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संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि

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 “जब दुनिया थक जाए, तब आशा की तीर्थयात्रा शुरू होती है” जयंती वर्ष 2025 का समापन और संत फ्रांसिस का नया आध्यात्मिक आह्वान अभी-अभी “आशा के तीर्थयात्री” (Pilgrims of Hope)—कैथोलिक चर्च के जयंती वर्ष 2025—का औपचारिक समापन हुआ है.यह वही पवित्र वर्ष था, जिसकी घोषणा पोप फ्रांसिस ने ऐसे समय में की थी, जब दुनिया युद्ध, महामारी, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रही थी. इस जयंती वर्ष ने मानवता को एक सीधा संदेश दिया—निराशा के अंधकार में भी आशा की लौ बुझनी नहीं चाहिए. हर 25 वर्षों में आने वाला यह विशेष कैथोलिक वर्ष 24 दिसंबर 2024 को आरंभ हुआ था और 6 जनवरी 2026, प्रभु प्रकाश महापर्व के दिन, इसका समापन हुआ.यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि एक वैश्विक नैतिक पुकार थी—कि हर व्यक्ति अपने जीवन में आशा को पुनर्जीवित करे और उसे दूसरों तक पहुँचाए. जयंती के बाद भी अनुग्रह का द्वार खुला                                      जयंती वर्ष के समापन के साथ ही पोप लियो XIV ने कलीसिया को एक और आध्यात्मिक उप...

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव

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  मकर संक्रांति: जब सूर्य उत्तरायण होता है और जीवन में उजास उतरता है सर्द हवाओं के बीच जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, तिल-गुड़ की मिठास हर रिश्ते में घुलने लगती है और सूर्य देव उत्तरायण की यात्रा शुरू करते हैं—तब आता है मकर संक्रांति, एक ऐसा पर्व जो केवल त्योहार नहीं, बल्कि परिवर्तन, सकारात्मकता और नई शुरुआत का प्रतीक है. मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव है, जो धर्म, विज्ञान और प्रकृति—तीनों को एक सूत्र में पिरोता है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय दिन के बड़े होने और रातों के छोटे होने का संकेत है, जबकि सांस्कृतिक रूप से यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है. तिल-गुड़ क्यों कहते हैं ‘मीठा बोलो’? मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है. तिल शरीर को गर्मी देता है और गुड़ ऊर्जा. लेकिन इन दोनों से जुड़ा संदेश केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं—यह सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है। “तिल-गुड़ खाओ, मीठा बोलो” का अर्थ है कि पुराने गिले-शिकवे भूलकर रिश्तों में मिठास घोलो. पतंगों में उड़ते सपने छतो...

बुर्का–नकाब पर ‘नो एंट्री’ का आह्वान और संविधान के सामने खड़े सवाल

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  जब सुरक्षा के नाम पर पहचान कटघरे में खड़ी हो जाए बुर्का–नकाब पर ‘नो एंट्री’ का आह्वान और संविधान के सामने खड़े सवाल जब सुरक्षा के नाम पर किसी की पहचान पर पहरा लगाया जाने लगे, तब सवाल केवल अपराध का नहीं रहता—वह सीधे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ जाता है. बिहार की ज्वेलरी दुकानों में बुर्का या नकाब पहनकर आने वाली महिलाओं के लिए “No Entry” का आह्वान इसी चिंता को जन्म देता है. यह महज़ एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाला गहरा असर है. ऑल इंडिया ज्वेलर्स एवं गोल्ड फेडरेशन (AIJGF) की बिहार इकाई के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा दिया गया यह वक्तव्य राज्य के उस सामाजिक ताने-बाने पर अनावश्यक दबाव डालता है, जो पहले से ही संवेदनशील दौर से गुजर रहा है. सुरक्षा बनाम संदेह: रेखा कहां खिंचनी चाहिए?                                                                        ...

यात्राओं का मुख्यमंत्री: 21 साल में 15 यात्राएं

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  सत्ता, संघर्ष और सड़कें: फिर यात्रा पर निकल रहे हैं नीतीश कुमार 10 बार मुख्यमंत्री, 21 साल की सियासत और अब ‘समृद्धि यात्रा’ का नया अध्याय बि हार की राजनीति में अगर कोई चेहरा लगातार दो दशकों से केंद्र में रहा है, तो वह हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. सत्ता बदली, गठबंधन बदले, राजनीति के मौसम बदले—लेकिन नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद पर बने रहना अपने आप में एक राजनीतिक रिकॉर्ड है. अब एक बार फिर वे जनता के बीच जाने की तैयारी में हैं.17 जनवरी से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘समृद्धि यात्रा’ पर निकल रहे हैं, जो 22 मार्च तक चलेगी. 10 बार मुख्यमंत्री, सबसे लंबा कार्यकाल                                                                                                         नीतीश कुमार ने अब तक 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है ...

आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में

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  “आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में” एनएसए अजीत डोभाल के बयान ने छेड़ा आज़ादी के इतिहास पर नया विमर्श क्या भारत की आज़ादी की कहानी वह है, जो दशकों से हमें पढ़ाई और राजनीति में सुनाई जाती रही है—या फिर इसके कुछ अध्याय अब भी अधूरे हैं? राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के हालिया बयान ने इसी सवाल को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है. डोभाल का कहना है कि भारत को आज़ादी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) के दबाव के कारण मिली.यह बयान केवल एक ऐतिहासिक व्याख्या नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की प्राथमिकताओं को लेकर चली आ रही बहस को नए संदर्भ और नई धार देता है. INA बनाम अहिंसा: पुराना विवाद, नया संदर्भ                                                                                          ...