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India : 19 साल बाद भूमिहीन परिवारों की मांग


जनादेश 2007 में एकता परिषद के नेतृत्व में हजारों लोगों ने भूमि और आवास के सवाल को उठाया था। 19 साल बाद भूमिहीन परिवारों की मांग और उसके असर पर नजर।
जनादेश 2007: 25 हजार लोगों की पदयात्रा और 19 साल बाद भी अधूरा जमीन का सपना

1 अक्टूबर 2007। मध्य प्रदेश का ग्वालियर। सड़क पर हजारों लोगों की मौजूदगी थी और एक बड़े जनआंदोलन की अंतिम तैयारियां चल रही थीं। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए सत्याग्रही एक ऐसी पदयात्रा के लिए जुटे थे, जिसका मुद्दा केवल किसी एक गांव या राज्य तक सीमित नहीं था। सवाल था—जिस गरीब परिवार के पास रहने के लिए जमीन नहीं है और जिस खेतिहर परिवार के पास खेती करने के लिए भूमि नहीं है, उसके जीवन की सुरक्षा कैसे होगी?

जन संगठन एकता परिषद के आह्वान पर आयोजित जनादेश 2007 इसी सवाल को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने वाला एक बड़ा जनआंदोलन था। आंदोलन का नेतृत्व एकता परिषद के संस्थापक पीवी राजगोपाल ने किया। करीब 25 हजार लोगों के इस जनसमूह ने ग्वालियर से दिल्ली तक पदयात्रा करने का संकल्प लिया था।

1 अक्टूबर को तैयारियां पूरी हुईं और 2 अक्टूबर से पदयात्रा शुरू हुई। यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी। इसके पीछे भूमि, आवास और आजीविका से जुड़े अधिकारों को लेकर लंबे समय से चल रहे संघर्ष की आवाज थी।

सड़क पर उतर आया भूमिहीनों का सवाल

जनादेश 2007 की प्रमुख मांगों में आवासीय भूमिहीन परिवारों को तीन डिसमिल जमीन और खेतिहर भूमिहीनों को डेढ़ एकड़ जमीन उपलब्ध कराने की मांग शामिल थी।

ग्रामीण गरीब परिवार के लिए जमीन का अर्थ केवल संपत्ति नहीं है। जमीन होने का मतलब घर बनाने के लिए एक स्थायी स्थान, खेती के लिए आधार और भविष्य के लिए कुछ सुरक्षा भी हो सकता है।

जिस परिवार के पास अपना घर बनाने की जमीन नहीं होती, उसके सामने हमेशा अस्थिरता बनी रहती है। वहीं खेती योग्य जमीन से वंचित परिवार की आजीविका मजदूरी या दूसरे अस्थायी साधनों पर निर्भर हो सकती है।

इसीलिए जनादेश 2007 में जमीन का सवाल हजारों लोगों को एक साथ सड़क पर लाने में सफल हुआ।

आलोक कुमार भी बने थे पदयात्रा का हिस्सा

इस आंदोलन की खास बात यह भी रही कि इसमें आलोक कुमार स्वयं शामिल थे। उस समय इस पदयात्रा को केवल दूर से देखने के बजाय सत्याग्रहियों के साथ चलने और उनके बीच रहने का अवसर मिला।

हजारों लोगों के साथ सड़क पर चलना अपने आप में एक अलग अनुभव था। आंदोलन में शामिल लोगों की जिंदगी को करीब से देखने पर यह समझने का अवसर मिला कि भूमि और आवास का सवाल केवल सरकारी नीति का विषय नहीं है। यह उन परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा प्रश्न है, जिनके पास स्थायी संसाधन सीमित हैं।

पदयात्रा के दौरान जीवन की परिस्थितियां भी सामान्य नहीं थीं। सोना, नहाना, खाना-पीना और आगे बढ़ना—बहुत कुछ सड़क पर ही होता था। हजारों लोग एक साथ चलते, रुकते और फिर अगले पड़ाव की ओर बढ़ते थे।

यह अनुभव बताता था कि आंदोलन में शामिल लोगों के लिए यह कोई एक-दो दिन का कार्यक्रम नहीं था। वे अपनी मांग को लेकर लंबी दूरी तय करने और कठिन परिस्थितियों में रहने के लिए तैयार थे।

चंबल की धरती की एक यादगार स्मृति

जनादेश 2007 की यात्रा से जुड़ी एक और स्मृति चंबल क्षेत्र से जुड़ी है। यात्रा के दौरान चंबल गांधी के नाम से चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता की पहल और उस दौर के चंबल के दस्युओं के आत्मसमर्पण से जुड़े प्रसंगों के संदर्भ में बातचीत और साक्षात्कार का अवसर मिला।

चंबल का सामाजिक इतिहास संघर्ष, हिंसा, आत्मसमर्पण और सामाजिक परिवर्तन की कई कहानियों से जुड़ा रहा है। ऐसे क्षेत्र में जनआंदोलन की यात्रा को करीब से देखना और वहां के सामाजिक अनुभवों को समझना इस पदयात्रा की स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

यह अनुभव यह भी दिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन की कहानियां केवल बड़े शहरों या सरकारी संस्थानों में नहीं लिखी जातीं। गांवों, जंगलों, खेतों और सड़कों पर भी ऐसे संघर्ष चलते रहे हैं, जिनका असर लंबे समय तक समाज और नीति की बहस पर दिखाई देता है।

19 साल बाद वही सवाल क्यों?

अब 2007 से 2026 तक 19 वर्ष का समय बीत चुका है। पीछे मुड़कर देखने पर स्वाभाविक सवाल उठता है—जनादेश 2007 में उठाए गए भूमि और आवास के सवालों की स्थिति आज क्या है?

सरकारों ने समय-समय पर गरीबों के आवास, भूमि और ग्रामीण आजीविका से संबंधित अलग-अलग योजनाएं और कार्यक्रम चलाए हैं। लेकिन देश के कई हिस्सों में भूमिहीनता और आवासीय भूमि की समस्या अभी भी स्थानीय स्तर पर दिखाई देती है।

इसलिए जनादेश 2007 की मांगों को केवल इतिहास की घटना मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। यह देखना जरूरी है कि जिन परिवारों के लिए भूमि अधिकार की मांग उठाई गई थी, उनमें से कितने परिवारों को वास्तव में स्थायी आवासीय भूमि या खेती योग्य जमीन मिली।

जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती

ग्रामीण समाज में जमीन का महत्व आर्थिक सीमा से कहीं आगे जाता है। जमीन घर और आजीविका के साथ सामाजिक पहचान और सुरक्षा से भी जुड़ी हो सकती है।

किसी भूमिहीन परिवार के लिए तीन डिसमिल आवासीय जमीन की मांग का अर्थ एक स्थायी छत की संभावना से जुड़ सकता है। इसी तरह खेतिहर भूमिहीन के लिए खेती योग्य जमीन की मांग का संबंध रोजगार और आय के स्थायी आधार से हो सकता है।

हालांकि, केवल जमीन का आवंटन भी हर समस्या का समाधान नहीं है। जमीन उपलब्ध होने के बाद उसका कानूनी रिकॉर्ड, कब्जा, पहुंच का रास्ता, सिंचाई, खेती की लागत और अन्य बुनियादी सुविधाएं भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

यानी भूमि अधिकार को केवल कागज पर दर्ज करने के बजाय उसके वास्तविक उपयोग की स्थिति देखना भी जरूरी है।

आंदोलन की सफलता को कैसे देखा जाए?

किसी भी जनआंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसमें कितने लोग शामिल हुए। यह भी देखना जरूरी होता है कि आंदोलन ने जिस समस्या को उठाया, उस पर सार्वजनिक नीति और प्रशासनिक व्यवस्था में क्या बदलाव आया।

जनादेश 2007 ने भूमि और आवास के सवाल को हजारों लोगों की सामूहिक आवाज के माध्यम से सामने रखा। 19 वर्ष बाद इस आंदोलन को याद करने का अर्थ उस समय की भीड़ को याद करना भर नहीं है।

आज का सवाल अधिक व्यावहारिक है—क्या उस आंदोलन में उठाए गए सवालों का समाधान उन परिवारों तक पहुंचा, जिनके लिए यह संघर्ष किया गया था?

यदि कहीं भूमि आवंटित हुई है लेकिन लाभार्थी को कब्जा नहीं मिला, कहीं जमीन है लेकिन आवास नहीं बन सका, या कहीं खेती योग्य भूमि तक पहुंच नहीं है, तो इन स्थितियों की अलग-अलग जांच जरूरी है।

आज भी प्रासंगिक है भूमि और आवास का सवाल

गांवों में गरीबी, बेरोजगारी और पलायन पर चर्चा करते समय भूमि और आवास के प्रश्न को अलग करके नहीं देखा जा सकता। जिस परिवार के पास रहने की स्थायी जगह और आजीविका का मजबूत आधार नहीं है, उसकी आर्थिक असुरक्षा बनी रह सकती है।

इसीलिए आज भी यह जरूरी है कि भूमिहीन परिवारों की वास्तविक संख्या, उपलब्ध सरकारी जमीन, आवासीय भूमि के वितरण और खेती योग्य जमीन से जुड़े मामलों की पारदर्शी जानकारी उपलब्ध हो।

सरकार और प्रशासन के साथ-साथ पंचायत स्तर पर भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि पात्र परिवारों के लिए कौन-सी व्यवस्था उपलब्ध है और उसका लाभ पाने की प्रक्रिया क्या है।

आलोक कुमार के लिए यह सिर्फ एक पुरानी तारीख नहीं

जनादेश 2007 को करीब से देखने और उसमें स्वयं शामिल होने वाले व्यक्ति के लिए 1 और 2 अक्टूबर की तारीखें केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं।

हजारों लोगों के साथ सड़क पर चलना, कठिन परिस्थितियों में रहना, भूमिहीन परिवारों की उम्मीदों को सुनना और चंबल जैसे क्षेत्र में सामाजिक संघर्ष की कहानियों से रूबरू होना उस अनुभव को आज भी जीवित रखता है।

19 वर्ष बाद जब पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही दिखाई देता है कि आंदोलन की आवाज कितनी दूर तक पहुंची और उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा।

निष्कर्ष

जनादेश 2007 ने भूमि और आवास के सवाल को हजारों लोगों की सामूहिक आवाज के रूप में सामने रखा था। ग्वालियर से दिल्ली तक प्रस्तावित और शुरू हुई उस पदयात्रा ने यह संदेश दिया कि भूमिहीन परिवारों के लिए जमीन केवल संपत्ति का विषय नहीं, बल्कि घर, आजीविका और सम्मान से जुड़ा प्रश्न है।

आज 19 साल बाद उस आंदोलन को याद करना तभी सार्थक है, जब हम यह भी पूछें कि आवासीय भूमिहीनों के लिए जमीन और खेतिहर भूमिहीनों के लिए खेती योग्य भूमि की मांग का वास्तविक परिणाम क्या रहा?

किसी आंदोलन की स्मृति केवल इतिहास में दर्ज तस्वीरों और नारों में नहीं रहती। उसकी असली विरासत तब दिखाई देती है, जब जिस समस्या को लेकर लोग सड़क पर उतरे थे, उसमें वास्तविक बदलाव दिखाई दे।

जनादेश 2007 की पदचाप आज भी एक सवाल छोड़ती है—भूमिहीन परिवारों के लिए सम्मानजनक आवास और आजीविका की जमीन का सपना आखिर कब पूरी तरह जमीन पर उतरेगा?


आलोक कुमार

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