Chhattisgarh: प्यास पर पहरा: जब भेदभाव के बीच मानवता बनी उम्मीद की किरण

 प्यास पर पहरा: जब भेदभाव के बीच मानवता बनी उम्मीद की किरण

पानी को जीवन कहा जाता है। यह प्रकृति का ऐसा उपहार है, जिस पर हर व्यक्ति का समान अधिकार माना जाता है। लेकिन जब किसी समुदाय या परिवार को पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता से भी वंचित कर दिया जाए, तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि मानव गरिमा और मूल अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाती है।

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से सामने आई एक घटना ने इसी मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिले के एक क्षेत्र में रहने वाले 14 ईसाई परिवारों के लगभग 70 लोगों को सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्थिति ऐसी बताई गई कि उन्हें सार्वजनिक जल स्रोतों से पानी लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। पीने, भोजन बनाने, स्वच्छता बनाए रखने और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए इसकी जरूरत हर व्यक्ति को होती है। ऐसे में जब किसी परिवार की पानी तक पहुंच बाधित हो जाए, तो उसका असर जीवन के लगभग हर पहलू पर पड़ता है।

इस प्रकार की परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ता है। बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर असर पड़ सकता है, जबकि बुजुर्गों और महिलाओं को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पानी जुटाने की चुनौती केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि यह सामाजिक और मानसिक दबाव भी पैदा करती है।

इसी दौरान एक राहत संगठन को प्रभावित परिवारों की स्थिति की जानकारी मिली। संगठन ने केवल सहानुभूति व्यक्त करने के बजाय समस्या के समाधान की दिशा में कदम उठाने का निर्णय लिया। प्रभावित परिवारों के लिए एक स्वतंत्र जल स्रोत उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई और बोरवेल निर्माण का कार्य शुरू किया गया।

यह पहल केवल पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं थी। इसका उद्देश्य प्रभावित परिवारों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान करना भी था। किसी भी व्यक्ति या समुदाय के लिए अपने संसाधनों तक सुरक्षित और सम्मानजनक पहुंच होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।


परियोजना के दौरान कई चुनौतियां सामने आईं। स्थानीय परिस्थितियों और विभिन्न बाधाओं के बावजूद प्रयास जारी रहे। अंततः बोरवेल निर्माण का कार्य पूरा हुआ और प्रभावित परिवारों को पानी का एक स्थायी स्रोत उपलब्ध हो सका।

यह उपलब्धि केवल एक निर्माण परियोजना की सफलता नहीं थी, बल्कि सहयोग, सेवा और सामुदायिक समर्थन की शक्ति का उदाहरण भी थी। इससे यह संदेश मिलता है कि कठिन परिस्थितियों में भी सामूहिक प्रयास सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।


यह घटना कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाती है। क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक या सामाजिक पहचान उसके मूल अधिकारों तक पहुंच को प्रभावित कर सकती है? क्या पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान जैसे अधिकारों को किसी भी आधार पर सीमित किया जाना चाहिए? लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों का आधार समानता और गरिमा ही है।

कांकेर की यह घटना केवल एक क्षेत्र विशेष की कहानी नहीं है। यह उस व्यापक चुनौती की ओर संकेत करती है, जहां समाज को समानता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही यह भी दिखाती है कि जब संवेदनशील लोग और संगठन आगे आते हैं, तो कठिन परिस्थितियों में भी समाधान का रास्ता निकाला जा सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास केवल भौतिक संसाधनों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक सम्मान, अधिकार और अवसर के रूप में पहुंचे। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इसी बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

अंततः यह कहानी हमें याद दिलाती है कि भेदभाव और कठिनाइयों के बीच भी मानवता, सहयोग और सेवा की भावना परिवर्तन का माध्यम बन सकती है। जब समाज मिलकर समस्याओं का समाधान खोजता है, तब उम्मीद की नई राहें खुलती हैं और जीवन आगे बढ़ता है।

आलोक कुमार

World : जापान में भारतीय आमों की एंट्री क्यों है मुश्किल?

जापान में भारतीय आमों की एंट्री क्यों है मुश्किल? जानिए सख्त नियमों की पूरी कहानी

भारत को आमों का देश कहा जाता है। यहां उगने वाले अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा, चौसा और केसर जैसे आम दुनिया भर में अपनी मिठास और स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं। इसके बावजूद दुनिया के कुछ बड़े बाजारों में भारतीय आमों को प्रवेश पाने के लिए कड़े मानकों से गुजरना पड़ता है। जापान भी ऐसे ही देशों में शामिल है।

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या जापान ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि जापान ने भारतीय आमों पर कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं लगाया है। हालांकि, कुछ अवसरों पर नियमों के उल्लंघन, निरीक्षण संबंधी कमियों या सुरक्षा मानकों पर खरा न उतरने वाली खेपों को अस्थायी रूप से रोका गया है।

जापान का कृषि और खाद्य सुरक्षा तंत्र दुनिया के सबसे सख्त तंत्रों में माना जाता है। वहां आयात होने वाले फलों, सब्जियों और खाद्य पदार्थों की अत्यंत सावधानी से जांच की जाती है। जापानी अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि आयातित उत्पादों में किसी प्रकार के हानिकारक कीट, रोग या निर्धारित सीमा से अधिक रासायनिक अवशेष मौजूद न हों।                                                                                           

भारतीय आमों के मामले में सबसे बड़ी चिंता फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई) और अन्य कृषि कीटों को लेकर रही है। यदि किसी खेप में ऐसे कीट या उनके अंश पाए जाते हैं, तो जापानी अधिकारी उसे अस्वीकार कर सकते हैं। यही कारण है कि निर्यात से पहले आमों का विशेष उपचार और वैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है।

जापान केवल फलों की गुणवत्ता ही नहीं देखता, बल्कि उनकी पूरी यात्रा का रिकॉर्ड भी चाहता है। इसे ट्रेसबिलिटी कहा जाता है। इसके तहत यह जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए कि आम किस बाग से आया, उसकी देखभाल कैसे हुई, उसका उपचार कब किया गया और पैकिंग की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी की गई। दस्तावेजी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कमी निर्यात को प्रभावित कर सकती है।

भारत और जापान के बीच कृषि व्यापार को लेकर लगातार सहयोग और संवाद होता रहा है। भारतीय एजेंसियों ने निर्यात मानकों को बेहतर बनाने, निरीक्षण व्यवस्था को मजबूत करने और पैकिंग प्रक्रियाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय आमों की कई खेपें सफलतापूर्वक जापानी बाजार तक पहुंची हैं।

यह कहना सही नहीं होगा कि जापान भारतीय आम नहीं खरीदना चाहता। वास्तव में जापानी उपभोक्ता भारतीय आमों के स्वाद और गुणवत्ता को पसंद करते हैं। लेकिन जापान केवल उन्हीं उत्पादों को स्वीकार करता है जो उसके सख्त स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों को पूरा करते हैं।

इस पूरे मामले से एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है। आज के वैश्विक बाजार में केवल अच्छा उत्पादन ही पर्याप्त नहीं है। गुणवत्ता नियंत्रण, वैज्ञानिक परीक्षण, पारदर्शिता, ट्रेसबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सफलता के लिए उत्पाद की गुणवत्ता के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण होती है।

भारतीय आमों की मिठास और लोकप्रियता पर दुनिया को कोई संदेह नहीं है। यदि किसान, निर्यातक और सरकारी एजेंसियां मिलकर अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करती रहें, तो जापान ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बाजारों में भी भारतीय आमों की मांग लगातार बढ़ सकती है।


आलोक कुमार

India : नेताओं की गलती ‘मानवीय भूल’ और कर्मचारियों की गलती ‘लापरवाही’ क्यों

 लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि सभी नागरिक कानून और व्यवस्था की दृष्टि में समान हैं

लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि सभी नागरिक कानून और व्यवस्था की दृष्टि में समान हैं। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या गलतियों का मूल्यांकन भी सभी के लिए समान मानकों पर किया जाता है? विशेष रूप से तब, जब किसी नेता और किसी सामान्य कर्मचारी की गलती पर समाज तथा व्यवस्था की प्रतिक्रिया अलग-अलग दिखाई देती है।

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के एक सार्वजनिक बयान को लेकर चर्चा हुई। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने उत्तराखंड राज्य के गठन का उल्लेख करते हुए कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में वर्ष 2022 में उत्तराखंड का निर्माण हुआ। यह बयान सामने आते ही चर्चा शुरू हो गई, क्योंकि ऐतिहासिक तथ्य इससे भिन्न हैं।

वास्तविकता यह है कि उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार थी। वहीं राजनाथ सिंह उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। यह भी सर्वविदित है कि अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को हो चुका था। ऐसे में वर्ष 2022 में उनके प्रधानमंत्री होने का प्रश्न ही नहीं उठता। दूसरी ओर, वर्ष 2014 से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और वर्तमान में अपने तीसरे कार्यकाल में हैं।

यहां महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि यह गलती जानबूझकर हुई या अनजाने में। अधिकांश लोगों का मानना है कि यह एक सामान्य मानवीय भूल थी। सार्वजनिक जीवन में लंबे भाषणों, लगातार कार्यक्रमों और अनेक तथ्यों के बीच कभी-कभी तारीखों या वर्षों को लेकर भ्रम हो जाना असामान्य नहीं है। राजनीति, पत्रकारिता, शिक्षा, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं।        

लेकिन असली बहस इस बात को लेकर है कि ऐसी गलतियों के प्रति समाज और व्यवस्था का रवैया अलग-अलग क्यों दिखाई देता है। जब कोई बड़ा नेता या मंत्री तथ्यात्मक गलती करता है, तो अक्सर इसे “जुबान फिसलना” या “मानवीय भूल” कहकर देखा जाता है। कई लोग यह तर्क देते हैं कि बयान का मूल संदेश अधिक महत्वपूर्ण है, न कि तारीख या वर्ष की त्रुटि।

इसके विपरीत यदि किसी सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, क्लर्क या अन्य कर्मी से आधिकारिक दस्तावेज, रिपोर्ट या आदेश में ऐसी ही गलती हो जाए, तो उसे गंभीर लापरवाही माना जा सकता है। कई मामलों में स्पष्टीकरण मांगा जाता है, विभागीय कार्रवाई होती है और कभी-कभी दंडात्मक कदम भी उठाए जाते हैं।

यही स्थिति दोहरे मापदंड की बहस को जन्म देती है। यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि इंसान से गलती हो सकती है, तो यह सिद्धांत केवल नेताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी गलती को गंभीर माना जाता है, तो उसके मूल्यांकन के मानक भी सभी के लिए समान होने चाहिए।

राजनाथ सिंह के मामले में तथ्य स्पष्ट हैं। उत्तराखंड का गठन वर्ष 2000 में हुआ था, न कि 2022 में। इसलिए बयान में तथ्यात्मक त्रुटि थी। हालांकि उपलब्ध संदर्भों को देखते हुए इसे जानबूझकर इतिहास बदलने का प्रयास कहना उचित नहीं होगा। यह एक सामान्य जुबानी चूक अधिक प्रतीत होती है।

फिर भी यह घटना एक व्यापक प्रश्न खड़ा करती है। क्या हमारे यहां गलतियों का मूल्यांकन व्यक्ति के पद और प्रभाव के आधार पर किया जाता है, या समान नियमों और सिद्धांतों के आधार पर? लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जवाबदेही और संवेदनशीलता दोनों का व्यवहार सभी के प्रति समान हो।

गलती चाहे किसी मंत्री से हो, किसी अधिकारी से हो या किसी सामान्य नागरिक से, उसका मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। न किसी को अनावश्यक रूप से महिमामंडित किया जाना चाहिए और न ही छोटी मानवीय भूल को असंगत रूप से बड़ा मुद्दा बनाया जाना चाहिए।

अंततः यह बहस केवल एक बयान तक सीमित नहीं है। यह उस सोच से जुड़ा प्रश्न है जिसमें हम तय करते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समानता का सिद्धांत व्यवहार में कितना लागू होता है। जब तक इस प्रश्न पर ईमानदारी से विचार नहीं किया जाएगा, तब तक ‘मानवीय भूल’ और ‘दंडनीय गलती’ के बीच का अंतर चर्चा का विषय बना रहेगा।

आलोक कुमार

Bihar : जब सत्ता में बैठे लोग शिक्षा की बात करें-----

 गणित की यूनिवर्सिटी, इतिहास की राजनीति और बिहार का शिक्षा संकट: बयान से उठे बड़े सवाल

"जब सत्ता में बैठे लोग शिक्षा की बात करें, तो उम्मीद होती है कि वे भविष्य का रास्ता दिखाएंगे। लेकिन जब शिक्षा पर दिया गया बयान ही बहस और विवाद का विषय बन जाए, तो सवाल सिर्फ बयान का नहीं, बल्कि सोच और तैयारी का भी बन जाता है।"

बिहार की राजनीति में इन दिनों मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के एक बयान को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बिहार में भविष्य में फिजिक्स, मैथमेटिक्स, केमिस्ट्री और आर्किटेक्चर जैसे विषयों के विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएंगे। उनका उद्देश्य शायद बिहार को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने का था, लेकिन बयान के शब्दों ने राजनीतिक विरोधियों को हमला करने का मौका दे दिया।

सोशल मीडिया पर इस बयान के बाद तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने मुख्यमंत्री की अकादमिक समझ पर सवाल उठाए, जबकि विपक्ष ने इसे बिहार के नेतृत्व की "शिक्षा संबंधी जानकारी की कमी" का उदाहरण बताया। कुछ पोस्टों में तो यहां तक लिखा गया कि "बिहार का दुर्भाग्य है कि यहां मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मूर्ख मंत्री शासन कर रहे हैं।"

हालांकि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन किसी भी राजनीतिक बहस को तथ्यों और तर्कों के आधार पर देखना अधिक उचित होता है।

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था कि बिहार ज्ञान की भूमि है, लेकिन यहां गणित का विश्वविद्यालय नहीं है। उन्होंने ओडिशा और अहमदाबाद जैसे स्थानों का उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में भी विशिष्ट विषयों पर आधारित संस्थानों की स्थापना की जाएगी। उनके बयान का मूल उद्देश्य राज्य में उच्च शिक्षा के विस्तार की घोषणा करना था।

लेकिन विपक्षी नेताओं और शिक्षा विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कटाक्ष करते हुए कहा कि दुनिया में कहीं भी "फिजिक्स यूनिवर्सिटी" या "केमिस्ट्री यूनिवर्सिटी" जैसी अवधारणा सामान्य रूप से नहीं होती। विश्वविद्यालयों में इन विषयों के विभाग होते हैं, स्वतंत्र विश्वविद्यालय नहीं। इसी तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकांश विश्वविद्यालय बहुविषयक (Multidisciplinary) होते हैं, जिनमें विज्ञान, कला, वाणिज्य और तकनीकी विषयों के अलग-अलग संकाय संचालित होते हैं।

तेजस्वी यादव और आरजेडी के समर्थकों ने भी इस बयान को मुद्दा बनाया। उनका कहना है कि बिहार की वास्तविक समस्या विश्वविद्यालयों की संख्या नहीं, बल्कि मौजूदा संस्थानों की खराब स्थिति है। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं, परीक्षा सत्र नियमित नहीं हैं और शोध गतिविधियां अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाई हैं।

दरअसल, विवाद का केंद्र यह नहीं है कि बिहार में नए संस्थान बनने चाहिए या नहीं। लगभग हर व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि राज्य को अधिक गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की आवश्यकता है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या विषयों के नाम पर अलग-अलग विश्वविद्यालय स्थापित करने की अवधारणा व्यावहारिक है और क्या सरकार के पास इसके लिए कोई स्पष्ट खाका मौजूद है।

बिहार ऐतिहासिक रूप से शिक्षा का केंद्र रहा है। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने दुनिया भर के विद्यार्थियों को आकर्षित किया था। आज भी राज्य में बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्र हैं, लेकिन उच्च शिक्षा और शोध के बेहतर अवसरों के लिए उन्हें दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद या विदेशों का रुख करना पड़ता है। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल संस्थानों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता और संसाधनों की भी है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। बिहार में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच हर बयान राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है। विपक्ष मुख्यमंत्री के बयान को उनकी योग्यता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है, जबकि सत्तापक्ष इसे विकास के विजन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। सोशल मीडिया ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जहां तथ्य और व्यंग्य अक्सर एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या जनता केवल शब्दों की गलती पर ध्यान दे या फिर उस बड़े उद्देश्य पर भी विचार करे जिसके तहत नए संस्थानों की बात कही गई है। यदि सरकार वास्तव में विज्ञान, गणित, वास्तुकला और शोध के लिए विशेष केंद्र स्थापित करना चाहती है, तो यह स्वागत योग्य पहल हो सकती है। दुनिया के कई देशों में विशिष्ट शोध संस्थान और केंद्र मौजूद हैं जो किसी खास विषय में विशेषज्ञता विकसित करते हैं। हालांकि उन्हें विश्वविद्यालय कहना या न कहना अलग बहस का विषय हो सकता है।

दूसरी ओर, विपक्ष का यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि बिहार को सबसे पहले अपने मौजूदा शिक्षा ढांचे को मजबूत करना चाहिए। अगर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी रहे, शोध के लिए पर्याप्त संसाधन न हों और छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहें, तो नए संस्थानों की घोषणा केवल राजनीतिक नारा बनकर रह सकती है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर बिहार की शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। यह बहस किसी एक नेता या दल तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा यह है कि क्या बिहार आने वाले वर्षों में शिक्षा और शोध के क्षेत्र में फिर से अपनी ऐतिहासिक पहचान हासिल कर पाएगा।

अंततः, किसी भी राजनीतिक बयान का मूल्यांकन केवल उसके शब्दों से नहीं बल्कि उसके पीछे की नीयत और उसके बाद होने वाले कार्यों से किया जाना चाहिए। जनता को भी यह देखना होगा कि विवादों और कटाक्षों के बीच शिक्षा सुधार की वास्तविक दिशा क्या है। क्योंकि बिहार को आज सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग बहसों से अधिक जरूरत बेहतर स्कूलों, मजबूत विश्वविद्यालयों, सक्षम शिक्षकों और शोध आधारित शिक्षा व्यवस्था की है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि बयान में कौन-सा शब्द गलत था; वह यह देखेगा कि शिक्षा के क्षेत्र में वास्तव में कितना परिवर्तन हुआ।

आलोक कुमार

India : राजाजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं

            क्या कोई व्यक्ति बिना सत्ता, बिना पद और बिना किसी राजनीतिक ताकत के लाखों गरीबों, आदिवासियों और भूमिहीनों की आवाज़ बन सकता है? 

क्या कोई व्यक्ति बिना सत्ता, बिना पद और बिना किसी राजनीतिक ताकत के लाखों गरीबों, आदिवासियों और भूमिहीनों की आवाज़ बन सकता है? क्या अहिंसा के रास्ते पर चलकर सरकारों को नीतियां बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है? यदि इसका उत्तर खोजना हो, तो एक नाम सामने आता है— पी. वी. राजगोपाल। जिन्हें देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में लोग सम्मानपूर्वक "राजा जी" कहकर संबोधित करते हैं। राजगोपाल पीवी का पूरा नाम राजगोपाल पुथन वीटिल है।उनका जन्म 6 जून 1948 को हुआ है। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हजारों कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन और शुभचिंतक उन्हें हार्दिक बधाई दे रहे हैं तथा उनके संघर्षपूर्ण जीवन को याद कर रहे हैं।

राजाजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों लोगों की आशा, संघर्ष और अधिकारों की कहानी है, जिनकी आवाज़ लंबे समय तक सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाई। उन्होंने अपने जीवन को गांधीवादी मूल्यों, अहिंसा, सत्याग्रह और मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। यही कारण है कि उनका नाम आज "जल, जंगल, जमीन" के संघर्ष का पर्याय बन चुका है।

एकता परिषद के संस्थापक के रूप में राजगोपाल जी ने देश के आदिवासियों, दलितों, भूमिहीन किसानों और वंचित समुदायों को संगठित किया। उन्होंने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि अधिकार मांगने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से हासिल करने की चीज़ है। उनके नेतृत्व में चले आंदोलनों ने भारत के सामाजिक इतिहास में नई इबारत लिखी।

साल 2007 में शुरू हुआ जनादेश 2007 इसी संघर्ष की एक ऐतिहासिक कड़ी था। ग्वालियर से दिल्ली तक लगभग 350 किलोमीटर की पदयात्रा में 18 राज्यों से आए करीब 25 हजार आदिवासी और भूमिहीन लोग शामिल हुए। यह केवल एक मार्च नहीं था, बल्कि उन लोगों की पुकार थी जो वर्षों से भूमि अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार नीति लागू कराना, भूमि विवादों के त्वरित समाधान की व्यवस्था करना और भूमिहीनों को उनका अधिकार दिलाना था। आंदोलन की ताकत इतनी प्रभावशाली थी कि केंद्र सरकार को राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद के गठन की घोषणा करनी पड़ी और वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का आश्वासन देना पड़ा।

लेकिन जब वादे पूरी तरह जमीन पर नहीं उतरे, तब राजाजी ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक बार फिर अहिंसा के मार्ग को चुना और वर्ष 2012 में जन सत्याग्रह 2012 का नेतृत्व किया। इस बार लगभग 50 हजार लोग न्याय की मांग लेकर दिल्ली की ओर बढ़े। यह दुनिया के सबसे बड़े अहिंसक जन आंदोलनों में से एक माना गया। आंदोलनकारियों के दिल्ली पहुंचने से पहले ही सरकार को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री ने आगरा में प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की और एक ऐतिहासिक 10 सूत्रीय समझौता हुआ। इस समझौते में राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का मसौदा तैयार करने और भूमिहीन परिवारों को आवासीय भूमि उपलब्ध कराने का वादा किया गया।

राजाजी का संघर्ष केवल भूमि अधिकार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यह समझा कि जल, जंगल और जमीन का प्रश्न केवल आजीविका का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, संस्कृति और अस्तित्व से भी जुड़ा हुआ है। इसी सोच के साथ जन आंदोलन 2016 की शुरुआत हुई। इस अभियान ने औद्योगिक परियोजनाओं और तथाकथित विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन के खिलाफ आवाज़ उठाई। साथ ही महिलाओं को भूमि स्वामित्व का अधिकार दिलाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया। इस आंदोलन ने भूमि अधिकारों को जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के वैश्विक विमर्श से जोड़ने का कार्य किया।

राजाजी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने संघर्ष को कभी हिंसा का रूप नहीं लेने दिया। उनके आंदोलनों ने दुनिया को यह संदेश दिया कि गांधीजी के सत्याग्रह की शक्ति आज भी जीवित है। बिना एक पत्थर उठाए, बिना किसी टकराव के, लाखों लोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकते हैं और व्यवस्था को संवेदनशील बना सकते हैं।

उनके साथ वर्षों तक काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं के लिए राजाजी केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, शिक्षक और प्रेरणास्रोत हैं। पिछले 25 वर्षों से उनके साथ जुड़े लोगों का मानना है कि उन्होंने उन्हें केवल आंदोलन करना नहीं सिखाया, बल्कि इंसानियत, करुणा और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीना भी सिखाया।

आज उनके जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए एक कार्यकर्ता की भावनाएं कुछ इस प्रकार हैं— "पिछले 25 वर्षों से मुझे आपके उस प्रेरणादायक सफर का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है जो गांधीवादी मूल्यों, अहिंसा और मानवता की सेवा पर आधारित है। भूमि अधिकारों के आंदोलन के माध्यम से न्याय, समानता और वंचितों के सशक्तिकरण के प्रति आपका समर्पण हम सबके लिए प्रेरणा रहा है। इस विशेष दिन पर मैं आपके उत्तम स्वास्थ्य, शांति और आपके महान मिशन को आगे बढ़ाने की शक्ति की कामना करता हूं। आने वाली पीढ़ियों के लिए आपका जीवन आशा, संघर्ष और एकता की मिसाल बना रहे।"

आज जब पूरा देश विकास, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है, तब राजाजी का जीवन हमें याद दिलाता है कि असली विकास वही है जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज़ सुनी जाए। उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि सम्मान, पहचान और जीवन का आधार होती है।

राजाजी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। उनका जीवन और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को न्याय, अहिंसा और मानवाधिकारों के लिए निरंतर प्रेरित करता रहे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान होगा।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है

                         जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है

बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है। यह केवल जमीन के एक टुकड़े का मामला नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और जीवन के बुनियादी अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। दशकों से हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए अपनी जमीन नहीं है। वे सरकारी जमीन, परती भूमि, सड़क किनारे या दूसरों की जमीन पर अस्थायी आशियाना बनाकर जीवन गुजारने को मजबूर हैं। ऐसे लोगों के अधिकारों की लड़ाई को लेकर जन संगठन एकता परिषद लंबे समय से संघर्ष करता रहा है। जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसी कड़ी में एकता परिषद बिहार के कार्यकर्ताओं ने राज्य के सभी 38 जिलों में आवासीय भूमिहीन परिवारों का सर्वेक्षण कराया। सर्वे के आधार पर हजारों परिवारों की सूची तैयार कर संबंधित प्रखंडों के अंचल कार्यालयों में आवेदन जमा किए गए। संगठन का दावा है कि इन आवेदनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और अधिकांश मामलों में भूमिहीन परिवार आज भी सरकारी सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

हाल के दिनों में इस मुद्दे ने एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा पैदा कर दी है। राज्य के नए भू-सुधार एवं राजस्व मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने पदभार संभालने के बाद भूमिहीनों से जुड़े मामलों की समीक्षा की है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अंचल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में वास्तविक स्थिति का सर्वेक्षण कर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी गलत जानकारी सरकार तक न पहुंचे। साथ ही अंचल अधिकारियों को यह भी स्पष्ट रूप से बताने को कहा गया है कि उनके क्षेत्र में कोई आवासीय भूमिहीन परिवार बचा है या नहीं।

सरकार की दृष्टि से देखें तो यह निर्देश पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास माना जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र में वास्तव में भूमिहीन परिवार हैं तो उनकी पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। वहीं यदि गलत आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं तो इससे नीति निर्माण प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार जमीनी स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत करना चाहती है।

लेकिन एकता परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता विजय गोरैया इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका आरोप है कि यह आदेश आवासीय भूमिहीनों के खिलाफ एक गहरी साजिश का हिस्सा हो सकता है। उनका कहना है कि जब पहले से ही संगठन द्वारा व्यापक सर्वेक्षण कर भूमिहीन परिवारों की सूची प्रशासन को सौंपी जा चुकी है, तब यह कहना कि किसी अंचल में एक भी भूमिहीन नहीं है, वास्तविक स्थिति को छिपाने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने संगठन के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे पहले दिए गए आवेदनों और सर्वेक्षण रिपोर्टों को फिर से अंचल अधिकारियों तथा मंत्री तक पहुंचाएं और अपने क्षेत्रों के भूमिहीन परिवारों की अद्यतन जानकारी लिखित रूप में भेजें।

बिहार में आवासीय भूमिहीनों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण की प्रतीक्षा सूची में लगभग 20 हजार से अधिक ऐसे परिवार चिन्हित किए गए हैं जिनके पास रहने के लिए अपना घर नहीं है। हालांकि सामाजिक संगठनों और गैर-सरकारी सर्वेक्षणों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। कई परिवार ऐसे हैं जो विभिन्न कारणों से सरकारी सूची में शामिल नहीं हो पाते और योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

राज्य सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। मुख्यमंत्री वास स्थल क्रय सहायता योजना उनमें प्रमुख है। इस योजना के तहत भूमिहीन और वास-स्थल विहीन परिवारों को जमीन खरीदने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। पहले यह सहायता राशि 60 हजार रुपये थी, जिसे बढ़ाकर अब एक लाख रुपये प्रति लाभार्थी कर दिया गया है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में सरकारी भूमि उपलब्ध है, वहां राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा भूमि बंदोबस्ती और पर्चा वितरण की प्रक्रिया भी चलाई जाती है।

फिर भी सवाल यह है कि यदि योजनाएं मौजूद हैं तो हजारों परिवार आज भी भूमि और आवास से वंचित क्यों हैं?इसका उत्तर प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, जमीन की उपलब्धता, सर्वेक्षण की खामियों और स्थानीय स्तर पर होने वाली देरी में छिपा हुआ है। कई बार पात्र परिवारों का नाम सूची में नहीं जुड़ पाता, तो कई बार कागजी प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि लोग वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं।

आज जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर वास्तविक समाधान खोजने की है। सरकार, प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी परिवार केवल इसलिए बेघर न रहे क्योंकि उसका नाम किसी सूची में नहीं है या उसका आवेदन किसी कार्यालय की फाइलों में दबा पड़ा है।

भूमिहीनों का सवाल केवल एक सरकारी योजना का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है। यदि बिहार को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो हर परिवार को रहने के लिए सुरक्षित जमीन और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना होगा। यही किसी भी कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी पहचान होती है।

आलोक कुमार

Bihar : मेरा भारत, ग्रीन भारत

 मेरा भारत, ग्रीन भारत : जलवायु संरक्षण के युवा सहभागिता विषय पर संत लौरेंस स्कूल चुहड़ी में भव्य कार्यक्रम आयोजित


बेतिया।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर माय भारत (My Bharat) के तत्वावधान में संत लौरेंस स्कूल, चुहड़ी में "मेरा भारत, ग्रीन भारत : जलवायु संरक्षण हेतु युवा सहभागिता" विषय पर एक व्यापक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं युवाओं के बीच पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता तथा प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि जिला युवा अधिकारी, माय भारत, पश्चिम चम्पारण श्री शशांक मित्तल, यूथ आइकन बिहार श्री आदित्य कुमार मधुकर तथा विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री रोनाल्ड कुँअर सिंह द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इसके पश्चात विद्यालय परिवार की ओर से अतिथियों का बुके एवं अंगवस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया। छात्राओं द्वारा प्रस्तुत स्वागत गान ने कार्यक्रम के वातावरण को और भी गरिमामय बना दिया।

अपने संबोधन में जिला युवा अधिकारी श्री शशांक मित्तल ने पर्यावरण संरक्षण को मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को जीवन का अधिकार प्राप्त है और स्वच्छ, स्वस्थ तथा सुरक्षित पर्यावरण इस अधिकार का अभिन्न अंग है। उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं उपस्थित लोगों को पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई तथा प्रकृति के संरक्षण हेतु सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विद्यालय परिसर में विभिन्न रचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक गतिविधियों का आयोजन किया गया। इनमें शपथ ग्रहण समारोह, चित्रांकन प्रतियोगिता, पेंटिंग प्रतियोगिता, भाषण प्रतियोगिता तथा "एक छात्र – एक पौधा" अभियान प्रमुख रहे। इन कार्यक्रमों में विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जागरूकता एवं प्रतिबद्धता का परिचय दिया। 


मुख्य अतिथि श्री शशांक मित्तल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे, तो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से पौधारोपण को एक अभियान के रूप में अपनाने का आह्वान किया।

विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री रोनाल्ड कुँअर सिंह ने अपने प्रेरणादायक संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण मानव जीवन गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। बढ़ता तापमान, जल संकट तथा पर्यावरणीय असंतुलन आने वाली पीढ़ियों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यदि आज हम प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इसलिए प्रत्येक छात्र-छात्रा को एक पौधा लगाकर उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित करने का संकल्प लेना चाहिए।

कार्यक्रम में उपस्थित यूथ आइकन बिहार श्री आदित्य कुमार मधुकर ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज का युवा केवल अपने करियर तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि युवाओं की ऊर्जा और सकारात्मक सोच बड़े से बड़े परिवर्तन का आधार बन सकती है। उन्होंने विद्यार्थियों से पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण तथा प्लास्टिक मुक्त समाज के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि "पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ" केवल एक नारा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का संकल्प है।

भाषण प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने "मेरा भारत, ग्रीन भारत : जलवायु संरक्षण हेतु युवा सहभागिता" विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा युवाओं की भूमिका पर प्रभावशाली वक्तव्य दिए। वहीं चित्रकला एवं पेंटिंग प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए पर्यावरण संरक्षण, हरित भारत और स्वच्छ पृथ्वी जैसे विषयों पर आकर्षक चित्र एवं पोस्टर तैयार किए।

अतिथियों ने विद्यार्थियों द्वारा तैयार चित्रकला, पोस्टर एवं पेंटिंग प्रदर्शनी का अवलोकन किया और उनकी रचनात्मकता की सराहना की। प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित भी किया गया। पेंटिंग प्रतियोगिता में अर्जुन कुमार, शालू कुमारी, आदेश कुमार, सत्यम कुमार तथा शिवानी कुमारी विजेता घोषित किए गए। वहीं भाषण प्रतियोगिता में शाहिल कुमार, सिद्धार्थ कुमार एवं समीर गुप्ता ने उत्कृष्ट प्रस्तुति देकर पुरस्कार प्राप्त किया। सभी विजेताओं को जिला युवा अधिकारी श्री शशांक मित्तल द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यालय के लगभग सौ विद्यार्थियों के बीच पौधों का वितरण किया गया, ताकि वे अपने घरों एवं आसपास के क्षेत्रों में पौधारोपण कर सकें। इसके बाद सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने संयुक्त रूप से पौधारोपण किया और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

कार्यक्रम का सफल संचालन शिक्षक श्री आकाश सेंसिल ने किया। वहीं सुश्री प्रियंका कुमारी, सुश्री सोनाली राजेश सहित विद्यालय के अन्य शिक्षकों ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रधानाचार्य श्री रोनाल्ड कुँअर सिंह ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया तथा कहा कि पर्यावरण संरक्षण का यह संदेश केवल विद्यालय तक सीमित न रहकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।

विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता, जिम्मेदारी और सक्रिय भागीदारी का प्रेरक अभियान सिद्ध हुआ। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि यदि युवा वर्ग पर्यावरण संरक्षण के लिए संकल्पित हो जाए, तो एक हरित, स्वच्छ और सुरक्षित भारत का सपना अवश्य साकार हो सकता है।

आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...