India: “जो जमीन सरकारी है, वह जमीन हमारी है” का नारा देने वाले आंदोलनकारी
सरकार जिस जमीन को “सरकारी” कह रही है, वह वास्तव में सदियों से आदिवासी और गरीब समुदायों के उपयोग में रही
भारत में “जल, जंगल और जमीन” केवल तीन शब्द नहीं हैं, बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, संस्कृति और पहचान का आधार हैं। सदियों से जंगलों में रहने वाले समुदायों ने प्रकृति को अपनी मां माना है। उनकी खेती, भोजन, संस्कृति, त्योहार और जीवन का हर हिस्सा जंगल और जमीन से जुड़ा रहा है। इसी कारण जब सरकारी जमीन, वनभूमि और सार्वजनिक क्षेत्रों पर कब्जे को लेकर बुलडोजर कार्रवाई होती है, तो यह केवल प्रशासनिक कदम नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष का रूप ले लेता है। आज देश के कई हिस्सों में यही टकराव दिखाई दे रहा है।
“जो जमीन सरकारी है, वह जमीन हमारी है” का नारा देने वाले आंदोलनकारी मानते हैं कि सरकार जिस जमीन को “सरकारी” कह रही है, वह वास्तव में सदियों से आदिवासी और गरीब समुदायों के उपयोग में रही है। उनके अनुसार जंगल और पहाड़ केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनकी विरासत हैं। यही कारण है कि जल-जंगल-जमीन का आंदोलन केवल भूमि अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान की लड़ाई भी बन गया है।
इस आंदोलन की प्रेरणा इतिहास के उन महान आदिवासी नायकों से मिलती है जिन्होंने अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी। बिरसा मुंडा ने उलगुलान आंदोलन के माध्यम से आदिवासियों को संगठित किया और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संदेश दिया। उन्होंने कहा था कि जंगल और जमीन पर पहला अधिकार उन लोगों का है जो पीढ़ियों से वहां रहते आए हैं। इसी प्रकार कोमाराम भीम ने “जल, जंगल, जमीन” का नारा देकर निजाम शासन और जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया। आज भी यह नारा देशभर के आदिवासी आंदोलनों में गूंजता है।
हाल के वर्षों में बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हटाने के लिए बुलडोजर कार्रवाई तेज हुई है। प्रशासन का तर्क है कि सरकारी भूमि, सड़क, तालाब, स्कूल और सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण हटाना आवश्यक है। कई जगहों पर यह कार्रवाई अदालत के आदेश या राजस्व विभाग की रिपोर्ट के आधार पर की गई है। सरकार का कहना है कि यदि अवैध कब्जे नहीं हटाए गए तो विकास योजनाएं प्रभावित होंगी और सार्वजनिक संपत्ति पर दबंगों का नियंत्रण बढ़ जाएगा।
लेकिन दूसरी ओर आंदोलनकारियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि बुलडोजर कार्रवाई का सबसे अधिक असर गरीबों, आदिवासियों और मजदूर वर्ग पर पड़ता है। जिन लोगों के पास रहने के लिए स्थायी जमीन नहीं है, वे वर्षों से सरकारी या वनभूमि पर झोपड़ी बनाकर जीवन गुजारते रहे हैं। अचानक प्रशासनिक कार्रवाई से उनका घर, रोजगार और जीवन सब कुछ उजड़ जाता है। कई मामलों में यह आरोप भी लगाया जाता है कि बिना पर्याप्त नोटिस और पुनर्वास के बुलडोजर चलाए जाते हैं।
यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी खड़ा करता है। यदि कोई परिवार दशकों से किसी जमीन पर रह रहा है, वहां खेती कर रहा है और उसी से उसकी आजीविका चल रही है, तो क्या केवल “सरकारी जमीन” कहकर उसे बेदखल कर देना उचित है? दूसरी ओर यह भी सच है कि सार्वजनिक भूमि पर अनियंत्रित कब्जा विकास और कानून व्यवस्था के लिए समस्या बन सकता है। यही कारण है कि यह संघर्ष लगातार जटिल होता जा रहा है।
आदिवासी समाज का मानना है कि संविधान ने उन्हें विशेष अधिकार दिए हैं। वन अधिकार कानून और पंचायत विस्तार कानून जैसे प्रावधानों का उद्देश्य भी यही था कि आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकार सुरक्षित रहें। लेकिन जमीन अधिग्रहण, खनन परियोजनाओं और वन क्षेत्रों में प्रशासनिक कार्रवाई के कारण अक्सर टकराव पैदा होता है। कई बार विकास परियोजनाओं के नाम पर गांव खाली कराए जाते हैं, जिससे लोगों में असंतोष बढ़ता है।
“Johar बिरसा मुंडा” जैसे नारों के साथ आज का युवा आदिवासी समाज अपने इतिहास और अधिकारों को फिर से याद कर रहा है। यह केवल भावनात्मक आंदोलन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की मांग भी है। उनका कहना है कि यदि सरकार विकास चाहती है तो उसे स्थानीय समुदायों को विश्वास में लेना होगा। पुनर्वास, शिक्षा, रोजगार और वैकल्पिक व्यवस्था के बिना केवल बुलडोजर चलाना समाधान नहीं हो सकता।दूसरी ओर सरकार और प्रशासन के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उन्हें कानून लागू करना है, सार्वजनिक संपत्ति बचानी है और अवैध कब्जों को रोकना है। लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई तभी सफल मानी जाएगी जब उसमें संवेदनशीलता और न्याय दोनों दिखाई दें। केवल शक्ति प्रदर्शन से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, प्रशासन और आंदोलनकारी संवाद का रास्ता अपनाएं। आदिवासी और गरीब समुदायों के पारंपरिक अधिकारों का सम्मान करते हुए विकास की नीति बनाई जाए। जंगलों और जमीन पर निर्भर लोगों को दुश्मन नहीं, बल्कि भागीदार माना जाए। क्योंकि जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन की धड़कन हैं।
भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब विकास और अधिकारों के बीच संतुलन बने। बुलडोजर किसी समस्या का तात्कालिक समाधान हो सकता है, लेकिन स्थायी शांति और न्याय केवल संवाद, संवेदनशीलता और समान अधिकारों से ही संभव है। यही संदेश बिरसा मुंडा और कोमाराम भीम के संघर्ष से आज भी मिलता है।
आलोक कुमार
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