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Bihar : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गरीब छात्रों की मुश्किलें

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  प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गरीब छात्रों की मुश्किलें पटना। बिहार में प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी तक पहुंचने का सबसे बड़ा रास्ता मानी जाती हैं। गांव से लेकर शहर तक बड़ी संख्या में विद्यार्थी रेलवे, बैंकिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस, एसएससी, लोक सेवा आयोग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन इस तैयारी की दौड़ में सभी अभ्यर्थियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। किसी विद्यार्थी के पास महंगी कोचिंग, बेहतर इंटरनेट, अलग कमरा, लैपटॉप और पर्याप्त किताबें हैं तो किसी दूसरे विद्यार्थी के सामने पढ़ाई के साथ-साथ परिवार का खर्च संभालने की जिम्मेदारी भी हो सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी केवल पढ़ाई का सवाल नहीं रह जाती। यह रोजमर्रा की जरूरतों और बेहतर भविष्य की उम्मीद के बीच संघर्ष बन जाती है। तैयारी शुरू करने से पहले ही खर्च की चुनौती प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में सबसे पहली बाधा आर्थिक होती है। किताबें, नोट्स, ऑनलाइन कोर्स, टेस्ट सीरीज, इंटरनेट, आवेदन शुल्क, यात्रा और परीक्षा केंद्र...

Bihar : बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए?

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  बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए? पटना। बिहार में शिक्षा का विस्तार हुआ है। गांव-कस्बों तक कॉलेज पहुंचे हैं, हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री लेकर निकल रहे हैं। लेकिन शिक्षा के इस विस्तार के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसका जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं है— डिग्री मिलने के बाद युवा जाएं तो जाएं कहां? यह सवाल केवल नौकरी पाने की व्यक्तिगत चिंता नहीं है। यह बिहार की अर्थव्यवस्था, परिवारों की स्थिति, युवाओं के पलायन और राज्य के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। एक ओर माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई पर वर्षों तक खर्च करते हैं, दूसरी ओर डिग्री पूरी करने के बाद युवा सरकारी नौकरी की तैयारी, सीमित निजी रोजगार और दूसरे राज्यों में पलायन के बीच अपना रास्ता तलाशते हैं। डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी, एमकॉम, बीसीए और बीबीए जैसी डिग्रियां हासिल करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। लेकिन हर डिग्री के बाद रोजगार का स्पष्ट रास्ता दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। समस्या केवल रोजगार के अवसरों की संख्या की नहीं है। शिक्षा और...

Bihar : गांव की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसान है?

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  गांव की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसान है? अस्पताल पास होने के बावजूद इलाज क्यों दूर है? गांव की महिला के लिए अस्पताल की दूरी सिर्फ किलोमीटर में नहीं मापी जाती। असली दूरी तब सामने आती है, जब उसे इलाज के लिए किसी के साथ की जरूरत पड़े, आने-जाने का पैसा जुटाना पड़े, महिला डॉक्टर का इंतजार करना पड़े और अपनी निजी बीमारी बताने में संकोच करना पड़े। सवाल यह है कि स्वास्थ्य केंद्र गांव के पास पहुंचा है, लेकिन क्या स्वास्थ्य सुविधा भी गांव की महिला तक सचमुच पहुंची है? पटना। ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या से तय नहीं होता। सरकार की योजनाएं गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का प्रयास करती हैं, लेकिन किसी महिला के लिए इलाज वास्तव में कितना आसान है, यह उसके रोजमर्रा के अनुभव से समझा जा सकता है। घर से स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना, परिवार से समय निकालना, आने-जाने का खर्च जुटाना, डॉक्टर से अपनी समस्या खुलकर बताना, जांच करवाना और दवा मिलने तक की पूरी प्रक्रिया उसके लिए कितनी सहज है—यही स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा है। ग्रा...

Bihar: सरकारी अस्पतालों में मरीज और व्यवस्था के बीच की दूरी

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सरकारी अस्पतालों में मरीज और व्यवस्था के बीच की दूरी: इलाज से पहले क्यों शुरू हो जाती है मरीज की परीक्षा? सरकारी अस्पताल में मरीज बीमारी लेकर पहुंचता है, लेकिन कई बार इलाज शुरू होने से पहले ही उसे कतार, पंजीकरण, जांच, दवा और जानकारी की ऐसी परीक्षा से गुजरना पड़ता है कि सवाल उठता है—क्या अस्पताल की व्यवस्था मरीज को राहत देने के लिए बनी है या मरीज को व्यवस्था के मुताबिक ढलने के लिए? पटना। बिहार में सरकारी अस्पतालों का ढांचा लगातार विस्तार की बात करता है। नए भवन, आधुनिक उपकरण, मुफ्त या कम लागत वाली दवाएं, जांच की सुविधाएं और स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन किसी अस्पताल की असली तस्वीर उसके भवन या मशीनों से नहीं, बल्कि उस मरीज से समझी जा सकती है जो इलाज की उम्मीद लेकर वहां पहुंचता है। पंजीकरण काउंटर से लेकर ओपीडी की कतार, जांच केंद्र से दवा वितरण केंद्र और डॉक्टर के कमरे के बाहर इंतजार तक—यही वे जगहें हैं जहां मरीज और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच की वास्तविक दूरी दिखाई देती है। अस्पताल गरीब परिवारों का सबसे बड़ा सहारा सरकारी अस्पतालों पर सबसे अधिक निर्भरत...

Bihar : एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत

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  एक चम्मच चीनी की बचत से आगे भी कुछ सवाल हैं: पत्रकारिता को मिठास नहीं, सच की जरूरत पटना। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चाय में एक चम्मच चीनी कम की जाए या ज्यादा। बचत जरूरी है, मितव्ययिता भी जरूरी है और संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब देश और समाज के सामने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बढ़ती लागत, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी की घटती क्रय शक्ति जैसे गंभीर सवाल खड़े हों, तब पत्रकारिता का दायरा केवल व्यक्तिगत बचत की सलाह तक सीमित नहीं रह सकता। पत्रकार रूबिका लियाकत की ओर से एक चम्मच चीनी बचाने की बात कही गई है। इस सलाह को बचत के सामान्य संदेश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता के संदर्भ में इससे कहीं बड़ा प्रश्न खड़ा होता है— क्या मीडिया जनता की छोटी-छोटी बचत पर बात करने के साथ-साथ उन बड़ी नीतियों और व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठा रहा है, जिनका सीधा असर करोड़ों परिवारों की आय और खर्च पर पड़ता है? यही वह बिंदु है जहां पत्रकारिता की असली भूमिका सामने आती है। पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना है पत्रकारिता ...

Bihar : छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था

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  छोटे किसानों के लिए सिंचाई आज भी बड़ी चुनौती क्यों? खेत तक पानी पहुंचने में कहां अटकती है व्यवस्था पटना। बिहार की कृषि व्यवस्था में छोटे और सीमांत किसान सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जमीन का आकार भले छोटा हो, लेकिन परिवार की आय, भोजन और रोजगार का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा होता है। ऐसे किसानों के लिए खेती की सफलता केवल अच्छे बीज और खाद पर निर्भर नहीं करती। सबसे जरूरी जरूरत है— समय पर, पर्याप्त और किफायती सिंचाई । बारिश सामान्य रही तो किसान की उम्मीद बढ़ती है, लेकिन मानसून में देरी, लंबे सूखे अंतराल या जरूरत से ज्यादा बारिश पूरी फसल की योजना बिगाड़ सकती है। बड़े किसान किसी हद तक निजी नलकूप, पंपसेट या अन्य साधनों से इस जोखिम को संभाल लेते हैं। छोटे किसान के पास ऐसे विकल्प सीमित होते हैं। इसलिए सिंचाई का सवाल केवल खेत में पानी पहुंचाने का विषय नहीं है। यह किसान की लागत, फसल के चुनाव, उत्पादन, जोखिम और अंततः उसकी आय से सीधे जुड़ा हुआ है। बारिश पर निर्भरता अब भी बड़ी मजबूरी बिहार में मानसून कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। खरीफ मौसम में धान सहित कई फसलों के लिए बारिश की भूमिका बड़ी होती है। लेक...

Bihar : बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल

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बिहार के किसानों की लागत और बाजार भाव के बीच बढ़ती दूरी: खेत में मेहनत किसान की, कीमत तय करने की ताकत किसकी? पटना। बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल है। गांवों कीबड़ी आबादी खेती, पशुपालन, कृषि मजदूरी, मंडी कारोबार और उससे जुड़े छोटे व्यवसायों पर निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन, सब्जियां और फल जैसी फसलें किसानों की आय का प्रमुख साधन हैं। लेकिन कृषि की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि फसल पैदा करने की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसान को मिलने वाला बाजार भाव कई बार उसकी उम्मीद के अनुरूप नहीं होता। यही अंतर बिहार के किसान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। खेती में जोखिम किसान का है, मौसम का असर किसान झेलता है, उत्पादन की लागत किसान उठाता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी कीमत तय करने की ताकत अक्सर उसके हाथ में नहीं रहती। बीज से बाजार तक बढ़ता खर्च आज खेती पहले की तुलना में अधिक खर्चीली हो गई है। खेत की जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी, डीजल, कृषि मशीनरी और फसल को बाजार तक पहुंचाने में पैसा खर्च होता है। जिन किसानों के पास अ...