Bihar : ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

 


ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

हुनर हाथ में है, प्रमाणपत्र जेब में है, फिर भी नौकरी की तलाश खत्म क्यों नहीं होती?

पटना। बिहार सहित देशभर में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों से तकनीकी प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं। किसी के हाथ में इलेक्ट्रिशियन का हुनर है, कोई फिटर है, कोई मशीन चलाना जानता है, तो कोई ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स या कंप्यूटर से जुड़ा प्रशिक्षण लेकर रोजगार की उम्मीद करता है। परिवार भी मानता है कि अब बच्चे के लिए कमाई का रास्ता खुल जाएगा।

लेकिन संस्थान से बाहर निकलते ही कई युवाओं को पता चलता है कि प्रशिक्षण पूरा होना और रोजगार मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।

यही बिहार के तकनीकी शिक्षा क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। अगर कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की जरूरत है और ITI-पॉलिटेक्निक के युवाओं के पास तकनीकी प्रशिक्षण है, तो फिर दोनों के बीच दूरी क्यों बनी हुई है?

असल समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या प्रशिक्षण बाजार और उद्योग की बदलती जरूरत के हिसाब से तैयार किया जा रहा है?

प्रमाणपत्र और नौकरी के बीच की दूरी

किसी युवा के पास ITI या पॉलिटेक्निक का प्रमाणपत्र होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन आज के रोजगार बाजार में सिर्फ प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है।

कंपनी को ऐसा कर्मचारी चाहिए जो मशीन को समझ सके, तकनीकी समस्या पहचान सके, सुरक्षा नियमों का पालन करे, कंप्यूटर आधारित सिस्टम पर काम कर सके और जरूरत पड़ने पर नई तकनीक सीख सके।

यहीं कई युवाओं को कठिनाई आती है।

अगर संस्थान में प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक मशीनों और वास्तविक कार्यस्थल का पर्याप्त अनुभव नहीं मिला, तो नौकरी के इंटरव्यू में प्रमाणपत्र होने के बावजूद व्यावहारिक सवालों का सामना करना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए अब प्रशिक्षण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने छात्र पास हुए।

बड़ा सवाल होना चाहिए—कितने छात्र प्रशिक्षण के बाद काम करने के लिए वास्तव में तैयार हुए?

उद्योग की जरूरत और पाठ्यक्रम में कितना तालमेल?

तकनीक तेजी से बदल रही है। आज उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सोलर तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल कंट्रोल और कंप्यूटर आधारित डिजाइन जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है।

ऐसे में तकनीकी शिक्षा भी लगातार बदलनी चाहिए।

अगर छात्र पुरानी तकनीक सीखकर निकलता है और नौकरी देने वाली कंपनी उससे नई मशीन और आधुनिक सिस्टम पर काम करने की उम्मीद करती है, तो दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से अंतर पैदा होगा।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक के पाठ्यक्रम को समय-समय पर उद्योग की वास्तविक जरूरत के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

बाजार बदल रहा है तो प्रशिक्षण भी बदलना होगा।

स्थानीय उद्योग से मजबूत रिश्ता क्यों जरूरी?

बिहार के लिए एक और बड़ी चुनौती है—तकनीकी संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के बीच कमजोर जुड़ाव।

जिस जिले या इलाके में ऑटोमोबाइल, निर्माण, कृषि उपकरण, इलेक्ट्रिकल, फर्नीचर, मशीनरी, सोलर या दूसरे तकनीकी कारोबार मौजूद हैं, वहां के प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय रोजगार बाजार की जरूरत समझनी चाहिए।

अगर किसी क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय अवसर नहीं हैं, तो उन्हें दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ता है।

यही कारण है कि तकनीकी शिक्षा को केवल संस्थान तक सीमित देखने के बजाय उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना जरूरी है।

बिहार में अगर छोटे उद्योग, MSME, सर्विस सेंटर और तकनीकी व्यवसाय बढ़ते हैं, तो ITI और पॉलिटेक्निक के युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

अप्रेंटिसशिप सिर्फ औपचारिकता न बने

कक्षा में किसी मशीन के बारे में पढ़ना और वास्तविक उद्योग में उसी मशीन पर काम करना एक जैसा अनुभव नहीं है।

यहीं अप्रेंटिसशिप महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर प्रशिक्षण के बाद युवा को कंपनी, वर्कशॉप, उद्योग या तकनीकी सेवा केंद्र में वास्तविक काम सीखने का अवसर मिलता है, तो उसके अंदर आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमता दोनों बढ़ते हैं।

लेकिन अप्रेंटिसशिप को सिर्फ कुछ महीनों का औपचारिक अनुभव बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें छात्र को पता हो कि उसे किस क्षेत्र में प्रशिक्षण मिलेगा, किस प्रकार का काम करना होगा और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद रोजगार की संभावना क्या है।

अच्छी अप्रेंटिसशिप वह है जो युवा को नौकरी के लिए तैयार करे, सिर्फ अनुभव प्रमाणपत्र न दे।

निजी कंपनियों को भी आगे आना होगा

सरकार हर प्रशिक्षित युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। रोजगार का बड़ा हिस्सा निजी उद्योगों, MSME, निर्माण कंपनियों, सर्विस सेंटर और स्थानीय व्यवसायों से आता है।

इसलिए निजी कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।

कंपनियां यह बता सकती हैं कि उन्हें किस प्रकार के कर्मचारियों की जरूरत है। संस्थान उसी अनुसार प्रशिक्षण विकसित कर सकते हैं। कंपनियां छात्रों को इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप दे सकती हैं और योग्य छात्रों की भर्ती भी कर सकती हैं।

इससे प्रशिक्षण → अनुभव → रोजगार की एक सीधी श्रृंखला बन सकती है।

हर छात्र नौकरी करेगा, यह जरूरी नहीं

तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी तलाशना नहीं होना चाहिए।

एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रिशियन अपना सर्विस कारोबार शुरू कर सकता है। ऑटोमोबाइल तकनीशियन वर्कशॉप खोल सकता है। सोलर तकनीक सीखने वाला युवक इंस्टॉलेशन और मरम्मत का काम कर सकता है। वेल्डिंग, मशीन रिपेयरिंग, प्लंबिंग और दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में भी छोटे व्यवसाय की संभावना है।

लेकिन इसके लिए तकनीकी कौशल के साथ व्यवसाय चलाने की जानकारी और शुरुआती पूंजी भी चाहिए।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उद्यमिता, डिजिटल भुगतान, ग्राहक प्रबंधन, हिसाब-किताब और छोटे व्यवसाय की बुनियादी जानकारी भी दी जानी चाहिए।

प्रशिक्षण की गुणवत्ता सबसे बड़ा सवाल

सिर्फ संस्थानों की संख्या बढ़ाने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी।

जरूरी है कि प्रशिक्षण केंद्रों में पर्याप्त प्रशिक्षक, आधुनिक उपकरण, प्रयोगशालाएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण की सुविधा हो।

युवा ने जिस मशीन पर पढ़ाई की है, अगर उसने उसे कभी वास्तविक रूप से चलाया ही नहीं, तो उसके प्रमाणपत्र का रोजगार बाजार में प्रभाव सीमित हो सकता है।

इसीलिए तकनीकी शिक्षा में Theory से ज्यादा Practical और Practical से ज्यादा Industry Exposure पर जोर देना होगा।

सफलता का पैमाना रोजगार होना चाहिए

किसी ITI या पॉलिटेक्निक की सफलता का मूल्यांकन केवल प्रवेश लेने वाले छात्रों और परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या से नहीं होना चाहिए।

यह भी देखा जाना चाहिए—

  • प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को नौकरी मिली?

  • कितनों को अप्रेंटिसशिप मिली?

  • कितनों को स्थानीय रोजगार मिला?

  • कितनों ने अपना व्यवसाय शुरू किया?

  • प्रशिक्षण के बाद उनकी आय में कितना बदलाव आया?

अगर इन आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाए तो छात्रों और अभिभावकों को भी बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

बिहार के लिए चुनौती के साथ अवसर भी

बिहार की बड़ी युवा आबादी को अगर सही तकनीकी प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़ा अनुभव और रोजगार का अवसर मिले तो यही युवा राज्य की आर्थिक ताकत बन सकते हैं।

इसके लिए प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय बाजार से जोड़ना होगा। उद्योगों को प्रशिक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा और युवाओं को सिर्फ प्रमाणपत्र देने के बजाय काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं की बेरोजगारी को केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या मानना सही नहीं होगा। यह शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, रोजगार बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच तालमेल का सवाल है।

युवा के हाथ में प्रमाणपत्र है, लेकिन अगर उस प्रमाणपत्र के साथ काम का अवसर नहीं है तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब समय आ गया है कि तकनीकी शिक्षा की सफलता को प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि रोजगार और आय के वास्तविक परिणाम से मापा जाए।

क्योंकि आखिरकार युवा को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि वह कह सके—“मैंने ITI या पॉलिटेक्निक किया है।”

उसे यह कहने का अवसर चाहिए—

“मेरे पास हुनर है और इसी हुनर से मैं अपने परिवार का भविष्य बना सकता हूं।”

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

 


बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

पटना। बिहार में युवाओं की संख्या राज्य की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन यही युवा वर्ग जब पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में निकलता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है—डिग्री के बाद काम क्या मिलेगा? सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और निजी क्षेत्र में सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि काम करने की वास्तविक क्षमता मांगी जाती है। ऐसे में कौशल विकास योजनाओं की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

बिहार सरकार ने युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए कई स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं। बिहार स्किल डेवलपमेंट मिशन यानी BSDM का उद्देश्य युवाओं को जरूरी कौशल देकर उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है। मिशन के पोर्टल पर प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन और रोजगार के अवसरों को एक साथ जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कौशल प्रशिक्षण सिर्फ प्रमाणपत्र पाने तक सीमित रहना चाहिए, या प्रशिक्षण के बाद युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था की होनी चाहिए?

प्रमाणपत्र से ज्यादा जरूरी है काम का हुनर

आज बिहार के हजारों युवा कंप्यूटर, भाषा, अकाउंटिंग, इलेक्ट्रिकल, तकनीकी और दूसरे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लेते हैं। कुशल युवा कार्यक्रम में भाषा एवं संवाद कौशल, बेसिक कंप्यूटर और सॉफ्ट स्किल जैसे विषय शामिल हैं। BSDM के अनुसार KYP का उद्देश्य युवाओं की employability यानी रोजगार पाने की क्षमता को बढ़ाना है।

लेकिन नौकरी के बाजार में केवल प्रमाणपत्र काफी नहीं होता।

किसी कंपनी को ऐसा युवा चाहिए जो कंप्यूटर पर वास्तविक काम कर सके, ग्राहक से बात कर सके, मशीन चला सके, डेटा संभाल सके, बिक्री कर सके या किसी तकनीकी समस्या का समाधान कर सके। इसलिए प्रशिक्षण का अगला चरण प्रैक्टिकल अनुभव होना चाहिए।

युवा को प्रशिक्षण केंद्र में सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे वास्तविक कार्यस्थल जैसी परिस्थितियों में काम करने का मौका मिलना चाहिए।

बिहार में कौशल विकास की जरूरत इतनी बड़ी क्यों है?

बिहार में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। लेकिन हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है। ऐसे में रोजगार के दूसरे रास्तों को मजबूत करना जरूरी है।

राज्य के योजना विभाग के अनुसार बिहार की बड़ी युवा आबादी के कारण रोजगार योग्य कार्यबल तैयार करना राज्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। कौशल विकास के क्षेत्र में KYP, डोमेन स्किलिंग, PMKVY, DDU-GKY, ITI, RSETI और अप्रेंटिसशिप जैसी विभिन्न पहलें चल रही हैं।

इसका अर्थ साफ है—बिहार में चुनौती सिर्फ युवाओं को प्रशिक्षण देने की नहीं है। चुनौती यह है कि जिस कौशल की ट्रेनिंग दी जा रही है, उस कौशल के लिए रोजगार भी मौजूद हो।

ITI और पॉलिटेक्निक छात्रों के लिए भी बड़ा सवाल

कौशल विकास की चर्चा अक्सर छोटे अवधि के प्रशिक्षण तक सीमित हो जाती है। लेकिन ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं के लिए भी उद्योग से सीधा जुड़ाव जरूरी है।

अगर किसी छात्र ने इलेक्ट्रिशियन, मशीनरी, ऑटोमोबाइल, फिटर, वेल्डिंग या दूसरे तकनीकी ट्रेड में प्रशिक्षण लिया है तो उसे प्रशिक्षण के बाद वास्तविक उद्योग में काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

यहीं पर अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार की नई रोजगार व्यवस्था भी प्रशिक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ने पर जोर दे रही है। बिहार रोजगार सेतु को निबंधन, प्रशिक्षण, प्रमाणन, सत्यापन और नियोजन को जोड़ने वाले एकीकृत मंच के रूप में विकसित किया गया है।

अगर इस व्यवस्था का प्रभाव गांव के युवा तक पहुंचता है तो यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है।

गांव के युवा के लिए प्रशिक्षण केंद्र कितना उपयोगी है?

बिहार में कौशल विकास का सबसे बड़ा परीक्षण गांवों में होना चाहिए।

पटना या बड़े शहर में रहने वाले युवा के पास इंटरनेट, कोचिंग, प्रशिक्षण संस्थान और नौकरी की जानकारी तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच हो सकती है। लेकिन ग्रामीण युवा के लिए समस्या अलग है।

उसे प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचने में किराया लगता है। कई बार परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि प्रशिक्षण के दौरान भी उसे काम करना पड़ता है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों की कमी भी उसके सामने बाधा बन सकती है।

इसलिए कौशल विकास योजना की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने नामांकन कराया।

सवाल होना चाहिए—

कितने युवाओं ने प्रशिक्षण पूरा किया?
कितनों ने प्रमाणपत्र हासिल किया?
कितनों को नौकरी मिली?
कितनों की आय बढ़ी?
और प्रशिक्षण के एक साल बाद कितने युवा उसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं?

यही आंकड़े किसी योजना की वास्तविक सफलता बताते हैं।

प्रशिक्षण बाजार की जरूरत के हिसाब से हो

कई बार युवा वही कोर्स चुनता है जिसके बारे में उसे जानकारी मिलती है। लेकिन हर कोर्स की स्थानीय बाजार में मांग समान नहीं होती।

अगर किसी जिले में सोलर उपकरण, मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल काम, स्वास्थ्य देखभाल, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं या कृषि आधारित कारोबार की मांग है तो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उसी के अनुसार तैयार करना चाहिए।

बिहार सरकार पहले भी मांग वाले क्षेत्रों में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण और मेगा स्किल सेंटर जैसी व्यवस्था की बात कर चुकी है।

यानी आगे की दिशा स्पष्ट है—युवा की रुचि और बाजार की जरूरत के बीच तालमेल।

नौकरी नहीं तो उद्यमिता का रास्ता

हर प्रशिक्षित युवा को नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं। लेकिन हर युवा के सामने आय का कोई रास्ता होना जरूरी है।

एक प्रशिक्षित युवक इलेक्ट्रिकल सर्विस शुरू कर सकता है। कोई मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोल सकता है। कोई डिजिटल सेवा केंद्र चला सकता है। कोई कृषि उपकरण की मरम्मत का काम कर सकता है। कोई स्थानीय स्तर पर सर्विस आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है।

इसलिए कौशल विकास के साथ उद्यमिता प्रशिक्षण, बैंक ऋण, बाजार और मार्गदर्शन को जोड़ना भी जरूरी है।

सरकार की रोजगार नीति में भी मांग आधारित प्रशिक्षण, उद्यमिता और निजी प्रतिष्ठानों के साथ साझेदारी को रोजगार बढ़ाने के महत्वपूर्ण माध्यमों के रूप में रखा गया है।

युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, रास्ता चाहिए

बिहार के युवा को सबसे ज्यादा जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें उसे शुरुआत से अंत तक मार्गदर्शन मिले।

उसे पता हो कि उसकी योग्यता के अनुसार कौन-सा कौशल उपयोगी है। उसे यह जानकारी मिले कि प्रशिक्षण कहां होगा। प्रशिक्षण के बाद नौकरी कहां मिलेगी। नौकरी के लिए आवेदन कैसे करना है। इंटरव्यू कैसे देना है। और अगर नौकरी नहीं मिलती तो अपना छोटा व्यवसाय कैसे शुरू किया जा सकता है।

यानी कौशल विकास को प्रशिक्षण केंद्र की चारदीवारी से बाहर निकालकर रोजगार की पूरी यात्रा से जोड़ना होगा।

असली सफलता रोजगार में दिखाई देगी

बिहार में कौशल विकास के लिए ढांचा तैयार हो रहा है। BSDM के पोर्टल पर हजारों प्रशिक्षण केंद्रों और लाखों प्रशिक्षार्थियों से जुड़े आंकड़े भी उपलब्ध हैं।

लेकिन आने वाले समय में जनता का सवाल संख्या से ज्यादा परिणाम पर होगा।

कितने युवा प्रशिक्षण के बाद अपने पैरों पर खड़े हुए?

कितनों की आय बढ़ी?

कितनों को बिहार में ही रोजगार मिला?

और कितने युवाओं को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ा?

कौशल विकास की असली सफलता प्रमाणपत्रों की संख्या में नहीं, युवाओं की बदलती जिंदगी में दिखाई देगी।

बिहार के युवा को सिर्फ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसके पास हुनर है। उसे ऐसा अवसर भी चाहिए जहां वह उस हुनर से अपनी आजीविका कमा सके।

आखिरकार सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं है। सवाल उस युवा के आत्मविश्वास का है जो वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद अपने परिवार से यह कहना चाहता है—“अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूं।”


आलोक कुमार

India : EPS-95 के पेंशनर्स के लिए साल 2026 भी उम्मीद

 


EPS-95 Pension Update 2026: ₹7,500 पेंशन का सच, ₹25,000 वेतन सीमा और Higher Pension पर बड़ा अपडेट

नई दिल्ली/पटना। Employees' Pension Scheme-1995 यानी EPS-95 के पेंशनर्स के लिए साल 2026 भी उम्मीद, मांग और इंतजार का साल बना हुआ है। देशभर में न्यूनतम पेंशन को मौजूदा ₹1,000 से बढ़ाकर ₹7,500 प्रतिमाह करने, महंगाई भत्ता यानी DA देने और पेंशनर्स व उनके जीवनसाथियों के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधा की मांग लगातार उठती रही है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—₹7,500 अभी EPS-95 की स्वीकृत न्यूनतम पेंशन नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में EPS-95 के तहत न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रतिमाह है। सरकार ने भी संसद में इसकी पुष्टि की है।

इसलिए सोशल मीडिया पर ₹7,500 पेंशन लागू होने का दावा देखने वाले पेंशनर्स को आधिकारिक आदेश के बिना ऐसी खबरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

₹7,500 पेंशन का सच क्या है?

EPS-95 पेंशनर्स की प्रमुख मांग है कि न्यूनतम मासिक पेंशन को बढ़ाकर ₹7,500 किया जाए। इसके साथ महंगाई भत्ता और बेहतर मेडिकल सुविधा की मांग भी जुड़ी हुई है।

लेकिन मांग और सरकारी फैसला एक ही चीज नहीं हैं।

वर्तमान आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रतिमाह है। EPS-95 के नियमों में भी न्यूनतम ₹1,000 की व्यवस्था दर्ज है।

इसलिए जब तक केंद्र सरकार की ओर से नई अधिसूचना या स्पष्ट वैधानिक आदेश जारी नहीं होता, ₹7,500 को लागू न्यूनतम पेंशन बताना सही नहीं होगा।

पेंशनर्स के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि वे वायरल पोस्ट, वीडियो या कथित सरकारी पत्र के बजाय EPFO और केंद्र सरकार के आधिकारिक स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करें।

₹7,500 की मांग क्यों तेज है?

EPS-95 के पेंशनर्स का तर्क है कि वर्षों पहले निर्धारित ₹1,000 की न्यूनतम पेंशन आज की महंगाई के मुकाबले बहुत कम है। वृद्धावस्था में दवा, भोजन, बिजली, किराया और रोजमर्रा के खर्च बढ़ने के कारण कम पेंशन पर जीवन चलाना कठिन हो सकता है।

पेंशनर्स संगठनों की ओर से इसलिए न्यूनतम पेंशन बढ़ाने के साथ DA और चिकित्सा सुविधा की मांग भी उठाई जाती रही है।

सरकार ने जुलाई 2025 में संसद में बताया था कि EPS-95 की न्यूनतम पेंशन ₹1,000 है और इसे बढ़ाने के संबंध में विभिन्न हितधारकों से प्रतिनिधित्व प्राप्त हुए हैं। साथ ही सरकार ने EPS के फंड की वित्तीय स्थिति और बजटीय सहायता का भी उल्लेख किया था।

इससे साफ है कि पेंशन बढ़ाने की मांग मौजूद है, लेकिन मांग को स्वीकृत निर्णय समझना उचित नहीं है।

₹25,000 Wage Ceiling को लेकर क्या स्थिति है?

EPS-95 से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण विषय Wage Ceiling है। मौजूदा EPS नियमों में पेंशन फंड में योगदान के लिए ₹15,000 प्रतिमाह की वेतन सीमा का प्रावधान मौजूद है। आधिकारिक EPS दस्तावेज में भी ₹15,000 की सीमा का उल्लेख है।

₹25,000 की वेतन सीमा बढ़ाने को लेकर चर्चाएं और दावे सामने आते रहे हैं। लेकिन पेंशनर्स को यह समझना चाहिए कि किसी प्रस्ताव, चर्चा या मीडिया रिपोर्ट को अंतिम लागू नियम नहीं माना जा सकता।

यदि भविष्य में वेतन सीमा बढ़ाने का औपचारिक निर्णय होता है तो उसके लिए संबंधित सरकारी अधिसूचना और लागू नियमों को देखना जरूरी होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Wage Ceiling में बदलाव और ₹7,500 न्यूनतम पेंशन दो अलग-अलग विषय हैं। वेतन सीमा बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मौजूदा EPS-95 पेंशनर की पेंशन अपने आप ₹7,500 हो जाएगी।

Higher Pension पर क्या है अपडेट?

EPS-95 से जुड़ा तीसरा महत्वपूर्ण विषय Higher Pension है। उच्च वेतन पर पेंशन से संबंधित प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महत्वपूर्ण बनी और EPFO ने पात्र सदस्यों के आवेदन तथा पेंशन निर्धारण की प्रक्रिया के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराई है।

EPFO के मौजूदा सदस्य पोर्टल पर “Track application status for Pension on Higher Wages” की सुविधा उपलब्ध है। EPFO ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके कैलकुलेटर से मिलने वाली राशि केवल अनुमानित है और वास्तविक गणना संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय के रिकॉर्ड के आधार पर होगी।

इसका मतलब यह है कि Higher Pension का मामला पात्र सदस्य की स्थिति, आवेदन और रिकॉर्ड पर निर्भर करता है। इसे ₹7,500 की न्यूनतम पेंशन की मांग के साथ मिलाकर नहीं देखना चाहिए।

पेंशनर्स सोशल मीडिया की खबरों से सावधान रहें

EPS-95 को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी खबरें वायरल होती हैं जिनमें कहा जाता है कि सरकार ने ₹7,500 पेंशन मंजूर कर दी, DA लागू कर दिया या पेंशनर्स को बड़ी राशि का एरियर मिलने वाला है।

ऐसी खबरों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बार पुरानी खबर को नई तारीख के साथ प्रसारित किया जाता है या किसी मांग को सरकारी निर्णय की तरह प्रस्तुत कर दिया जाता है।

पेंशनर्स को किसी भी बड़े दावे की पुष्टि के लिए EPFO की आधिकारिक वेबसाइट, सरकारी अधिसूचना और PIB/श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की जानकारी देखनी चाहिए।

EPFO की वेबसाइट पर पेंशन स्थिति और Higher Pension आवेदन की स्थिति जांचने की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

पेंशनर्स के लिए 2026 में तीन बड़े सवाल

EPS-95 से जुड़े मुद्दों को फिलहाल तीन हिस्सों में समझा जा सकता है।

पहला—₹7,500 न्यूनतम पेंशन: यह पेंशनर्स की प्रमुख मांग है, लेकिन अभी स्वीकृत न्यूनतम पेंशन नहीं है।

दूसरा—₹25,000 Wage Ceiling: मौजूदा आधिकारिक EPS नियमों में ₹15,000 की सीमा का प्रावधान है। ₹25,000 से जुड़ी किसी भी खबर को अंतिम सरकारी नियम मानने से पहले आधिकारिक अधिसूचना जरूरी है।

तीसरा—Higher Pension: पात्र सदस्यों के लिए उच्च वेतन पर पेंशन से जुड़ी प्रक्रिया EPFO के पोर्टल पर उपलब्ध है और आवेदन की स्थिति ऑनलाइन देखी जा सकती है।

निष्कर्ष: उम्मीद जारी, लेकिन आधिकारिक फैसला जरूरी

EPS-95 पेंशनर्स के लिए ₹7,500 न्यूनतम पेंशन की मांग निश्चित रूप से एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार न्यूनतम पेंशन अभी ₹1,000 प्रतिमाह है।

इसी तरह ₹25,000 Wage Ceiling से जुड़ी किसी भी जानकारी को अंतिम नियम मानने से पहले आधिकारिक अधिसूचना देखना जरूरी है। Higher Pension का मामला अलग है और पात्र सदस्यों के लिए EPFO की प्रक्रिया उपलब्ध है।

इसलिए EPS-95 पेंशनर्स के लिए 2026 का सबसे जरूरी संदेश यही है—

वायरल खबर पर नहीं, सरकारी आदेश पर भरोसा करें।

₹7,500 की मांग को लेकर उम्मीद और आंदोलन अपनी जगह हैं, लेकिन जब तक केंद्र सरकार औपचारिक फैसला नहीं करती, इसे लागू न्यूनतम पेंशन बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

पेंशनर्स का सवाल केवल राशि बढ़ाने का नहीं है। यह सम्मानजनक वृद्धावस्था, सामाजिक सुरक्षा और वर्षों की सेवा के बाद सुरक्षित जीवन का सवाल भी है।


आलोक कुमार

Bihar : गांव की सड़क और अस्पताल तक पहुंच का सीधा संबंध

 


गांव की सड़क और अस्पताल तक पहुंच का सीधा संबंध

गांव की सड़क केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने का रास्ता नहीं है। यह स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। सड़क अच्छी हो तो मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकता है, एंबुलेंस गांव तक पहुंच सकती है और गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में इलाज मिलने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन सड़क खराब हो, रास्ते में कीचड़ और जलभराव हो या गांव का संपर्क मुख्य मार्ग से टूट जाए, तो अस्पताल कुछ किलोमीटर दूर होने के बावजूद मरीज के लिए बहुत दूर हो जाता है।

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की चर्चा अक्सर अस्पताल, डॉक्टर, दवाइयों और जांच सुविधाओं तक सीमित रहती है। लेकिन स्वास्थ्य सेवा की सफलता केवल अस्पताल की चारदीवारी के भीतर तय नहीं होती। मरीज अस्पताल तक कितनी जल्दी और सुरक्षित पहुंचता है, यह भी स्वास्थ्य व्यवस्था का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यही कारण है कि ग्रामीण सड़क और स्वास्थ्य सेवा को अलग-अलग विषय मानकर योजना बनाना व्यावहारिक नहीं है।

सड़क खराब तो इलाज में देरी

गांव में अचानक बीमारी, दुर्घटना, प्रसव या किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में समय सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। शहरों में जहां अस्पताल तक पहुंचने में कुछ मिनट लग सकते हैं, वहीं खराब ग्रामीण सड़क के कारण यही दूरी कई बार घंटों में बदल जाती है।

यदि गांव से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या अनुमंडलीय अस्पताल तक जाने वाली सड़क खराब है तो मरीज को अस्पताल ले जाने में परेशानी होती है। बरसात के दिनों में समस्या और गंभीर हो जाती है।

गड्ढे, कीचड़ और जलभराव के कारण वाहन की गति कम हो जाती है। कहीं संपर्क मार्ग क्षतिग्रस्त हो जाए तो चालक को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है।

ऐसी स्थिति में अस्पताल की दूरी किलोमीटर में नहीं, समय में मापी जाती है।

गर्भवती महिलाओं के लिए सड़क का महत्व

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में सड़क की भूमिका गर्भवती महिलाओं के मामले में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। प्रसव के दौरान अचानक जटिलता उत्पन्न होने पर मरीज को जल्द से जल्द स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचाना पड़ सकता है।

यदि गांव की सड़क खराब है तो एंबुलेंस के पहुंचने में देरी हो सकती है। कई परिवारों को निजी वाहन, ऑटो या स्थानीय परिवहन का सहारा लेना पड़ता है। रात के समय और बरसात में ऐसी स्थिति और कठिन हो सकती है।

इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच का मतलब केवल अस्पताल बनाना नहीं है। अस्पताल तक सुरक्षित और हर मौसम में उपयोगी रास्ता उपलब्ध कराना भी स्वास्थ्य नीति का हिस्सा होना चाहिए।

दुर्घटना में हर मिनट महत्वपूर्ण

सड़क और स्वास्थ्य के संबंध को दुर्घटनाओं के मामलों में आसानी से समझा जा सकता है। किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति को जितनी जल्दी चिकित्सा सहायता मिलती है, उपचार की संभावना उतनी बेहतर हो सकती है।

लेकिन यदि गांव की सड़क खराब है तो एंबुलेंस को घटनास्थल तक पहुंचने और मरीज को अस्पताल ले जाने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

गड्ढों और उबड़-खाबड़ रास्तों पर एंबुलेंस को तेज गति से चलाना भी मुश्किल होता है। इससे मरीज के लिए परेशानी बढ़ सकती है।

इसलिए ग्रामीण सड़क की खराब स्थिति केवल यातायात की समस्या नहीं है। आपात स्थिति में यह स्वास्थ्य सुरक्षा और समय पर चिकित्सा सहायता का सवाल बन जाती है।

बरसात में बढ़ जाती है परेशानी

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में मानसून के दौरान सड़क और स्वास्थ्य का संबंध और स्पष्ट दिखाई देता है। निचले इलाकों में जलभराव, नदियों और नालों का बढ़ा जलस्तर तथा संपर्क मार्गों के क्षतिग्रस्त होने से गांवों का मुख्य मार्ग से संपर्क प्रभावित हो सकता है।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में मरीज को पहले गांव से सुरक्षित स्थान तक निकालना पड़ सकता है और उसके बाद अस्पताल ले जाने की व्यवस्था करनी पड़ती है।

ऐसे समय में गांव के पास स्वास्थ्य केंद्र मौजूद होने के बावजूद उसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब मरीज वहां तक पहुंच सके।

इसलिए बाढ़ और जलभराव वाले क्षेत्रों में ऑल-वेदर कनेक्टिविटी को स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ जोड़कर देखना जरूरी है।

केवल अस्पताल खोलना पर्याप्त नहीं

सरकारें ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी संस्थाएं विकसित करती हैं। यह जरूरी कदम है।

लेकिन इसके साथ यह भी देखना चाहिए कि इन स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचने वाली सड़क की स्थिति कैसी है।

यदि स्वास्थ्य केंद्र गांव के नजदीक है, लेकिन खराब सड़क के कारण वहां पहुंचने में बहुत अधिक समय लगता है, तो अस्पताल की भौगोलिक निकटता का वास्तविक लाभ सीमित हो जाता है।

इसलिए ग्रामीण स्वास्थ्य योजना को केवल भवन निर्माण तक सीमित रखने के बजाय अस्पताल + सड़क + एंबुलेंस + परिवहन + संचार की पूरी व्यवस्था के रूप में देखना होगा।

एंबुलेंस तभी प्रभावी जब रास्ता हो

ग्रामीण क्षेत्रों में एंबुलेंस व्यवस्था स्वास्थ्य सेवा की महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन एंबुलेंस की उपलब्धता तभी प्रभावी होगी जब वह मरीज तक समय पर पहुंच सके।

खराब सड़क एंबुलेंस के लिए केवल असुविधा नहीं है। लगातार गड्ढों और खराब सतह पर वाहन चलाने से मरीज को अतिरिक्त झटके लग सकते हैं और वाहन की गति भी प्रभावित हो सकती है।

इसलिए जिन गांवों में स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच का जोखिम अधिक है, वहां मुख्य सड़क से गांव तक के संपर्क मार्ग की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए।

सड़क विकास और स्वास्थ्य योजना को जोड़ना होगा

आमतौर पर सड़क निर्माण और स्वास्थ्य विभाग को अलग-अलग प्रशासनिक विषय माना जाता है। लेकिन ग्रामीण जीवन की वास्तविकता दोनों को आपस में जोड़ती है।

यदि सरकार किसी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार कर रही है तो उसी क्षेत्र के संपर्क मार्गों को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

इसी तरह सड़क निर्माण की योजना बनाते समय यह देखा जा सकता है कि सड़क किन स्वास्थ्य केंद्रों, अस्पतालों, स्कूलों, बाजारों और आपातकालीन सेवाओं को जोड़ती है।

एक अच्छी सड़क कई बार अस्पताल से पहले स्वास्थ्य सेवा की भूमिका निभाती है, क्योंकि वह मरीज को समय पर अस्पताल तक पहुंचाती है।

सड़क की गुणवत्ता और रखरखाव भी जरूरी

नई सड़क बना देना पर्याप्त नहीं है। उसकी नियमित देखभाल भी जरूरी है। छोटी दरारें और गड्ढे समय रहते ठीक कर दिए जाएं तो सड़क को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।

जलनिकासी भी बेहद महत्वपूर्ण है। सड़क पर लंबे समय तक पानी जमा रहने से उसकी संरचना कमजोर हो सकती है और आवागमन प्रभावित हो सकता है।

इसलिए सड़क निर्माण, जलनिकासी और रखरखाव को अलग-अलग नहीं देखा जाना चाहिए। तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

गांव की सड़क विकास की पहली सीढ़ी है

ग्रामीण विकास की चर्चा में सड़क को अक्सर किसान और बाजार के बीच संपर्क के रूप में देखा जाता है। लेकिन सड़क का महत्व इससे कहीं बड़ा है।

सड़क बच्चे को स्कूल तक पहुंचाती है। किसान को बाजार तक पहुंचाती है। मजदूर को रोजगार तक पहुंचाती है। और सबसे महत्वपूर्ण—मरीज को अस्पताल तक पहुंचाती है।

इसलिए गांव की सड़क वहां की सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण संकेतक है।

सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, जीवन का है

जब गांव की सड़क खराब होती है तो उसका असर केवल वाहन चलाने वाले व्यक्ति पर नहीं पड़ता। मरीज के अस्पताल पहुंचने में देरी होती है, गर्भवती महिला को अतिरिक्त जोखिम उठाना पड़ सकता है, बुजुर्गों की नियमित चिकित्सा प्रभावित हो सकती है और गंभीर बीमारी की स्थिति में परिवार के सामने परिवहन सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

इसलिए ग्रामीण सड़क निर्माण को केवल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसे स्वास्थ्य सुरक्षा की बुनियादी आवश्यकता के रूप में भी देखना होगा।

सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक गांव से निकटतम स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल तक हर मौसम में सुरक्षित संपर्क उपलब्ध हो। जहां सड़क बार-बार खराब होती है, वहां केवल पैचवर्क करने के बजाय समस्या के मूल कारण की पहचान होनी चाहिए।

क्योंकि गांव की सड़क टूटती है तो सिर्फ रास्ता नहीं टूटता—मरीज और अस्पताल के बीच का भरोसा भी टूटता है।

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए डॉक्टर, दवाइयां और अस्पताल जरूरी हैं। लेकिन अस्पताल तक पहुंचने वाली सड़क भी उतनी ही जरूरी है।

एक मजबूत सड़क केवल यातायात का माध्यम नहीं है। यह समय पर इलाज पाने के अधिकार की पहली गारंटी है।

आलोक कुमार

Bihar : सड़क बनती है, टूटती है और फिर बनती है


सड़क बनती है, टूटती है और फिर बनती है—जवाबदेही किसकी?

बिहार में सड़क निर्माण और मरम्मत पर हर साल बड़ी राशि खर्च होती है। नई सड़क बनती है, कुछ समय बाद उस पर गड्ढे दिखाई देने लगते हैं, बरसात में कई जगह सड़क की परत उखड़ जाती है और फिर मरम्मत के नाम पर सरकारी मशीनरी सक्रिय हो जाती है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सड़क क्यों टूटी। बड़ा सवाल यह है कि अगर निर्माण में कमी थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है और जनता के पैसे से बनी सड़क इतनी जल्दी खराब क्यों हुई?

सड़क किसी भी राज्य के विकास की बुनियादी जरूरत है। यह गांव को बाजार से, किसान को मंडी से, मरीज को अस्पताल से और बच्चों को स्कूल-कॉलेज से जोड़ती है। सड़क मजबूत होगी तो परिवहन आसान होगा, समय बचेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। लेकिन जब सड़क की गुणवत्ता कमजोर हो, पानी की निकासी की उचित व्यवस्था न हो और समय पर रखरखाव नहीं किया जाए, तो यही विकास का आधार लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है।

सड़क बनने के बाद उसकी उम्र कौन तय करता है?

किसी सरकारी सड़क के निर्माण के दौरान सामग्री की गुणवत्ता, सड़क की मोटाई, बेस और सब-बेस, दबाव, जलनिकासी तथा निर्माण तकनीक से जुड़े मानक निर्धारित होते हैं। निर्माण एजेंसी या ठेकेदार को इन मानकों का पालन करना होता है और संबंधित विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि काम की निगरानी की जाए।

लेकिन असली परीक्षा सड़क पूरी होने के बाद शुरू होती है।

अगर कोई नई सड़क कुछ ही महीनों में टूटने लगे तो यह केवल मरम्मत का विषय नहीं होना चाहिए। यह जांच का विषय होना चाहिए कि सड़क निर्माण के दौरान निर्धारित मानकों का पालन हुआ था या नहीं।

क्या इस्तेमाल की गई सामग्री निर्धारित गुणवत्ता की थी? क्या सड़क की नींव ठीक तरीके से तैयार की गई थी? क्या पानी की निकासी के लिए पर्याप्त व्यवस्था थी? क्या निर्माण के बाद गुणवत्ता की जांच हुई? इन सवालों के जवाब सामने आए बिना सड़क टूटने का पूरा दोष बारिश या मौसम पर डाल देना आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन यह जवाबदेही की समस्या का समाधान नहीं है।

बारिश को दोष देकर कब तक बचेंगे?

बरसात में सड़क टूटना बिहार की बड़ी समस्याओं में शामिल है। भारी बारिश और जलभराव निश्चित रूप से सड़क को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि सड़क का डिजाइन उस क्षेत्र की भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था या नहीं।

जहां लगातार पानी जमा रहता है, वहां सड़क की मजबूती प्रभावित होना स्वाभाविक है। इसलिए सड़क निर्माण के साथ नाला, पुलिया और जलनिकासी व्यवस्था को भी योजना का हिस्सा बनाना जरूरी है।

सिर्फ सड़क बना देना पर्याप्त नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि बारिश का पानी सड़क पर जमा न हो और उसे निकलने का पर्याप्त रास्ता मिले।

क्या केवल ठेकेदार जिम्मेदार है?

सड़क खराब होने के बाद आमतौर पर सबसे पहले ठेकेदार की गुणवत्ता पर सवाल उठता है। यह सवाल जायज हो सकता है, लेकिन सरकारी निर्माण व्यवस्था में जिम्मेदारी केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं होती।

निर्माण की निगरानी के लिए विभागीय अधिकारी और अभियंता होते हैं। कई परियोजनाओं में गुणवत्ता जांच, माप पुस्तिका, भुगतान प्रक्रिया और निर्माण के बाद रखरखाव से जुड़े प्रावधान होते हैं।

ऐसे में दो सवाल बेहद महत्वपूर्ण हैं—

अगर काम खराब था तो भुगतान कैसे हुआ?

और—

अगर काम निर्धारित मानकों के अनुसार था तो सड़क इतनी जल्दी खराब क्यों हुई?

इन दोनों सवालों का जवाब सड़क निर्माण व्यवस्था में वास्तविक जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी है।

मरम्मत का चक्र कब टूटेगा?

सड़क खराब होने के बाद अक्सर गड्ढे भरने, पैचवर्क करने या सड़क पर नई परत डालने की प्रक्रिया शुरू होती है। कुछ समय बाद सड़क फिर खराब होती है और दोबारा मरम्मत की जरूरत पड़ती है।

अगर यही चक्र लगातार चलता रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी धन का इस्तेमाल समस्या के स्थायी समाधान के लिए हो रहा है या केवल तत्काल राहत के लिए।

सरकारी धन जनता के पैसे से आता है। इसलिए हर निर्माण परियोजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि काम पूरा हो गया। यह भी देखना जरूरी है कि सड़क कितने समय तक टिकाऊ रही और निर्माण पर खर्च की गई राशि का वास्तविक लाभ लोगों को कितने वर्षों तक मिला।

ग्रामीण सड़क खराब हुई तो असर सिर्फ यातायात पर नहीं

शहर में सड़क खराब होने की समस्या दिखाई देने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।

गांव की सड़क टूटने से किसान अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में परेशान होता है। मजदूरों की आवाजाही प्रभावित होती है। बच्चों के स्कूल पहुंचने में कठिनाई होती है। मरीज को अस्पताल ले जाने में अधिक समय लग सकता है। बरसात में जलभराव या सड़क कटने की स्थिति में कई गांवों का संपर्क मुख्य सड़क से कमजोर हो सकता है।

इसलिए ग्रामीण सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं है। यह कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बुनियादी कड़ी है।

जनता को भी मिले निगरानी का अधिकार

सड़क निर्माण को केवल शिलान्यास और उद्घाटन तक सीमित रखने के बजाय पूरी परियोजना की जानकारी जनता के सामने होनी चाहिए।

किस सड़क पर कितना खर्च प्रस्तावित है? निर्माण एजेंसी कौन है? काम पूरा करने की समयसीमा क्या है? सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? दोष दायित्व की अवधि कितनी है?

ऐसी जानकारी सड़क निर्माण स्थल और संबंधित सरकारी पोर्टल पर आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए।

तकनीक का इस्तेमाल करके निर्माण की प्रगति की तस्वीरें, निरीक्षण रिपोर्ट और गुणवत्ता जांच से जुड़ी जानकारी भी सार्वजनिक की जा सकती है। इससे स्थानीय नागरिकों को भी निगरानी में भागीदार बनाया जा सकता है।

सड़क जल्दी खराब हो तो जांच क्यों न हो?

किसी सड़क के निर्धारित अवधि से पहले खराब होने पर स्वतः तकनीकी जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि समस्या निर्माण सामग्री में थी, डिजाइन में थी, जलनिकासी में थी, भारी यातायात के कारण थी या रखरखाव में लापरवाही हुई।

यदि ठेकेदार की गलती सामने आए तो अनुबंध के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि निगरानी में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

सिर्फ गड्ढा भर देना पर्याप्त नहीं है। यह पता लगाना जरूरी है कि गड्ढा बना क्यों।

विकास का मतलब बार-बार सड़क बनाना नहीं

किसी क्षेत्र में बार-बार सड़क निर्माण होना अपने आप में विकास का प्रमाण नहीं है। वास्तविक विकास तब माना जाएगा जब सड़क मजबूत बने, निर्धारित मानकों के अनुसार टिके और लोगों को सुरक्षित एवं सुगम यातायात उपलब्ध कराए।

सरकार और विभागों को सड़क निर्माण की संख्या से अधिक गुणवत्ता, टिकाऊपन और जवाबदेही को सफलता का पैमाना बनाना चाहिए।

नई सड़क बनाने से पहले यह देखना जरूरी है कि पुरानी सड़क क्यों खराब हुई। इसी तरह सड़क की मरम्मत करने से पहले यह समझना जरूरी है कि समस्या केवल ऊपरी सतह में है या सड़क की पूरी संरचना में।

सड़क जनता के भरोसे की भी पहचान है

बिहार जैसे राज्य में बेहतर सड़कें केवल यातायात को आसान नहीं बनातीं, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को भी मजबूत करती हैं। इसलिए सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता केवल तकनीकी गलती नहीं है। यह जनता के पैसे और भरोसे दोनों से जुड़ा सवाल है।

सड़क जनता के पैसे से बनती है। इसलिए सड़क टूटने पर सिर्फ गड्ढा नहीं बनता, जनता के भरोसे में भी गड्ढा पड़ता है।

सवाल सीधा है—सड़क बनती है, टूटती है और फिर बनती है। लेकिन इस पूरे चक्र में जवाबदेही कब तय होगी?

जब तक इस सवाल का ठोस जवाब नहीं मिलता, तब तक सड़क निर्माण पर खर्च बढ़ता रहेगा और जनता मजबूत सड़क के बजाय बार-बार मरम्मत का इंतजार करती रहेगी।

सड़क विकास की पहचान है, लेकिन टिकाऊ सड़क सुशासन की पहचान है।


आलोक कुमार

Saharsa :कोसी क्षेत्र में हर साल बाढ़ क्यों लौटती है?

 


कोसी क्षेत्र में हर साल बाढ़ क्यों लौटती है? नदी का स्वभाव, तटबंध और विकास मॉडल पर उठते सवाल

कोसी क्षेत्र में बाढ़ अब केवल बारिश के दिनों में आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह हर साल लौटने वाला ऐसा संकट बन चुकी है, जिसका असर खेतों, घरों, पशुपालन, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय रोजगार तक दिखाई देता है। बाढ़ के दौरान राहत और बचाव की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन पानी उतरने के बाद एक बड़ा सवाल फिर खड़ा हो जाता है—आखिर कोसी क्षेत्र में बाढ़ का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा है?

बिहार की कोसी नदी को लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता रहा है। हिमालय से निकलकर बिहार के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करने वाली यह नदी अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद और अवसाद लेकर आती है। नदी का स्वभाव ऐतिहासिक रूप से बदलता रहा है और इसके प्रवाह में बदलाव ने इसके आसपास बसे इलाकों को हमेशा बाढ़ के जोखिम में रखा है।

हिमालय से मैदान तक का सफर ही बनाता है संकट

कोसी की बाढ़ को समझने के लिए सबसे पहले उसके भौगोलिक चरित्र को समझना जरूरी है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में जब भारी बारिश होती है तो उसका पानी तेजी से नीचे की ओर आता है। इसका सीधा प्रभाव बिहार के मैदानी इलाकों में नदी के जलस्तर पर पड़ता है।

हिमालय अपेक्षाकृत युवा पर्वत श्रृंखला है। यहां भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और भू-क्षरण जैसी घटनाएं होती रहती हैं। इसके कारण बड़ी मात्रा में अवसाद नदी में पहुंचता है। जब यही नदी अपेक्षाकृत समतल मैदानी क्षेत्र में आती है तो उसकी गति और प्रवाह की स्थिति बदल जाती है तथा कई स्थानों पर गाद जमा होती रहती है।

इसलिए कोसी की बाढ़ को केवल बारिश से जोड़कर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे गाद, नदी की धारा, जलग्रहण क्षेत्र, तटबंध, जलनिकासी और मानव बस्तियों का आपस में जुड़ा हुआ संबंध है।

तटबंधों ने राहत दी, लेकिन सवाल भी खड़े किए

बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य से कोसी क्षेत्र में तटबंधों का निर्माण किया गया। इससे अनेक इलाकों को सामान्य परिस्थितियों में नदी के सीधे फैलाव से सुरक्षा मिली। लेकिन तटबंध किसी नदी की प्राकृतिक प्रवृत्ति को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते।

नदी के भीतर गाद जमा होने, जलप्रवाह बदलने और तटबंधों के बाहर स्थानीय जलनिकासी की समस्या जैसी स्थितियां कई जगह चुनौती पैदा करती हैं। जब बारिश का पानी और छोटी नदियों या नालों का पानी आसानी से बाहर नहीं निकल पाता, तब स्थानीय स्तर पर जलभराव गंभीर रूप ले सकता है।

यही कारण है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि तटबंध मजबूत हैं या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या नदी के पूरे तंत्र, जलनिकासी और आसपास के भूगोल को ध्यान में रखकर बाढ़ प्रबंधन की समीक्षा की जा रही है?

नेपाल से आने वाला पानी भी महत्वपूर्ण कारक

कोसी का बड़ा जलग्रहण क्षेत्र नेपाल में है। इसलिए बिहार में बाढ़ प्रबंधन को केवल राज्य की सीमा के भीतर की समस्या मानना व्यावहारिक नहीं होगा। भारत और नेपाल के बीच जल संसाधन प्रबंधन, मौसम की जानकारी, जलस्तर की निगरानी और बाढ़ पूर्व चेतावनी व्यवस्था का मजबूत होना बेहद जरूरी है।

ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अचानक अत्यधिक बारिश होने पर नीचे के इलाकों में तेजी से पानी बढ़ सकता है। ऐसे समय में कुछ घंटे पहले मिलने वाली विश्वसनीय चेतावनी भी हजारों लोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

लेकिन चेतावनी तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ गांव स्तर पर निकासी योजना, नाव, सुरक्षित स्थान, भोजन, दवा और पशुओं के लिए व्यवस्था भी मौजूद हो।

हर साल वही सवाल—स्थायी समाधान कहां है?

बाढ़ आने के बाद प्रशासन सक्रिय हो जाता है। नावें चलती हैं, राहत शिविर बनाए जाते हैं, प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाता है और भोजन तथा जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। यह तत्काल राहत जरूरी है, लेकिन असली चुनौती इससे आगे की है।

बाढ़ खत्म होने के बाद खेतों में जमा पानी, टूटी सड़कें, क्षतिग्रस्त घर, पशुओं की समस्या और बच्चों की पढ़ाई में आया व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है। गरीब और छोटे किसानों के लिए स्थिति और कठिन हो जाती है क्योंकि एक बाढ़ का आर्थिक नुकसान उनकी कई महीनों या वर्षों की आय को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए बाढ़ प्रबंधन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि राहत कितनी जल्दी पहुंची। यह भी देखना होगा कि अगली बाढ़ से पहले जोखिम कितना कम किया गया।

खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी असर

कोसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। बाढ़ के दौरान खड़ी फसल नष्ट हो सकती है। कई जगह खेतों में रेत और गाद जमा हो जाती है, जिससे अगली फसल की तैयारी महंगी हो जाती है।

छोटे और सीमांत किसानों के पास अक्सर नुकसान झेलने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं होते। फसल खराब होने के बाद बीज, खाद, सिंचाई और घरेलू खर्च का इंतजाम करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।

बाढ़ का असर केवल किसान तक सीमित नहीं रहता। खेतिहर मजदूरों, छोटे दुकानदारों, पशुपालकों, स्थानीय परिवहन और ग्रामीण बाजारों की आय भी प्रभावित होती है। इस तरह बाढ़ धीरे-धीरे पूरे स्थानीय अर्थतंत्र को प्रभावित करती है।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई अनिश्चितता

बदलते मौसम के कारण अत्यधिक बारिश की घटनाओं को लेकर भी चिंता बढ़ी है। बारिश का समय, तीव्रता और वितरण पहले जैसा न रहने से पुराने अनुभवों के आधार पर जोखिम का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है।

अब जरूरत केवल नदी का जलस्तर मापने की नहीं है। आधुनिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो यह अनुमान लगाने में मदद करे कि किस इलाके में कब तक पानी पहुंच सकता है, कितने परिवार प्रभावित हो सकते हैं और किन गांवों को पहले खाली कराने की जरूरत है।

यानी बाढ़ प्रबंधन को जलस्तर आधारित व्यवस्था से आगे बढ़ाकर जोखिम आधारित व्यवस्था बनाने की जरूरत है।

समाधान राहत में नहीं, नदी को समझने में है

कोसी की बाढ़ का स्थायी समाधान किसी एक परियोजना या एक विभाग के भरोसे संभव नहीं है। इसके लिए नदी बेसिन के स्तर पर दीर्घकालीन योजना जरूरी है।

नेपाल के साथ बेहतर समन्वय, आधुनिक जलस्तर निगरानी, प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली, तटबंधों की नियमित तकनीकी समीक्षा, जलनिकासी व्यवस्था और गांवों में आपदा तैयारी को एक साथ मजबूत करना होगा।

इसके अलावा स्थानीय लोगों को भी बाढ़ प्रबंधन की योजना में शामिल किया जाना चाहिए। ग्रामीणों के पास नदी और पानी के व्यवहार का वर्षों का अनुभव होता है। स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक तकनीक के साथ जोड़ने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।

अब हर साल की राहत नहीं, दीर्घकालीन नीति चाहिए

कोसी की बाढ़ हर साल राजनीतिक चर्चा और राहत घोषणाओं का विषय बनती है। लेकिन बाढ़ का स्थायी समाधान केवल घोषणा से संभव नहीं होगा। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, निरंतर निगरानी, दीर्घकालीन निवेश और विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम हर साल बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाने को ही सफलता मानते रहेंगे या बाढ़ आने से पहले नुकसान कम करने की रणनीति बनाएंगे?

कोसी को केवल बांधकर या नदी के प्राकृतिक व्यवहार को नजरअंदाज करके समस्या का समाधान करना आसान नहीं है। जरूरत नदी के स्वभाव को समझने और उसके साथ संतुलित विकास मॉडल तैयार करने की है।

कोसी क्षेत्र के लोगों को हर साल केवल यह सुनने की जरूरत नहीं कि बाढ़ प्राकृतिक आपदा है। उन्हें यह जानने का अधिकार भी है कि एक जैसी चुनौती बार-बार सामने आने के बावजूद जोखिम कम करने की तैयारी कितनी प्रभावी हुई है।

बाढ़ आएगी या नहीं, इसे पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं हो सकता। लेकिन बाढ़ आने पर कितने लोग प्रभावित होंगे, कितनी फसल नष्ट होगी, कितने घर डूबेंगे और कितने परिवार लंबे समय तक आर्थिक संकट में रहेंगे—इन नुकसान को कम करना नीति और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

कोसी की बाढ़ इसलिए केवल नदी की समस्या नहीं है। यह बिहार के जल प्रबंधन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आपदा तैयारी और विकास मॉडल की भी परीक्षा है।


आलोक कुमार

Bihar : क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?

 


बिहार में बाढ़: राहत के बाद पुनर्वास का सवाल, क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?

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पटना। बिहार में बाढ़ कोई नई आपदा नहीं है। हर साल नदियां उफनती हैं, तटबंधों के भीतर और बाहर रहने वाली आबादी पानी से घिरती है, घर डूबते हैं, खेत बर्बाद होते हैं और प्रशासन राहत एवं बचाव अभियान शुरू करता है। नावें चलती हैं, राहत सामग्री बांटी जाती है, सामुदायिक रसोई शुरू होती है और सरकारी स्तर पर स्थिति की निगरानी की जाती है। यह सब जरूरी है।

लेकिन असली सवाल इसके बाद शुरू होता है—जब पानी उतर जाएगा, तब इन लोगों का क्या होगा?

बाढ़ के दौरान राहत दिखाई देती है, लेकिन पुनर्वास की चिंता अक्सर सुर्खियों से बाहर चली जाती है। यही बिहार की बाढ़ की सबसे बड़ी मानवीय विडंबना है।

पटना के कुर्जी स्थित बिंद टोली जैसे इलाके इस सवाल को और गंभीर बना देते हैं। यहां रहने वाले गरीब परिवारों के लिए बाढ़ केवल कुछ दिनों तक घर में पानी घुसने की समस्या नहीं है। कई परिवारों के लिए यह हर साल दोहराया जाने वाला विस्थापन है। झोपड़ी में पानी भरता है, घरेलू सामान खराब होता है, बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है और परिवारों को सुरक्षित स्थान की तलाश में भटकना पड़ता है। पानी उतरने के बाद वे फिर उसी जगह लौट आते हैं—क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं है।

बिंद टोली की कलावती देवी की पीड़ा इस संकट की पूरी तस्वीर सामने रखती है। उनका कहना है—“डूब गईल झोपड़ी हमार, काला प्लास्टिक लगल हई। ई एक साल की बात ने हई, दस साल से लीला हई।”

यह केवल एक महिला की पीड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें एक गरीब परिवार वर्षों तक बाढ़ और बेघर होने की आशंका के साथ जीवन जीने को मजबूर है।

राहत जरूरी है, लेकिन क्या राहत ही समाधान है?

बाढ़ के समय प्लास्टिक शीट, भोजन, पीने का पानी, दवा और अस्थायी आश्रय तत्काल जरूरतें हैं। इनके बिना प्रभावित परिवारों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। लेकिन यदि कोई परिवार दस वर्षों से हर मानसून में अपनी झोपड़ी बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो हर साल राहत सामग्री देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं कहा जा सकता।

यहां राहत और पुनर्वास के बीच अंतर समझना जरूरी है।

राहत का उद्देश्य तत्काल संकट से लोगों को बचाना है। पुनर्वास का उद्देश्य उन्हें ऐसी सुरक्षित और सम्मानजनक जगह देना है, जहां अगली बाढ़ उनके जीवन को फिर से शून्य पर न ला दे।

यही अंतर बिहार की बाढ़ नीति में सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।

बार-बार डूबने वाले परिवारों की पहचान जरूरी

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सरकार को ऐसे परिवारों की अलग से पहचान करनी चाहिए जिनके घर हर वर्ष या लगातार कई वर्षों से बाढ़ की चपेट में आते हैं।

इसके लिए स्थानीय स्तर पर वास्तविक सर्वे होना चाहिए। केवल कागजी सूची या पुराने आंकड़ों के आधार पर योजना बनाने के बजाय यह पता लगाया जाना चाहिए कि कौन परिवार कहां रहता है, कितनी बार विस्थापित हुआ है, उसके पास जमीन है या नहीं और उसकी आजीविका किस पर निर्भर है।

जहां स्थानीय स्तर पर सुरक्षा संभव हो, वहां बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए। जहां रहना जोखिमपूर्ण हो, वहां सम्मानजनक पुनर्वास कॉलोनी विकसित की जाए।

लेकिन पुनर्वास का अर्थ केवल जमीन का छोटा टुकड़ा या एक मकान देना नहीं होना चाहिए।

वहां सड़क, बिजली, पेयजल, जलनिकासी, विद्यालय, स्वास्थ्य सुविधा और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वहां रोजगार और आजीविका का अवसर उपलब्ध हो।

किसी गरीब परिवार को नदी किनारे से हटाकर शहर से बहुत दूर ऐसी जगह बसाना, जहां न काम हो और न पर्याप्त परिवहन, पुनर्वास नहीं बल्कि एक नए प्रकार का विस्थापन होगा।

बाढ़ का असर गरीबों पर ज्यादा क्यों पड़ता है?

बाढ़ का पानी अमीर और गरीब के घर में भेदभाव नहीं करता, लेकिन बाढ़ का नुकसान बराबर नहीं होता।

पक्का मकान वाला परिवार कुछ दिनों के लिए सुरक्षित स्थान पर जा सकता है। उसके पास बचत, वाहन या रिश्तेदारों के यहां रहने का विकल्प हो सकता है। गरीब परिवार के पास अक्सर इनमें से कोई सुविधा नहीं होती।

उसकी पूरी पूंजी एक छोटी झोपड़ी, कुछ बर्तन, कपड़े, राशन, मवेशी और रोज कमाकर खाने की व्यवस्था होती है। बाढ़ इनमें से किसी एक चीज को भी नुकसान पहुंचाती है तो परिवार कई महीने पीछे चला जाता है।

सबसे अधिक असर बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों पर पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। महिलाओं के सामने सुरक्षित शौचालय और रहने की समस्या बढ़ती है। बीमार लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच मुश्किल हो जाती है। दिहाड़ी मजदूरों का काम रुक जाता है।

इसलिए बाढ़ को केवल जल संसाधन या आपदा प्रबंधन विभाग की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से भी जुड़ा प्रश्न है।

सरकार को तीन स्तरों पर बनानी होगी योजना

बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए दीर्घकालिक नीति को कम से कम तीन स्तरों पर काम करना चाहिए।

पहला—आपदा के दौरान तत्काल राहत और सुरक्षित निकासी।

दूसरा—पानी उतरने के बाद घर, सड़क, बिजली, पेयजल और आजीविका की बहाली।

तीसरा—बार-बार बाढ़ में डूबने वाले परिवारों का स्थायी पुनर्वास।

तीसरे स्तर को सबसे अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत है।

स्थानीय लोगों की भागीदारी भी अनिवार्य होनी चाहिए। ग्रामसभा, स्थानीय प्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और प्रभावित परिवार योजना बनाने की प्रक्रिया में शामिल हों। जमीन पर रहने वाला व्यक्ति ही सबसे अच्छी तरह बता सकता है कि पानी कहां से आता है, कौन रास्ता बंद होता है और किस स्थान पर पुनर्वास व्यावहारिक होगा।

बाढ़ के बाद भी मीडिया की जिम्मेदारी खत्म नहीं होनी चाहिए

बाढ़ के दौरान मीडिया की नजर राहत शिविरों, जलस्तर और बचाव अभियानों पर रहती है। लेकिन पानी उतरने के बाद कैमरे और खबरें दूसरी जगह चली जाती हैं।

यहीं से एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता शुरू होनी चाहिए।

किसे घर मिला? किसे जमीन मिली? किस बच्चे की पढ़ाई छूटी? किस परिवार की आजीविका खत्म हुई? कितने लोगों का पुनर्वास हुआ? कितने परिवार वापस उसी डूब क्षेत्र में लौट गए?

इन सवालों की लगातार निगरानी जरूरी है।

क्योंकि बाढ़ की असली कहानी केवल पानी में डूबे घरों की तस्वीर नहीं है। असली कहानी यह भी है कि पानी उतरने के बाद उन घरों और परिवारों की जिंदगी कितनी बदली।

सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, समाज से भी है

बाढ़ के दौरान बिहार में सामाजिक सहयोग की मजबूत परंपरा दिखाई देती है। लोग भोजन, कपड़े, दवा और दूसरी जरूरी सामग्री लेकर प्रभावित इलाकों में पहुंचते हैं। यह मानवीय संवेदना समाज की बड़ी ताकत है।

लेकिन क्या बाढ़ उतरने के बाद भी हम उन परिवारों को याद रखते हैं?

किसी परिवार को एक सप्ताह भोजन उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन यदि वही परिवार अगले साल फिर उसी संकट में फंस जाता है तो समाज और व्यवस्था दोनों को अपने प्रयासों पर विचार करना होगा।

आखिर पुनर्वास का सवाल कौन पूछेगा?

बाढ़ का पानी एक दिन उतर जाएगा। सड़कें धीरे-धीरे सूख जाएंगी। राहत शिविर बंद हो जाएंगे। सरकारी अधिकारी अगली चुनौती की ओर बढ़ जाएंगे और अखबारों की सुर्खियां बदल जाएंगी।

लेकिन बिंद टोली जैसी बस्तियों में रहने वाले परिवारों की कहानी खत्म नहीं होगी।

वे फिर अपनी टूटी झोपड़ी खड़ी करेंगे, प्लास्टिक लगाएंगे, बच्चों को संभालेंगे और अगली बारिश का इंतजार करेंगे।

यही वह चक्र है जिसे तोड़ना होगा।

बिहार को ऐसी बाढ़ नीति चाहिए जिसमें राहत अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि पुनर्वास की पहली सीढ़ी हो। किसी गरीब को हर साल राहत देने से बेहतर है कि उसे एक बार सुरक्षित, सम्मानजनक और टिकाऊ जीवन दिया जाए।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि संकट के समय राहत कितनी तेजी से पहुंची। असली परीक्षा यह है कि संकट खत्म होने के बाद सबसे कमजोर नागरिक को दोबारा उसी संकट में लौटने से रोकने के लिए क्या किया गया।

बाढ़ आती रहेगी, नदियां उफनती रहेंगी। लेकिन क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?

यह सवाल सिर्फ बिंद टोली का नहीं, पूरे बिहार का है। इसका जवाब राहत की सूची में नहीं, पुनर्वास की जमीन पर दिखाई देना चाहिए।

आलोक कुमार

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