India : अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया

 


अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया है, बेरोजगारी, लाचारी और महंगाई ताक पर रख दी गई

पटना। चुनावी मौसम आते ही राजनीति का माहौल बदलने लगता है। मुद्दों की दुकान सजती है, बयान तेज होते हैं, आरोप-प्रत्यारोप बढ़ते हैं और जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए नए-नए राजनीतिक मुहावरे सामने आने लगते हैं। कोई विकास की बात करता है, कोई जातीय समीकरण का हिसाब लगाता है और कोई ऐसा मुद्दा उछाल देता है, जिस पर कुछ दिनों तक खूब चर्चा हो।

बिहार की राजनीति में इन दिनों “नाराज फूफा” जैसा एक राजनीतिक शगूफा भी चर्चा का विषय बना हुआ है। सुनने में यह मुहावरा भले ही हल्का-फुल्का और मनोरंजक लगे, लेकिन इसके बहाने एक गंभीर सवाल उठता है—जब घर का युवा बेरोजगार है, परिवार महंगाई से परेशान है और नौकरी की तलाश में वर्षों गुजर रहे हैं, तब चुनावी बहस का केंद्र कौन होना चाहिए?

क्या जनता के असली सवालों पर बात होनी चाहिए या फिर ऐसे राजनीतिक किस्सों पर, जो कुछ समय के लिए माहौल गर्म तो कर सकते हैं, लेकिन किसी परिवार की समस्या का समाधान नहीं करते?

बिहार का युवा रोजगार चाहता है

बिहार के युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते हैं। किसी को सरकारी नौकरी की उम्मीद है तो कोई शिक्षक, पुलिसकर्मी, कर्मचारी या दूसरी सरकारी सेवा में जाने का सपना देखता है।

लेकिन नौकरी की राह आसान नहीं है। परीक्षा के लिए वर्षों तैयारी करनी पड़ती है। इसके बाद आवेदन, परीक्षा की तारीख, परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति जैसी प्रक्रियाएं चलती रहती हैं।

कई बार एक भर्ती पूरी होने में इतना समय लग जाता है कि अभ्यर्थी की उम्र ही अगले अवसरों के करीब पहुंच जाती है।

एक युवा 21-22 साल की उम्र में तैयारी शुरू करता है। वह सोचता है कि कुछ वर्षों में नौकरी मिल जाएगी। लेकिन 25, 27 और 30 की उम्र कब सामने आ जाती है, उसे पता ही नहीं चलता।

यही बेरोजगारी की असली चिंता है।

बेरोजगारी के साथ जुड़ी है लाचारी

बेरोजगारी को सिर्फ आंकड़ों में नहीं समझा जा सकता। इसके साथ परिवार की आर्थिक और सामाजिक परेशानियां जुड़ी होती हैं।

शहर में रहकर तैयारी करने वाले विद्यार्थी कमरे का किराया, भोजन, कोचिंग, किताबें, इंटरनेट और यात्रा का खर्च उठाते हैं। गांव से आने वाले परिवारों के लिए यह खर्च और भी मुश्किल हो सकता है।

कई माता-पिता अपनी सीमित आमदनी से बच्चों की तैयारी का खर्च उठाते हैं। उन्हें भरोसा होता है कि बेटा या बेटी नौकरी हासिल करेगा और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरेगी।

लेकिन जब तैयारी कई वर्षों तक चलती है तो परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है।

युवा के सामने भी सवाल होता है—तैयारी जारी रखूं या कोई काम शुरू कर दूं?

यही वह स्थिति है जिसे लाचारी कहा जा सकता है।

महंगाई ने बढ़ाई परिवार की परेशानी

बेरोजगारी के साथ महंगाई आम परिवार की दूसरी बड़ी चिंता है। भोजन, किराया, शिक्षा, इलाज, बिजली, यात्रा और रोजमर्रा की जरूरतों पर होने वाला खर्च परिवार के बजट को प्रभावित करता है।

कमाई सीमित हो और खर्च लगातार बढ़ता जाए तो परिवार को हर महीने हिसाब लगाना पड़ता है कि किस खर्च को टाला जाए।

लेकिन राशन को कितना कम किया जा सकता है? बच्चे की पढ़ाई को कितना टाला जा सकता है? बीमारी का खर्च कैसे रोका जा सकता है?

यही कारण है कि महंगाई सिर्फ बाजार की खबर नहीं है। यह हर परिवार की रसोई और मासिक बजट से जुड़ा सवाल है।

चुनावी बहस में असली मुद्दे कहां हैं?

चुनाव लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अवसर है। इस दौरान जनता को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दल और उम्मीदवार उसके भविष्य के लिए क्या योजना रखते हैं।

बिहार के युवा पूछ सकते हैं—नई नौकरियां कितनी आएंगी? भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध कैसे बनाया जाएगा? परीक्षा और नियुक्ति के बीच देरी कैसे कम होगी? कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार कैसे मिलेगा?

किसान पूछ सकता है—उसे अपनी उपज की बेहतर कीमत कैसे मिलेगी?

मजदूर पूछ सकता है—स्थायी और सम्मानजनक काम के अवसर कहां हैं?

छोटा दुकानदार पूछ सकता है—उसके कारोबार को बढ़ाने के लिए क्या सहायता मिलेगी?

मध्यम वर्ग पूछ सकता है—बढ़ते खर्च और सीमित आय के बीच परिवार कैसे चले?

ये सवाल किसी एक वर्ग के नहीं हैं। ये बिहार के हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े सवाल हैं।

राजनीतिक शगूफा कुछ दिन चलता है, समस्या वर्षों

“नाराज फूफा” जैसी भाषा सोशल मीडिया और चुनावी चर्चा में लोगों का ध्यान खींच सकती है। बयान वायरल हो सकता है और राजनीतिक समर्थक उसके पक्ष-विपक्ष में बहस कर सकते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे बेरोजगार युवा को नौकरी मिलेगी?

क्या किसी गरीब परिवार का किराना बजट सुधरेगा?

क्या महंगाई से परेशान परिवार को राहत मिलेगी?

क्या परीक्षा देकर वर्षों से परिणाम और नियुक्ति का इंतजार कर रहे अभ्यर्थी की समस्या खत्म होगी?

राजनीतिक संवाद में हास्य और व्यंग्य की अपनी जगह हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में जनता के मूल सवालों की जगह उससे बड़ी होनी चाहिए।

जनता को जवाब चाहिए

बिहार का मतदाता अब सिर्फ भाषण सुनना नहीं चाहता। वह योजनाओं और वादों के साथ उनका रास्ता भी जानना चाहता है।

रोजगार कैसे बढ़ेगा?

सरकारी भर्ती कब और कितनी तेजी से पूरी होगी?

युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार कैसे मिलेगा?

शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कैसे कम होगी?

महंगाई के बीच गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को राहत कैसे मिलेगी?

छोटे कारोबार और स्वरोजगार को कैसे मजबूत किया जाएगा?

इन सवालों पर गंभीर बहस चुनावी राजनीति को ज्यादा उपयोगी बना सकती है।

चुनाव के बाद भी जनता के सवाल रहेंगे

चुनाव खत्म होने के बाद राजनीतिक नारों की आवाज कम हो सकती है, लेकिन बेरोजगार युवा की समस्या खत्म नहीं होगी।

जिस परिवार का बेटा नौकरी की तैयारी कर रहा है, वह परिणाम का इंतजार करता रहेगा। जिस घर का बजट महंगाई से बिगड़ा है, उसे अगले महीने भी खर्च चलाना होगा। जिस किसान को अपनी उपज की कीमत की चिंता है, उसकी चिंता चुनाव के बाद भी बनी रहेगी।

इसलिए चुनावी बहस को उन मुद्दों तक पहुंचना जरूरी है जो चुनाव के बाद भी जनता के साथ रहते हैं।

बिहार की राजनीति में शगूने आते-जाते रहेंगे, लेकिन जनता की समस्याएं स्थायी हैं।

नाराज कौन है, इससे बड़ा सवाल परेशान कौन है?

अगर राजनीतिक चर्चा में “नाराज फूफा” का शगूफा छोड़ा गया है, तो जनता को भी अपने सवाल पूछने चाहिए।

कौन नाराज है, यह कुछ दिनों की राजनीतिक चर्चा हो सकती है। लेकिन कौन बेरोजगार है, कौन महंगाई से परेशान है और कौन आर्थिक मजबूरी में जिंदगी काट रहा है, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।

बिहार का युवा शगूफा नहीं, रोजगार चाहता है।

परिवार सिर्फ भाषण नहीं, आर्थिक राहत चाहता है।

मजदूर सिर्फ चुनावी वादा नहीं, काम और सम्मानजनक मजदूरी चाहता है।

किसान सिर्फ आश्वासन नहीं, अपनी मेहनत की उचित कीमत चाहता है।

और आम मतदाता चाहता है कि चुनाव में उसकी जिंदगी से जुड़े सवालों पर गंभीरता से बात हो।

क्योंकि चुनाव किसी एक परिवार की नाराजगी दूर करने का मंच नहीं है। यह जनता के भविष्य का फैसला करने का अवसर है।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि फूफा नाराज हैं या खुश। सवाल यह होना चाहिए कि बेरोजगारी, लाचारी और महंगाई से परेशान आम आदमी की आवाज चुनावी बहस के केंद्र में कब आएगी?

यही वह सवाल है जिसका जवाब बिहार की राजनीति और राजनीतिक दलों, दोनों को देना चाहिए।


आलोक कुमार

Bihar : उम्र निकलने से पहले नौकरी पाने की चिंता में बिहार का युव


पटना। बिहार के हजारों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सम्मान और भविष्य को सुरक्षित करने का रास्ता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में युवा कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते हैं। लेकिन नौकरी पाने की इस दौड़ में एक चिंता लगातार बढ़ रही है—कहीं नौकरी की तैयारी करते-करते उम्र ही न निकल जाए।

एक युवा जब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू करता है तो उसके सामने सिर्फ परीक्षा पास करने की चुनौती नहीं होती। उसे कई वर्षों तक लगातार पढ़ाई करनी पड़ती है। कोचिंग, किताबें, किराया, इंटरनेट, यात्रा और दूसरी जरूरतों पर पैसा खर्च होता है। कई परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होते, फिर भी माता-पिता बेटे या बेटी की नौकरी की उम्मीद में अपनी बचत खर्च करते हैं। युवा भी यह सोचकर वर्षों तक तैयारी करता है कि एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो जिंदगी स्थिर हो जाएगी।

लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब भर्ती प्रक्रिया खुद लंबी होती जाती है।

विज्ञापन से नियुक्ति तक लंबा इंतजार

किसी सरकारी पद का विज्ञापन जारी होने के बाद परीक्षा की तारीख आने में कई महीने लग सकते हैं। परीक्षा की तारीख घोषित होने के बाद किसी कारण से बदलाव या स्थगन हो जाए तो अभ्यर्थियों की तैयारी का पूरा कार्यक्रम प्रभावित होता है।

परीक्षा हो जाने के बाद उत्तर कुंजी, आपत्ति और परिणाम की प्रक्रिया आती है। इसके बाद यदि अगला चरण है तो मुख्य परीक्षा, कौशल परीक्षा, शारीरिक परीक्षा, दस्तावेज सत्यापन या मेडिकल जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ सकती हैं।

अंतिम चयन के बाद भी नियुक्ति पत्र और ज्वाइनिंग का इंतजार अलग हो सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया में समय लगता है और इसका सीधा संबंध अभ्यर्थी की उम्र और अगले अवसरों से है।

उम्र सीमा बन जाती है सबसे बड़ी चिंता

सरकारी नौकरियों में अलग-अलग पदों के लिए निर्धारित आयु सीमा होती है। कई युवा 21-22 वर्ष की उम्र में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू करते हैं। अगर एक भर्ती की प्रक्रिया लंबी चलती है और उसमें सफलता नहीं मिलती तो अगली भर्ती तक उनकी उम्र तेजी से बढ़ती रहती है।

युवा के मन में सवाल उठता है—जिस परीक्षा के लिए दो-तीन साल लगाए, अगर उसमें चयन नहीं हुआ तो अगला मौका मिलेगा या नहीं?

यह डर उन उम्मीदवारों में ज्यादा होता है जो किसी भर्ती की अधिकतम आयु सीमा के करीब पहुंच चुके होते हैं। उनके लिए हर नई भर्ती सिर्फ एक अवसर नहीं बल्कि शायद आखिरी अवसर जैसी महसूस होने लगती है।

तैयारी का खर्च भी बढ़ता जाता है

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी मुफ्त नहीं होती। शहर में रहकर तैयारी करने वाले छात्रों को कमरे का किराया, भोजन, किताबें, कोचिंग, टेस्ट सीरीज और इंटरनेट जैसी जरूरतों पर लगातार खर्च करना पड़ता है।

गांव और छोटे शहरों से आने वाले युवाओं के लिए यह आर्थिक बोझ और बड़ा हो जाता है। कई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए ट्यूशन पढ़ाते हैं या पार्ट-टाइम काम करते हैं।

लेकिन नौकरी की तैयारी जितनी गंभीर होती है, उतना ही ज्यादा समय पढ़ाई को देना पड़ता है। ऐसे में कमाई और तैयारी के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है।

यदि भर्ती प्रक्रिया भी वर्षों तक चलती रहे तो परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है।

नौकरी के इंतजार का मानसिक दबाव

लंबे समय तक किसी परीक्षा के परिणाम का इंतजार करना भी आसान नहीं है। युवा परीक्षा की तैयारी करता है, परीक्षा देता है और फिर परिणाम की तारीख का इंतजार करता रहता है।

अगर परीक्षा स्थगित हो जाए तो तैयारी का शेड्यूल बिगड़ जाता है। रिजल्ट देर से आए तो अगली रणनीति तय करना मुश्किल होता है। चयन के बाद नियुक्ति में देरी हो तो उम्मीदवार के सामने यह दुविधा होती है कि दूसरी नौकरी स्वीकार करे या सरकारी नियुक्ति का इंतजार करे।

इस अनिश्चितता का असर आत्मविश्वास और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।

परिवार की उम्मीदें भी बढ़ती जाती हैं

बिहार में सरकारी नौकरी को लेकर परिवारों की उम्मीदें काफी मजबूत होती हैं। कई माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई को भविष्य में बेहतर जीवन की नींव मानते हैं।

लेकिन जब युवा 25 से 30 वर्ष या उससे अधिक उम्र तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता रहता है तो परिवार में सवाल उठने लगते हैं—नौकरी कब मिलेगी? अब आगे क्या करना है?

इस उम्र में कई युवाओं पर शादी और परिवार की जिम्मेदारी का दबाव भी बढ़ने लगता है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की जरूरत भी सामने आती है।

इसलिए सरकारी भर्ती में देरी सिर्फ परीक्षा से जुड़ा विषय नहीं है। इसका संबंध पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति से है।

सरकारी नौकरी के अवसर और आवेदकों की संख्या

सरकारी पदों की संख्या सीमित होती है, जबकि प्रतियोगी परीक्षाओं में आवेदन करने वाले युवाओं की संख्या बहुत अधिक हो सकती है। इसलिए हर उम्मीदवार का चयन संभव नहीं है।

यह प्रतियोगिता व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन उम्मीदवारों की मांग यह है कि कम से कम भर्ती की प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और पूर्वानुमानित हो।

अगर परीक्षा समय पर होगी, परिणाम समय पर आएगा और नियुक्ति भी तय समय में होगी तो उम्मीदवार अपने करियर की अगली योजना बना सकेगा।

भर्ती कैलेंडर का पालन क्यों जरूरी?

सरकारी भर्ती प्रक्रिया में एक स्पष्ट कैलेंडर युवाओं के लिए बड़ी राहत हो सकता है। विज्ञापन से लेकर परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति तक संभावित समयसीमा सार्वजनिक होनी चाहिए।

यदि किसी कारण से देरी होती है तो अभ्यर्थियों को इसकी जानकारी और संशोधित समयसीमा भी स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए।

डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से उम्मीदवार अपने आवेदन की स्थिति और भर्ती के प्रत्येक चरण की जानकारी आसानी से देख सकें, तो अनिश्चितता काफी कम हो सकती है।

सरकारी देरी का बोझ उम्मीदवार पर क्यों?

एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि अगर भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक देरी होती है और उम्मीदवार की उम्र इस दौरान बढ़ती रहती है, तो इसका पूरा नुकसान अभ्यर्थी ही क्यों उठाए?

यदि किसी भर्ती में आवेदन की पात्रता एक निश्चित तारीख को तय हुई थी और बाद में प्रक्रिया लंबे समय तक चली, तो ऐसी परिस्थितियों में उम्र सीमा को लेकर स्पष्ट और न्यायसंगत नीति पर विचार किया जाना चाहिए।

इससे उन उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है जिन्होंने समय पर आवेदन किया था, लेकिन प्रक्रिया में हुई देरी के कारण बाद की भर्तियों में उम्र सीमा के करीब पहुंच गए।

युवा मेहनत कर रहा है, व्यवस्था को भी समय की कीमत समझनी होगी

बिहार का युवा मेहनत से पीछे नहीं हट रहा है। गांवों, कस्बों और शहरों में हजारों विद्यार्थी सुबह से रात तक पढ़ाई कर रहे हैं। सीमित संसाधनों में भी वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

उनकी मांग कोई असंभव मांग नहीं है। वे सिर्फ ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें परीक्षा देने के बाद उन्हें वर्षों तक अनिश्चितता में न रहना पड़े।

नौकरी की तैयारी में किसी युवा के जीवन के तीन-चार साल निकल जाना केवल कैलेंडर के पन्ने बदलना नहीं है। यह उसकी उम्र, आर्थिक स्थिति, परिवार की जिम्मेदारियों और भविष्य की योजनाओं से जुड़ा समय है।

इसलिए भर्ती प्रक्रिया में होने वाली हर देरी का असर कागज पर दर्ज तारीख से कहीं बड़ा होता है।

बिहार के युवाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है—मेहनत करते-करते कहीं अवसर की उम्र न निकल जाए।

इस चिंता का समाधान केवल नई भर्तियां निकालने से नहीं होगा। जरूरत ऐसी भर्ती व्यवस्था की है जिसमें विज्ञापन से नियुक्ति तक प्रत्येक चरण के लिए स्पष्ट समयसीमा हो और उम्मीदवार को वर्षों तक इंतजार न करना पड़े।

क्योंकि युवा के पास सपने बहुत हैं, मेहनत करने का हौसला भी है, लेकिन इंतजार करने के लिए उसके पास अनंत समय नहीं है। 


आलोक कुमार

Bihar: सरकारी भर्ती में परीक्षा, रिजल्ट और नियुक्ति की लंबी प्रक्रिया


सरकारी भर्ती में परीक्षा, रिजल्ट और नियुक्ति की लंबी प्रक्रिया: उम्र निकलने से पहले नौकरी पाने की चिंता में बिहार का युवा

पटना। सरकारी नौकरी आज भी बिहार के लाखों युवाओं के लिए स्थायी रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का महत्वपूर्ण माध्यम है। गांव से लेकर शहर तक बड़ी संख्या में युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कोई शिक्षक बनने का सपना देखता है, कोई पुलिस, रेलवे, बैंक, सचिवालय या दूसरी सरकारी सेवाओं में जाना चाहता है। लेकिन नौकरी पाने की तैयारी जितनी कठिन है, उससे कम चुनौतीपूर्ण नहीं है भर्ती प्रक्रिया का लंबा इंतजार

एक युवा लिखित परीक्षा की तैयारी करता है, आवेदन करता है, परीक्षा देता है और फिर परिणाम की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है। परिणाम आने के बाद भी प्रक्रिया खत्म नहीं होती। कई भर्तियों में अगला चरण, दस्तावेज सत्यापन, शारीरिक परीक्षा, काउंसलिंग, मेरिट सूची और नियुक्ति पत्र तक पहुंचने में लंबा समय लग सकता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थी के सामने सबसे बड़ा सवाल रहता है—आखिर नौकरी कब मिलेगी?

परीक्षा की तैयारी में गुजर जाते हैं कई साल

बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए एक परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं होती। इसके पीछे कई महीनों और कई बार वर्षों की तैयारी होती है। किताबें, कोचिंग, टेस्ट सीरीज, इंटरनेट, रहने और खाने का खर्च—इन सब पर परिवार का पैसा खर्च होता है।

गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए यह खर्च और भी महत्वपूर्ण है। परिवार को उम्मीद रहती है कि बेटा या बेटी सरकारी नौकरी हासिल करके आर्थिक स्थिति सुधारेगा। लेकिन जब भर्ती प्रक्रिया लंबी होती जाती है तो तैयारी का खर्च भी बढ़ता जाता है।

युवा के सामने दूसरी चुनौती भी रहती है—उम्र। सरकारी नौकरियों में आयु सीमा निर्धारित होती है। यदि किसी भर्ती की प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती है तो अभ्यर्थी को यह चिंता सताने लगती है कि अगली भर्ती में वह पात्र रहेगा या नहीं।

परीक्षा के बाद शुरू होता है असली इंतजार

अभ्यर्थी के लिए परीक्षा का दिन अक्सर लंबे संघर्ष के बाद आता है। लेकिन परीक्षा समाप्त होते ही राहत नहीं मिलती। इसके बाद प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी, आपत्ति, संशोधित उत्तर कुंजी और परिणाम जैसी प्रक्रियाओं का इंतजार शुरू हो जाता है।

रिजल्ट में देरी होने पर युवा की तैयारी का पूरा कैलेंडर प्रभावित होता है। उसे यह भी पता नहीं होता कि अगली तैयारी किस परीक्षा के लिए करे और वर्तमान भर्ती का परिणाम कब आएगा।

यह स्थिति खासकर उन अभ्यर्थियों के लिए मुश्किल होती है जिनकी उम्र किसी भर्ती की अंतिम सीमा के करीब पहुंच रही होती है।

रिजल्ट के बाद भी नियुक्ति निश्चित नहीं

कई अभ्यर्थियों के लिए परिणाम में सफल होना अंतिम मंजिल नहीं होता। इसके बाद दस्तावेज सत्यापन, शारीरिक दक्षता परीक्षा, मेडिकल जांच, काउंसलिंग या अन्य प्रक्रियाएं हो सकती हैं।

यहीं से एक और लंबा इंतजार शुरू हो जाता है। अभ्यर्थी सफल होने के बावजूद यह निश्चित नहीं समझ पाता कि नियुक्ति पत्र उसके हाथ में कब आएगा।

सरकारी भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता और जांच जरूरी है। फर्जी प्रमाणपत्रों की जांच, आरक्षण संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन और योग्य उम्मीदवारों का चयन किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट समयसीमा तय नहीं की जा सकती?

उम्र निकलने का डर क्यों बढ़ रहा है?

बिहार के युवा के लिए उम्र केवल एक संख्या नहीं है। उसके साथ कई सपने और पारिवारिक जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं।

25-30 वर्ष की उम्र के बीच एक युवा नौकरी की तैयारी कर रहा होता है। कई बार वह निजी नौकरी छोड़कर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। कुछ युवा परिवार की आर्थिक मदद भी नहीं कर पाते क्योंकि उनका पूरा ध्यान परीक्षा पर होता है।

यदि भर्ती की प्रक्रिया लंबी होती है तो उम्र बढ़ती जाती है। एक भर्ती का इंतजार करते-करते दूसरी भर्ती की आयु सीमा समाप्त होने का डर पैदा हो जाता है।

इस स्थिति में युवा को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ता है—एक तरफ नौकरी की तैयारी और दूसरी तरफ उम्र निकलने की चिंता।

बेरोजगारी का असर केवल युवा पर नहीं पड़ता

सरकारी नौकरी न मिलना केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। इसके पीछे पूरा परिवार प्रभावित होता है।

जिस परिवार ने वर्षों तक पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए आर्थिक मदद की, वह भी परिणाम का इंतजार करता है। युवा की शादी, परिवार की जिम्मेदारी और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे सवाल भी नौकरी से जुड़े होते हैं।

कई परिवारों में युवा को यह सुनना पड़ता है कि आखिर पढ़ाई कब तक चलेगी और नौकरी कब मिलेगी।

इसलिए भर्ती प्रक्रिया में देरी को केवल प्रशासनिक समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है।

भर्ती प्रक्रिया में क्या सुधार हो सकता है?

सबसे जरूरी जरूरत है कि सरकारी भर्ती के लिए समयबद्ध कैलेंडर बनाया जाए। विज्ञापन जारी होने से लेकर नियुक्ति पत्र देने तक प्रत्येक चरण की संभावित समयसीमा सार्वजनिक होनी चाहिए।

दूसरा, परीक्षा और परिणाम के बीच अनावश्यक देरी कम होनी चाहिए। उत्तर कुंजी और आपत्ति प्रक्रिया को डिजिटल तरीके से अधिक व्यवस्थित किया जा सकता है।

तीसरा, अभ्यर्थियों को भर्ती की प्रत्येक अवस्था की जानकारी ऑनलाइन मिलनी चाहिए। उन्हें बार-बार अलग-अलग कार्यालयों या वेबसाइटों पर जानकारी खोजने की जरूरत न पड़े।

चौथा, यदि किसी भर्ती में असाधारण कारणों से देरी होती है तो संबंधित संस्था को अभ्यर्थियों को स्पष्ट कारण और नई समयसीमा बतानी चाहिए।

सरकार और भर्ती संस्थाओं के सामने बड़ा सवाल

सरकारी नौकरी की प्रतियोगिता कठिन होना स्वाभाविक है। लाखों उम्मीदवारों में से सीमित पदों पर चयन होना ही है। लेकिन प्रतियोगिता कठिन होने और प्रक्रिया लंबी होने में अंतर है।

युवाओं को केवल यह भरोसा चाहिए कि यदि उन्होंने मेहनत की, परीक्षा दी और सफल हुए तो पूरी प्रक्रिया निश्चित और समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगी।

भर्ती प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, युवाओं का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।

नौकरी की तैयारी को इंतजार की सजा न बनाया जाए

बिहार के युवा मेहनत से पीछे नहीं हट रहे हैं। गांवों में छोटे कमरों से लेकर शहरों की लाइब्रेरी तक हजारों युवा रोज घंटों पढ़ाई कर रहे हैं। उनके पास संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन उम्मीद बड़ी है।

जरूरत इस बात की है कि इस उम्मीद को लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण कमजोर न होने दिया जाए।

परीक्षा लेना सरकार की जिम्मेदारी है, निष्पक्ष परिणाम देना भी उसकी जिम्मेदारी है और सफल अभ्यर्थी को समय पर नियुक्ति देना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है।

बिहार के युवा को केवल नौकरी का अवसर नहीं चाहिए। उसे ऐसी भर्ती व्यवस्था चाहिए जिसमें उसे यह भरोसा हो कि परीक्षा से नियुक्ति तक का सफर वर्षों का अनिश्चित इंतजार नहीं बनेगा।

आखिर युवा की उम्र, समय और मेहनत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी सरकारी भर्ती की प्रक्रिया।


आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

 


बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव

प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

बेतिया। 8 सितंबर का दिन कैथोलिक कलीसिया के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन कुवांरी मां मरियम के जन्मोत्सव का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। पश्चिमी चंपारण के बेतिया पल्ली में भी मरियम के जन्मोत्सव को पल्ली दिवस के रूप में धार्मिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने सामूहिक प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।

बेतिया शहर की पहचान केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से नहीं है, बल्कि यहां की ईसाई धार्मिक परंपरा भी लंबे समय से लोगों के जीवन का हिस्सा रही है। क्रिश्चियन क्वार्टर स्थित नेटिविटी ऑफ द ब्लेस्ड वर्जिन मैरी कैथेड्रल, जिसे आम तौर पर बेतिया कैथेड्रल के नाम से जाना जाता है, स्थानीय कैथोलिक समुदाय के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है।

मरियम के जन्मोत्सव के अवसर पर कैथेड्रल परिसर में श्रद्धालुओं की उपस्थिति और धार्मिक वातावरण ने पूरे आयोजन को विशेष बना दिया।

धर्माध्यक्ष के नेतृत्व में हुआ पवित्र मिस्सा

पल्ली दिवस के अवसर पर बेतिया धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा अर्पित की गई। इस दौरान उनके साथ फादर एडिशन आर्मस्ट्रॉग, फादर माइकल, फादर पास्कल आनंद, फादर संदीप, फादर विपिन और फादर हेंद्री फर्नांडो सहित अन्य धर्मगुरु उपस्थित रहे।

पवित्र मिस्सा के दौरान कैथेड्रल में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से प्रार्थना की और धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लिया। मरियम के जन्मोत्सव को लेकर लोगों में विशेष उत्साह दिखाई दिया।

धार्मिक पर्व का यह अवसर केवल एक परंपरा निभाने तक सीमित नहीं रहा। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन अपने विश्वास को और मजबूत करने, प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर के करीब आने तथा परिवार और समुदाय के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव को महसूस करने का अवसर भी रहा।

आठ बच्चों के लिए यादगार बना दिन

इस समारोह का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण क्षण उस समय आया, जब आठ बच्चों ने पहली बार पवित्र परमप्रसाद ग्रहण किया।

धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस के करकमलों से बच्चों ने प्रथम परमप्रसाद ग्रहण किया। परमप्रसाद प्रदान करते समय धर्माध्यक्ष ने बच्चों से कहा—“ख्रीस्त का शरीर और रक्त।” बच्चों ने श्रद्धापूर्वक “आमेन” कहा और पवित्र परमप्रसाद ग्रहण किया।

कैथोलिक कलीसिया में प्रथम परमप्रसाद बच्चे के आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। यह बच्चों के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि विश्वास और कलीसियाई जीवन में उनकी भागीदारी के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जाता है।

इन आठ बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह दिन लंबे समय तक याद रहने वाला अवसर बन गया। बच्चों की तैयारी, धार्मिक शिक्षा और प्रथम परमप्रसाद के लिए परिवारों की भूमिका भी इस पूरे आयोजन में महत्वपूर्ण रही।

बाइबल, रोजरी और प्रमाण पत्र देकर किया सम्मानित

पवित्र मिस्सा के समापन के बाद प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करने वाले बच्चों को पल्ली की ओर से पवित्र बाइबल, रोजरी और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

बच्चों के लिए नाश्ते की भी व्यवस्था की गई। उपहार प्राप्त करते समय बच्चों में उत्साह दिखाई दिया। उनके परिजन भी इस विशेष अवसर के साक्षी बने।

किसी भी परिवार के लिए बच्चे का धार्मिक जीवन में एक नए चरण में प्रवेश करना भावनात्मक क्षण होता है। इसलिए प्रथम परमप्रसाद का यह अवसर बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता और परिजनों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

चर्च के बाद घरों में भी दिखा उत्सव

बेतिया पल्ली दिवस का उत्साह केवल कैथेड्रल परिसर तक सीमित नहीं रहा। धार्मिक कार्यक्रम के बाद कई परिवारों ने अपने घरों में भी सामाजिक आयोजन किए।

रिश्तेदारों, मित्रों और समुदाय के लोगों को आमंत्रित कर साथ में भोजन किया गया। इससे धार्मिक आयोजन में पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव का रंग भी जुड़ गया।

एक ओर चर्च में प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठान हुआ, वहीं दूसरी ओर घरों में परिवार और परिचितों के साथ खुशियां साझा की गईं। इस तरह मरियम के जन्मोत्सव ने आस्था और पारिवारिक एकता को एक साथ जोड़ने का अवसर दिया।

नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने का अवसर

धार्मिक पर्वों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विश्वास और परंपरा को पहुंचाने का माध्यम बनते हैं।

बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव का आयोजन भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। विशेषकर आठ बच्चों का प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करना यह दिखाता है कि नई पीढ़ी को धार्मिक शिक्षा और संस्कारों से जोड़ने की प्रक्रिया समुदाय के जीवन का हिस्सा है।

बच्चों के लिए ऐसे आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होते। इनके माध्यम से उन्हें प्रार्थना, धार्मिक मूल्यों, सामुदायिक जीवन और जिम्मेदारी की समझ विकसित करने का अवसर मिलता है।

बेतिया की धार्मिक विरासत से जुड़ा आयोजन

बेतिया की पहचान उसके ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ ईसाई धार्मिक विरासत से भी जुड़ी है। यहां का कैथेड्रल लंबे समय से स्थानीय कैथोलिक समुदाय के धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

ऐसे धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालुओं का एक साथ जुटना इस विरासत को जीवंत बनाए रखने में भी भूमिका निभाता है। पुरानी पीढ़ी जहां अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाती है, वहीं युवा और बच्चे उसमें अपनी भागीदारी के माध्यम से जुड़ते हैं।

यही कारण है कि पल्ली दिवस जैसे आयोजन को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह समुदाय के सामाजिक और पारिवारिक जीवन को भी जोड़ने वाला अवसर बन जाता है।

आस्था के साथ समुदाय का संदेश

मरियम के जन्मोत्सव के अवसर पर बेतिया पल्ली में आयोजित कार्यक्रम ने धार्मिक विश्वास के साथ सामुदायिक एकता की तस्वीर भी प्रस्तुत की।

पवित्र मिस्सा में भाग लेने वाले श्रद्धालु, धर्मगुरु, बच्चे और उनके परिवार एक ही धार्मिक आयोजन का हिस्सा बने। प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करने वाले बच्चों के लिए पूरे समुदाय की शुभकामनाएं और प्रार्थनाएं इस अवसर को और खास बनाती हैं।

धार्मिक आयोजन की सार्थकता केवल अनुष्ठान पूरा होने में नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले संदेश में भी होती है। प्रार्थना, विश्वास, परिवार और समुदाय के बीच संबंध मजबूत करना ऐसे पर्वों की महत्वपूर्ण विशेषता है।

बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव का पर्व श्रद्धा, प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया गया। धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा, आठ बच्चों का प्रथम परमप्रसाद और उसके बाद परिवारों में साझा की गई खुशियों ने इस दिन को विशेष बना दिया।

चर्च से लेकर घरों तक उत्सव का माहौल दिखाई दिया। बच्चों को पवित्र बाइबल, रोजरी और प्रमाण पत्र प्रदान करना उनके धार्मिक जीवन के नए चरण का स्वागत भी रहा।

बेतिया का यह पल्ली दिवस इस बात की सुंदर तस्वीर पेश करता है कि धार्मिक पर्व केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित नहीं होते। वे परिवारों को जोड़ते हैं, नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ते हैं और समुदाय को साथ खड़े होने का अवसर देते हैं।

मरियम के जन्मोत्सव पर बेतिया में यही आस्था, खुशी और सामुदायिक एकता देखने को मिली।

आलोक कुमार

Bihar : ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

 


ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

हुनर हाथ में है, प्रमाणपत्र जेब में है, फिर भी नौकरी की तलाश खत्म क्यों नहीं होती?

पटना। बिहार सहित देशभर में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों से तकनीकी प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं। किसी के हाथ में इलेक्ट्रिशियन का हुनर है, कोई फिटर है, कोई मशीन चलाना जानता है, तो कोई ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स या कंप्यूटर से जुड़ा प्रशिक्षण लेकर रोजगार की उम्मीद करता है। परिवार भी मानता है कि अब बच्चे के लिए कमाई का रास्ता खुल जाएगा।

लेकिन संस्थान से बाहर निकलते ही कई युवाओं को पता चलता है कि प्रशिक्षण पूरा होना और रोजगार मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।

यही बिहार के तकनीकी शिक्षा क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। अगर कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की जरूरत है और ITI-पॉलिटेक्निक के युवाओं के पास तकनीकी प्रशिक्षण है, तो फिर दोनों के बीच दूरी क्यों बनी हुई है?

असल समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या प्रशिक्षण बाजार और उद्योग की बदलती जरूरत के हिसाब से तैयार किया जा रहा है?

प्रमाणपत्र और नौकरी के बीच की दूरी

किसी युवा के पास ITI या पॉलिटेक्निक का प्रमाणपत्र होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन आज के रोजगार बाजार में सिर्फ प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है।

कंपनी को ऐसा कर्मचारी चाहिए जो मशीन को समझ सके, तकनीकी समस्या पहचान सके, सुरक्षा नियमों का पालन करे, कंप्यूटर आधारित सिस्टम पर काम कर सके और जरूरत पड़ने पर नई तकनीक सीख सके।

यहीं कई युवाओं को कठिनाई आती है।

अगर संस्थान में प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक मशीनों और वास्तविक कार्यस्थल का पर्याप्त अनुभव नहीं मिला, तो नौकरी के इंटरव्यू में प्रमाणपत्र होने के बावजूद व्यावहारिक सवालों का सामना करना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए अब प्रशिक्षण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने छात्र पास हुए।

बड़ा सवाल होना चाहिए—कितने छात्र प्रशिक्षण के बाद काम करने के लिए वास्तव में तैयार हुए?

उद्योग की जरूरत और पाठ्यक्रम में कितना तालमेल?

तकनीक तेजी से बदल रही है। आज उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सोलर तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल कंट्रोल और कंप्यूटर आधारित डिजाइन जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है।

ऐसे में तकनीकी शिक्षा भी लगातार बदलनी चाहिए।

अगर छात्र पुरानी तकनीक सीखकर निकलता है और नौकरी देने वाली कंपनी उससे नई मशीन और आधुनिक सिस्टम पर काम करने की उम्मीद करती है, तो दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से अंतर पैदा होगा।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक के पाठ्यक्रम को समय-समय पर उद्योग की वास्तविक जरूरत के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

बाजार बदल रहा है तो प्रशिक्षण भी बदलना होगा।

स्थानीय उद्योग से मजबूत रिश्ता क्यों जरूरी?

बिहार के लिए एक और बड़ी चुनौती है—तकनीकी संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के बीच कमजोर जुड़ाव।

जिस जिले या इलाके में ऑटोमोबाइल, निर्माण, कृषि उपकरण, इलेक्ट्रिकल, फर्नीचर, मशीनरी, सोलर या दूसरे तकनीकी कारोबार मौजूद हैं, वहां के प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय रोजगार बाजार की जरूरत समझनी चाहिए।

अगर किसी क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय अवसर नहीं हैं, तो उन्हें दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ता है।

यही कारण है कि तकनीकी शिक्षा को केवल संस्थान तक सीमित देखने के बजाय उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना जरूरी है।

बिहार में अगर छोटे उद्योग, MSME, सर्विस सेंटर और तकनीकी व्यवसाय बढ़ते हैं, तो ITI और पॉलिटेक्निक के युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

अप्रेंटिसशिप सिर्फ औपचारिकता न बने

कक्षा में किसी मशीन के बारे में पढ़ना और वास्तविक उद्योग में उसी मशीन पर काम करना एक जैसा अनुभव नहीं है।

यहीं अप्रेंटिसशिप महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर प्रशिक्षण के बाद युवा को कंपनी, वर्कशॉप, उद्योग या तकनीकी सेवा केंद्र में वास्तविक काम सीखने का अवसर मिलता है, तो उसके अंदर आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमता दोनों बढ़ते हैं।

लेकिन अप्रेंटिसशिप को सिर्फ कुछ महीनों का औपचारिक अनुभव बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें छात्र को पता हो कि उसे किस क्षेत्र में प्रशिक्षण मिलेगा, किस प्रकार का काम करना होगा और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद रोजगार की संभावना क्या है।

अच्छी अप्रेंटिसशिप वह है जो युवा को नौकरी के लिए तैयार करे, सिर्फ अनुभव प्रमाणपत्र न दे।

निजी कंपनियों को भी आगे आना होगा

सरकार हर प्रशिक्षित युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। रोजगार का बड़ा हिस्सा निजी उद्योगों, MSME, निर्माण कंपनियों, सर्विस सेंटर और स्थानीय व्यवसायों से आता है।

इसलिए निजी कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।

कंपनियां यह बता सकती हैं कि उन्हें किस प्रकार के कर्मचारियों की जरूरत है। संस्थान उसी अनुसार प्रशिक्षण विकसित कर सकते हैं। कंपनियां छात्रों को इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप दे सकती हैं और योग्य छात्रों की भर्ती भी कर सकती हैं।

इससे प्रशिक्षण → अनुभव → रोजगार की एक सीधी श्रृंखला बन सकती है।

हर छात्र नौकरी करेगा, यह जरूरी नहीं

तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी तलाशना नहीं होना चाहिए।

एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रिशियन अपना सर्विस कारोबार शुरू कर सकता है। ऑटोमोबाइल तकनीशियन वर्कशॉप खोल सकता है। सोलर तकनीक सीखने वाला युवक इंस्टॉलेशन और मरम्मत का काम कर सकता है। वेल्डिंग, मशीन रिपेयरिंग, प्लंबिंग और दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में भी छोटे व्यवसाय की संभावना है।

लेकिन इसके लिए तकनीकी कौशल के साथ व्यवसाय चलाने की जानकारी और शुरुआती पूंजी भी चाहिए।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उद्यमिता, डिजिटल भुगतान, ग्राहक प्रबंधन, हिसाब-किताब और छोटे व्यवसाय की बुनियादी जानकारी भी दी जानी चाहिए।

प्रशिक्षण की गुणवत्ता सबसे बड़ा सवाल

सिर्फ संस्थानों की संख्या बढ़ाने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी।

जरूरी है कि प्रशिक्षण केंद्रों में पर्याप्त प्रशिक्षक, आधुनिक उपकरण, प्रयोगशालाएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण की सुविधा हो।

युवा ने जिस मशीन पर पढ़ाई की है, अगर उसने उसे कभी वास्तविक रूप से चलाया ही नहीं, तो उसके प्रमाणपत्र का रोजगार बाजार में प्रभाव सीमित हो सकता है।

इसीलिए तकनीकी शिक्षा में Theory से ज्यादा Practical और Practical से ज्यादा Industry Exposure पर जोर देना होगा।

सफलता का पैमाना रोजगार होना चाहिए

किसी ITI या पॉलिटेक्निक की सफलता का मूल्यांकन केवल प्रवेश लेने वाले छात्रों और परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या से नहीं होना चाहिए।

यह भी देखा जाना चाहिए—

  • प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को नौकरी मिली?

  • कितनों को अप्रेंटिसशिप मिली?

  • कितनों को स्थानीय रोजगार मिला?

  • कितनों ने अपना व्यवसाय शुरू किया?

  • प्रशिक्षण के बाद उनकी आय में कितना बदलाव आया?

अगर इन आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाए तो छात्रों और अभिभावकों को भी बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

बिहार के लिए चुनौती के साथ अवसर भी

बिहार की बड़ी युवा आबादी को अगर सही तकनीकी प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़ा अनुभव और रोजगार का अवसर मिले तो यही युवा राज्य की आर्थिक ताकत बन सकते हैं।

इसके लिए प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय बाजार से जोड़ना होगा। उद्योगों को प्रशिक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा और युवाओं को सिर्फ प्रमाणपत्र देने के बजाय काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं की बेरोजगारी को केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या मानना सही नहीं होगा। यह शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, रोजगार बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच तालमेल का सवाल है।

युवा के हाथ में प्रमाणपत्र है, लेकिन अगर उस प्रमाणपत्र के साथ काम का अवसर नहीं है तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब समय आ गया है कि तकनीकी शिक्षा की सफलता को प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि रोजगार और आय के वास्तविक परिणाम से मापा जाए।

क्योंकि आखिरकार युवा को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि वह कह सके—“मैंने ITI या पॉलिटेक्निक किया है।”

उसे यह कहने का अवसर चाहिए—

“मेरे पास हुनर है और इसी हुनर से मैं अपने परिवार का भविष्य बना सकता हूं।”

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

 


बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

पटना। बिहार में युवाओं की संख्या राज्य की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन यही युवा वर्ग जब पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में निकलता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है—डिग्री के बाद काम क्या मिलेगा? सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और निजी क्षेत्र में सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि काम करने की वास्तविक क्षमता मांगी जाती है। ऐसे में कौशल विकास योजनाओं की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

बिहार सरकार ने युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए कई स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं। बिहार स्किल डेवलपमेंट मिशन यानी BSDM का उद्देश्य युवाओं को जरूरी कौशल देकर उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है। मिशन के पोर्टल पर प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन और रोजगार के अवसरों को एक साथ जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कौशल प्रशिक्षण सिर्फ प्रमाणपत्र पाने तक सीमित रहना चाहिए, या प्रशिक्षण के बाद युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था की होनी चाहिए?

प्रमाणपत्र से ज्यादा जरूरी है काम का हुनर

आज बिहार के हजारों युवा कंप्यूटर, भाषा, अकाउंटिंग, इलेक्ट्रिकल, तकनीकी और दूसरे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लेते हैं। कुशल युवा कार्यक्रम में भाषा एवं संवाद कौशल, बेसिक कंप्यूटर और सॉफ्ट स्किल जैसे विषय शामिल हैं। BSDM के अनुसार KYP का उद्देश्य युवाओं की employability यानी रोजगार पाने की क्षमता को बढ़ाना है।

लेकिन नौकरी के बाजार में केवल प्रमाणपत्र काफी नहीं होता।

किसी कंपनी को ऐसा युवा चाहिए जो कंप्यूटर पर वास्तविक काम कर सके, ग्राहक से बात कर सके, मशीन चला सके, डेटा संभाल सके, बिक्री कर सके या किसी तकनीकी समस्या का समाधान कर सके। इसलिए प्रशिक्षण का अगला चरण प्रैक्टिकल अनुभव होना चाहिए।

युवा को प्रशिक्षण केंद्र में सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे वास्तविक कार्यस्थल जैसी परिस्थितियों में काम करने का मौका मिलना चाहिए।

बिहार में कौशल विकास की जरूरत इतनी बड़ी क्यों है?

बिहार में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। लेकिन हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है। ऐसे में रोजगार के दूसरे रास्तों को मजबूत करना जरूरी है।

राज्य के योजना विभाग के अनुसार बिहार की बड़ी युवा आबादी के कारण रोजगार योग्य कार्यबल तैयार करना राज्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। कौशल विकास के क्षेत्र में KYP, डोमेन स्किलिंग, PMKVY, DDU-GKY, ITI, RSETI और अप्रेंटिसशिप जैसी विभिन्न पहलें चल रही हैं।

इसका अर्थ साफ है—बिहार में चुनौती सिर्फ युवाओं को प्रशिक्षण देने की नहीं है। चुनौती यह है कि जिस कौशल की ट्रेनिंग दी जा रही है, उस कौशल के लिए रोजगार भी मौजूद हो।

ITI और पॉलिटेक्निक छात्रों के लिए भी बड़ा सवाल

कौशल विकास की चर्चा अक्सर छोटे अवधि के प्रशिक्षण तक सीमित हो जाती है। लेकिन ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं के लिए भी उद्योग से सीधा जुड़ाव जरूरी है।

अगर किसी छात्र ने इलेक्ट्रिशियन, मशीनरी, ऑटोमोबाइल, फिटर, वेल्डिंग या दूसरे तकनीकी ट्रेड में प्रशिक्षण लिया है तो उसे प्रशिक्षण के बाद वास्तविक उद्योग में काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

यहीं पर अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार की नई रोजगार व्यवस्था भी प्रशिक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ने पर जोर दे रही है। बिहार रोजगार सेतु को निबंधन, प्रशिक्षण, प्रमाणन, सत्यापन और नियोजन को जोड़ने वाले एकीकृत मंच के रूप में विकसित किया गया है।

अगर इस व्यवस्था का प्रभाव गांव के युवा तक पहुंचता है तो यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है।

गांव के युवा के लिए प्रशिक्षण केंद्र कितना उपयोगी है?

बिहार में कौशल विकास का सबसे बड़ा परीक्षण गांवों में होना चाहिए।

पटना या बड़े शहर में रहने वाले युवा के पास इंटरनेट, कोचिंग, प्रशिक्षण संस्थान और नौकरी की जानकारी तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच हो सकती है। लेकिन ग्रामीण युवा के लिए समस्या अलग है।

उसे प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचने में किराया लगता है। कई बार परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि प्रशिक्षण के दौरान भी उसे काम करना पड़ता है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों की कमी भी उसके सामने बाधा बन सकती है।

इसलिए कौशल विकास योजना की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने नामांकन कराया।

सवाल होना चाहिए—

कितने युवाओं ने प्रशिक्षण पूरा किया?
कितनों ने प्रमाणपत्र हासिल किया?
कितनों को नौकरी मिली?
कितनों की आय बढ़ी?
और प्रशिक्षण के एक साल बाद कितने युवा उसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं?

यही आंकड़े किसी योजना की वास्तविक सफलता बताते हैं।

प्रशिक्षण बाजार की जरूरत के हिसाब से हो

कई बार युवा वही कोर्स चुनता है जिसके बारे में उसे जानकारी मिलती है। लेकिन हर कोर्स की स्थानीय बाजार में मांग समान नहीं होती।

अगर किसी जिले में सोलर उपकरण, मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल काम, स्वास्थ्य देखभाल, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं या कृषि आधारित कारोबार की मांग है तो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उसी के अनुसार तैयार करना चाहिए।

बिहार सरकार पहले भी मांग वाले क्षेत्रों में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण और मेगा स्किल सेंटर जैसी व्यवस्था की बात कर चुकी है।

यानी आगे की दिशा स्पष्ट है—युवा की रुचि और बाजार की जरूरत के बीच तालमेल।

नौकरी नहीं तो उद्यमिता का रास्ता

हर प्रशिक्षित युवा को नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं। लेकिन हर युवा के सामने आय का कोई रास्ता होना जरूरी है।

एक प्रशिक्षित युवक इलेक्ट्रिकल सर्विस शुरू कर सकता है। कोई मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोल सकता है। कोई डिजिटल सेवा केंद्र चला सकता है। कोई कृषि उपकरण की मरम्मत का काम कर सकता है। कोई स्थानीय स्तर पर सर्विस आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है।

इसलिए कौशल विकास के साथ उद्यमिता प्रशिक्षण, बैंक ऋण, बाजार और मार्गदर्शन को जोड़ना भी जरूरी है।

सरकार की रोजगार नीति में भी मांग आधारित प्रशिक्षण, उद्यमिता और निजी प्रतिष्ठानों के साथ साझेदारी को रोजगार बढ़ाने के महत्वपूर्ण माध्यमों के रूप में रखा गया है।

युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, रास्ता चाहिए

बिहार के युवा को सबसे ज्यादा जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें उसे शुरुआत से अंत तक मार्गदर्शन मिले।

उसे पता हो कि उसकी योग्यता के अनुसार कौन-सा कौशल उपयोगी है। उसे यह जानकारी मिले कि प्रशिक्षण कहां होगा। प्रशिक्षण के बाद नौकरी कहां मिलेगी। नौकरी के लिए आवेदन कैसे करना है। इंटरव्यू कैसे देना है। और अगर नौकरी नहीं मिलती तो अपना छोटा व्यवसाय कैसे शुरू किया जा सकता है।

यानी कौशल विकास को प्रशिक्षण केंद्र की चारदीवारी से बाहर निकालकर रोजगार की पूरी यात्रा से जोड़ना होगा।

असली सफलता रोजगार में दिखाई देगी

बिहार में कौशल विकास के लिए ढांचा तैयार हो रहा है। BSDM के पोर्टल पर हजारों प्रशिक्षण केंद्रों और लाखों प्रशिक्षार्थियों से जुड़े आंकड़े भी उपलब्ध हैं।

लेकिन आने वाले समय में जनता का सवाल संख्या से ज्यादा परिणाम पर होगा।

कितने युवा प्रशिक्षण के बाद अपने पैरों पर खड़े हुए?

कितनों की आय बढ़ी?

कितनों को बिहार में ही रोजगार मिला?

और कितने युवाओं को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ा?

कौशल विकास की असली सफलता प्रमाणपत्रों की संख्या में नहीं, युवाओं की बदलती जिंदगी में दिखाई देगी।

बिहार के युवा को सिर्फ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसके पास हुनर है। उसे ऐसा अवसर भी चाहिए जहां वह उस हुनर से अपनी आजीविका कमा सके।

आखिरकार सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं है। सवाल उस युवा के आत्मविश्वास का है जो वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद अपने परिवार से यह कहना चाहता है—“अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूं।”


आलोक कुमार

India : EPS-95 के पेंशनर्स के लिए साल 2026 भी उम्मीद

 


EPS-95 Pension Update 2026: ₹7,500 पेंशन का सच, ₹25,000 वेतन सीमा और Higher Pension पर बड़ा अपडेट

नई दिल्ली/पटना। Employees' Pension Scheme-1995 यानी EPS-95 के पेंशनर्स के लिए साल 2026 भी उम्मीद, मांग और इंतजार का साल बना हुआ है। देशभर में न्यूनतम पेंशन को मौजूदा ₹1,000 से बढ़ाकर ₹7,500 प्रतिमाह करने, महंगाई भत्ता यानी DA देने और पेंशनर्स व उनके जीवनसाथियों के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधा की मांग लगातार उठती रही है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—₹7,500 अभी EPS-95 की स्वीकृत न्यूनतम पेंशन नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में EPS-95 के तहत न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रतिमाह है। सरकार ने भी संसद में इसकी पुष्टि की है।

इसलिए सोशल मीडिया पर ₹7,500 पेंशन लागू होने का दावा देखने वाले पेंशनर्स को आधिकारिक आदेश के बिना ऐसी खबरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

₹7,500 पेंशन का सच क्या है?

EPS-95 पेंशनर्स की प्रमुख मांग है कि न्यूनतम मासिक पेंशन को बढ़ाकर ₹7,500 किया जाए। इसके साथ महंगाई भत्ता और बेहतर मेडिकल सुविधा की मांग भी जुड़ी हुई है।

लेकिन मांग और सरकारी फैसला एक ही चीज नहीं हैं।

वर्तमान आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रतिमाह है। EPS-95 के नियमों में भी न्यूनतम ₹1,000 की व्यवस्था दर्ज है।

इसलिए जब तक केंद्र सरकार की ओर से नई अधिसूचना या स्पष्ट वैधानिक आदेश जारी नहीं होता, ₹7,500 को लागू न्यूनतम पेंशन बताना सही नहीं होगा।

पेंशनर्स के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि वे वायरल पोस्ट, वीडियो या कथित सरकारी पत्र के बजाय EPFO और केंद्र सरकार के आधिकारिक स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करें।

₹7,500 की मांग क्यों तेज है?

EPS-95 के पेंशनर्स का तर्क है कि वर्षों पहले निर्धारित ₹1,000 की न्यूनतम पेंशन आज की महंगाई के मुकाबले बहुत कम है। वृद्धावस्था में दवा, भोजन, बिजली, किराया और रोजमर्रा के खर्च बढ़ने के कारण कम पेंशन पर जीवन चलाना कठिन हो सकता है।

पेंशनर्स संगठनों की ओर से इसलिए न्यूनतम पेंशन बढ़ाने के साथ DA और चिकित्सा सुविधा की मांग भी उठाई जाती रही है।

सरकार ने जुलाई 2025 में संसद में बताया था कि EPS-95 की न्यूनतम पेंशन ₹1,000 है और इसे बढ़ाने के संबंध में विभिन्न हितधारकों से प्रतिनिधित्व प्राप्त हुए हैं। साथ ही सरकार ने EPS के फंड की वित्तीय स्थिति और बजटीय सहायता का भी उल्लेख किया था।

इससे साफ है कि पेंशन बढ़ाने की मांग मौजूद है, लेकिन मांग को स्वीकृत निर्णय समझना उचित नहीं है।

₹25,000 Wage Ceiling को लेकर क्या स्थिति है?

EPS-95 से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण विषय Wage Ceiling है। मौजूदा EPS नियमों में पेंशन फंड में योगदान के लिए ₹15,000 प्रतिमाह की वेतन सीमा का प्रावधान मौजूद है। आधिकारिक EPS दस्तावेज में भी ₹15,000 की सीमा का उल्लेख है।

₹25,000 की वेतन सीमा बढ़ाने को लेकर चर्चाएं और दावे सामने आते रहे हैं। लेकिन पेंशनर्स को यह समझना चाहिए कि किसी प्रस्ताव, चर्चा या मीडिया रिपोर्ट को अंतिम लागू नियम नहीं माना जा सकता।

यदि भविष्य में वेतन सीमा बढ़ाने का औपचारिक निर्णय होता है तो उसके लिए संबंधित सरकारी अधिसूचना और लागू नियमों को देखना जरूरी होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Wage Ceiling में बदलाव और ₹7,500 न्यूनतम पेंशन दो अलग-अलग विषय हैं। वेतन सीमा बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मौजूदा EPS-95 पेंशनर की पेंशन अपने आप ₹7,500 हो जाएगी।

Higher Pension पर क्या है अपडेट?

EPS-95 से जुड़ा तीसरा महत्वपूर्ण विषय Higher Pension है। उच्च वेतन पर पेंशन से संबंधित प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महत्वपूर्ण बनी और EPFO ने पात्र सदस्यों के आवेदन तथा पेंशन निर्धारण की प्रक्रिया के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराई है।

EPFO के मौजूदा सदस्य पोर्टल पर “Track application status for Pension on Higher Wages” की सुविधा उपलब्ध है। EPFO ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके कैलकुलेटर से मिलने वाली राशि केवल अनुमानित है और वास्तविक गणना संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय के रिकॉर्ड के आधार पर होगी।

इसका मतलब यह है कि Higher Pension का मामला पात्र सदस्य की स्थिति, आवेदन और रिकॉर्ड पर निर्भर करता है। इसे ₹7,500 की न्यूनतम पेंशन की मांग के साथ मिलाकर नहीं देखना चाहिए।

पेंशनर्स सोशल मीडिया की खबरों से सावधान रहें

EPS-95 को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी खबरें वायरल होती हैं जिनमें कहा जाता है कि सरकार ने ₹7,500 पेंशन मंजूर कर दी, DA लागू कर दिया या पेंशनर्स को बड़ी राशि का एरियर मिलने वाला है।

ऐसी खबरों में सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बार पुरानी खबर को नई तारीख के साथ प्रसारित किया जाता है या किसी मांग को सरकारी निर्णय की तरह प्रस्तुत कर दिया जाता है।

पेंशनर्स को किसी भी बड़े दावे की पुष्टि के लिए EPFO की आधिकारिक वेबसाइट, सरकारी अधिसूचना और PIB/श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की जानकारी देखनी चाहिए।

EPFO की वेबसाइट पर पेंशन स्थिति और Higher Pension आवेदन की स्थिति जांचने की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

पेंशनर्स के लिए 2026 में तीन बड़े सवाल

EPS-95 से जुड़े मुद्दों को फिलहाल तीन हिस्सों में समझा जा सकता है।

पहला—₹7,500 न्यूनतम पेंशन: यह पेंशनर्स की प्रमुख मांग है, लेकिन अभी स्वीकृत न्यूनतम पेंशन नहीं है।

दूसरा—₹25,000 Wage Ceiling: मौजूदा आधिकारिक EPS नियमों में ₹15,000 की सीमा का प्रावधान है। ₹25,000 से जुड़ी किसी भी खबर को अंतिम सरकारी नियम मानने से पहले आधिकारिक अधिसूचना जरूरी है।

तीसरा—Higher Pension: पात्र सदस्यों के लिए उच्च वेतन पर पेंशन से जुड़ी प्रक्रिया EPFO के पोर्टल पर उपलब्ध है और आवेदन की स्थिति ऑनलाइन देखी जा सकती है।

निष्कर्ष: उम्मीद जारी, लेकिन आधिकारिक फैसला जरूरी

EPS-95 पेंशनर्स के लिए ₹7,500 न्यूनतम पेंशन की मांग निश्चित रूप से एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार न्यूनतम पेंशन अभी ₹1,000 प्रतिमाह है।

इसी तरह ₹25,000 Wage Ceiling से जुड़ी किसी भी जानकारी को अंतिम नियम मानने से पहले आधिकारिक अधिसूचना देखना जरूरी है। Higher Pension का मामला अलग है और पात्र सदस्यों के लिए EPFO की प्रक्रिया उपलब्ध है।

इसलिए EPS-95 पेंशनर्स के लिए 2026 का सबसे जरूरी संदेश यही है—

वायरल खबर पर नहीं, सरकारी आदेश पर भरोसा करें।

₹7,500 की मांग को लेकर उम्मीद और आंदोलन अपनी जगह हैं, लेकिन जब तक केंद्र सरकार औपचारिक फैसला नहीं करती, इसे लागू न्यूनतम पेंशन बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

पेंशनर्स का सवाल केवल राशि बढ़ाने का नहीं है। यह सम्मानजनक वृद्धावस्था, सामाजिक सुरक्षा और वर्षों की सेवा के बाद सुरक्षित जीवन का सवाल भी है।


आलोक कुमार

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