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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

India : जब नरेंद्र मोदी की राजनीति में ‘विश्वकर्मा’ का रूपक चर्चा में आया

 जब नरेंद्र मोदी की राजनीति में ‘विश्वकर्मा’ का रूपक चर्चा में आया

नरेंद्र मोदी और ‘विश्वकर्मा’ रूपक की चर्चा को समझिए। जानिए विश्वकर्मा जयंती, PM Vishwakarma योजना, कारीगरों के कौशल और राजनीतिक प्रतीकवाद के बीच क्या संबंध है।

भारतीय राजनीति में नेताओं और समर्थकों द्वारा किसी राजनीतिक व्यक्तित्व को ऐतिहासिक, धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों से जोड़ने की परंपरा पुरानी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में भी समय-समय पर ऐसे राजनीतिक रूपक सामने आते रहे हैं। ‘विश्वकर्मा’ का संदर्भ भी इसी व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतीकवाद को समझने का एक माध्यम बन सकता है।

हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नरेंद्र मोदी को आधिकारिक रूप से ‘विश्वकर्मा’ कोई पदवी नहीं मिली है और न ही यह कोई संवैधानिक या ऐतिहासिक उपाधि है। विश्वसनीय सार्वजनिक स्रोतों में अधिक स्पष्ट रूप से यह दिखाई देता है कि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने विश्वकर्मा को श्रम, कौशल, शिल्प और निर्माण से जोड़ा है।

17 सितंबर 2023 को केंद्र सरकार ने PM Vishwakarma योजना शुरू की थी। इस योजना का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को प्रशिक्षण, प्रमाण-पत्र, ऋण और अन्य सहायता उपलब्ध कराना है। योजना में 18 पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है।

विश्वकर्मा का प्रतीक और राजनीति

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प, वास्तु और सृजन से जोड़ा जाता है। इसलिए ‘विश्वकर्मा’ शब्द केवल धार्मिक संदर्भ तक सीमित नहीं रहता। आधुनिक सार्वजनिक विमर्श में यह मेहनत, हुनर और निर्माण की प्रतीकात्मक भाषा भी बन सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कारीगरों और कुशल श्रमिकों के योगदान को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा है। 2022 में उन्होंने विश्वकर्मा जयंती को मेहनत और श्रम के सम्मान से संबंधित बताया तथा कहा कि भारत में श्रमिक के कौशल में भी विश्वकर्मा का स्वरूप देखा गया है।

इस दृष्टि से ‘विश्वकर्मा’ रूपक को समझने का एक रास्ता यह है कि इसे किसी एक व्यक्ति के बजाय निर्माण और कौशल की राजनीति के रूप में देखा जाए।

मोदी की सार्वजनिक छवि और निर्माण का विमर्श

2014 के बाद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली में विकास, बुनियादी ढांचे, तकनीक, आत्मनिर्भरता और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। सरकार की ओर से भी विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं को आधुनिक भारत के निर्माण से जोड़ा जाता रहा है।

लेकिन किसी भी सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल राजनीतिक प्रतीकों से नहीं किया जा सकता। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, डिजिटल सेवाएं, उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में वास्तविक परिणामों को अलग-अलग आंकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों के आधार पर देखना पड़ता है।

यही वह बिंदु है जहां ‘विश्वकर्मा’ का रूपक राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर सार्वजनिक बहस का विषय बन सकता है।

प्रधानमंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण है कारीगर

विश्वकर्मा के प्रतीक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका संबंध मूल रूप से कौशल और निर्माण से है। इसलिए यदि इस प्रतीक का इस्तेमाल राजनीतिक संदर्भ में किया जाता है तो चर्चा केवल प्रधानमंत्री या किसी नेता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

देश के वास्तविक निर्माण में राजमिस्त्री, बढ़ई, लोहार, सुनार, कुम्हार, दर्जी, मोची, नाव निर्माता, मूर्तिकार, नाई, धोबी और ऐसे अनेक पारंपरिक कारीगरों की भूमिका है। PM Vishwakarma योजना में इन्हीं 18 पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है।

2026 में केंद्र सरकार ने भी PM Vishwakarma योजना के तहत 24 लाख से अधिक पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक कौशल, ऋण और बाजार सहायता से जोड़ने की जानकारी दी है।

इसलिए ‘विश्वकर्मा’ शब्द का सबसे व्यापक अर्थ उस श्रम और हुनर में दिखाई देता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को वास्तविक रूप से बनाता और चलाता है।

दाढ़ी से लेकर राजनीतिक प्रतीक तक

नरेंद्र मोदी की दाढ़ी भी उनकी सार्वजनिक छवि का एक चर्चित हिस्सा रही है। उनके पहनावे और व्यक्तिगत शैली पर अकादमिक और मीडिया विश्लेषण भी प्रकाशित हुए हैं।

लेकिन दाढ़ी की किसी पारंपरिक विश्वकर्मा चित्रात्मक छवि से समानता को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। ऐसी समानताएं यदि राजनीतिक या सोशल मीडिया विमर्श में सामने आती हैं तो उन्हें रूपक या प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए, ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं।

यही अंतर पत्रकारिता में महत्वपूर्ण है—किसी राजनीतिक प्रतीक की चर्चा की जा सकती है, लेकिन प्रतीक को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

विश्वकर्मा जयंती का राजनीतिक संदर्भ

17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती और नरेंद्र मोदी के जन्मदिन का अवसर एक ही दिन पड़ता है। 17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी संदेश में मोदी ने कारीगरों, शिल्पकारों और निर्माण से जुड़े कुशल श्रमिकों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया तथा उनके कौशल और मेहनत को विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से जोड़ा।

यह संयोग राजनीतिक संचार के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि एक ही दिन प्रधानमंत्री का जन्मदिन और विश्वकर्मा जयंती होने से नेतृत्व, श्रम, कौशल और निर्माण जैसे विषय एक ही सार्वजनिक विमर्श में दिखाई देते हैं।

लेकिन इसका अर्थ निकालते समय तथ्य और राजनीतिक प्रस्तुति के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

असली सवाल उपमा का नहीं, काम का है

किसी नेता को ‘विश्वकर्मा’ कहना हो या किसी दूसरे सांस्कृतिक प्रतीक से जोड़ना—यह राजनीतिक भाषा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन देश निर्माण किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है।

भारत को बनाने में किसान खेत में काम करता है, मजदूर निर्माण स्थल पर श्रम करता है, इंजीनियर डिजाइन तैयार करता है, वैज्ञानिक शोध करता है, शिक्षक नई पीढ़ी तैयार करता है और उद्यमी रोजगार पैदा करता है। सरकारी कर्मचारी प्रशासन चलाते हैं और करोड़ों नागरिक अपने-अपने क्षेत्र में योगदान देते हैं।

इसलिए विश्वकर्मा का रूपक यदि इस्तेमाल किया जाए तो उसकी सबसे व्यापक व्याख्या सामूहिक राष्ट्र निर्माण और श्रम के सम्मान में होनी चाहिए।

नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में ‘निर्माण’ और ‘विकास’ की भाषा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण रही है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दावे की अंतिम कसौटी प्रतीक या उपमा नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद नीतियां, आंकड़े और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम होते हैं।

आखिरकार, विश्वकर्मा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि निर्माण केवल कल्पना से नहीं होता। उसके लिए कौशल, श्रम, साधन और निरंतर प्रयास चाहिए। राजनीति में किसी नेता को इस प्रतीक से जोड़ना एक बात है, लेकिन उस प्रतीक से जुड़े श्रम और कारीगरों को सम्मान, अवसर और आर्थिक सुरक्षा देना उससे कहीं अधिक ठोस प्रश्न है।

यही वह जगह है जहां राजनीतिक प्रतीकवाद और वास्तविक राष्ट्र निर्माण के बीच अंतर दिखाई देता है।

आलोक कुमार

Bihar : दवा उपलब्धता और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा

 


दवा उपलब्धता और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा

सरकारी अस्पतालों में दवा की उपलब्धता स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा क्यों है? जानिए दवा स्टॉक, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र, आपूर्ति व्यवस्था, पारदर्शिता और मरीज की आर्थिक परेशानी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल।

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण अस्पताल की चमकदार इमारत, महंगी मशीनें या उद्घाटन के बड़े-बड़े दावे नहीं हैं। असली परीक्षा उस समय होती है, जब कोई गरीब मरीज डॉक्टर की पर्ची लेकर सरकारी अस्पताल की दवा खिड़की पर पहुंचता है और उसे जरूरत की दवा मिल जाती है।

मरीज के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था आंकड़ों का विषय नहीं है। उसके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था का मतलब है—समय पर डॉक्टर, जरूरी जांच, उपलब्ध दवा और बीमारी से राहत। यही कारण है कि सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता केवल स्वास्थ्य विभाग की प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आम लोगों के भरोसे से जुड़ा सवाल है।

सरकारी अस्पताल में आने वाला बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाला होता है। वह निजी अस्पताल का महंगा इलाज वहन नहीं कर सकता। इसलिए जब वह सरकारी अस्पताल पहुंचता है तो उसकी सबसे बड़ी उम्मीद होती है कि डॉक्टर की सलाह के बाद जरूरी दवा भी उसे यहीं मिल जाएगी। लेकिन यदि डॉक्टर पर्ची लिख दे और दवा खिड़की से जवाब मिले कि दवा उपलब्ध नहीं है, तो मरीज के सामने बाजार से दवा खरीदने के अलावा दूसरा विकल्प कम ही बचता है।

दवा नहीं तो मुफ्त इलाज का दावा अधूरा

स्वास्थ्य सेवा में दवा की उपलब्धता कोई छोटी समस्या नहीं है। इसका सीधा संबंध मरीज के उपचार और परिवार की आर्थिक स्थिति से है। गरीब परिवार के लिए बीमारी का खर्च पहले ही चिंता का कारण होता है। यदि अस्पताल में दवा न मिले और वही दवा बाहर से खरीदनी पड़े, तो सरकारी इलाज की वास्तविक लागत बढ़ जाती है।

बुखार, संक्रमण, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, सांस संबंधी बीमारी, बच्चों की सामान्य बीमारियों और बुजुर्गों की नियमित दवाओं में उपचार की निरंतरता विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। कुछ दिनों तक दवा न मिलने से मरीज की परेशानी बढ़ सकती है और कई मामलों में वह इलाज को बीच में छोड़ भी सकता है।

इसलिए सरकारी अस्पताल में दवा उपलब्धता को स्वास्थ्य व्यवस्था की मूलभूत जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए।

स्टॉक खत्म होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं

अस्पताल में किसी दवा का खत्म होना हमेशा किसी एक कर्मचारी की लापरवाही का परिणाम नहीं होता। खरीद प्रक्रिया में देरी, आपूर्ति श्रृंखला में समस्या, मरीजों की संख्या में अचानक वृद्धि, मांग का गलत अनुमान, भंडारण की कमी या वितरण व्यवस्था में व्यवधान इसके कारण हो सकते हैं।

लेकिन इन संभावित कारणों से प्रशासन की जिम्मेदारी कम नहीं होती। स्वास्थ्य विभाग के पास मरीजों की संख्या, बीमारी के सामान्य पैटर्न और पिछली दवाओं की खपत का रिकॉर्ड होता है। इन आंकड़ों के आधार पर आवश्यक दवाओं की मांग का अनुमान लगाया जा सकता है।

बेहतर व्यवस्था वही होगी जिसमें दवा खत्म होने के बाद कार्रवाई शुरू न हो, बल्कि स्टॉक कम होते ही अगली आपूर्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाए।

गांव के स्वास्थ्य केंद्र से शुरू होती है असली चुनौती

दवा उपलब्धता का सवाल केवल जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

यदि गांव या प्रखंड स्तर के स्वास्थ्य केंद्र पर सामान्य बीमारियों की आवश्यक दवाएं उपलब्ध रहें, तो छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए मरीजों को जिला मुख्यालय या बड़े अस्पतालों का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा।

इसके विपरीत यदि स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पर दवा नहीं मिलती और मरीज को बाहर की दुकान से खरीदने को कहा जाता है, तो उसके मन में स्वाभाविक सवाल उठता है कि जब सरकारी अस्पताल आया हूं तो दवा भी बाहर से क्यों खरीदूं?

ग्रामीण गरीब परिवारों के लिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दवा की कीमत के साथ आने-जाने का खर्च भी जुड़ जाता है।

मरीज को जानकारी क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

दवा व्यवस्था में पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है जितनी दवा की उपलब्धता। मरीज को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि अस्पताल में कौन-कौन सी आवश्यक दवाएं उपलब्ध हैं और किन दवाओं की कमी है।

यह जानकारी सूचना पट्ट, डिजिटल डिस्प्ले या ऑनलाइन माध्यम से दी जा सकती है। इससे मरीज को अनावश्यक रूप से अलग-अलग काउंटर पर भटकना नहीं पड़ेगा।

यदि कोई जरूरी दवा उपलब्ध नहीं है तो मरीज को केवल “बाहर से खरीद लीजिए” कहकर वापस भेज देना पर्याप्त व्यवस्था नहीं मानी जा सकती। जहां संभव हो, उसे उपलब्ध विकल्प और शिकायत निवारण की प्रक्रिया की जानकारी भी मिलनी चाहिए।

डॉक्टर की पर्ची और मरीज की जेब

सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की सलाह और अस्पताल की दवा आपूर्ति व्यवस्था के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। हर चिकित्सकीय स्थिति में वही दवा लिखना संभव नहीं है जो सरकारी स्टॉक में उपलब्ध हो, क्योंकि डॉक्टर का पहला दायित्व मरीज की चिकित्सकीय जरूरत देखना है।

लेकिन अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सामान्य और आवश्यक दवाओं का पर्याप्त स्टॉक बना रहे। खासकर उन दवाओं की उपलब्धता पर लगातार निगरानी होनी चाहिए जिनकी मांग नियमित रहती है।

क्योंकि मरीज के लिए इलाज का खर्च केवल डॉक्टर की फीस से तय नहीं होता। दवा, जांच, यात्रा और इलाज के दौरान काम से छुट्टी—इन सबका आर्थिक प्रभाव परिवार पर पड़ता है।

शिकायत के बाद नहीं, पहले हो निगरानी

दवा खत्म होने के बाद मरीज शिकायत करे और फिर व्यवस्था सक्रिय हो—यह आदर्श स्थिति नहीं है। स्वास्थ्य प्रशासन के पास ऐसा निगरानी तंत्र होना चाहिए जिससे पहले ही पता चल सके कि किस अस्पताल में कौन-सी दवा कितनी मात्रा में उपलब्ध है और कितने समय तक चल सकती है।

यदि किसी अस्पताल में एक ही दवा की कमी बार-बार सामने आती है तो केवल तत्काल अतिरिक्त स्टॉक भेजना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि कमी बार-बार क्यों पैदा हो रही है।

खरीद से लेकर भंडारण और वितरण तक पूरी श्रृंखला की समीक्षा जरूरी है।

स्वास्थ्य बजट का लाभ मरीज तक पहुंचे

स्वास्थ्य बजट बढ़ाना और नए अस्पताल बनाना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं, लेकिन अंतिम परिणाम मरीज तक पहुंचना चाहिए। अस्पताल की इमारत, उपकरण और आधुनिक सुविधाएं तभी सार्थक हैं जब जरूरत के समय मरीज को उपचार और आवश्यक दवा मिल सके।

स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन इसलिए केवल अस्पतालों की संख्या, भवनों या उपकरणों से नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि कितने मरीजों को समय पर आवश्यक दवा मिली, कितनी बार दवा का स्टॉक खत्म हुआ और दवा संबंधी शिकायतों का कितनी जल्दी समाधान किया गया।

असली परीक्षा दवा की खिड़की पर होती है

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा किसी सम्मेलन के मंच पर नहीं, बल्कि अस्पताल की दवा खिड़की पर होती है। वहां खड़ा मरीज यह नहीं पूछता कि स्वास्थ्य बजट कितना है या कितने नए उपकरण खरीदे गए हैं। उसका सीधा सवाल होता है—“डॉक्टर ने जो दवा लिखी है, वह यहां मिलेगी या नहीं?”

यही सवाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों और जनता के अनुभव के बीच की दूरी को सामने लाता है।

सरकार और स्वास्थ्य प्रशासन के सामने चुनौती केवल दवा खरीदने की नहीं, बल्कि सही दवा को सही समय पर सही स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने की है। इसके लिए मजबूत स्टॉक प्रबंधन, समय पर खरीद, पारदर्शी आपूर्ति व्यवस्था, नियमित निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही जरूरी है।

आखिरकार स्वास्थ्य सेवा का अंतिम पैमाना कागज पर दर्ज उपलब्धियां नहीं, बल्कि मरीज को मिली वास्तविक राहत है।

जिस दिन गरीब मरीज डॉक्टर की पर्ची लेकर सरकारी अस्पताल की दवा खिड़की पर पहुंचे और जरूरी दवा लेकर संतोष के साथ घर लौटे, उस दिन सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता जमीन पर दिखाई देगी।

क्योंकि अस्पताल में डॉक्टर की मौजूदगी इलाज की शुरुआत है, लेकिन जरूरी दवा का समय पर मिलना उस इलाज को पूरा करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है।

आलोक कुमार

Bihar : सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं, फिर भी मरीज निजी अस्पताल क्यों जाता है?

 


सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं, फिर भी मरीज निजी अस्पताल क्यों जाता है?

सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं, जांच की सुविधाएं हैं और गरीबों के लिए कम खर्च में इलाज की व्यवस्था भी है। फिर भी मरीज निजी अस्पताल की ओर क्यों जाता है? क्या वजह सिर्फ डॉक्टर की कमी है, या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐसी कई छोटी-बड़ी कमियां हैं जो मरीज का भरोसा कमजोर करती हैं?

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर हैं, विशेषज्ञ चिकित्सक हैं, जांच की सुविधाएं हैं, दवाओं की व्यवस्था है और गरीब एवं जरूरतमंद मरीजों के लिए उपचार अपेक्षाकृत कम खर्च में उपलब्ध होता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में मरीज निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम का रुख करते हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि डॉक्टर और संसाधन मौजूद होने के बावजूद मरीज को सरकारी अस्पताल में भरोसे का अनुभव क्यों नहीं होता?

यह सवाल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली से आगे बढ़कर पूरे सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही से जुड़ता है।

मरीज जब अस्पताल पहुंचता है तो वह केवल डॉक्टर नहीं खोजता। उसे समय पर पंजीकरण, जांच, दवा, साफ-सफाई, सम्मानजनक व्यवहार, बीमारी की स्पष्ट जानकारी और इलाज की निरंतरता चाहिए। यदि इन सेवाओं में बार-बार परेशानी आती है तो मरीज धीरे-धीरे निजी अस्पताल की ओर जाने लगता है।

डॉक्टर होना और इलाज मिलना एक बात नहीं

सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की नियुक्ति निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल डॉक्टर का पद स्वीकृत होना पर्याप्त नहीं है। डॉक्टर के साथ पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मचारी, पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी, दवाएं, उपकरण और आपातकालीन सुविधाएं भी जरूरी हैं।

कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर मौजूद होते हैं, लेकिन मरीजों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण प्रत्येक मरीज को पर्याप्त समय देना मुश्किल हो जाता है। मरीज अपनी पूरी समस्या नहीं बता पाता और उसे लगता है कि उसकी बात ठीक से सुनी नहीं गई।

दूसरी तरफ निजी अस्पताल में मरीज को अपेक्षाकृत अधिक समय, सुविधा और व्यक्तिगत मार्गदर्शन का अनुभव हो सकता है। इसके लिए उसे अधिक पैसा खर्च करना पड़े, फिर भी वह सुविधा के कारण निजी अस्पताल को चुन लेता है।

लंबा इंतजार भी बदल देता है मरीज का रास्ता

स्वास्थ्य सेवा में समय की अपनी कीमत होती है। यदि पंजीकरण के लिए लंबी कतार हो, जांच के लिए कई दिनों बाद तारीख मिले या रिपोर्ट के लिए मरीज को बार-बार अस्पताल आना पड़े, तो उसके सामने निजी विकल्प तलाशने की स्थिति बन जाती है।

गरीब मरीज के लिए भी समय मुफ्त नहीं होता। मजदूर की एक दिन की मजदूरी छूट सकती है। परिवार के किसी सदस्य को साथ आने पर उसका काम प्रभावित हो सकता है। गांव से जिला मुख्यालय या बड़े अस्पताल तक आने-जाने में किराया और भोजन का खर्च भी जुड़ जाता है।

इसलिए सरकारी अस्पताल की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि वहां कितने डॉक्टर हैं। यह भी देखा जाना चाहिए कि मरीज अस्पताल में पहुंचने के बाद कितने समय में आवश्यक इलाज, जांच और दवा प्राप्त करता है।

दवा और जांच उपलब्ध न हो तो भरोसा कैसे बने?

मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है। डॉक्टर जांच लिखता है या दवा लिखता है। लेकिन अस्पताल में संबंधित जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं है या मशीन खराब है। कभी दवा लिख दी जाती है, लेकिन अस्पताल में वह दवा उपलब्ध नहीं होती।

ऐसी स्थिति में मरीज को बाहर से जांच या दवा खरीदनी पड़ सकती है। यहीं से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उसका भरोसा कमजोर होने लगता है।

अस्पतालों में दवाओं और जांच सुविधाओं की उपलब्धता की नियमित निगरानी होनी चाहिए। अस्पताल में कौन-कौन सी जांच उपलब्ध है, कौन-सी मशीन चालू है और कौन-सी दवाएं उपलब्ध हैं—इसकी जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जा सकती है। इससे मरीज को पहले से जानकारी मिलेगी और अनावश्यक भागदौड़ कम होगी।

अस्पताल का व्यवहार भी इलाज का हिस्सा है

बीमारी के समय मरीज और उसके परिवार के लोग पहले से तनाव में होते हैं। ऐसे में यदि अस्पताल के किसी कर्मचारी से रूखा व्यवहार मिले या मरीज को अपनी समस्या बताने के लिए बार-बार भटकना पड़े, तो उसका भरोसा टूट सकता है।

यह भी सच है कि सरकारी अस्पतालों में काम का दबाव कई बार बहुत अधिक होता है। डॉक्टर, नर्स और अन्य कर्मचारी सीमित संसाधनों में बड़ी संख्या में मरीजों की सेवा करते हैं। इसलिए केवल कर्मचारी को दोष देने के बजाय व्यवस्था को भी देखा जाना चाहिए।

मरीज के लिए स्पष्ट हेल्प डेस्क, सूचना केंद्र और शिकायत निवारण व्यवस्था होनी चाहिए। उसे यह पता होना चाहिए कि समस्या होने पर किस अधिकारी से संपर्क करना है और शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई।

निजी अस्पताल सुविधा का अनुभव देता है

निजी अस्पतालों की ओर मरीजों के जाने का एक कारण सुविधा भी है। कई जगह डॉक्टर से परामर्श, जांच, रिपोर्ट, दवा और भुगतान की प्रक्रिया एक ही परिसर में पूरी हो जाती है।

सरकारी अस्पतालों को निजी अस्पतालों की नकल करने की जरूरत नहीं है, लेकिन मरीज-केंद्रित व्यवस्थाओं से सीखना जरूर चाहिए। डिजिटल पंजीकरण, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट, डिजिटल जांच रिपोर्ट, स्पष्ट सूचना-पट्ट, हेल्प डेस्क और मरीज मार्गदर्शन जैसी सुविधाएं सरकारी अस्पतालों में भी विकसित की जा सकती हैं।

तकनीक का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड रखना नहीं, बल्कि मरीज की परेशानी कम करना होना चाहिए।

रेफरल व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए

हर सरकारी अस्पताल में हर बीमारी का इलाज संभव नहीं है। समस्या तब होती है जब मरीज को आगे कहां जाना है, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल और जरूरत पड़ने पर मेडिकल कॉलेज तक रेफरल व्यवस्था व्यवस्थित होनी चाहिए। मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के बीच भटकना न पड़े, इसके लिए रेफरल प्रक्रिया को सरल बनाया जाना जरूरी है।

यदि डॉक्टर को लगता है कि मरीज को उच्च स्तर की चिकित्सा की आवश्यकता है, तो उसे उचित समय पर रेफर करने के साथ आगे की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।

जवाबदेही केवल डॉक्टरों की नहीं, पूरी व्यवस्था की हो

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर चर्चा होते ही अक्सर डॉक्टरों की अनुपस्थिति या कार्यशैली पर सवाल उठते हैं। डॉक्टरों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन पूरी समस्या का समाधान केवल डॉक्टर को जिम्मेदार ठहराने से नहीं होगा।

यह भी पूछा जाना चाहिए कि अस्पताल में कितने पद स्वीकृत हैं, कितने डॉक्टर और नर्स तैनात हैं, कितने पद रिक्त हैं, उपकरणों की स्थिति क्या है और दवाओं की आपूर्ति नियमित है या नहीं।

जहां कमी व्यवस्था की है, वहां समाधान भी व्यवस्था के स्तर पर होना चाहिए।

मरीज का भरोसा सबसे बड़ी पूंजी

सरकारी अस्पताल में इलाज का कम खर्च उसकी बड़ी ताकत है, लेकिन केवल सस्ता या मुफ्त इलाज मरीज को वहां बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। मरीज को विश्वास, सम्मान, समय और उपचार की निरंतरता चाहिए।

यदि उसे लगे कि उसकी बीमारी को गंभीरता से लिया जा रहा है, जांच समय पर होगी, दवा उपलब्ध होगी, डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ सहयोग करेंगे और जरूरत पड़ने पर आगे का उपचार भी सुनिश्चित होगा, तो निजी अस्पताल जाने की मजबूरी कम हो सकती है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं या नहीं। असली सवाल होना चाहिए—क्या पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था मरीज के लिए काम कर रही है?

सरकारी अस्पताल को मजबूत करने का अर्थ केवल नई इमारत बनाना या नए डॉक्टर नियुक्त करना नहीं है। इसका अर्थ है मरीज के अनुभव को स्वास्थ्य व्यवस्था के केंद्र में रखना।

अस्पताल के दरवाजे से लेकर उपचार की अंतिम अवस्था तक हर कदम सरल, पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए। जब डॉक्टर के साथ व्यवस्था भी मरीज को दिखाई देगी, तब सरकारी अस्पताल के प्रति भरोसा मजबूत होगा।

आखिरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता यही है कि मरीज मजबूरी में नहीं, भरोसे के साथ सरकारी अस्पताल पहुंचे।

आलोक कुमार

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

India : प्रधानमंत्री जी, जन्मदिन पर पेंशनभोगियों को 7,500 रुपये का तोहफा दीजिए

 
प्रधानमंत्री जी, जन्मदिन पर पेंशनभोगियों को 7,500 रुपये का तोहफा दीजिए

प्रधानमंत्री जी, जन्मदिन पर देश आपको शुभकामनाएं दे रहा है। क्या इस अवसर पर देश के लाखों EPS-95 पेंशनभोगियों की लंबे समय से चली आ रही ₹7,500 न्यूनतम पेंशन की मांग पर भी कोई ठोस पहल हो सकती है?

17 सितंबर का दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के कारण देश के सार्वजनिक जीवन में विशेष महत्व रखता है। प्रधानमंत्री मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था। उनके सार्वजनिक जीवन की यात्रा में 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। अक्टूबर 2025 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी उनके सरकार के प्रमुख के रूप में 25वें वर्ष में प्रवेश का उल्लेख किया था।

जन्मदिन के अवसर पर देशभर से शुभकामनाएं दी जाती हैं। लेकिन लोकतंत्र में शुभकामनाओं के साथ जनता की अपेक्षाएं और समस्याएं भी सत्ता तक पहुंचनी चाहिए। इसी संदर्भ में कर्मचारी पेंशन योजना यानी EPS-95 के पेंशनभोगियों की न्यूनतम पेंशन बढ़ाने की मांग एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दा है।

₹1,000 से ₹7,500 की मांग क्यों?

कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 के तहत न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रतिमाह निर्धारित है। यह न्यूनतम राशि 1 सितंबर 2014 से लागू है और केंद्र सरकार अतिरिक्त बजटीय सहायता के माध्यम से इसे सुनिश्चित करती है।

लेकिन समय के साथ जीवन-यापन की लागत बढ़ी है। बुजुर्ग पेंशनभोगियों के लिए दवाइयां, चिकित्सकीय जांच, भोजन, बिजली, आवागमन और अन्य रोजमर्रा के खर्च आय का बड़ा हिस्सा ले सकते हैं।

इसीलिए पेंशनभोगियों के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों की ओर से न्यूनतम पेंशन को बढ़ाकर ₹7,500 प्रतिमाह करने सहित अलग-अलग मांगें लंबे समय से उठाई जाती रही हैं। जुलाई 2025 में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने स्वयं संसद में बताया था कि EPS-95 की न्यूनतम पेंशन को मौजूदा ₹1,000 से बढ़ाने के लिए ट्रेड यूनियनों और जनप्रतिनिधियों सहित विभिन्न हितधारकों से अभ्यावेदन प्राप्त हुए हैं।

यानी यह केवल सोशल मीडिया पर उठने वाली मांग नहीं है। इसे विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों की ओर से सरकार के सामने रखा गया है।

पेंशनभोगियों के लिए नियमित आय का महत्व

बुढ़ापे में नियमित आय का महत्व बढ़ जाता है। कामकाजी जीवन में व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारियां निभाता है, रोजगार करता है और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में योगदान देता है। सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय का साधन सीमित हो जाने पर पेंशन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

EPS-95 को सरकार ने सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में वर्णित किया है। मार्च 2025 में श्रम मंत्रालय ने बताया कि इस योजना में सदस्य पेंशन, विकलांगता पेंशन, विधवा या विधुर पेंशन और बच्चों के लिए पेंशन जैसी विभिन्न सुविधाएं शामिल हैं। उसी जानकारी के अनुसार 2023-24 में EPS-95 के अंतर्गत लगभग 78.49 लाख पेंशनभोगी लाभ प्राप्त कर रहे थे।

इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि पेंशन का सवाल बड़ी संख्या में परिवारों से जुड़ा हुआ है।

₹7,500 की मांग पर सरकार क्या कहती है?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। ₹7,500 न्यूनतम पेंशन वर्तमान में सरकार द्वारा घोषित नई राशि नहीं है, बल्कि पेंशनभोगी संगठनों और अन्य हितधारकों की ओर से उठाई जाने वाली मांगों में से एक है।

वहीं सरकार ने जुलाई 2025 में संसद में बताया था कि EPS-95 के तहत मौजूदा न्यूनतम पेंशन ₹1,000 है। सरकार ने यह भी बताया कि पेंशन फंड में नियोक्ता का योगदान और केंद्र सरकार का बजटीय समर्थन शामिल होता है तथा योजना की वित्तीय स्थिति का आकलन किया जाता है।

इसलिए ₹7,500 की मांग पर निर्णय केवल घोषणा का विषय नहीं है। इसके लिए वित्तीय प्रभाव, योजना के फंड, सरकारी सहायता और दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा।

जन्मदिन पर क्यों उठ रही है यह मांग?

प्रधानमंत्री का जन्मदिन राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण सार्वजनिक चर्चा का अवसर बनता है। ऐसे अवसर पर किसी वर्ग की मांग को सामने रखना लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा हो सकता है।

पेंशनभोगियों की अपील भी इसी संदर्भ में है—यदि सरकार उचित समझे तो EPS-95 की न्यूनतम पेंशन पर गंभीरता से विचार किया जाए और पेंशनभोगियों को राहत देने के लिए कोई ठोस निर्णय लिया जाए।

₹7,500 की मांग को स्वीकार करना या नहीं करना सरकार का नीतिगत और वित्तीय निर्णय होगा। लेकिन इस मांग पर चर्चा और उसके आधार, लागत तथा संभावित प्रभाव को सार्वजनिक रूप से समझाना भी महत्वपूर्ण है।

पेंशन केवल आर्थिक मुद्दा नहीं

पेंशन का सवाल केवल रकम बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता का प्रश्न भी जुड़ा है।

किसी बुजुर्ग को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े, यह सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जा सकता है। इसलिए न्यूनतम पेंशन की राशि पर चर्चा करते समय महंगाई, चिकित्सा खर्च और वास्तविक जीवन-यापन लागत जैसे पहलुओं पर भी विचार होना चाहिए।

प्रधानमंत्री से एक विनम्र अपील

प्रधानमंत्री जी, 17 सितंबर को देश आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं देता है। इसी अवसर पर EPS-95 के लाखों पेंशनभोगियों की ओर से एक विनम्र अपील भी सामने रखी जा सकती है।

₹7,500 न्यूनतम पेंशन की मांग पर गंभीरता से विचार कीजिए।

यदि सरकार इस विषय पर कोई निर्णय लेती है, तो उससे पहले उसके वित्तीय और प्रशासनिक प्रभाव स्पष्ट करना भी जरूरी होगा। लेकिन पेंशनभोगियों की मांग को लगातार चर्चा और नीति-निर्माण के दायरे में रखना सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

जन्मदिन केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं, बल्कि समाज की अपेक्षाओं को सामने रखने का अवसर भी हो सकता है। देश के वरिष्ठ नागरिकों और पेंशनभोगियों की आवाज को भी इस सार्वजनिक संवाद में जगह मिलनी चाहिए।

जन्मदिन पर पेंशनभोगियों की यही उम्मीद है—उनकी न्यूनतम पेंशन ₹7,500 प्रतिमाह करने की मांग पर सरकार गंभीरता से विचार करे और यदि वित्तीय तथा नीतिगत रूप से संभव हो तो उन्हें राहत देने की दिशा में ठोस कदम उठाए।

क्योंकि सम्मानजनक वृद्धावस्था केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक सुरक्षा का भी विषय है।


आलोक कुमार

India : चुनाव के समय वादे और चुनाव के बाद जवाबदेही

 


चुनाव के समय वादे और चुनाव के बाद जवाबदेही

चुनाव के समय नेता जनता से वादे करते हैं, लेकिन चुनाव के बाद जनता उन वादों का हिसाब कैसे ले? यही सवाल लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती से जुड़ा है। चुनाव केवल वोट डालने और सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है। यह जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच एक सार्वजनिक समझ का अवसर भी है। चुनाव के दौरान सड़क, बिजली, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों, महिलाओं, युवाओं और सामाजिक कल्याण से जुड़े अनेक वादे किए जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद शुरू होती है।

चुनाव जीतने के बाद किसी प्रतिनिधि या सरकार के सामने केवल सत्ता चलाने की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि जनता को यह बताने की जिम्मेदारी भी होती है कि चुनाव के दौरान किए गए प्रमुख वादों पर क्या प्रगति हुई। इसी को लोकतांत्रिक जवाबदेही के व्यापक अर्थ में समझा जा सकता है।

चुनावी वादा केवल भाषण नहीं

चुनाव के समय किया गया वादा राजनीतिक भाषण का हिस्सा जरूर हो सकता है, लेकिन मतदाता के लिए वह सार्वजनिक राजनीतिक संकल्प की तरह महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए किसी वादे को सुनने के बाद केवल उत्साहित होने के बजाय कुछ बुनियादी सवाल भी पूछे जाने चाहिए।

वादे को पूरा करने के लिए धन कहां से आएगा? इसके लिए किस स्तर की सरकार जिम्मेदार होगी? क्या इसके लिए कानून या प्रशासनिक अनुमति की जरूरत है? समयसीमा क्या होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—चुनाव के बाद इस वादे की प्रगति की जानकारी जनता को कहां से मिलेगी?

ऐसे सवाल चुनावी चर्चा को केवल नारों से निकालकर वास्तविक नीतिगत बहस की ओर ले जा सकते हैं।

घोषणा से जमीन तक की दूरी

किसी योजना की घोषणा और उसके जमीन पर लागू होने के बीच कई चरण होते हैं। बजट आवंटन, प्रशासनिक स्वीकृति, भूमि उपलब्धता, तकनीकी प्रक्रिया, निविदा, विभागीय अनुमति और स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ सकती हैं।

इसलिए जनता को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि चुनाव के समय क्या घोषणा की गई थी। चुनाव के बाद यह भी देखना जरूरी है कि उस घोषणा पर वास्तव में क्या कदम उठाए गए।

क्या बजट में प्रावधान हुआ? क्या विभाग ने आदेश जारी किया? क्या काम शुरू हुआ? क्या निर्धारित समयसीमा है? कितना काम पूरा हुआ? और यदि काम रुक गया है तो आधिकारिक रूप से उसकी वजह क्या बताई गई है?

यही सवाल चुनावी वादे और वास्तविक काम के बीच का अंतर समझने में मदद करते हैं।

पांच साल बाद नहीं, लगातार सवाल

जवाबदेही का मतलब केवल अगले चुनाव में हिसाब मांगना नहीं है। लोकतंत्र में जनता को पूरे कार्यकाल के दौरान अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछने और सार्वजनिक जानकारी मांगने का अवसर होना चाहिए।

किसी क्षेत्र के नागरिक यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि उनके इलाके के लिए घोषित परियोजना की स्थिति क्या है, कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितना खर्च हुआ और काम किस स्तर पर पहुंचा।

एक जागरूक मतदाता अपने प्रतिनिधि से पूछ सकता है—पिछले चुनाव में जिन प्रमुख मुद्दों पर समर्थन मांगा गया था, उनमें से कितने पर काम शुरू हुआ? जो काम शुरू नहीं हुए, उनमें क्या बाधा है? क्या उनकी समयसीमा तय की गई है? और जनता को इसकी जानकारी कब दी जाएगी?

घोषणापत्र को संभालकर रखना चाहिए

राजनीतिक दलों के घोषणापत्र को केवल चुनावी प्रचार सामग्री समझने के बजाय सार्वजनिक दस्तावेज के रूप में देखा जा सकता है। मतदाता घोषणापत्र को सुरक्षित रखकर चुनाव के बाद उसकी समीक्षा कर सकते हैं।

नागरिक संगठन, पत्रकार, सामाजिक समूह और स्थानीय निवासी मिलकर सरल "वादे बनाम काम" सूची भी तैयार कर सकते हैं।

इसमें कुछ बिंदु शामिल किए जा सकते हैं—

  • चुनावी वादा क्या था?

  • इसके लिए जिम्मेदार सरकार या संस्था कौन है?

  • क्या बजट या प्रशासनिक स्वीकृति मिली?

  • काम शुरू हुआ या नहीं?

  • निर्धारित समयसीमा क्या है?

  • अब तक कितना काम हुआ?

  • देरी है तो आधिकारिक कारण क्या बताया गया?

ऐसी प्रक्रिया किसी दल के पक्ष या विपक्ष में प्रचार करने के बजाय सार्वजनिक पारदर्शिता बढ़ाने का नागरिक तरीका हो सकती है।

हर वादा सरकार के सीधे नियंत्रण में नहीं

जवाबदेही तय करते समय अधिकार क्षेत्र को समझना भी जरूरी है। हर समस्या का समाधान एक ही सरकार या जनप्रतिनिधि के अधिकार क्षेत्र में नहीं होता।

कुछ विषय केंद्र सरकार से जुड़े होते हैं, कुछ राज्य सरकार से और कई स्थानीय समस्याएं पंचायत, नगर निकाय या स्थानीय प्रशासन से संबंधित होती हैं। कुछ मामलों में न्यायिक प्रक्रिया, कानूनी प्रावधान, भूमि संबंधी विवाद या आर्थिक परिस्थितियां भी किसी परियोजना को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए किसी वादे के पूरे या अधूरे होने का मूल्यांकन करते समय यह देखना जरूरी है कि जिम्मेदारी किस संस्था की थी। तथ्यात्मक स्थिति समझे बिना केवल आरोप लगाना जवाबदेही की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

आंकड़े और दस्तावेज क्यों जरूरी हैं?

सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक दावे बहुत तेजी से फैलते हैं। कोई भाषण, वीडियो या पोस्ट कुछ ही घंटों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे माहौल में चुनावी वादों की समीक्षा करते समय दस्तावेज और प्रमाण महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सरकारी बजट, विभागीय आदेश, परियोजना रिपोर्ट, संसद या विधानसभा में दिए गए आधिकारिक उत्तर, स्थानीय निकायों के रिकॉर्ड और सरकारी योजनाओं की प्रगति संबंधी जानकारी नागरिकों और पत्रकारों के लिए उपयोगी हो सकती है।

पत्रकारिता की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है। चुनाव के दौरान नेताओं के भाषणों को प्रकाशित करना जरूरी है, लेकिन चुनाव के बाद उन्हीं घोषणाओं की स्थिति पर रिपोर्ट करना भी उतना ही महत्वपूर्ण जनहित का काम है।

जनता की भी जिम्मेदारी है

जवाबदेही केवल सरकार या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी नहीं है। मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

यदि जनता चुनाव के समय केवल भावनात्मक मुद्दों, व्यक्तिगत संबंधों, प्रचार या तत्काल लाभ के आधार पर चर्चा करती है और चुनाव के बाद अपने प्रतिनिधियों से कोई सवाल नहीं पूछती, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर हो सकती है।

मतदाता को उम्मीदवारों की घोषित प्राथमिकताओं, पिछले सार्वजनिक कार्यों, उपलब्ध रिकॉर्ड और भविष्य की योजनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही अपुष्ट सोशल मीडिया दावों से सावधान रहना चाहिए।

सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं

किसी निर्वाचित प्रतिनिधि से सवाल पूछना विरोध या दुश्मनी का प्रतीक नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक भागीदारी का स्वाभाविक हिस्सा है।

जनता पूछ सकती है कि सड़क कब बनेगी, अस्पताल में आवश्यक सुविधाएं कब उपलब्ध होंगी, विद्यालय में शिक्षकों की स्थिति क्या है, पेयजल योजना की प्रगति कितनी है या स्वीकृत परियोजना में देरी क्यों हो रही है।

इसी तरह जनप्रतिनिधियों के लिए भी उपलब्धियों के साथ अपनी सीमाओं और अधूरे कामों की स्थिति बताना पारदर्शिता का हिस्सा हो सकता है।

चुनावी वादों का सामाजिक ऑडिट

जरूरत इस बात की है कि चुनावी वादों की समीक्षा सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया बने। किसी क्षेत्र के नागरिक अपने प्रतिनिधि के प्रमुख वादों की सूची तैयार कर सकते हैं और समय-समय पर उनकी स्थिति की समीक्षा कर सकते हैं।

इससे चुनाव केवल पांच साल में एक बार होने वाली गतिविधि नहीं रहेगा। जनता और जनप्रतिनिधि के बीच पूरे कार्यकाल में संवाद और जवाबदेही की संस्कृति विकसित हो सकती है।

अंततः लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव होने से नहीं होती। उसकी गुणवत्ता इस बात से भी जुड़ी होती है कि जनता अपने प्रतिनिधियों से कितने सवाल पूछती है और शासन व्यवस्था उन सवालों का जवाब कितनी पारदर्शिता से देती है।

चुनाव के समय वादे सुनिए, चुनाव के बाद काम देखिए और पूरे कार्यकाल में सवाल पूछिए। यही सक्रिय नागरिकता का एक महत्वपूर्ण आधार है और जवाबदेह लोकतंत्र की दिशा में जरूरी कदम भी।


आलोक कुमार

India : युवाओं की राजनीति में भागीदारी क्यों जरूरी है?

 


युवाओं की राजनीति में भागीदारी क्यों जरूरी है?

अगर युवा राजनीति से दूर रहेंगे, तो उनके भविष्य से जुड़े फैसले कौन लेगा?
रोजगार से लेकर शिक्षा, महंगाई से लेकर स्वास्थ्य, डिजिटल सुविधा से लेकर पर्यावरण और गांव की सड़क से लेकर देश की नीतियों तक—हमारी जिंदगी का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा हो, जो राजनीतिक फैसलों से पूरी तरह अलग हो। ऐसे में राजनीति से दूरी बनाना केवल चुनाव से दूरी बनाना नहीं है, बल्कि उन निर्णय प्रक्रियाओं से भी दूर होना है, जो युवाओं के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करती हैं।

लोकतंत्र केवल मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें नागरिक अपने समाज, राज्य और देश की दिशा तय करने में अलग-अलग तरीकों से भाग लेते हैं। इस व्यवस्था में युवाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि युवा किसी भी देश की ऊर्जा, आकांक्षाओं और भविष्य की संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भारत जैसे विशाल और युवा देश में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि युवा राजनीति को केवल चुनाव, भाषण और सत्ता संघर्ष के रूप में देखते हैं या इसे सामाजिक बदलाव और जनभागीदारी का माध्यम भी मानते हैं।

राजनीति हमारे जीवन से अलग नहीं

अक्सर राजनीति को नेताओं और चुनावों तक सीमित समझ लिया जाता है। वास्तव में सड़क, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली, पानी, महंगाई, कृषि, उद्योग, कानून-व्यवस्था, डिजिटल सेवाएं और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर लिए गए फैसले आम नागरिक के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं।

इसलिए यदि युवा राजनीति से पूरी तरह दूरी बना लेते हैं, तो उनके जीवन को प्रभावित करने वाले फैसलों की प्रक्रिया में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी कम हो सकती है। लोकतंत्र में केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि सरकार क्या कर रही है; नागरिकों के लिए यह भी जरूरी है कि वे सवाल पूछें कि नीतियां कैसे बन रही हैं और उनका असर किस पर पड़ रहा है।

राजनीति में भागीदारी का मतलब केवल चुनाव लड़ना नहीं

युवाओं की राजनीतिक भागीदारी का अर्थ यह नहीं है कि हर युवा चुनाव लड़े या किसी राजनीतिक दल में शामिल हो। मतदान करना, उम्मीदवारों और दलों की नीतियों को समझना, जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना, स्थानीय समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाना, जनसुनवाई में शामिल होना, सामाजिक अभियानों से जुड़ना और सार्वजनिक नीतियों पर चर्चा करना भी राजनीतिक भागीदारी के महत्वपूर्ण रूप हैं।

एक जागरूक युवा अपने गांव, वार्ड या मोहल्ले की समस्या को उठाकर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है।

जागरूक मतदाता बनना पहली जिम्मेदारी

युवाओं की राजनीति में भागीदारी का सबसे व्यापक माध्यम मतदान है। लेकिन मतदान केवल जाति, धर्म, क्षेत्र, व्यक्तिगत संबंध या सोशल मीडिया प्रचार के आधार पर नहीं होना चाहिए।

मतदाता के लिए उम्मीदवार का सार्वजनिक रिकॉर्ड, उसके घोषित मुद्दे, स्थानीय समस्याओं पर उसका दृष्टिकोण और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही जैसे विषय महत्वपूर्ण हो सकते हैं। राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के दावों की जानकारी विश्वसनीय स्रोतों से जांचना भी जरूरी है।

युवा मतदाता यदि सवाल पूछने और जानकारी के आधार पर निर्णय लेने की आदत विकसित करें, तो लोकतांत्रिक संवाद अधिक मुद्दा-केंद्रित हो सकता है।

स्थानीय राजनीति से शुरुआत जरूरी

देश की बड़ी राजनीति पर चर्चा करना आसान है, लेकिन लोकतंत्र का प्रभाव सबसे पहले स्थानीय स्तर पर दिखाई देता है। गांव, पंचायत, नगर निकाय और वार्ड की समस्याओं से सीधे जुड़ना युवाओं के लिए राजनीतिक भागीदारी का व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।

सड़क, जलनिकासी, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल, स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन और रोजगार जैसे मुद्दों पर युवा अपने क्षेत्र के लोगों को संगठित कर सकते हैं और संबंधित प्रशासन या जनप्रतिनिधियों के सामने सवाल रख सकते हैं।

स्थानीय स्तर पर सक्रियता युवाओं को यह समझने में भी मदद कर सकती है कि सरकारी योजनाएं जमीन पर कैसे लागू होती हैं और नागरिकों की शिकायतों का समाधान किस प्रक्रिया से होता है।

नीति निर्माण में युवाओं की आवाज

आज युवाओं के सामने रोजगार और कौशल विकास के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल अर्थव्यवस्था, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्टार्टअप, उच्च शिक्षा और बदलते रोजगार बाजार जैसी नई चुनौतियां भी हैं।

इन विषयों पर नीतियां बनाते समय युवाओं के अनुभव और सुझावों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाना उपयोगी हो सकता है। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, युवा संगठनों और नागरिक समूहों में नीति संबंधी चर्चाएं युवाओं को केवल दर्शक के बजाय सक्रिय भागीदार बना सकती हैं।

राजनीति से दूरी के पीछे कई कारण

युवाओं की राजनीति में भागीदारी के रास्ते में कई बाधाएं भी हैं। राजनीति को लेकर निराशा, भ्रष्टाचार की धारणा, चुनावी खर्च, राजनीतिक परिवारवाद, अवसरों की असमानता और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी परिस्थितियां युवाओं को राजनीति से दूर कर सकती हैं।

कुछ युवा यह मान सकते हैं कि राजनीति में ईमानदार और नए लोगों के लिए अवसर सीमित हैं। ऐसी धारणा लोकतांत्रिक भागीदारी को प्रभावित कर सकती है। लेकिन राजनीति से दूरी बनाने के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझना तथा उनमें शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से भाग लेना अधिक रचनात्मक रास्ता हो सकता है।

सोशल मीडिया: अवसर भी, चुनौती भी

आज युवा अपने मोबाइल फोन से किसी सार्वजनिक मुद्दे को हजारों लोगों तक पहुंचा सकते हैं। सोशल मीडिया ने राजनीतिक संवाद को पहले की तुलना में अधिक व्यापक बनाया है। लेकिन इसके साथ गलत सूचना, अधूरी जानकारी और भावनात्मक प्रचार तेजी से फैलने की चुनौती भी मौजूद है।

इसलिए राजनीतिक जागरूकता के साथ सूचना की जांच करना भी जरूरी है। किसी वायरल पोस्ट को तुरंत सही मानने के बजाय उसके स्रोत, तारीख, संदर्भ और उपलब्ध प्रमाण को देखना चाहिए।

असहमति का सम्मान लोकतंत्र की ताकत

लोकतंत्र में सभी नागरिकों का एक जैसा विचार होना जरूरी नहीं है। किसी नीति का समर्थन करने वाले और उसका विरोध करने वाले दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

युवाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने के बजाय तथ्यों और तर्कों के आधार पर बहस की जा सकती है। किसी दल या नेता का समर्थक होना भी सवाल पूछने के अधिकार को समाप्त नहीं करता।

युवाओं को भीड़ नहीं, भागीदार बनना होगा

राजनीतिक दलों और संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को केवल चुनावी प्रचार, पोस्टर लगाने या सोशल मीडिया अभियान तक सीमित न रखें। युवाओं को संगठनात्मक जिम्मेदारी, नीति विमर्श और नेतृत्व के अवसर मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

वहीं युवाओं को भी केवल किसी व्यक्ति या दल के समर्थक के रूप में नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक के रूप में अपनी भूमिका समझनी होगी।

भारत का भविष्य केवल संसद और विधानसभाओं में बैठे जनप्रतिनिधियों से तय नहीं होगा। यह उन करोड़ों युवाओं की सोच और सक्रियता से भी बनेगा, जो आज कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, गांवों, शहरों, खेतों, उद्योगों, स्टार्टअप और सामाजिक संस्थाओं में काम कर रहे हैं।

इसलिए युवाओं के सामने राजनीति से भागने के बजाय उसे समझने और लोकतांत्रिक तरीके से उसमें भाग लेने का रास्ता है। राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम मानने के बजाय जनसेवा, नीति निर्माण, नागरिक भागीदारी और जवाबदेही के क्षेत्र के रूप में देखना जरूरी है।

युवा राजनीति में आएं तो सवालों के साथ आएं। नेतृत्व करें तो संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ करें। असहमति व्यक्त करें तो संवाद का रास्ता खुला रखें। और सबसे महत्वपूर्ण—किसी व्यक्ति या दल के अंधसमर्थक बनने के बजाय जागरूक नागरिक बनने की कोशिश करें।

लोकतंत्र की मजबूती केवल नेताओं से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों से होती है। जब नागरिकों में बड़ी संख्या युवाओं की हो, तब लोकतंत्र के भविष्य में युवाओं की सक्रिय भागीदारी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बन जाती है।


आलोक कुमार

बुधवार, 16 सितंबर 2026

India : समानता और विविधता एक-दूसरे की विरोधी नहीं

 

समान नागरिक संहिता की राह: समानता और विविधता के बीच संतुलन

 क्या भारत में सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानून बनाया जा सकता है, और क्या ऐसा करते समय देश की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता को सुरक्षित रखा जा सकता है? समान नागरिक संहिता यानी UCC पर बहस का मूल सवाल यही है।

भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) केवल कानून बनाने का विषय नहीं है। यह समानता, लैंगिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकार और देश की सामाजिक विविधता से जुड़ा संवेदनशील संवैधानिक प्रश्न है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करे। इसी संवैधानिक प्रावधान के कारण UCC पर समय-समय पर देश में गंभीर बहस होती रही है।

समान नागरिक संहिता का सामान्य अर्थ ऐसी नागरिक कानून व्यवस्था से है जिसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और गोद लेने जैसे मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय समान नागरिक नियम लागू हों। हालांकि भारत में इन विषयों को नियंत्रित करने वाले कानूनों का स्वरूप एक जैसा नहीं है और कई मामलों में व्यक्तिगत कानूनों के साथ अलग-अलग वैधानिक प्रावधान भी लागू होते हैं।

समानता का संवैधानिक सवाल

UCC के समर्थन में प्रमुख तर्क यह है कि समान नागरिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता हैं। विशेष रूप से विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे मामलों में महिलाओं के अधिकारों को लेकर लंबे समय से सुधार की मांग होती रही है।

किसी महिला या पुरुष के अधिकार केवल उसकी धार्मिक पहचान के कारण अलग क्यों हों, यह सवाल UCC की बहस के केंद्र में रहता है। लैंगिक समानता का अर्थ यह है कि नागरिक कानून किसी व्यक्ति के अधिकारों और दायित्वों के मामले में न्यायपूर्ण व्यवस्था उपलब्ध कराए।

लेकिन समानता का मतलब यह भी है कि सुधार की प्रक्रिया संवैधानिक अधिकारों के आधार पर हो। किसी समुदाय की धार्मिक पहचान को निशाना बनाना या सामाजिक परंपराओं को बिना पर्याप्त विचार के समाप्त करना समानता की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसलिए UCC पर चर्चा करते समय यह देखना महत्वपूर्ण है कि प्रस्तावित व्यवस्था वास्तव में नागरिक अधिकारों को मजबूत करती है या नहीं।

भारत की विविधता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है। यहां अलग-अलग धर्मों के साथ-साथ अनेक आदिवासी, क्षेत्रीय और स्थानीय समुदायों की अपनी सामाजिक परंपराएं हैं। विवाह, परिवार और उत्तराधिकार से जुड़े रीति-रिवाज भी कई स्थानों पर अलग-अलग हैं।

यही कारण है कि पूरे देश के लिए समान नागरिक कानून तैयार करना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं होगा। इसके सामाजिक प्रभावों पर भी गंभीर विचार करना होगा।

विशेष रूप से जनजातीय समुदायों की परंपराओं और उनके संवैधानिक संरक्षणों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। यदि किसी कानून में ऐसी सामाजिक वास्तविकताओं की पर्याप्त समझ नहीं होगी, तो उसके लागू होने के बाद व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं।

इसलिए UCC की बहस में केवल यह प्रश्न पर्याप्त नहीं है कि कानून समान होगा या नहीं। यह भी पूछा जाना चाहिए कि समान कानून अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों में किस तरह लागू होगा।

धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार

भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है। साथ ही संविधान समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों को भी महत्व देता है। इसलिए UCC की चर्चा में इन दोनों संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है।

धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं हो सकता कि नागरिक अधिकारों के मामले में किसी व्यक्ति को असमानता का सामना करना पड़े। दूसरी ओर, नागरिक कानून में समानता लाने का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि हर धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा को स्वतः समाप्त कर दिया जाए।

यहीं से UCC की असली संवैधानिक चुनौती सामने आती है—ऐसी व्यवस्था तैयार करना जो नागरिकों के अधिकारों की समान सुरक्षा करे और साथ ही संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रताओं का भी सम्मान करे।

क्या समान कानून ही पर्याप्त है?

किसी भी कानून की सफलता केवल उसके संसद से पारित होने पर निर्भर नहीं करती। कानून का प्रभाव इस बात से भी तय होता है कि लोग उसे कितना समझते हैं, स्वीकार करते हैं और व्यवहार में लागू करते हैं।

यदि UCC को केवल राजनीतिक बहस के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो इसके वास्तविक सामाजिक और कानूनी उद्देश्यों पर चर्चा पीछे छूट सकती है। इसके बजाय विवाह, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े वास्तविक सवालों पर सार्वजनिक चर्चा जरूरी है।

महिला संगठनों, कानून विशेषज्ञों, धार्मिक एवं सामाजिक प्रतिनिधियों, जनजातीय समुदायों, नागरिक समाज और आम नागरिकों की राय इस प्रक्रिया को अधिक व्यापक बना सकती है। अलग-अलग पक्षों को सुनकर तैयार किया गया कानून सामाजिक स्तर पर अधिक स्पष्टता पैदा कर सकता है।

महिलाओं के अधिकारों पर विशेष ध्यान जरूरी

UCC की बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिलाओं के अधिकार हैं। विवाह में अधिकार, तलाक की प्रक्रिया, भरण-पोषण, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे विषय सीधे महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को प्रभावित करते हैं।

इसलिए किसी भी प्रस्तावित नागरिक संहिता का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह महिलाओं को व्यवहारिक रूप से कितने समान अधिकार देती है। केवल कानून की भाषा में समानता पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को अपने अधिकारों तक वास्तविक पहुंच, कानूनी सहायता और न्याय पाने की प्रभावी व्यवस्था भी चाहिए।

इसी तरह बच्चों और कमजोर पारिवारिक सदस्यों के हितों की सुरक्षा को भी नागरिक कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए।

संवाद से बने रास्ते की जरूरत

UCC जैसे संवेदनशील विषय पर व्यापक संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है। अलग-अलग समुदायों की आशंकाओं को सुनना और उनके संवैधानिक आधार को समझना उतना ही जरूरी है जितना समान नागरिक अधिकारों की आवश्यकता पर चर्चा करना।

किसी भी प्रस्तावित व्यवस्था में यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका उद्देश्य किसी धार्मिक समुदाय की पहचान बदलना नहीं, बल्कि नागरिक मामलों में अधिकारों और कानूनी सुरक्षा की समानता सुनिश्चित करना है।

भारत जैसे विविध देश में कानून की स्वीकार्यता केवल उसके कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद विश्वास से भी जुड़ी होती है।

समान नागरिक संहिता भारत के संवैधानिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय है। इसके केंद्र में एक ओर समानता और लैंगिक न्याय का प्रश्न है, तो दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक विविधता की सुरक्षा की चिंता है।

इसलिए UCC पर बहस को केवल पक्ष और विपक्ष के राजनीतिक खांचे में सीमित करने के बजाय इसके वास्तविक कानूनी और सामाजिक प्रभावों पर चर्चा की जरूरत है।

भारत के लिए ऐसी नागरिक कानून व्यवस्था की आवश्यकता पर बहस हो सकती है जो सभी नागरिकों को समान अधिकार और न्याय की सुरक्षा दे। लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ते समय देश की बहुलतावादी सामाजिक संरचना, जनजातीय परंपराओं और संवैधानिक संरक्षणों को भी गंभीरता से समझना होगा।

समानता और विविधता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। चुनौती यह है कि दोनों के बीच ऐसा संवैधानिक संतुलन बनाया जाए, जिसमें नागरिक अधिकार मजबूत हों और भारत की विविध सामाजिक पहचान का सम्मान भी बना रहे।


आलोक कुमार

India : दिनकर की पंक्तियों से सियासत पर तीखा सवाल

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