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बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

India : दिनकर की पंक्तियों से सियासत पर तीखा सवाल

 


कलम या तलवार की तर्ज पर कांग्रेस के सामने सवाल—EVM या बैलेट पेपर?

दिनकर की पंक्तियों से सियासत पर तीखा सवाल

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—

“दो में से क्या तुम्हें चाहिए, कलम या कि तलवार?
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति, विजय अपार।”

दिनकर की इन पंक्तियों की तर्ज पर आज भारतीय राजनीति में कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सामने भी एक सवाल खड़ा है—EVM या बैलेट पेपर? यह सवाल केवल मतदान की तकनीक का नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, राजनीतिक जवाबदेही और लोकतंत्र में जनता के विश्वास का भी है।

28 अक्टूबर 2026 को चार राज्यों की विधान परिषद की सीटों के चुनाव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए मतदान बैलेट पेपर से हुआ, तो कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं? मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस ने जिन 12 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें उसे सफलता नहीं मिली। <Cite refs={["turn756370search0","turn756370search1"]}/>

इस नतीजे ने EVM और बैलेट पेपर को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।

1. बैलेट पेपर के नतीजों से कांग्रेस के सामने क्या सवाल उठे?

कांग्रेस और विपक्ष के कुछ नेता इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता तथा चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। विपक्षी दलों की मांगों में बैलेट पेपर से चुनाव कराने और चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।

ऐसे माहौल में बैलेट पेपर से हुए चुनावों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिलने का मुद्दा भाजपा के लिए राजनीतिक जवाब देने का अवसर बना। प्रधानमंत्री की टिप्पणी का मूल संदेश यही था कि यदि चुनावी हार का कारण EVM को बताया जाता है, तो बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों पर भी आत्ममंथन होना चाहिए। <Cite refs={["turn756370search2","turn756370search7"]}/>

लेकिन इस सवाल का जवाब केवल एक चुनाव के नतीजों से नहीं दिया जा सकता। किसी पार्टी का चुनाव जीतना या हारना कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे, संगठन की ताकत, मतदाताओं की प्राथमिकताएँ और चुनावी गठबंधन जैसे कारक भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए कांग्रेस के लिए यह नतीजा राजनीतिक समीक्षा का अवसर हो सकता है, लेकिन इसे चुनाव प्रणाली पर उठने वाले हर सवाल का अंतिम फैसला मानना उचित नहीं होगा।

2. क्या विधान परिषद के चुनाव आम चुनावों जैसे होते हैं?

इस बहस में एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। चार राज्यों में चर्चा में आए चुनाव मुख्य रूप से शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की विधान परिषद सीटों से संबंधित थे। इन क्षेत्रों में सामान्य विधानसभा चुनावों की तरह सभी पंजीकृत मतदाता मतदान नहीं करते। मतदान का अधिकार संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले और मतदाता सूची में दर्ज शिक्षकों तथा स्नातकों को मिलता है। <Cite refs={["turn756370search10","turn756370search13"]}/>

इन चुनावों में बैलेट पेपर और प्राथमिकता आधारित मतदान प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। यह प्रक्रिया सामान्य लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रचलित EVM मतदान से अलग है।

इस अंतर को समझे बिना दोनों चुनावों की सीधी तुलना करना भ्रामक हो सकता है। विधान परिषद के चुनावों में मतदाताओं का समूह सीमित और अलग होता है। इसलिए वहाँ किसी पार्टी के प्रदर्शन से देशभर के मतदाताओं की पसंद या सभी चुनावों की निष्पक्षता के बारे में स्वतः निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

3. क्या बैलेट पेपर से हारने पर EVM पर सवाल खत्म हो जाते हैं?

इसका सीधा जवाब है—नहीं। बैलेट पेपर से हुए चुनाव में हारना अपने आप यह साबित नहीं करता कि EVM से जुड़े सभी सवाल निराधार हैं। इसी तरह EVM पर आरोप लगाना भी अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है।

चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता का मूल्यांकन उपलब्ध प्रमाणों, निर्धारित नियमों, निगरानी व्यवस्था और शिकायतों की निष्पक्ष जाँच के आधार पर होना चाहिए।

यदि किसी दल को मतदान या मतगणना में गड़बड़ी का संदेह है, तो उसे विशिष्ट तथ्य और प्रमाण सामने रखने चाहिए। संबंधित चुनावी नियमों के अंतर्गत शिकायत या कानूनी चुनौती का रास्ता अपनाया जा सकता है। दूसरी ओर, चुनाव कराने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे नियमों का पालन सुनिश्चित करें और उचित सवालों का पारदर्शी तरीके से जवाब दें।

लोकतंत्र में विश्वास केवल राजनीतिक दावों से नहीं बनता। इसके लिए ऐसी प्रक्रिया जरूरी है, जिसकी निष्पक्षता की जाँच की जा सके और जिसमें शिकायतों का उचित समाधान हो।

4. कांग्रेस और महागठबंधन के सामने आत्ममंथन की चुनौती

बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों के परिणाम कांग्रेस के लिए संगठनात्मक समीक्षा का विषय हैं। पार्टी को यह देखना चाहिए कि उसके उम्मीदवारों का स्थानीय जनाधार कैसा था, चुनावी रणनीति कितनी प्रभावी रही और संबंधित मतदाताओं तक उसकी पहुँच कितनी मजबूत थी।

बिहार जैसे राज्य में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजों का विश्लेषण करते समय स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों की पहचान और प्रतिद्वंद्वी दलों की स्थिति को भी समझना जरूरी है। केवल EVM विरोध या बैलेट पेपर की मांग से चुनावी समर्थन सुनिश्चित नहीं होता।

यदि कांग्रेस चुनाव सुधार की मांग करती है, तो उसे अपनी मांग के पक्ष में स्पष्ट तर्क, प्रमाण और व्यावहारिक प्रस्ताव भी रखने चाहिए। साथ ही, जहाँ पार्टी को हार मिली है, वहाँ संगठनात्मक कमियों की समीक्षा से बचना नहीं चाहिए।

5. भाजपा के तर्क की भी निष्पक्ष जाँच जरूरी

प्रधानमंत्री के बयान ने कांग्रेस को राजनीतिक जवाबदेही के सवाल पर घेरा है। फिर भी भाजपा की राजनीतिक टिप्पणी और चुनाव प्रणाली के बारे में तथ्यात्मक निष्कर्ष को अलग-अलग समझना चाहिए।

किसी पार्टी की हार से यह सिद्ध नहीं होता कि इस्तेमाल की गई मतदान प्रणाली हर परिस्थिति में त्रुटिरहित है। उसी तरह चुनाव में जीत हासिल करना भी किसी प्रणाली की निष्पक्षता का अकेला प्रमाण नहीं है।

EVM और बैलेट पेपर की तुलना करते समय सुरक्षा, मतगणना, पारदर्शिता, संभावित त्रुटियों, निगरानी और शिकायतों के निपटारे जैसे पहलुओं पर विचार होना चाहिए। बहस का उद्देश्य केवल किसी राजनीतिक दल को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि ऐसी चुनाव व्यवस्था सुनिश्चित करना होना चाहिए जिस पर जनता भरोसा कर सके।

निष्कर्ष: लोकतंत्र में मशीन से बड़ा है जनता का विश्वास

दिनकर की पंक्तियों की तरह आज की राजनीतिक बहस भी विकल्पों और जवाबदेही का सवाल उठाती है। लेकिन EVM बनाम बैलेट पेपर की चर्चा को केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर देना लोकतंत्र के व्यापक हित में नहीं होगा।

कांग्रेस को चुनावी नतीजों से सबक लेते हुए अपने संगठन और रणनीति की समीक्षा करनी चाहिए। भाजपा को भी राजनीतिक तंज और चुनावी निष्पक्षता के प्रमाणों के बीच अंतर बनाए रखना चाहिए। चुनावी संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे पारदर्शिता, नियमों के पालन और शिकायतों के उचित निपटारे के माध्यम से जनता का भरोसा मजबूत करें।

आखिरकार, लोकतंत्र में न कोई मशीन किसी दल की जीत की गारंटी देती है और न बैलेट पेपर हार को जीत में बदलने का माध्यम है। चुनावी सफलता के लिए जनता का समर्थन, प्रभावी संगठन और विश्वसनीय राजनीतिक कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं।

कलम हो या तलवार, EVM हो या बैलेट पेपर—लोकतंत्र की असली ताकत जनता का विश्वास, निष्पक्ष चुनाव और जवाबदेह व्यवस्था है।

लेखक: आलोक कुमार | Chingari Prime News

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