Saharsa :कोसी क्षेत्र में हर साल बाढ़ क्यों लौटती है?
कोसी क्षेत्र में हर साल बाढ़ क्यों लौटती है? नदी का स्वभाव, तटबंध और विकास मॉडल पर उठते सवाल
कोसी क्षेत्र में बाढ़ अब केवल बारिश के दिनों में आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह हर साल लौटने वाला ऐसा संकट बन चुकी है, जिसका असर खेतों, घरों, पशुपालन, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय रोजगार तक दिखाई देता है। बाढ़ के दौरान राहत और बचाव की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन पानी उतरने के बाद एक बड़ा सवाल फिर खड़ा हो जाता है—आखिर कोसी क्षेत्र में बाढ़ का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा है?
बिहार की कोसी नदी को लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता रहा है। हिमालय से निकलकर बिहार के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करने वाली यह नदी अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद और अवसाद लेकर आती है। नदी का स्वभाव ऐतिहासिक रूप से बदलता रहा है और इसके प्रवाह में बदलाव ने इसके आसपास बसे इलाकों को हमेशा बाढ़ के जोखिम में रखा है।
हिमालय से मैदान तक का सफर ही बनाता है संकट
कोसी की बाढ़ को समझने के लिए सबसे पहले उसके भौगोलिक चरित्र को समझना जरूरी है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में जब भारी बारिश होती है तो उसका पानी तेजी से नीचे की ओर आता है। इसका सीधा प्रभाव बिहार के मैदानी इलाकों में नदी के जलस्तर पर पड़ता है।
हिमालय अपेक्षाकृत युवा पर्वत श्रृंखला है। यहां भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और भू-क्षरण जैसी घटनाएं होती रहती हैं। इसके कारण बड़ी मात्रा में अवसाद नदी में पहुंचता है। जब यही नदी अपेक्षाकृत समतल मैदानी क्षेत्र में आती है तो उसकी गति और प्रवाह की स्थिति बदल जाती है तथा कई स्थानों पर गाद जमा होती रहती है।
इसलिए कोसी की बाढ़ को केवल बारिश से जोड़कर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे गाद, नदी की धारा, जलग्रहण क्षेत्र, तटबंध, जलनिकासी और मानव बस्तियों का आपस में जुड़ा हुआ संबंध है।
तटबंधों ने राहत दी, लेकिन सवाल भी खड़े किए
बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य से कोसी क्षेत्र में तटबंधों का निर्माण किया गया। इससे अनेक इलाकों को सामान्य परिस्थितियों में नदी के सीधे फैलाव से सुरक्षा मिली। लेकिन तटबंध किसी नदी की प्राकृतिक प्रवृत्ति को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते।
नदी के भीतर गाद जमा होने, जलप्रवाह बदलने और तटबंधों के बाहर स्थानीय जलनिकासी की समस्या जैसी स्थितियां कई जगह चुनौती पैदा करती हैं। जब बारिश का पानी और छोटी नदियों या नालों का पानी आसानी से बाहर नहीं निकल पाता, तब स्थानीय स्तर पर जलभराव गंभीर रूप ले सकता है।
यही कारण है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि तटबंध मजबूत हैं या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या नदी के पूरे तंत्र, जलनिकासी और आसपास के भूगोल को ध्यान में रखकर बाढ़ प्रबंधन की समीक्षा की जा रही है?
नेपाल से आने वाला पानी भी महत्वपूर्ण कारक
कोसी का बड़ा जलग्रहण क्षेत्र नेपाल में है। इसलिए बिहार में बाढ़ प्रबंधन को केवल राज्य की सीमा के भीतर की समस्या मानना व्यावहारिक नहीं होगा। भारत और नेपाल के बीच जल संसाधन प्रबंधन, मौसम की जानकारी, जलस्तर की निगरानी और बाढ़ पूर्व चेतावनी व्यवस्था का मजबूत होना बेहद जरूरी है।
ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अचानक अत्यधिक बारिश होने पर नीचे के इलाकों में तेजी से पानी बढ़ सकता है। ऐसे समय में कुछ घंटे पहले मिलने वाली विश्वसनीय चेतावनी भी हजारों लोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
लेकिन चेतावनी तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ गांव स्तर पर निकासी योजना, नाव, सुरक्षित स्थान, भोजन, दवा और पशुओं के लिए व्यवस्था भी मौजूद हो।
हर साल वही सवाल—स्थायी समाधान कहां है?
बाढ़ आने के बाद प्रशासन सक्रिय हो जाता है। नावें चलती हैं, राहत शिविर बनाए जाते हैं, प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाता है और भोजन तथा जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। यह तत्काल राहत जरूरी है, लेकिन असली चुनौती इससे आगे की है।
बाढ़ खत्म होने के बाद खेतों में जमा पानी, टूटी सड़कें, क्षतिग्रस्त घर, पशुओं की समस्या और बच्चों की पढ़ाई में आया व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है। गरीब और छोटे किसानों के लिए स्थिति और कठिन हो जाती है क्योंकि एक बाढ़ का आर्थिक नुकसान उनकी कई महीनों या वर्षों की आय को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए बाढ़ प्रबंधन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि राहत कितनी जल्दी पहुंची। यह भी देखना होगा कि अगली बाढ़ से पहले जोखिम कितना कम किया गया।
खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी असर
कोसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। बाढ़ के दौरान खड़ी फसल नष्ट हो सकती है। कई जगह खेतों में रेत और गाद जमा हो जाती है, जिससे अगली फसल की तैयारी महंगी हो जाती है।
छोटे और सीमांत किसानों के पास अक्सर नुकसान झेलने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं होते। फसल खराब होने के बाद बीज, खाद, सिंचाई और घरेलू खर्च का इंतजाम करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
बाढ़ का असर केवल किसान तक सीमित नहीं रहता। खेतिहर मजदूरों, छोटे दुकानदारों, पशुपालकों, स्थानीय परिवहन और ग्रामीण बाजारों की आय भी प्रभावित होती है। इस तरह बाढ़ धीरे-धीरे पूरे स्थानीय अर्थतंत्र को प्रभावित करती है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई अनिश्चितता
बदलते मौसम के कारण अत्यधिक बारिश की घटनाओं को लेकर भी चिंता बढ़ी है। बारिश का समय, तीव्रता और वितरण पहले जैसा न रहने से पुराने अनुभवों के आधार पर जोखिम का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है।
अब जरूरत केवल नदी का जलस्तर मापने की नहीं है। आधुनिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो यह अनुमान लगाने में मदद करे कि किस इलाके में कब तक पानी पहुंच सकता है, कितने परिवार प्रभावित हो सकते हैं और किन गांवों को पहले खाली कराने की जरूरत है।
यानी बाढ़ प्रबंधन को जलस्तर आधारित व्यवस्था से आगे बढ़ाकर जोखिम आधारित व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
समाधान राहत में नहीं, नदी को समझने में है
कोसी की बाढ़ का स्थायी समाधान किसी एक परियोजना या एक विभाग के भरोसे संभव नहीं है। इसके लिए नदी बेसिन के स्तर पर दीर्घकालीन योजना जरूरी है।
नेपाल के साथ बेहतर समन्वय, आधुनिक जलस्तर निगरानी, प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली, तटबंधों की नियमित तकनीकी समीक्षा, जलनिकासी व्यवस्था और गांवों में आपदा तैयारी को एक साथ मजबूत करना होगा।
इसके अलावा स्थानीय लोगों को भी बाढ़ प्रबंधन की योजना में शामिल किया जाना चाहिए। ग्रामीणों के पास नदी और पानी के व्यवहार का वर्षों का अनुभव होता है। स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक तकनीक के साथ जोड़ने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
अब हर साल की राहत नहीं, दीर्घकालीन नीति चाहिए
कोसी की बाढ़ हर साल राजनीतिक चर्चा और राहत घोषणाओं का विषय बनती है। लेकिन बाढ़ का स्थायी समाधान केवल घोषणा से संभव नहीं होगा। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, निरंतर निगरानी, दीर्घकालीन निवेश और विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम हर साल बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाने को ही सफलता मानते रहेंगे या बाढ़ आने से पहले नुकसान कम करने की रणनीति बनाएंगे?
कोसी को केवल बांधकर या नदी के प्राकृतिक व्यवहार को नजरअंदाज करके समस्या का समाधान करना आसान नहीं है। जरूरत नदी के स्वभाव को समझने और उसके साथ संतुलित विकास मॉडल तैयार करने की है।
कोसी क्षेत्र के लोगों को हर साल केवल यह सुनने की जरूरत नहीं कि बाढ़ प्राकृतिक आपदा है। उन्हें यह जानने का अधिकार भी है कि एक जैसी चुनौती बार-बार सामने आने के बावजूद जोखिम कम करने की तैयारी कितनी प्रभावी हुई है।
बाढ़ आएगी या नहीं, इसे पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं हो सकता। लेकिन बाढ़ आने पर कितने लोग प्रभावित होंगे, कितनी फसल नष्ट होगी, कितने घर डूबेंगे और कितने परिवार लंबे समय तक आर्थिक संकट में रहेंगे—इन नुकसान को कम करना नीति और प्रशासन की जिम्मेदारी है।
कोसी की बाढ़ इसलिए केवल नदी की समस्या नहीं है। यह बिहार के जल प्रबंधन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आपदा तैयारी और विकास मॉडल की भी परीक्षा है।
आलोक कुमार
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