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Bihar : चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

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  चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन? चुनाव के दौरान जनता राजा बन जाती है और उम्मीदवार रंक। लेकिन जैसे ही नतीजे आते हैं, तस्वीर पलट जाती है—रंक राजा बन जाता है और जनता फिर अपने ही चुने हुए प्रतिनिधि के दरबार में खड़ी दिखाई देती है। लोकतंत्र की असली चुनौती इसी उलटफेर को रोकने की है। लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प विडंबना यही है कि चुनाव के दौरान जिस जनता के दरवाजे पर नेता सिर झुकाकर पहुंचते हैं, वही जनता चुनाव परिणाम के बाद अक्सर अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती नजर आती है। वोट मांगते समय जनता सर्वोपरि होती है, लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हैसियत बढ़ जाती है। यही सवाल आज बिहार की राजनीति में भी महत्वपूर्ण है। जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक के रूप में शपथ लेना उनके राजनीतिक सफर का नया अध्याय है। राजनीति और चुनावी रणनीति के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले प्रशांत किशोर अब विधानसभा के भीतर बैठकर विधायी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। रणनीतिकार से ‘माननीय’ बनने का यह सफर केवल पद परिवर्तन नहीं है। इसके स...

Bihar : कोसी का कहर

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  कोसी का कहर: छह माह में रिपोर्ट का वादा, छह साल में निष्कर्ष और 18 साल बाद भी अधूरे जख्म छह महीने में जांच पूरी करने का दावा था, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह साल लग गए। रिपोर्ट आई तो सवालों के जवाब और जवाबदेही दोनों अधूरे रह गए। 18 साल बाद भी कोसी के हजारों परिवारों के लिए टूटे पुल, अधूरे घर, मुआवजे और पुनर्वास के सवाल जिंदा हैं। 18 अगस्त 2008 की तारीख कोसी अंचल के लाखों लोगों की स्मृति में आज भी एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। नेपाल के कुसहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। सुपौल, मधेपुरा, सहरसा समेत कोसी क्षेत्र के कई हिस्सों में पानी फैल गया। गांव डूबे, घर उजड़े, खेत बर्बाद हुए और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई। सरकारों ने इसे बड़ी राष्ट्रीय आपदा माना। राहत और पुनर्वास के वादे हुए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था का भरोसा दिया गया। लेकिन 18 वर्ष बाद सवाल यह है कि उन वादों का हिसाब कौन देगा? छह महीने की जांच, छह साल में रिपोर्ट कोसी त्रासदी के कारणों की जांच के लिए 10 सितंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश...

India : 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?

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 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई? क्या संसद का काम केवल विधेयक पारित करना है, या कानून बनने से पहले पर्याप्त बहस और जवाबदेही भी जरूरी है? 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चला संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कामकाज को लेकर सामने आए आंकड़े संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। PRS Legislative Research के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत, यानी 17.5 घंटे, जबकि राज्यसभा ने 33 प्रतिशत, यानी 37.4 घंटे ही काम किया। दोनों सदनों को मिलाकर वास्तविक कामकाज लगभग 55 घंटे रहा। यहां सवाल केवल उत्पादकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि जब संसद में कानून बनाए जाते हैं, तब उन कानूनों पर सांसदों को कितनी गंभीरता से चर्चा करने का अवसर मिलता है? लोकसभा में 117 घंटे का समय, काम केवल 17.5 घंटे लोकसभा के लिए निर्धारित कामकाजी समय का बड़ा हिस्सा व्यवधानों की वजह से इस्तेमाल नहीं हो सका। इसका सीधा असर प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने, नीतियों पर चर्चा करने और विधेयकों की धाराओं पर विचार करने की संसदीय प्रक...

India : धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?

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 धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक? क्या किसी राज्य को ‘चर्च-मुक्त’ बनाने की मांग धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से टकराती है? ओडिशा।भारत एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में धर्म का कोई स्थान नहीं होगा, बल्कि यह है कि राज्य किसी एक धर्म को अपना आधिकारिक धर्म नहीं मानता और नागरिकों को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में जब किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसा नारा सामने आता है, तो यह केवल राजनीतिक बयान नहीं रह जाता। इसके साथ संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ जाते हैं। भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की नींव संविधान लागू होने के समय से ही मौजूद थी। संविधान की प्रस्तावना में 1976 के 42वें संविधान संशोधन के बाद ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द स्पष्ट रूप से जोड़ा गया। हालांकि धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और सभी नागरिकों के अधिकारों की संवैधानिक गारंटी पहले से ही संविधान का हिस्सा थी। भारत में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अनेक अन्य ध...

India : अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा

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  अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा: असहमति और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा क्या अब बंदूक से नहीं, विचारों से लड़ी जाएगी नक्सलवाद की लड़ाई? और अगर विचारों की लड़ाई होगी, तो लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा के बीच सीमा कौन तय करेगा? 15 अगस्त 2026 को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल ने स्वतंत्रता दिवस के राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री ने माओवादी और नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि बंदूक उठाने वाले नक्सलवाद के साथ-साथ ऐसी मानसिकता रखने वालों को भी पहचानना और अलग-थलग करना जरूरी है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के बीच बहस तेज हो गई है। यह विवाद केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लोकतंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है— क्या किसी हिंसक विचारधारा के वैचारिक समर्थन और सरकार की लोकतांत्रिक आलोचना के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा? प्रधानमंत्री के बयान को सरकार के नजरिए से देखें तो उसका तर्क समझ में आता है।...

Keralam: राजा महाबली के स्वागत का पर्व

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  ओणम: राजा महाबली के स्वागत का पर्व, जहां फूलों की रंगोली से लेकर साद्या तक दिखती है केरल की संस्कृति   क्या कोई त्योहार ऐसा भी हो सकता है, जिसमें राजा अपने राज्य में नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के दिलों में लौटता हो? केरल का ओणम इसी भावनात्मक और सांस्कृतिक विश्वास का उत्सव है। फूलों से घर-आंगन सजते हैं, पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू फैलती है, नौकाएं पानी पर दौड़ती हैं और लोकगीतों की धुनों के बीच राजा महाबली के स्वागत की तैयारी होती है। केरल का प्रसिद्ध 10 दिवसीय फसल और सांस्कृतिक उत्सव ओणम 16 अगस्त 2026 को अथम से शुरू हो रहा है और इसका प्रमुख दिन तिरुवोनम 26 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। ओणम केवल फसल और समृद्धि की खुशी का पर्व नहीं है, बल्कि यह समानता, दान, वचन, सद्भाव और प्रजा के प्रति प्रेम की उस कल्पना को भी जीवित रखता है, जिसे राजा महाबली के आदर्श शासन से जोड़ा जाता है। अथम से शुरू होती है दस दिनों की रंगीन यात्रा ओणम के पहले दिन अथम से घरों के आंगन में फूलों की रंगोली यानी पूक्कलम बनाने की परंपरा शुरू होती है। जैसे-जैसे उत्सव के दिन आगे बढ़ते हैं, पूक्कलम में नए फूल और नए डिज...

India : असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

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  असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?   आजादी की तारीख इतिहास तय करता है, राजनीति नहीं। अगर 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” नहीं था, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक चली भाजपा सरकार को किस रूप में देखा जाएगा? भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली। यह स्वतंत्रता किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार की देन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम थी। इसके बाद देश ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा विकसित की। ऐसे में जब यह कहा जाता है कि भारत को “असली आजादी” 2014 के बाद मिली, तो यह इतिहास का तथ्य कम और राजनीतिक व्याख्या अधिक बन जाता है। भाजपा सांसद कंगना रनौत के 2014 के बाद “असली आजादी” मिलने संबंधी पुराने बयान को लेकर भी इसी कारण बहस होती रही है। 2014 के बाद भारत में क्या बदला, इस पर खुलकर चर्चा हो सकती है। सरकार की उपलब्धियों, नीतियों, आर्थिक फैसलों,...