तविक पोप अस्तित्व में नहीं है। साथ ही उसने यह भी कहा कि यह संभवतः किसी काल्पनिक कहानी, उपन्यास, टाइपिंग त्रुटि या इंटरनेट पर फैली अफवाह का परिणाम है।

इसके बाद उपयोगकर्ता ने वेटिकन न्यूज़ की शैली में प्रकाशित एक लेख का अंश प्रस्तुत किया, जिसमें स्पष्ट रूप से "संत पापा लियो 14वें" का उल्लेख था। लेख में 30 मई 2026 को काथलिक करिश्माई रिन्यूअल के सदस्यों को दिए गए संदेश का वर्णन किया गया था। यहाँ एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आया। एआई ने उस लेख का सारांश भी प्रस्तुत किया और उसमें लिखे संदेशों की व्याख्या भी की, लेकिन साथ ही यह दावा जारी रखा कि "पोप लियो XIV" वास्तविक नहीं हैं।

यहीं से बहस का केंद्रीय प्रश्न उभरा। यदि प्रस्तुत दस्तावेज़ में बार-बार पोप लियो XIV का उल्लेख हो रहा है, तो क्या उसे केवल इस आधार पर काल्पनिक घोषित किया जा सकता है कि वह मॉडल के पूर्व ज्ञान से मेल नहीं खाता? आलोचकों का तर्क था कि एआई ने उपलब्ध प्रमाण की निष्पक्ष जाँच करने के बजाय अपने पुराने निष्कर्ष की रक्षा करने का प्रयास किया। दूसरी ओर यह भी कहा गया कि किसी भी दस्तावेज़ की प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध नहीं होती और केवल किसी पाठ में लिखी बात को सत्य नहीं मान लिया जा सकता।

चर्चा आगे बढ़ने पर उपयोगकर्ता ने वेटिकन न्यूज़ के ऐसे अंश प्रस्तुत किए जिनमें पोप लियो XIV का उल्लेख लगातार दिखाई देता था। इसके बावजूद एआई का एक उत्तर यह कहता रहा कि यह संभवतः पैरोडी, काल्पनिक प्रोजेक्ट या किसी एआई द्वारा तैयार किया गया नकली पाठ हो सकता है। यहाँ एआई ने "सोर्स मैनिपुलेशन" और "हैलुसिनेशन" जैसी अवधारणाओं का उल्लेख किया। उसका तर्क था कि कभी-कभी उपयोगकर्ता भी ऐसे पाठ प्रस्तुत कर सकते हैं जो देखने में आधिकारिक लगते हैं लेकिन वास्तव में काल्पनिक होते हैं।

हालाँकि, चर्चा का एक नया मोड़ तब आया जब उसी एआई मॉडल से बाद में पोप लियो XIV का पूरा नाम पूछा गया। इस बार उसने उत्तर दिया कि पोप लियो XIV का मूल नाम रॉबर्ट फ्रांसिस प्रीवोस्ट है और उन्होंने पोप लियो XIII से प्रेरित होकर "लियो" नाम चुना। उसने सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकारों और प्रसिद्ध दस्तावेज़ Rerum Novarum का भी उल्लेख किया। इतना ही नहीं, उसने अपनी पूर्व त्रुटि स्वीकार करते हुए कहा कि पहले दिया गया निष्कर्ष गलत था और नई जानकारी को स्वीकार करना आवश्यक है।

यह परिवर्तन इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण भाग बन गया। एक ओर पहले के उत्तरों में पोप लियो XIV के अस्तित्व को पूरी तरह नकारा जा रहा था, वहीं बाद के उत्तरों में उसी व्यक्ति की पहचान, पृष्ठभूमि और नाम चयन के कारणों का विस्तार से वर्णन किया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि एआई मॉडल कभी-कभी एक ही विषय पर अलग-अलग समय पर परस्पर विरोधी उत्तर दे सकते हैं।

इस पूरे विवाद से कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, एआई को अंतिम सत्य का स्रोत नहीं माना जा सकता। दूसरा, किसी भी दावे की पुष्टि स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों से करना आवश्यक है। तीसरा, यदि कोई नया प्रमाण सामने आता है तो केवल पुराने ज्ञान के आधार पर उसे अस्वीकार नहीं करना चाहिए। चौथा, किसी स्रोत को नकली या काल्पनिक घोषित करने से पहले उसके बारे में ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक है। पाँचवाँ, एआई मॉडल भी मनुष्यों की तरह त्रुटि कर सकते हैं, लेकिन उनकी त्रुटि का स्वरूप अलग होता है क्योंकि वे अक्सर गलत जानकारी को भी पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सकते हैं।

निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो इस प्रकरण में न तो केवल उपयोगकर्ता को पूरी तरह सही कहा जा सकता है और न ही केवल एआई को पूरी तरह गलत। उपयोगकर्ता ने उपलब्ध पाठ और स्रोतों के आधार पर तार्किक प्रश्न उठाए, जबकि एआई ने प्रारंभ में अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर उत्तर दिया। समस्या तब उत्पन्न हुई जब नए प्रमाणों के सामने आने के बाद भी कुछ समय तक पुराने निष्कर्ष पर जोर दिया गया। बाद में जब मॉडल ने अपने उत्तर में संशोधन किया, तब यह स्पष्ट हुआ कि एआई की विश्वसनीयता का मूल्यांकन उसके आत्मविश्वास से नहीं, बल्कि उसके द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों और अपनी त्रुटि सुधारने की क्षमता से किया जाना चाहिए।

अंततः यह पूरा प्रकरण डिजिटल युग के लिए एक महत्वपूर्ण सबक देता है। चाहे जानकारी किसी एआई से प्राप्त हो, किसी वेबसाइट से या किसी व्यक्ति से, सत्य की पुष्टि स्वतंत्र स्रोतों और प्रमाणों के आधार पर ही की जानी चाहिए। विवेकपूर्ण प्रश्न पूछना, प्रमाणों की जाँच करना और नए तथ्यों के प्रति खुले मन से विचार करना ही सूचना युग में सबसे विश्वसनीय मार्ग है।

आलोक कुमार

Bihar : सशक्त स्थायी समिति के चुनाव ने एक नया राजनीतिक अध्याय


बेतिया नगर निगम की राजनीति में हाल ही में हुए सशक्त स्थायी समिति के चुनाव ने एक नया राजनीतिक अध्याय खोल दिया है। यह चुनाव केवल सात सदस्यों के चयन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने नगर निगम के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों और सत्ता संतुलन की वास्तविक तस्वीर भी सामने रख दी। चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि नगर निगम के अधिकांश पार्षद अब मेयर गरिमा देवी सिकारिया के नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। परिणामस्वरूप, समिति की सातों सीटों पर विपक्षी खेमे के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज कर ली और मेयर समर्थक एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। इसे नगर निगम के इतिहास में मेयर की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक माना जा रहा है।

सशक्त स्थायी समिति नगर निगम की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था होती है। नगर निगम के बजट, विकास योजनाओं, निर्माण कार्यों, निविदाओं की स्वीकृति और विभिन्न प्रशासनिक प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय लेने में इस समिति की प्रमुख भूमिका होती है। ऐसे में समिति में बहुमत होना किसी भी मेयर के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन इस चुनाव में जो परिणाम सामने आए, उन्होंने मेयर खेमे को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया।

चुनाव से पहले नगर निगम के गलियारों में काफी हलचल थी। दोनों पक्ष अपने-अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए सक्रिय थे। मेयर खेमे को विश्वास था कि उनके प्रभाव और पद की शक्ति के कारण पर्याप्त समर्थन मिलेगा। वहीं विपक्ष पिछले कई महीनों से लगातार संगठनात्मक मजबूती पर काम कर रहा था। विपक्षी पार्षदों ने मेयर की कार्यशैली, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में कथित देरी तथा पार्षदों की उपेक्षा जैसे मुद्दों को लेकर एकजुटता दिखाई।

जब मतदान के बाद परिणाम घोषित हुए तो राजनीतिक पर्यवेक्षकों के साथ-साथ नगर निगम के कई अनुभवी सदस्यों के लिए भी यह अप्रत्याशित था। सातों सीटों पर विपक्ष समर्थित उम्मीदवारों की जीत ने यह संदेश दे दिया कि निगम के भीतर सत्ता का वास्तविक केंद्र बदल चुका है। सबसे बड़ी बात यह रही कि मेयर के करीबी माने जाने वाले उम्मीदवार भी हार गए। इससे यह संकेत मिला कि चुनाव में केवल विपक्ष की मजबूती ही नहीं, बल्कि मेयर खेमे के भीतर भी गंभीर असंतोष मौजूद था।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस हार के पीछे कई कारण रहे। सबसे पहला कारण पार्षदों के साथ संवाद की कमी को माना जा रहा है। कई वार्ड पार्षद लंबे समय से यह शिकायत करते रहे थे कि उनके सुझावों और समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा था। विकास कार्यों के वितरण में भी पक्षपात के आरोप समय-समय पर लगते रहे। इससे कई ऐसे पार्षद भी नाराज हो गए जो पहले तटस्थ माने जाते थे।

दूसरा बड़ा कारण अति-आत्मविश्वास बताया जा रहा है। सत्ता में होने के कारण मेयर खेमा यह मानकर चल रहा था कि उनके पास पर्याप्त समर्थन है। लेकिन उन्होंने विपक्ष की रणनीति और पार्षदों के भीतर बढ़ती नाराजगी को गंभीरता से नहीं लिया। यही कारण रहा कि मतदान के समय उनका पूरा गणित बिगड़ गया।

तीसरा और सबसे चर्चित कारण भीतरघात या क्रॉस वोटिंग माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ ऐसे पार्षदों ने भी विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन किया, जिन्हें मेयर का करीबी माना जाता था। यदि यह सच है तो यह मेयर के लिए राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि इससे उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े होते हैं।

विपक्ष की रणनीति भी इस जीत का महत्वपूर्ण कारण रही। विपक्षी गुट ने व्यक्तिगत मतभेदों को भुलाकर केवल एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया—सशक्त स्थायी समिति पर कब्जा। जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया गया। परिणामस्वरूप विपक्ष पूरी तरह सफल रहा और उसने समिति की सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया।

इस चुनाव के बाद नगर निगम में मेयर की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। अब कोई भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव या वित्तीय निर्णय समिति की स्वीकृति के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। चूंकि समिति के सभी सात सदस्य विपक्ष से जुड़े हैं, इसलिए मेयर को हर निर्णय के लिए विपक्ष से संवाद और सहयोग करना होगा। यदि दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है तो विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

आने वाले समय में नगर निगम की बैठकों में राजनीतिक खींचतान बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। विपक्ष अब हर प्रस्ताव की गहन समीक्षा करेगा और बिना पर्याप्त संतुष्टि के किसी भी योजना को मंजूरी देने से बच सकता है। इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं धीमी पड़ सकती हैं। दूसरी ओर, यदि विपक्ष जिम्मेदार भूमिका निभाता है और जनहित को प्राथमिकता देता है, तो यह समिति नगर निगम के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ा सकती है।

इस चुनाव ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में केवल पद का प्रभाव पर्याप्त नहीं होता। जनप्रतिनिधियों का विश्वास बनाए रखना, संवाद कायम रखना और सभी पक्षों को साथ लेकर चलना उतना ही आवश्यक है। नगर निगम के पार्षदों ने अपने मतदान के माध्यम से यह संकेत दिया है कि वे निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी चाहते हैं।

बेतिया की जनता की नजरें अब मेयर और विपक्ष दोनों पर टिकी हुई हैं। जनता चाहती है कि राजनीतिक संघर्ष विकास कार्यों में बाधा न बने। शहर की सड़कें, सफाई व्यवस्था, जल निकासी, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में राजनीतिक टकराव का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, सशक्त स्थायी समिति का यह चुनाव बेतिया नगर निगम की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ है। मेयर गरिमा देवी सिकारिया को मिली यह करारी हार केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि निगम के भीतर बदलते राजनीतिक विश्वास का संकेत भी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मेयर इस चुनौती का सामना किस प्रकार करती हैं और विपक्ष अपनी नई शक्ति का उपयोग जनहित में करता है या केवल राजनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए। आने वाले महीनों में बेतिया नगर निगम की राजनीति और प्रशासन दोनों की दिशा काफी हद तक इसी समीकरण पर निर्भर करेगी।

आलोक कुमार

India : सीसीबीआई के अधिकारियों ने केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन को किया सम्मानित

 सीसीबीआई के अधिकारियों ने केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन को किया सम्मानित

नई दिल्ली। भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CCBI) के अधिकारियों ने केरल के नव-शपथ ग्रहण किए हुए मुख्यमंत्री V. D. Satheesan का अभिनंदन किया। यह मुलाकात 26 मई 2026 को नई दिल्ली स्थित केरल हाउस में हुई, जहां दोनों पक्षों के बीच राज्य के विकास, सामाजिक सद्भाव और गरीबों के कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

इस अवसर पर सीसीबीआई के उप महासचिव रेव. डॉ. स्टीफन अलाथारा तथा प्रवासी आयोग (Commission for Migrants) के कार्यकारी सचिव फादर एडवोकेट जैसन वडास्सेरी ने मुख्यमंत्री से भेंट की। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन उस समय राष्ट्रीय राजधानी में भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi के साथ विभिन्न विकासात्मक और प्रशासनिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आए हुए थे।

बैठक के दौरान रेव. डॉ. स्टीफन अलाथारा ने मुख्यमंत्री को मिजोरम की समृद्ध जनजातीय संस्कृति का प्रतीक एक पारंपरिक मिजो शॉल भेंट किया। यह सम्मान न केवल सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक था, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों के बीच भाईचारे और एकता का संदेश भी देता है।                 

इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री को पोप लियो चौदहवें द्वारा जारी प्रथम अपोस्टोलिक उपदेश (Apostolic Exhortation) “Dilexi Te” की एक प्रति भी भेंट की। 9 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित इस महत्वपूर्ण दस्तावेज का उपशीर्षक “गरीबों के प्रति प्रेम” है। इसमें मसीह के गरीबों और वंचितों के प्रति प्रेम पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है तथा चर्च को समाज के कमजोर, जरूरतमंद और हाशिए पर रहने वाले लोगों की सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करने का आह्वान किया गया है।

फादर अलाथारा ने इस अवसर पर कहा कि किसी भी सरकार की पहली और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समाज के गरीब, कमजोर और वंचित वर्गों के कल्याण को सुनिश्चित करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब शासन व्यवस्था समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और न्याय पहुंचाने का प्रयास करती है, तभी वास्तविक प्रगति संभव हो पाती है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि मुख्यमंत्री सतीशन के नेतृत्व में केरल सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी विकास की दिशा में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा।

बैठक के दौरान दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण और अनौपचारिक बातचीत भी हुई। सीसीबीआई के प्रतिनिधियों ने केरल के भविष्य को लेकर अपनी आशाओं और अपेक्षाओं को साझा किया। उन्होंने राज्य में शांति, धार्मिक सद्भाव, सामाजिक एकता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री को आश्वस्त किया कि चर्च और उसके विभिन्न संगठन समाज में सकारात्मक मूल्यों के प्रसार तथा सामुदायिक सद्भाव को मजबूत करने के लिए सरकार के साथ सहयोग करते रहेंगे।

सीसीबीआई अधिकारियों ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि आज के समय में समाज को विभाजन, ध्रुवीकरण और कट्टरता से दूर रखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विविधता से भरे केरल जैसे राज्य में सभी समुदायों के बीच विश्वास, सम्मान और संवाद को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नई सरकार सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली नीतियों को प्राथमिकता देगी।

मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने भी सीसीबीआई प्रतिनिधियों के प्रति आभार व्यक्त किया और समाज के विभिन्न वर्गों के सहयोग को लोकतांत्रिक शासन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के समग्र विकास के लिए धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं की रचनात्मक भागीदारी आवश्यक है।

उल्लेखनीय है कि वी. डी. सतीशन ने 18 मई 2026 को केरल के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया था। उनके नेतृत्व से राज्य के लोगों को विकास, पारदर्शिता और जनकल्याण की नई उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव के कारण उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो विभिन्न समुदायों को साथ लेकर आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं।

सीसीबीआई और मुख्यमंत्री के बीच हुई यह मुलाकात केवल एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक उत्तरदायित्व, मानवीय मूल्यों और जनकल्याण के प्रति साझा प्रतिबद्धता का भी प्रतीक थी। इस बैठक ने यह संदेश दिया कि सरकार और सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं मिलकर समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान, शांति की स्थापना और सामाजिक एकता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

भविष्य में भी ऐसे संवाद और सहयोग राज्य तथा देश के समावेशी विकास को नई दिशा देने में सहायक सिद्ध होंगे।

आलोक कुमार

World : आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस

                         31 मई को पूरे विश्व में World No Tobacco Day मनाया जाता है

31 मई वर्ष का एक महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन केवल कैलेंडर का एक सामान्य दिन नहीं, बल्कि अनेक ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक जागरूकता अभियानों और प्रेरणादायक प्रसंगों से जुड़ा हुआ है। मई महीने का अंतिम दिन होने के कारण यह लोगों को बीते महीने का मूल्यांकन करने और आने वाले जून माह की नई योजनाओं के लिए तैयार होने का अवसर भी देता है।            

विश्व तंबाकू निषेध दिवस

31 मई को पूरे विश्व में World No Tobacco Day मनाया जाता है। इसकी शुरुआत World Health Organization (WHO) ने वर्ष 1987 में की थी। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य तंबाकू सेवन से होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करना और तंबाकू के उपयोग को कम करना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तंबाकू सेवन से हर वर्ष लाखों लोगों की मृत्यु होती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के साथ-साथ उसके आसपास रहने वाले लोग भी इसके दुष्प्रभावों का सामना करते हैं। इस दिन विभिन्न देशों में जागरूकता रैलियां, स्वास्थ्य शिविर, संगोष्ठियां और जनजागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

भारतीय और विश्व इतिहास में 31 मई

इतिहास के पन्नों में 31 मई कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है।

वर्ष 1859 में लंदन की प्रसिद्ध घड़ी Big Ben पहली बार चलनी शुरू हुई।

वर्ष 1921 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई राष्ट्रीय गतिविधियों को नई दिशा मिली।

वर्ष 1961 में दक्षिण अफ्रीका आधिकारिक रूप से Republic of South Africa बना।

वर्ष 1970 में पेरू में आए विनाशकारी भूकंप ने हजारों लोगों की जान ले ली थी।

वर्ष 2005 में पत्रकारिता और मीडिया जगत से जुड़े कई महत्वपूर्ण बदलावों का दौर शुरू हुआ, जिसने डिजिटल मीडिया के विस्तार को नई गति दी।

31 मई को जन्मे प्रसिद्ध व्यक्तित्व

इस दिन कई प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का जन्म हुआ जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।

Walt Whitman (1819) – अमेरिका के महान कवि और साहित्यकार।

Clint Eastwood (1930) – विश्व प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक और निर्माता।

Brooke Shields (1965) – प्रसिद्ध अभिनेत्री और मॉडल।

इन व्यक्तित्वों की उपलब्धियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं।

31 मई को हुए महत्वपूर्ण निधन

इतिहास में यह दिन कुछ महान हस्तियों की पुण्यतिथि के रूप में भी याद किया जाता है। उनके कार्य और योगदान समाज के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।

मई माह का समापन

31 मई वर्ष के पाँचवें महीने का अंतिम दिन होता है। यह समय विद्यार्थियों, कर्मचारियों, व्यवसायियों और किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। भारत के अधिकांश हिस्सों में इस समय गर्मी अपने चरम पर होती है और लोग मानसून के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। किसान आगामी खरीफ फसलों की तैयारी शुरू कर देते हैं।

सामाजिक संदेश


31 मई हमें स्वास्थ्य, अनुशासन और जागरूकता का संदेश देता है। विशेष रूप से विश्व तंबाकू निषेध दिवस लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि स्वस्थ जीवन ही सबसे बड़ी संपत्ति है। तंबाकू से दूरी बनाकर न केवल व्यक्ति स्वयं स्वस्थ रह सकता है, बल्कि अपने परिवार और समाज को भी सुरक्षित रख सकता है।

निष्कर्ष

31 मई अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन विश्व तंबाकू निषेध दिवस के माध्यम से स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश देता है, वहीं इतिहास की अनेक घटनाओं और महान व्यक्तित्वों की याद भी दिलाता है। मई माह के अंतिम दिन के रूप में यह आत्ममंथन, नई योजनाओं और सकारात्मक बदलाव का अवसर प्रदान करता है। इसलिए 31 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, इतिहास, प्रेरणा और जागरूकता का प्रतीक है।

आलोक कुमार

Bihar : नकटा दियारा की जनता की मांग को अनसुना न करें केंद्र सरकार

 नकटा दियारा की जनता की मांग को अनसुना न करें केंद्र सरकार

पटना संसदीय क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री Ravi Shankar Prasad ने एक बार फिर गंगा नदी पर निर्माणाधीन छह लेन सड़क पुल परियोजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष उठाया है। उन्होंने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री Nitin Gadkari को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि जे.पी. सेतु के समानांतर बन रहे राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 139W के पुल पर पिलर संख्या 16 से 26 के बीच नकटा दियारा क्षेत्र के लिए एक अप्रोच अथवा रैंप रोड का निर्माण कराया जाए।

यह मांग केवल एक सड़क निर्माण की मांग नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के जीवन को आसान बनाने का प्रश्न है। सांसद रविशंकर प्रसाद ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि दीघा-सोनपुर के बीच निर्माणाधीन छह लेन पुल का एक हिस्सा ग्राम नकटा दियारा एवं छितरचक क्षेत्र से होकर गुजरता है। यहां के ग्रामीण लंबे समय से चाहते हैं कि पुल से सीधे दियारा क्षेत्र को जोड़ने के लिए एक रैंप रोड बनाई जाए, जिससे वे मुख्य सड़क नेटवर्क से सीधे जुड़ सकें।

दियारा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या उसका भौगोलिक स्वरूप है। गंगा और अन्य नदियों से घिरे इन इलाकों में वर्षा ऋतु और बाढ़ के दौरान आवागमन लगभग ठप हो जाता है। कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय, अनुमंडल मुख्यालय तथा प्रखंड मुख्यालय से कट जाता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई होती है, विद्यार्थियों
की पढ़ाई प्रभावित होती है तथा प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच बाधित हो जाती है। ऐसे में यदि निर्माणाधीन पुल से सीधे एक अप्रोच रोड उतार दी जाए तो यह क्षेत्र पूरे वर्ष राजधानी पटना और अन्य महत्वपूर्ण केंद्रों से जुड़ा रहेगा।

सांसद रविशंकर प्रसाद ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि इस मांग को पहले भी केंद्र सरकार के समक्ष उठाया गया था। उन्होंने अपने पूर्व पत्र का संदर्भ देते हुए बताया कि तत्कालीन बिहार सरकार के पथ निर्माण मंत्री Nitin Nabin ने भी 14 मई 2025 को इस मांग का समर्थन किया था। इतना ही नहीं, इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुई बैठक में भी चर्चा हुई थी। बाद में नकटा दियारा को किसी अन्य प्रस्तावित मार्ग से जोड़ने का विकल्प सामने आया, किंतु स्थानीय जनता इसे व्यावहारिक समाधान नहीं मानती।

स्थानीय लोगों का कहना है कि शेरपुर के निकट प्रस्तावित वैकल्पिक संपर्क मार्ग नकटा दियारा के निवासियों के लिए सुविधाजनक नहीं होगा। नकटा दियारा से उस प्रस्तावित संपर्क मार्ग तक आने-जाने में लगभग 50 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी। ग्रामीणों के अनुसार यह न केवल समय और धन की बर्बादी होगी, बल्कि बाढ़ के समय स्थिति और भी विकट हो जाएगी। गंगा नदी के फैलाव के कारण लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

नकटा दियारा कोई साधारण गांव नहीं है। यह एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक क्षेत्र है, जिसके संपर्क में लगभग दस पंचायतें आती हैं। अनुमानतः दो से तीन लाख लोगों की आबादी इस प्रस्तावित रैंप रोड से सीधे लाभान्वित होगी। यदि यहां अप्रोच रोड का निर्माण होता है तो कृषि, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। दियारा क्षेत्र के किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी तथा युवाओं को रोजगार और शिक्षा के बेहतर अवसर प्राप्त होंगे।

इस मांग को केवल सांसद रविशंकर प्रसाद ने ही नहीं उठाया है। पूर्णिया (बिहार) के वर्तमान सांसद राजेश रंजन (पप्पू यादव) हैं।सांसद Pappu Yadav ने भी जनभावनाओं का सम्मान करते हुए अप्रोच रोड निर्माण का समर्थन किया है। वहीं बिहार सरकार के सहकारिता मंत्री Ram Kripal Yadav भी इस मांग के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। जब विभिन्न राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की राय एक समान हो तथा जनता की मांग भी स्पष्ट हो, तब सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

विकास का वास्तविक अर्थ केवल बड़े-बड़े पुल और राजमार्ग बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उन परियोजनाओं का लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचे। यदि करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाला पुल दियारा क्षेत्र के लोगों को प्रत्यक्ष लाभ नहीं दे पाता, तो विकास का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। एक रैंप रोड का निर्माण अपेक्षाकृत कम लागत में लाखों लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी देश में आधुनिक सड़क अवसंरचना के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। उनके नेतृत्व में अनेक महत्वाकांक्षी परियोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी हुई हैं। ऐसे में नकटा दियारा की इस जनहितकारी मांग पर सकारात्मक निर्णय लेना न केवल स्थानीय जनता के हित में होगा, बल्कि यह सरकार की जनसंवेदनशीलता का भी परिचायक बनेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और संबंधित विभाग मिलकर नकटा दियारा क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन करें। यदि तकनीकी दृष्टि से संभव हो, तो पिलर संख्या 16 से 26 के बीच एक उपयुक्त अप्रोच अथवा रैंप रोड का निर्माण कराया जाए। इससे लाखों लोगों की वर्षों पुरानी मांग पूरी होगी और दियारा क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से स्थायी रूप से जुड़ सकेगा। जनता की अपेक्षा भी यही है कि उनकी आवाज को सुना जाए और विकास का लाभ उनके दरवाजे तक पहुंचाया जाए।

आलोक कुमार


World :"पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया "

 विश्व शांति के लिए रोजरी माला विनती : सन्त पापा लियो 14वें की विशेष पहल

कैथोलिक कलीसिया में मई का महीना माता मरियम को समर्पित माना जाता है। इस पूरे महीने में विश्व भर के श्रद्धालु माता मरियम के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हुए रोजरी माला का पाठ करते हैं। इस वर्ष मई माह के समापन पर सन्त पापा लियो 14वें ने विश्व शांति के लिए एक विशेष पहल की है। उन्होंने युद्धों, हिंसा और संघर्षों से पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया है तथा स्वयं 30 मई को वाटिकन गार्डन्स में पवित्र रोजरी माला विनती की अध्यक्षता करने का निर्णय लिया है।

सन्त पापा लियो 14वें अपने परमाध्यक्षीय कार्यकाल के आरम्भ से ही विश्व में शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर युद्धरत देशों और संघर्षों से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए प्रार्थना की अपील की है। उनका मानना है कि प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव हृदय को बदलने और शांति का मार्ग प्रशस्त करने का एक प्रभावशाली साधन है। इसी सोच के साथ वे मई माह के अंतिम दिनों में विश्व के सभी लोगों को एकजुट होकर शांति के लिए प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। 

30 मई की शाम रोम समयानुसार 7 बजे, वाटिकन गार्डन्स में स्थित लूर्द की रानी माता मरियम को समर्पित गुफा के सामने यह विशेष रोजरी माला विनती आयोजित की जाएगी। इस प्रार्थना में सन्त पापा स्वयं नेतृत्व करेंगे और विश्व भर के श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से इसमें सहभागी बनने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन केवल वाटिकन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल भी इसमें सहभागी होंगे।

विशेष बात यह है कि इस रोजरी विनती के प्रत्येक भेद को युद्ध और हिंसा से प्रभावित लोगों के लिए समर्पित किया जाएगा। सामान्यतः रोजरी माला के भेद प्रभु यीशु और माता मरियम के जीवन की विभिन्न घटनाओं पर आधारित होते हैं, किन्तु इस अवसर पर प्रत्येक भेद के साथ युद्ध पीड़ित परिवारों, विस्थापित लोगों, घायल नागरिकों, चिकित्सकों, राहत कर्मियों और स्वयंसेवकों के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाएंगी। इस प्रकार यह परंपरागत रोजरी पाठ के साथ-साथ समकालीन मानवीय पीड़ा को भी अपने भीतर समाहित करेगा।

कलीसिया में ऐसी परंपरा पहले भी देखी गई है। विशेषकर लेंट काल के दौरान कई चर्चों में पारंपरिक प्रार्थनाओं के साथ वर्तमान समाज के दुख-दर्द और चुनौतियों को जोड़कर विशेष पाठ किए जाते हैं। जिस प्रकार क्रूस मार्ग की चौदह मंजिलों के चिंतन में मानव जीवन की कठिनाइयों को शामिल किया जाता है, उसी प्रकार इस रोजरी विनती में भी विश्व की पीड़ाओं को ईश्वर और माता मरियम के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

इस आयोजन में विश्व के अनेक प्रसिद्ध मरियम तीर्थस्थलों और धार्मिक केंद्रों को भी आमंत्रित किया गया है। जिन प्रमुख तीर्थस्थलों ने अपनी सहभागिता की पुष्टि की है, उनमें यूक्रेन का मरियम तीर्थस्थल, फिलीपींस में शांति की रानी माता मरियम का अंतरराष्ट्रीय तीर्थ, पुर्तगाल का प्रसिद्ध फातिमा तीर्थस्थल, बोस्निया और हर्जेगोविना का मेज्जुगोर्ये तीर्थ, फ्रांस का लूर्द तीर्थस्थल, लेबनान का संत चारबेल अन्नाया तीर्थ और इटली का लॉरेटो स्थित परमधर्मपीठीय हाउस ऑफ लॉरेटो शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर श्रद्धालु उसी समय प्रार्थना में सहभागी होंगे और इस प्रकार विश्वभर के लाखों लोग एक आध्यात्मिक सूत्र में बंध जाएंगे।

आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, आतंकवाद, राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक अस्थिरता बनी हुई है, तब यह पहल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। युद्ध केवल सैनिकों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि असंख्य परिवारों को बिखेर देता है। बच्चे अनाथ हो जाते हैं, माता-पिता अपने प्रियजनों को खो देते हैं और लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हो जाते हैं। अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात घायलों की सेवा करते हैं, जबकि राहतकर्मी और स्वयंसेवक कठिन परिस्थितियों में मानवता की सेवा में लगे रहते हैं। सन्त पापा लियो 14वें ने विशेष रूप से इन सभी लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करने का निर्णय लिया है।

रोजरी माला विनती में सुख के पाँच भेदों का पाठ किया जाएगा। प्रत्येक भेद के माध्यम से विश्व के विभिन्न संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए ईश्वर से शांति, न्याय और मेल-मिलाप की याचना की जाएगी। साथ ही माता मरियम, जिन्हें “शांति की रानी” कहा जाता है, के संरक्षण और मध्यस्थता की प्रार्थना की जाएगी। विश्वासियों का मानना है कि माता मरियम की मध्यस्थता मानवता को ईश्वर के और निकट लाती है तथा कठिन समय में आशा प्रदान करती है।

रोम में उपस्थित तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। वे सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में स्थापित विशाल स्क्रीन के माध्यम से इस प्रार्थना में सहभागी बन सकेंगे। इससे हजारों लोग एक साथ इस आध्यात्मिक आयोजन का हिस्सा बनेंगे और विश्व शांति के लिए अपनी प्रार्थनाएं अर्पित करेंगे।

यह कार्यक्रम सुसमाचार प्रचार संबंधी परमधर्मपीठीय परिषद के तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल एक धार्मिक समारोह आयोजित करना नहीं, बल्कि विश्व भर के लोगों को शांति, करुणा और भाईचारे के संदेश से जोड़ना है। आज की विभाजित दुनिया में यह पहल हमें याद दिलाती है कि प्रार्थना और एकता के माध्यम से मानवता बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकती है।

सन्त पापा लियो 14वें की यह पहल इस बात का प्रतीक है कि शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि मानव हृदयों के परिवर्तन से भी आती है। जब लाखों लोग एक साथ शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, तब आशा की एक नई किरण जन्म लेती है। यही संदेश इस विशेष रोजरी माला विनती का भी है—विश्व में शांति स्थापित हो, युद्ध समाप्त हों और समस्त मानवता प्रेम, न्याय तथा भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़े।


आलोक कुमार


Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...