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Bihar : स्कूल में पढ़ाई या लापरवाही का अड्डा? चार शिक्षक निलंबित, छात्रा से मालिश कराने का आरोप भी

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  स्कूल में पढ़ाई या लापरवाही का अड्डा? चार शिक्षक निलंबित, छात्रा से मालिश कराने का आरोप भी बक्सर। डुमरांव प्रखंड के नथुनी अहीर के डेरा स्थित मध्य विद्यालय में छात्राओं से कथित आपत्तिजनक व्यवहार की घटना के बाद शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ ही रहे थे कि अब ब्रह्मपुर प्रखंड के एक अन्य सरकारी विद्यालय में सामने आई अनियमितताओं ने व्यवस्था को फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। मध्य विद्यालय गरहथा कला में एक साथ चार शिक्षकों का निलंबन केवल विभागीय कार्रवाई नहीं, बल्कि विद्यालयों में पढ़ाई, अनुशासन, प्रशासन और निगरानी की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि निलंबित शिक्षकों में एक शिक्षक पर निरीक्षण के दौरान एक छात्रा से अपने कंधे की मालिश कराने का आरोप सामने आया। यह आरोप छात्र-शिक्षक संबंधों की मर्यादा और विद्यालय में बच्चों की गरिमा से जुड़ा संवेदनशील विषय है। हालांकि, आरोप की अंतिम पुष्टि विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही मानी जाएगी। जिला शिक्षा पदाधिकारी इंद्र कुमार कर्ण के कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार, 25 अगस्त को मध्य विद्...

Bihar : निजी स्कूलों की फीस और मध्यमवर्गीय परिवारों का दबाव: शिक्षा या हर महीने की आर्थिक परीक्षा?

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निजी स्कूलों की फीस और मध्यमवर्गीय परिवारों का दबाव: शिक्षा या हर महीने की आर्थिक परीक्षा? पटना। बच्चे के हाथ में स्कूल बैग है, लेकिन उस बैग का वजन सिर्फ किताबों का नहीं है। उसके साथ स्कूल फीस, एडमिशन चार्ज, यूनिफॉर्म, जूते, किताबें, कॉपियां, परिवहन और कई दूसरे खर्चों का बोझ भी जुड़ा है। सवाल यह है कि मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की कोशिश में आखिर कितनी आर्थिक कीमत चुकाए? हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़े, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करे और भविष्य में अपने पैरों पर खड़ा हो। लेकिन बदलते समय में निजी स्कूलों की फीस और उससे जुड़े खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। एक तरफ सरकारी स्कूलों की सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं, तो दूसरी ओर निजी स्कूलों की फीस अभिभावकों के सामने अलग तरह का आर्थिक संकट खड़ा करती है। मध्यमवर्गीय परिवार न तो हमेशा महंगी निजी शिक्षा को आसानी से वहन कर पाते हैं और न ही बच्चों की शिक्षा से समझौता करना चाहते हैं। यही दोहरी मजबूरी परिवार के मासिक बजट पर लगातार दबाव बढ़ाती...

Bihar : शिक्षक दिवस पर सवाल: सरकारी स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की जंग कब खत्म होगी

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 शिक्षक दिवस पर सवाल: सरकारी स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की जंग कब खत्म होगी? पटना। हर साल 5 सितंबर को देश में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षक समाज के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं, विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और शिक्षक के महत्व पर भाषण दिए जाते हैं। लेकिन इस सम्मान के बीच एक बड़ा सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है— क्या हमारे सरकारी स्कूल शिक्षकों को वह वातावरण और संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं, जिनके सहारे वे बच्चों का भविष्य बेहतर बना सकें? शिक्षक केवल किताब पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह बच्चे के ज्ञान, सोच, अनुशासन, आत्मविश्वास और भविष्य की नींव तैयार करता है। लेकिन जब उसी शिक्षक के सामने बड़ी कक्षाएं, संसाधनों की कमी, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाने की चुनौती हो, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य मुश्किल हो जाता है। शिक्षक हैं, लेकिन पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय कितना? सरकारी विद्यालयों में शिक्षक की जिम्मेदारी केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित...

Bihar : कागज पर राहत, जमीन पर कड़वाहट क्यों?

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बाढ़ में डूबा दियारा, राहत में डूबी व्यवस्था! नकटा के पीड़ितों का सवाल—कागज पर राहत, जमीन पर कड़वाहट क्यों? दीघा घाट राहत शिविर में शौचालय, भोजन, पानी, चिकित्सा और पशु चारे की कमी का आरोप; दियारा विकास संघर्ष समिति ने डीएम को ज्ञापन देकर 6 सितंबर को धरना-प्रदर्शन की चेतावनी दी पटना। बाढ़ जब आती है तो वह केवल खेत, घर और रास्ते नहीं डुबोती, बल्कि व्यवस्था की असली तस्वीर भी सामने ला देती है। सरकारी बैठकों में राहत के इंतजाम के दावे किए जा सकते हैं और कागजों पर व्यवस्थाएं पूरी दिखाई जा सकती हैं, लेकिन बाढ़ पीड़ित के लिए असली सवाल तब खड़ा होता है, जब वह राहत शिविर में पहुंचकर पूछता है— “अब हम जाएं तो जाएं कहां?” ग्राम पंचायत नकटा दियारा के बाढ़ पीड़ितों की ऐसी ही परेशानी का मामला सामने आया है। 4 सितंबर 2026 को दीघा घाट स्थित राहत शिविर के निरीक्षण के बाद दियारा विकास संघर्ष समिति ने कथित अव्यवस्थाओं को लेकर पटना जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। समिति ने अंचलाधिकारी, पाटलिपुत्र के माध्यम से प्रशासन के सामने अपनी मांगें रखीं और चेतावनी दी कि यदि व्यवस्थाओं में तत्काल सुधार नहीं हुआ तो 6 सितंबर क...

Bihar : गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां

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  गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां गांव से शहर जाने वाले मजदूरों के सामने रोजगार की अनिश्चितता, समय पर मजदूरी न मिलना, सुरक्षित आवास की कमी, स्वास्थ्य जोखिम, सामाजिक सुरक्षा और परिवार से दूरी जैसी कई चुनौतियां होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ प्रवासी मजदूरों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक काम की व्यवस्था करना जरूरी है। पटना। गांव की पगडंडी से निकलकर जब कोई मजदूर शहर की ओर जाता है, तो उसके साथ केवल एक छोटा-सा बैग नहीं होता। उसके कंधे पर पूरे परिवार की उम्मीदें होती हैं। आंखों में बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत, बेटी की शादी, बुजुर्ग माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का सपना होता है। वह गांव इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे अपना घर पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि घर में उसके श्रम के बदले पर्याप्त आमदनी का रास्ता नहीं बन पाता। बिहार जैसे राज्यों में गांव से शहर की ओर मजदूरों का जाना कोई नई घटना नहीं है। वर्षों से लाखों परिवारों की अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा प्रवासी मजदूरी पर टिका हुआ है। लेकिन पलायन की तस्वीर अक्सर इतनी भर दिखाई जाती है कि मजदूर शहर...

Bihar :ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

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  ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश? ग्रामीण बिहार में पलायन केवल बेरोजगारी का परिणाम नहीं है। खेती की कम आय, स्थानीय रोजगार की कमी, कौशल के अनुरूप काम का अभाव और बेहतर मजदूरी की तलाश युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर ले जाती है। समाधान पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में सम्मानजनक रोजगार और बाहर जाने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित अवसर सुनिश्चित करना है। पटना। बिहार की पहचान आज भी गांवों, खेतों और मेहनतकश लोगों से जुड़ी है। लेकिन इन गांवों की एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। सुबह होते ही बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिल्ली जा रहा है, कोई पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या गुजरात का रास्ता पकड़ रहा है तो कोई दक्षिण भारत के औद्योगिक शहरों में रोजगार तलाश रहा है। सवाल यह है कि आखिर ग्रामीण बिहार का आदमी अपना गांव, परिवार और खेत छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों तैयार होता है? क्या यह केवल रोजगार की कमी है या फिर बेहतर अवसर की तलाश? पलायन को केवल बेरोजगारी क...

Bihar: कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाओं की जमीनी पड़ताल

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  कुपोषण के खिलाफ सरकारी योजनाओं की जमीनी पड़ताल पटना। कुपोषण के खिलाफ लड़ाई भारत में दशकों से जारी है। सरकारें बदलती रहीं, योजनाओं के नाम और स्वरूप बदलते रहे, बजट बढ़ता रहा, लेकिन गरीब परिवारों के बच्चों की कमजोर काया आज भी व्यवस्था से एक असहज सवाल पूछती है— आखिर सरकारी पोषण योजनाओं का वास्तविक लाभ उन बच्चों तक कितनी दूर पहुंचा, जिनके नाम पर ये योजनाएं बनाई गई हैं? बिहार जैसे राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जहां गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वच्छ पेयजल की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच बच्चों के पोषण को प्रभावित करती है। ऐसे में कुपोषण केवल भोजन की कमी का परिणाम नहीं है। यह गरीबी, स्वास्थ्य, स्वच्छता, मातृ शिक्षा और सरकारी सेवाओं की पहुंच से जुड़ा हुआ व्यापक सामाजिक संकट है। सरकार ने बच्चों और माताओं के पोषण के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों, पूरक पोषाहार, मातृ-शिशु स्वास्थ्य सेवाओं और विभिन्न पोषण अभियानों के माध्यम से बड़ा तंत्र खड़ा किया है। लेकिन असली परीक्षा कागज पर नहीं, गांव के उस आंगनबाड़ी केंद्र में होती है जहां एक मां अपने...