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India :शिवलिंग पर टिप्पणी: अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आस्था का अपमान कब तक?

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शिवलिंग पर टिप्पणी: अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आस्था का अपमान कब तक? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन क्या इस स्वतंत्रता की कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए? रायपुर की कथित सोशल मीडिया टिप्पणी ने धर्म, अभिव्यक्ति और कानून के बीच संतुलन पर फिर बहस छेड़ दी है। रायपुर में छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल की भगवान शिव और शिवलिंग को लेकर कथित सोशल मीडिया टिप्पणी के बाद विवाद गहरा गया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एक सोशल मीडिया पोस्ट पर उनकी टिप्पणी को आपत्तिजनक माना गया, जिसके बाद शिकायत दर्ज हुई और पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने तथा समुदायों के बीच वैमनस्य से जुड़े कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की। उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किए जाने और न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की खबर भी सामने आई है। हालांकि, यहां एक बुनियादी कानूनी सिद्धांत को नहीं भूलना चाहिए—"गिरफ्तारी या आरोप किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करते।"किसी भी मामले में अंतिम निर्णय जांच, साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। इसलिए इस घटना पर चर्चा करते समय आ...

India : महिलाओं को संसद में जगह कब?

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  महिलाओं को संसद में जगह कब?   जिस देश में महिलाएं पंचायत से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी क्षमता साबित कर रही हैं, वहां संसद में उनकी हिस्सेदारी अब भी इतनी कम क्यों है? महिला आरक्षण कानून बन चुका है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ महिलाओं को कब मिलेगा? जवाब सिर्फ राजनीति में नहीं, बल्कि जनगणना, परिसीमन और चुनावी प्रक्रिया की उस कड़ी में छिपा है, जो 2026 में और महत्वपूर्ण हो गई है। भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का सवाल नया नहीं है। स्वतंत्रता के बाद महिलाओं को पुरुषों के समान मतदान का अधिकार मिला और वे चुनाव लड़कर संसद तथा विधानसभाओं तक पहुंचती रही हैं। लेकिन सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुपात में नहीं पहुंच पाया है। यही वजह है कि महिला आरक्षण को केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के सवाल के रूप में देखना जरूरी है। 2023 में संसद ने संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम पारित किया। इसे आम तौर पर महिला आरक्षण कानून कहा जाता है। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित क...

Bihar: बक्सर धर्मप्रांत में मसीही सत्संग मंडली और लोकभाषा में ईसाई संदेश की एक अनोखी यात्रा

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  जब अकेला चला एक व्यक्ति, तो बनता गया कारवाँ “एक पिता की मेज पर पड़ी छोटी-सी पुस्तिका ने बदली एक व्यक्ति की दिशा, भोजपुरी लोकभाषा और लोकधुनों के सहारे शुरू हुई यात्रा कैसे बनी मसीही सत्संग मंडली का कारवाँ?” बिहार के सामाजिक और धार्मिक इतिहास में ग्रामीण समाज की अपनी भाषा, लोकधुन और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का विशेष महत्व रहा है। इसी पृष्ठभूमि में बक्सर धर्मप्रांत से जुड़ी 'मसीही सत्संग मंडली' की यात्रा को एक अलग प्रयोग के रूप में देखा जा सकता है। इस पहल के जनक के रूप में "श्री प्यारेलाल"का नाम सामने आता है। उनके लिए यह केवल धार्मिक प्रचार का माध्यम नहीं था, बल्कि अपने समाज की भाषा और लोकसंस्कृति के भीतर आध्यात्मिक संदेश को अभिव्यक्त करने का प्रयास भी था। इस यात्रा की प्रेरणा उन्हें अपने पिता "स्वर्गीय लूकस मास्टर" के अधूरे कार्यों और सपनों से मिली। प्यारेलाल के अनुसार, एक दिन उन्हें अपने पिता की टेबल पर रखी ‘ईसायण’ नामक पुस्तिका मिली। दोहा-चौपाई की शैली में लिखी इस पुस्तिका ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने महसूस किया कि यदि धार्मिक संदेश को ग्रामीण ...

India : FCRA 2026: विदेशी फंड पर शिकंजा या सेवा संस्थानों पर संकट?

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सवाल सिर्फ चर्च का नहीं, उन करोड़ों भारतीयों का भी है जिन्हें स्कूल, अस्पताल, छात्रावास और सामाजिक सेवाएँ मिलती हैं । पटना। विदेशी चंदे और उससे जुड़े संगठनों की निगरानी किसी भी संप्रभु देश के लिए जरूरी है। विदेशी धन का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित के खिलाफ, अवैध गतिविधियों या वित्तीय अनियमितताओं के लिए न हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। लेकिन Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर उठ रही बहस ने एक महत्वपूर्ण सवाल सामने ला दिया है—क्या विदेशी फंड पर निगरानी की प्रक्रिया इतनी कठोर हो सकती है कि उसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जुड़ी संस्थाओं पर भी पड़ने लगे? FCRA Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य उन परिस्थितियों में विदेशी अंशदान और उससे बनी परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए व्यवस्था तैयार करना है, जब किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाए, संस्था स्वयं उसे वापस कर दे या उसका पंजीकरण समाप्त हो जाए। प्रस्तावित व्यवस्था में **Designated Authority** की भूमिका ...

Jharkhand : मांडर के आनंद डेविड खालखो बने राँची महाधर्मप्रांत के सहायक धर्माध्यक्ष, अभिषेक समारोह में उमड़ा विश्वासियों का जनसैला

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मांडर पल्ली से निकली धर्मसेवा की यात्रा अब राँची महाधर्मप्रांत के सहायक धर्माध्यक्ष के रूप में नई जिम्मेदारी तक पहुँची है। आनंद डेविड खालखो के धर्माध्यक्षीय अभिषेक समारोह में देशभर से धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, धर्मबहनों, जनप्रतिनिधियों और विश्वासियों ने भाग लेकर उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएँ दीं। राँची। राँची महाधर्मप्रांत में आज हर्ष और आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण रहा। मांडर पल्ली में जन्मे आनंद डेविड खालखो ने राँची के सहायक धर्माध्यक्ष के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली। उनके धर्माध्यक्षीय अभिषेक की पवित्र धर्मविधि श्रद्धा, प्रार्थना और धार्मिक परंपराओं के बीच सम्पन्न हुई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में धर्मगुरुओं और विश्वासियों की उपस्थिति ने समारोह को विशेष बना दिया। आनंद डेविड खालखो का जन्म 20 नवंबर 1975 को राँची महाधर्मप्रांत के मांडर पल्ली में हुआ था। मांडर पल्ली से धर्मपुरोहित के रूप में उनकी यात्रा शुरू हुई और अब वे इसी महाधर्मप्रांत के सहायक धर्माध्यक्ष के रूप में कलीसिया की सेवा के लिए अभिषिक्त हुए हैं। यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण पड़ाव है...

India : FCRA संशोधन पर बढ़ी चिंता: मिशनरी संस्थाओं ने गृह मंत्री अमित शाह के सामने रखीं अपनी आशंकाएँ

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क्या FCRA के नए नियमों से मिशनरी संस्थाओं के स्कूल, अस्पताल और सामाजिक सेवा कार्य प्रभावित होंगे? संसद में अमित शाह से हुई अहम मुलाकात ने इस बहस को फिर से राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। नई दिल्ली। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act – FCRA) को लेकर देशभर के ईसाई मिशनरी संस्थानों, सामाजिक संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं (NGO) के बीच चिंता लगातार बढ़ रही है। इसी पृष्ठभूमि में नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो के नेतृत्व में ईसाई मिशनरी संस्थाओं और राज्य प्रतिनिधिमंडलों ने संसद भवन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर FCRA से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। यह मुलाकात केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि उन हजारों संस्थाओं की चिंताओं को सामने रखने का प्रयास था जो वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और आदिवासी क्षेत्रों के विकास में कार्यरत हैं। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि वर्तमान नियमों और प्रस्तावित संशोधनों के कारण कई संस्थाओं के लिए अपना कार्य सुचारु रूप से जारी रखना कठिन होता जा रहा है। FCRA क्यों है महत्वपूर्ण? FCRA वह कानून है ...

India : 40 साल बाद बोफोर्स केस का कानूनी अंत: सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका भी खारिज की

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  40 साल बाद बोफोर्स केस का कानूनी अंत: सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका भी खारिज की नई दिल्ली। करीब चार दशक से भारतीय राजनीति, रक्षा सौदों की पारदर्शिता और भ्रष्टाचार की बहस के केंद्र में रहा बोफोर्स मामला अब अपनी लंबी कानूनी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 अगस्त 2026 को बोफोर्स मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले को चुनौती देने वाली अंतिम लंबित याचिका खारिज कर दी। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ के इस फैसले के साथ हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स को राहत देने वाले हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ चली अंतिम कानूनी चुनौती भी समाप्त हो गई। यह फैसला केवल एक पुराने मुकदमे का कानूनी समापन नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के उस अध्याय का भी अंत है, जिसने 1980 के दशक के अंत में सत्ता, विपक्ष और जनता के बीच भ्रष्टाचार को लेकर बहस का स्वरूप बदल दिया था। हालांकि बोफोर्स विवाद के राजनीतिक प्रभाव और उससे जुड़े सवाल आज भी भारतीय सार्वजनिक जीवन में चर्चा का विषय बने हुए हैं। क्या था बोफोर्स मामला? बोफोर्स विवाद की शुरुआत 1986 में भारत और...