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India : राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

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  राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद  जिस उम्र में आज के नेता राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने की तैयारी करते हैं, उसी उम्र में राजीव गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बागडोर संभाल ली थी। सवाल यह नहीं कि राजीव गांधी की राजनीति से हर कोई सहमत था या नहीं; सवाल यह है कि क्या आज का भारत उस युवा प्रधानमंत्री के उस सपने को याद करता है, जिसमें तकनीक, आधुनिकता और सद्भावना के सहारे देश को 21वीं सदी में ले जाने की कोशिश थी? 20 अगस्त भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती का दिन है। देश में यह दिन ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में भी याद किया जाता है। यह अवसर केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि उन विचारों और नीतिगत प्रयासों को समझने का भी है, जिनके केंद्र में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द, तकनीकी आधुनिकीकरण और बदलते भारत की कल्पना थी। राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। वे केवल 40 वर्ष की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। भारतीय राजनीति के इतिहास में इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री बनने की घटना अपने आप में उल्लेखनीय ह...

India : वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

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 वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी 2014 के दावों से 2026 की हकीकत तक—अब जनता हिसाब मांग रही है राजनीति में वादे करना आसान होता है, लेकिन वर्षों बाद उन्हीं वादों की कसौटी पर खुद को खड़ा करना कठिन। 2014 में महंगाई, खासकर पेट्रोल, चीनी और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों को लेकर जिस तरह राजनीतिक बहस हुई थी, उसकी गूंज आज 2026 में भी सुनाई देती है। सवाल यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद किसी सरकार को अपने पुराने बयानों, दावों और वादों का हिसाब जनता को नहीं देना चाहिए? लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं होती। वह पूरे कार्यकाल में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछने का अधिकार रखती है। यदि किसी राजनीतिक दल ने महंगाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था, तो वर्षों बाद उससे यह पूछना भी स्वाभाविक है कि आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट की स्थिति कितनी बदली? महंगाई का सवाल केवल किसी एक वस्तु की कीमत तक सीमित नहीं है। चीनी, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का सीधा असर परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है। गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए तो छोटी कीमत ...

Patna : दिवंगत पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को दी नई ऊंचाई

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  दिवंगत पीटर फ्रांसिस ने कुर्जी पल्ली की गीत मंडली को दी नई ऊंचाई सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण से उन्होंने कलीसियाई जीवन में बनाई अपनी अलग पहचान किसी व्यक्ति का जीवन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन मूल्यों से भी पहचाना जाता है जिन्हें वह अपने पीछे छोड़ जाता है। दिवंगत पीटर फ्रांसिस का जीवन सेवा, अनुशासन, संगीत और कलीसियाई जिम्मेदारी के प्रति समर्पण का ऐसा ही उदाहरण रहा। कुर्जी पल्ली की गीत मंडली से जुड़े लोगों के लिए उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक ऐसे सहयोगी और मार्गदर्शक की कमी है, जिसने संगीत सेवा को नई ऊर्जा और ऊंचाई प्रदान की। कुर्जी पल्ली के प्रधान पल्ली पुरोहित फादर सेल्विन जेवियर ने दिवंगत पीटर फ्रांसिस के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में सेवा, अनुशासन और संगीत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम की। उनके अनुसार, पीटर फ्रांसिस का व्यक्तित्व केवल उनके संगीत कौशल तक सीमित नहीं था। उनके जीवन में जिम्मेदारी, निरंतर अभ्यास और दूसरों के लिए कुछ करने की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। तमिलनाडु से शुरू हुआ जीवन का स...

India : हिंदू खतरे में है या भविष्य? NEET के सवाल पर राजनीति कब तक?

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  हिंदू खतरे में है या भविष्य? NEET के सवाल पर राजनीति कब तक? जब बच्चों के हाथ में किताबें हों और नेताओं के हाथ में ‘खतरे’ का नारा, तब सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, देश के भविष्य का होता है। सोशल मीडिया पर एक पोस्टर तेजी से वायरल है, जिसमें सांसद रवि किशन के नाम से कथित तौर पर कहा गया है—“यहाँ हिंदू खतरे में है और तुम लोगों को NEET एग्जाम की पड़ी है। जब हिंदू ही नहीं रहेगा तो NEET एग्जाम का क्या करोगे?” हालांकि इस कथन की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इसे रवि किशन का प्रमाणित बयान मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन इस वायरल पोस्टर ने एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा कर दिया है— क्या हमारे बच्चों के भविष्य के सवालों को भी धार्मिक भय की राजनीति के नीचे दबा दिया जाएगा? NEET सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। यह लाखों विद्यार्थियों के सपनों का रास्ता है। किसी के लिए डॉक्टर बनने का सपना, किसी परिवार की वर्षों की मेहनत और किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सामाजिक-आर्थिक बदलाव की उम्मीद। जिस बच्चे ने वर्षों तक किताबों के बीच बैठकर पढ़ाई की, उसके सामने परीक्षा का सवाल आता है तो उसे रोजगार, ...

Bihar : चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन?

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  चुनाव में राजा जनता, नतीजे के बाद राजा कौन? चुनाव के दौरान जनता राजा बन जाती है और उम्मीदवार रंक। लेकिन जैसे ही नतीजे आते हैं, तस्वीर पलट जाती है—रंक राजा बन जाता है और जनता फिर अपने ही चुने हुए प्रतिनिधि के दरबार में खड़ी दिखाई देती है। लोकतंत्र की असली चुनौती इसी उलटफेर को रोकने की है। लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प विडंबना यही है कि चुनाव के दौरान जिस जनता के दरवाजे पर नेता सिर झुकाकर पहुंचते हैं, वही जनता चुनाव परिणाम के बाद अक्सर अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती नजर आती है। वोट मांगते समय जनता सर्वोपरि होती है, लेकिन सत्ता की कुर्सी मिलते ही जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हैसियत बढ़ जाती है। यही सवाल आज बिहार की राजनीति में भी महत्वपूर्ण है। जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतकर विधायक के रूप में शपथ लेना उनके राजनीतिक सफर का नया अध्याय है। राजनीति और चुनावी रणनीति के क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले प्रशांत किशोर अब विधानसभा के भीतर बैठकर विधायी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। रणनीतिकार से ‘माननीय’ बनने का यह सफर केवल पद परिवर्तन नहीं है। इसके स...

Bihar : कोसी का कहर

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  कोसी का कहर: छह माह में रिपोर्ट का वादा, छह साल में निष्कर्ष और 18 साल बाद भी अधूरे जख्म छह महीने में जांच पूरी करने का दावा था, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह साल लग गए। रिपोर्ट आई तो सवालों के जवाब और जवाबदेही दोनों अधूरे रह गए। 18 साल बाद भी कोसी के हजारों परिवारों के लिए टूटे पुल, अधूरे घर, मुआवजे और पुनर्वास के सवाल जिंदा हैं। 18 अगस्त 2008 की तारीख कोसी अंचल के लाखों लोगों की स्मृति में आज भी एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। नेपाल के कुसहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। सुपौल, मधेपुरा, सहरसा समेत कोसी क्षेत्र के कई हिस्सों में पानी फैल गया। गांव डूबे, घर उजड़े, खेत बर्बाद हुए और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई। सरकारों ने इसे बड़ी राष्ट्रीय आपदा माना। राहत और पुनर्वास के वादे हुए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था का भरोसा दिया गया। लेकिन 18 वर्ष बाद सवाल यह है कि उन वादों का हिसाब कौन देगा? छह महीने की जांच, छह साल में रिपोर्ट कोसी त्रासदी के कारणों की जांच के लिए 10 सितंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश...

India : 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई?

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 25 दिन की संसद, 55 घंटे का काम: विधेयक पास हुए, लेकिन बहस कहां गई? क्या संसद का काम केवल विधेयक पारित करना है, या कानून बनने से पहले पर्याप्त बहस और जवाबदेही भी जरूरी है? 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक चला संसद का मॉनसून सत्र समाप्त हो गया। कुल 19 बैठकें हुईं, लेकिन कामकाज को लेकर सामने आए आंकड़े संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। PRS Legislative Research के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत, यानी 17.5 घंटे, जबकि राज्यसभा ने 33 प्रतिशत, यानी 37.4 घंटे ही काम किया। दोनों सदनों को मिलाकर वास्तविक कामकाज लगभग 55 घंटे रहा। यहां सवाल केवल उत्पादकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि जब संसद में कानून बनाए जाते हैं, तब उन कानूनों पर सांसदों को कितनी गंभीरता से चर्चा करने का अवसर मिलता है? लोकसभा में 117 घंटे का समय, काम केवल 17.5 घंटे लोकसभा के लिए निर्धारित कामकाजी समय का बड़ा हिस्सा व्यवधानों की वजह से इस्तेमाल नहीं हो सका। इसका सीधा असर प्रश्न पूछने, सरकार से जवाब मांगने, नीतियों पर चर्चा करने और विधेयकों की धाराओं पर विचार करने की संसदीय प्रक...