Bihar : समाज के कई हिस्सों की मानसिकता अब भी मध्यकालीन सोच से बाहर नहीं निकल पाई

 

भारतीय समाज में विवाह को केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और कई बार दो जातियों के बीच संबंध माना जाता रहा है। यही कारण है कि जब कोई युवक या युवती अपनी पसंद से, विशेषकर दूसरी जाति में विवाह करता है, तो समाज का एक बड़ा वर्ग इसे अपनी परंपरा और प्रतिष्ठा के खिलाफ मान लेता है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड के जियन खुर्द गांव में सामने आई घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कानून भले आधुनिक हो गया हो, लेकिन समाज के कई हिस्सों की मानसिकता अब भी मध्यकालीन सोच से बाहर नहीं निकल पाई है।

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का भयावह चेहरा है, जहां पंचायत का दबाव संविधान से बड़ा दिखाई देने लगता है। एक बालिग युवती ने अपनी इच्छा से अंतरजातीय विवाह किया। भारतीय संविधान उसे यह अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार साफ कर चुका है कि दो बालिग यदि अपनी मर्जी से विवाह करते हैं, तो कोई भी संस्था, पंचायत या परिवार उसमें बाधा नहीं डाल सकता। इसके बावजूद गांव की तथाकथित पंचायत ने परिवार पर ऐसा दबाव बनाया कि उन्होंने अपनी जीवित बेटी को “मृत” घोषित कर उसका प्रतीकात्मक दाह संस्कार कर दिया।

यह दृश्य किसी फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन यह हमारे समाज की कठोर सच्चाई है। जिस बेटी को माता-पिता ने जन्म दिया, पाला-पोसा, उसी बेटी को सामाजिक भय और बहिष्कार के डर से मृत मान लेना इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक प्रताड़ना कितनी गहरी हो सकती है। गांव में हुक्का-पानी बंद करने, बहिष्कार करने और सामाजिक संबंध तोड़ने की धमकियां आज भी लोगों के लिए इतनी भयावह हैं कि वे अपनी भावनाओं और रिश्तों तक को कुर्बान कर देते हैं।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए कानून मौजूद हैं, तब ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं? केंद्र और राज्य सरकारें लगातार सामाजिक समरसता की बातें करती हैं। बिहार सरकार की “मुख्यमंत्री अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना” के तहत आर्थिक सहायता भी दी जाती है, ताकि लोग जातीय बंधनों को तोड़कर समानता का संदेश दें। लेकिन दूसरी ओर, गांवों में पंचायतें आज भी सामाजिक अदालत बनकर लोगों के निजी जीवन का फैसला कर रही हैं।

इस मामले में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। पुलिस ने यह तो स्पष्ट किया कि युवती बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से विवाह किया है। लेकिन उसके बाद जो सामाजिक उत्पीड़न हुआ, उसे रोकने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम दिखा। यदि पंचायत खुलेआम परिवार पर दबाव बना रही थी, तो क्या स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी? क्या कानून का भय केवल कमजोर लोगों के लिए है?

आज जरूरत इस बात की है कि अंतरजातीय विवाह करने वाले दंपतियों को केवल आर्थिक सहायता देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी मानने की भूल न करे। उन्हें सामाजिक और कानूनी सुरक्षा भी देनी होगी। कई मामलों में देखा गया है कि प्रेम विवाह करने वाले जोड़े महीनों तक छिपते फिरते हैं, क्योंकि उन्हें अपने ही परिवार और समाज से खतरा रहता है। यह स्थिति किसी लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश के लिए शर्मनाक है।

भारत का संविधान व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को अपनी पसंद से जीवन जीने और विवाह करने का अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय ने “ऑनर किलिंग” और खाप पंचायतों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की हैं। इसके बावजूद यदि पंचायतें सामाजिक बहिष्कार का हथियार इस्तेमाल कर रही हैं, तो यह सीधे-सीधे संविधान की अवमानना है।

समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। आखिर जाति की शुद्धता के नाम पर हम किस दिशा में जा रहे हैं? एक ओर देश चंद्रमा और मंगल की बात कर रहा है, डिजिटल इंडिया का सपना देख रहा है, वहीं दूसरी ओर गांवों में आज भी जाति के नाम पर रिश्तों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। यह विरोधाभास चिंताजनक है।

माता-पिता की पीड़ा को भी समझना होगा। संभव है कि वे अपनी बेटी से प्रेम करते हों, लेकिन सामाजिक दबाव इतना अधिक रहा कि उन्होंने यह अमानवीय कदम उठाया। असली दोष उस मानसिकता का है, जिसने समाज में डर और बहिष्कार की संस्कृति को जन्म दिया है। जब तक गांवों और कस्बों में सामाजिक जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक कानून अकेले ऐसी घटनाओं को नहीं रोक पाएंगे।

शिक्षा यहां सबसे बड़ा हथियार हो सकती है। स्कूलों और कॉलेजों में केवल किताबों की पढ़ाई नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। धार्मिक और सामाजिक नेताओं को भी आगे आकर जातीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी होगी। मीडिया और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।

मुजफ्फरपुर की यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। यदि आज भी अंतरजातीय विवाह करने वाले युवाओं को सामाजिक मृत्यु का सामना करना पड़ रहा है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि सामाजिक सुधार की यात्रा अभी अधूरी है। कानून तभी प्रभावी होगा, जब समाज उसकी भावना को स्वीकार करेगा।


एक जीवित बेटी का प्रतीकात्मक दाह संस्कार केवल एक परिवार की हार नहीं, बल्कि मानवता, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की भी पराजय है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर ऐसी मानसिकता के खिलाफ खड़े हों, ताकि भविष्य में किसी बेटी को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने की इतनी बड़ी कीमत न चुकानी पड़े।


आलोक कुमार    

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