Bihar : क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?
बिहार में बाढ़: राहत के बाद पुनर्वास का सवाल, क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?
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पटना। बिहार में बाढ़ कोई नई आपदा नहीं है। हर साल नदियां उफनती हैं, तटबंधों के भीतर और बाहर रहने वाली आबादी पानी से घिरती है, घर डूबते हैं, खेत बर्बाद होते हैं और प्रशासन राहत एवं बचाव अभियान शुरू करता है। नावें चलती हैं, राहत सामग्री बांटी जाती है, सामुदायिक रसोई शुरू होती है और सरकारी स्तर पर स्थिति की निगरानी की जाती है। यह सब जरूरी है।
लेकिन असली सवाल इसके बाद शुरू होता है—जब पानी उतर जाएगा, तब इन लोगों का क्या होगा?
बाढ़ के दौरान राहत दिखाई देती है, लेकिन पुनर्वास की चिंता अक्सर सुर्खियों से बाहर चली जाती है। यही बिहार की बाढ़ की सबसे बड़ी मानवीय विडंबना है।
पटना के कुर्जी स्थित बिंद टोली जैसे इलाके इस सवाल को और गंभीर बना देते हैं। यहां रहने वाले गरीब परिवारों के लिए बाढ़ केवल कुछ दिनों तक घर में पानी घुसने की समस्या नहीं है। कई परिवारों के लिए यह हर साल दोहराया जाने वाला विस्थापन है। झोपड़ी में पानी भरता है, घरेलू सामान खराब होता है, बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है और परिवारों को सुरक्षित स्थान की तलाश में भटकना पड़ता है। पानी उतरने के बाद वे फिर उसी जगह लौट आते हैं—क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं है।
बिंद टोली की कलावती देवी की पीड़ा इस संकट की पूरी तस्वीर सामने रखती है। उनका कहना है—“डूब गईल झोपड़ी हमार, काला प्लास्टिक लगल हई। ई एक साल की बात ने हई, दस साल से लीला हई।”
यह केवल एक महिला की पीड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें एक गरीब परिवार वर्षों तक बाढ़ और बेघर होने की आशंका के साथ जीवन जीने को मजबूर है।
राहत जरूरी है, लेकिन क्या राहत ही समाधान है?
बाढ़ के समय प्लास्टिक शीट, भोजन, पीने का पानी, दवा और अस्थायी आश्रय तत्काल जरूरतें हैं। इनके बिना प्रभावित परिवारों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। लेकिन यदि कोई परिवार दस वर्षों से हर मानसून में अपनी झोपड़ी बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो हर साल राहत सामग्री देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं कहा जा सकता।
यहां राहत और पुनर्वास के बीच अंतर समझना जरूरी है।
राहत का उद्देश्य तत्काल संकट से लोगों को बचाना है। पुनर्वास का उद्देश्य उन्हें ऐसी सुरक्षित और सम्मानजनक जगह देना है, जहां अगली बाढ़ उनके जीवन को फिर से शून्य पर न ला दे।
यही अंतर बिहार की बाढ़ नीति में सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।
बार-बार डूबने वाले परिवारों की पहचान जरूरी
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सरकार को ऐसे परिवारों की अलग से पहचान करनी चाहिए जिनके घर हर वर्ष या लगातार कई वर्षों से बाढ़ की चपेट में आते हैं।
इसके लिए स्थानीय स्तर पर वास्तविक सर्वे होना चाहिए। केवल कागजी सूची या पुराने आंकड़ों के आधार पर योजना बनाने के बजाय यह पता लगाया जाना चाहिए कि कौन परिवार कहां रहता है, कितनी बार विस्थापित हुआ है, उसके पास जमीन है या नहीं और उसकी आजीविका किस पर निर्भर है।
जहां स्थानीय स्तर पर सुरक्षा संभव हो, वहां बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए। जहां रहना जोखिमपूर्ण हो, वहां सम्मानजनक पुनर्वास कॉलोनी विकसित की जाए।
लेकिन पुनर्वास का अर्थ केवल जमीन का छोटा टुकड़ा या एक मकान देना नहीं होना चाहिए।
वहां सड़क, बिजली, पेयजल, जलनिकासी, विद्यालय, स्वास्थ्य सुविधा और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वहां रोजगार और आजीविका का अवसर उपलब्ध हो।
किसी गरीब परिवार को नदी किनारे से हटाकर शहर से बहुत दूर ऐसी जगह बसाना, जहां न काम हो और न पर्याप्त परिवहन, पुनर्वास नहीं बल्कि एक नए प्रकार का विस्थापन होगा।
बाढ़ का असर गरीबों पर ज्यादा क्यों पड़ता है?
बाढ़ का पानी अमीर और गरीब के घर में भेदभाव नहीं करता, लेकिन बाढ़ का नुकसान बराबर नहीं होता।
पक्का मकान वाला परिवार कुछ दिनों के लिए सुरक्षित स्थान पर जा सकता है। उसके पास बचत, वाहन या रिश्तेदारों के यहां रहने का विकल्प हो सकता है। गरीब परिवार के पास अक्सर इनमें से कोई सुविधा नहीं होती।
उसकी पूरी पूंजी एक छोटी झोपड़ी, कुछ बर्तन, कपड़े, राशन, मवेशी और रोज कमाकर खाने की व्यवस्था होती है। बाढ़ इनमें से किसी एक चीज को भी नुकसान पहुंचाती है तो परिवार कई महीने पीछे चला जाता है।
सबसे अधिक असर बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों पर पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। महिलाओं के सामने सुरक्षित शौचालय और रहने की समस्या बढ़ती है। बीमार लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच मुश्किल हो जाती है। दिहाड़ी मजदूरों का काम रुक जाता है।
इसलिए बाढ़ को केवल जल संसाधन या आपदा प्रबंधन विभाग की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से भी जुड़ा प्रश्न है।
सरकार को तीन स्तरों पर बनानी होगी योजना
बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए दीर्घकालिक नीति को कम से कम तीन स्तरों पर काम करना चाहिए।
पहला—आपदा के दौरान तत्काल राहत और सुरक्षित निकासी।
दूसरा—पानी उतरने के बाद घर, सड़क, बिजली, पेयजल और आजीविका की बहाली।
तीसरा—बार-बार बाढ़ में डूबने वाले परिवारों का स्थायी पुनर्वास।
तीसरे स्तर को सबसे अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत है।
स्थानीय लोगों की भागीदारी भी अनिवार्य होनी चाहिए। ग्रामसभा, स्थानीय प्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और प्रभावित परिवार योजना बनाने की प्रक्रिया में शामिल हों। जमीन पर रहने वाला व्यक्ति ही सबसे अच्छी तरह बता सकता है कि पानी कहां से आता है, कौन रास्ता बंद होता है और किस स्थान पर पुनर्वास व्यावहारिक होगा।
बाढ़ के बाद भी मीडिया की जिम्मेदारी खत्म नहीं होनी चाहिए
बाढ़ के दौरान मीडिया की नजर राहत शिविरों, जलस्तर और बचाव अभियानों पर रहती है। लेकिन पानी उतरने के बाद कैमरे और खबरें दूसरी जगह चली जाती हैं।
यहीं से एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता शुरू होनी चाहिए।
किसे घर मिला? किसे जमीन मिली? किस बच्चे की पढ़ाई छूटी? किस परिवार की आजीविका खत्म हुई? कितने लोगों का पुनर्वास हुआ? कितने परिवार वापस उसी डूब क्षेत्र में लौट गए?
इन सवालों की लगातार निगरानी जरूरी है।
क्योंकि बाढ़ की असली कहानी केवल पानी में डूबे घरों की तस्वीर नहीं है। असली कहानी यह भी है कि पानी उतरने के बाद उन घरों और परिवारों की जिंदगी कितनी बदली।
सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, समाज से भी है
बाढ़ के दौरान बिहार में सामाजिक सहयोग की मजबूत परंपरा दिखाई देती है। लोग भोजन, कपड़े, दवा और दूसरी जरूरी सामग्री लेकर प्रभावित इलाकों में पहुंचते हैं। यह मानवीय संवेदना समाज की बड़ी ताकत है।
लेकिन क्या बाढ़ उतरने के बाद भी हम उन परिवारों को याद रखते हैं?
किसी परिवार को एक सप्ताह भोजन उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन यदि वही परिवार अगले साल फिर उसी संकट में फंस जाता है तो समाज और व्यवस्था दोनों को अपने प्रयासों पर विचार करना होगा।
आखिर पुनर्वास का सवाल कौन पूछेगा?
बाढ़ का पानी एक दिन उतर जाएगा। सड़कें धीरे-धीरे सूख जाएंगी। राहत शिविर बंद हो जाएंगे। सरकारी अधिकारी अगली चुनौती की ओर बढ़ जाएंगे और अखबारों की सुर्खियां बदल जाएंगी।
लेकिन बिंद टोली जैसी बस्तियों में रहने वाले परिवारों की कहानी खत्म नहीं होगी।
वे फिर अपनी टूटी झोपड़ी खड़ी करेंगे, प्लास्टिक लगाएंगे, बच्चों को संभालेंगे और अगली बारिश का इंतजार करेंगे।
यही वह चक्र है जिसे तोड़ना होगा।
बिहार को ऐसी बाढ़ नीति चाहिए जिसमें राहत अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि पुनर्वास की पहली सीढ़ी हो। किसी गरीब को हर साल राहत देने से बेहतर है कि उसे एक बार सुरक्षित, सम्मानजनक और टिकाऊ जीवन दिया जाए।
लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि संकट के समय राहत कितनी तेजी से पहुंची। असली परीक्षा यह है कि संकट खत्म होने के बाद सबसे कमजोर नागरिक को दोबारा उसी संकट में लौटने से रोकने के लिए क्या किया गया।
बाढ़ आती रहेगी, नदियां उफनती रहेंगी। लेकिन क्या हर साल गरीब का घर ही डूबता रहेगा?
यह सवाल सिर्फ बिंद टोली का नहीं, पूरे बिहार का है। इसका जवाब राहत की सूची में नहीं, पुनर्वास की जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
आलोक कुमार
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