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जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं
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जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं—याददाश्तें भी ताले में बंद हो जाती हैं पटना जैसे शहर में, जहाँ हिंदी पत्रकारिता की एक मजबूत और संघर्षशील परंपरा रही है, वहाँ अख़बारों का बंद होना केवल एक कारोबारी घटना नहीं है—यह लोकतंत्र की आवाज़ के धीमे पड़ने जैसा है। पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रदीप, सर्चलाइट, आर्यावर्त, इंडियन नेशन, नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों का बंद होना पहले ही क्षेत्रीय मीडिया की ताक़त को कमजोर कर चुका था। अब राष्ट्रीय सहारा (पटना संस्करण) के बंद होने की खबर उस सिलसिले की एक और दुखद कड़ी बन गई है। सहारा समूह की आर्थिक मुश्किलें—विशेषकर कानूनी मामलों और निवेश योजनाओं से जुड़े विवाद—अब उसके मीडिया संस्थानों पर भी साफ़ दिखने लगी हैं। 2024–25 के दौरान पटना यूनिट में वेतन न मिलने, कामकाज ठप होने और कर्मचारियों की हड़ताल की खबरें आती रहीं। अब जब पूर्ण बंदी की स्थिति सामने है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम किया। दर्जनों अनुभवी पत्रकार एक झटके में बेरोज़गार हो गए, लेकिन इस पर न तो बड़ी बहस हु...
6 सांसद ऐसे हैं, सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया
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जब विकास के लिए पैसा मौजूद हो, लेकिन ज़मीन पर काम न दिखे—तो सवाल सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का होता है. सांसद निधि: करोड़ों का बजट, लेकिन बिहार में क्यों उठे सवाल? सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) देश की उन महत्वपूर्ण योजनाओं में शामिल है, जिसके जरिए सांसद अपने-अपने क्षेत्र की ज़रूरतों के अनुसार विकास कार्य करा सकते हैं. इस योजना के तहत लोकसभा, राज्यसभा और मनोनीत सांसदों को हर साल ₹5 करोड़ (₹2.5 करोड़ की दो किस्तों में) की राशि मिलती है. यह पैसा सीधे सांसद को नहीं, बल्कि जिला कलेक्टर के माध्यम से स्वीकृत विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है. एमपीएलएडीएस का उद्देश्य साफ है—पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक ढांचे जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में टिकाऊ विकास. योजना में यह भी प्रावधान है कि एससी क्षेत्रों के लिए 15% और एसटी क्षेत्रों के लिए 7.5% राशि खर्च की जाए, वहीं दिव्यांगों के लिए ₹10 लाख तक की सिफारिश संभव है. कोविड-19 के दौरान यह योजना अस्थायी रूप से निलंबित रही, लेकिन 2021-22 से इसे फिर बहाल कर दिया गया। इसके बावजूद बिहार से जुड़े आंकड़े अब स...
हमारी पहली इच्छा
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संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि
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“जब दुनिया थक जाए, तब आशा की तीर्थयात्रा शुरू होती है” जयंती वर्ष 2025 का समापन और संत फ्रांसिस का नया आध्यात्मिक आह्वान अभी-अभी “आशा के तीर्थयात्री” (Pilgrims of Hope)—कैथोलिक चर्च के जयंती वर्ष 2025—का औपचारिक समापन हुआ है.यह वही पवित्र वर्ष था, जिसकी घोषणा पोप फ्रांसिस ने ऐसे समय में की थी, जब दुनिया युद्ध, महामारी, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रही थी. इस जयंती वर्ष ने मानवता को एक सीधा संदेश दिया—निराशा के अंधकार में भी आशा की लौ बुझनी नहीं चाहिए. हर 25 वर्षों में आने वाला यह विशेष कैथोलिक वर्ष 24 दिसंबर 2024 को आरंभ हुआ था और 6 जनवरी 2026, प्रभु प्रकाश महापर्व के दिन, इसका समापन हुआ.यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि एक वैश्विक नैतिक पुकार थी—कि हर व्यक्ति अपने जीवन में आशा को पुनर्जीवित करे और उसे दूसरों तक पहुँचाए. जयंती के बाद भी अनुग्रह का द्वार खुला जयंती वर्ष के समापन के साथ ही पोप लियो XIV ने कलीसिया को एक और आध्यात्मिक उप...