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“सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”

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 “सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन” पटना.  आज, 2 नवंबर, कैथोलिक समुदाय विश्व भर में ‘ऑल सोल्स डे’ (सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस) श्रद्धा और आस्था के साथ मनाता है.यह दिन उन सभी दिवंगत आत्माओं के लिए समर्पित होता है, जिन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया है, परंतु अब भी परमेश्वर की अनंत उपस्थिति में प्रवेश से पूर्व शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजर रही हैं.      इस दिन का मूल भाव है — प्रार्थना, स्मरण और प्रेम का प्रदर्शन. कैथोलिक परंपरा के अनुसार, पृथ्वी पर जीवित विश्वासी अपने दिवंगत परिजनों के लिए मिस्सा (पवित्र बलिदान), प्रार्थना और दान के माध्यम से ईश्वर से कृपा की याचना करते हैं ताकि वे आत्माएं शीघ्र ही स्वर्ग में परम शांति प्राप्त कर सकें.       सुबह से ही चर्चों में विशेष पवित्र मिस्सा आयोजित किए जाते हैं, जहां श्रद्धालु परिवारजन अपने मृत परिजनों के नाम लेकर उनके लिए प्रार्थना करते हैं. प्रार्थना के पश्चात, लोग कब्रिस्तान जाकर कब्रों को फूलों से सजाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, और मौन साधकर अपने प्रियजनों क...

पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर

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  सभी संतों को नमन पटना.सभी संतों को नमन: पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर — यह तिथि केवल ईसाई कैलेंडर का एक दिन नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और मानवता की महानता का उत्सव है.इस दिन विश्व भर का ईसाई समुदाय ऑल सेंट्स डे या सर्व संतों का पर्व मनाता है — एक ऐसा अवसर, जब वे उन सभी संतों को स्मरण करते हैं जिन्होंने अपने जीवन को ईश्वर और मानवता की सेवा में अर्पित किया.     इतिहास की पवित्र गूंज इस परंपरा की जड़ें 609 ईस्वी में मिलते हैं, जब पोप बोनिफेस चतुर्थ ने रोम के प्रसिद्ध पैंथियन मंदिर को एक ईसाई चर्च में रूपांतरित कर दिया. इसे उन्होंने सेंट मैरी एंड द मार्टियर्स (सेंट मैरी और शहीदों का चर्च) के नाम से समर्पित किया.दो शताब्दियों बाद, 837 ईस्वी में पोप ग्रेगरी चतुर्थ ने इस पर्व को नवंबर में स्थानांतरित किया. तब से यह दिन न केवल पश्चिमी ईसाई जगत में, बल्कि विश्व के हर कोने में श्रद्धा और विनम्रता के साथ मनाया जाता है.     संतत्व का अर्थ ईसाई परंपरा में “संत” वह नहीं जो केवल मठों में तपस्या करता है, बल्कि वह भी है जो जीवन की कठोर वास्तविकताओं में भी करुणा और स...

"देश के गरीब और वंचित वर्गों को आत्मसम्मान और अधिकार की भावना दी"

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 *स्व. इंदिरा गांधी और सरदार पटेल को कांग्रेस ने किया याद   पटना .आज बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम में भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी की 41वीं पुण्यतिथि पर उनकी प्रतिमा पर एवं भारत के लौह पुरुष, पूर्व गृह व रक्षा मंत्री स्व. सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती के अवसर पर उनके तैल चित्र पर माल्यार्पण किया गया.      इस अवसर पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  ने इंदिरा गांधी जी के राष्ट्र निर्माण में योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने अदम्य साहस, निर्णायक नेतृत्व और भारत की एकता-अखंडता की रक्षा के लिए जो योगदान दिया, वह सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी जी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर देश के गरीब और वंचित वर्गों को आत्मसम्मान और अधिकार की भावना दी.      अशोक गहलोत  ने साथ ही सरदार वल्लभभाई पटेल जी की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए कहा कि लौह पुरुष पटेल ने अपने अद्भुत संगठन कौशल और दृढ़ संकल्प के बल पर 562 रियासतों का एकीकरण कर भारत की एकता की नींव रखी। उनके...

मोकामा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

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 पटना.मोकामा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ बाहुबलियों के प्रभाव के लिए जानी जाती है. बाहुबली नेता अनंत सिंह यहां से कई बार विधायक रह चुके हैं. गंगा नदी के दक्षिण में बसे इस क्षेत्र में घोसवरी, मोकामा और पंडारक प्रखंड के कुछ गांव शामिल हैं. आगामी 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा सीट पर कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है, क्योंकि जातीय समीकरण और बाहुबली प्रभाव इस क्षेत्र की राजनीति को आकार देते हैं.             बिहार में चुनाव हो रहा है.कुल 243 सीटों पर चुनाव होना है.चुनाव दो चरणों में होना है.पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा 11 नवंबर हो है.चुनाव परिणाम 14 नवंबर को आएगा.बिहार के लोगों की नजर मोकामा विधानसभा पर जा ठीक गयी है.भूमिहार बहुल मोकामा विधानसभा सीट पर इस बार दो बाहुबलियों की भिड़ंत होने वाली है. मोकामा के छोटे सरकार जदयू से चुनाव लड़ रहे हैं, तो सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी ने राजद के टिकट पर परचा भर दिया है. चुनाव भले वीणा लड़ रहीं हों, लेकिन मुकाबला अनंत सिंह बनाम सूरजभान सिंह ही बताया जा रहा है.अब दोनों बाहुबलि पसंद नहीं करते ...

इस त्याग ने बेटी को यह सोचने पर विवश किया

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  त्याग और अनुशासन का मौन स्तंभ पटना.1909 में जब सोनोरा स्मार्ट डोड ने मदर्स डे पर एक उपदेश सुना, तो उनके मन में यह प्रश्न उठा कि पिताओं के लिए भी कोई दिन क्यों न हो? माँ के प्रेम की तरह पिता का समर्पण भी तो समान रूप से आदरणीय है। इसी भाव से उन्होंने फादर्स डे की नींव रखी।उनकी प्रेरणा के केंद्र में उनके अपने पिता विलियम जैक्सन स्मार्ट थे — गृह युद्ध के एक सैनिक, जिन्होंने पत्नी के निधन के बाद छह बच्चों का पालन-पोषण अकेले किया.     इस त्याग ने बेटी को यह सोचने पर विवश किया कि पिता के मौन संघर्ष को भी समाज की मान्यता मिलनी चाहिए।उनके अथक प्रयासों का परिणाम था — 19 जून 1910, जब स्पोकेन, वाशिंगटन में पहला फादर्स डे मनाया गया. लेकिन इसे आधिकारिक मान्यता मिलने में लंबा समय लगा. अंततः 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे अमेरिका का राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया.आज भारत सहित अनेक देशों में यह पर्व जून के तीसरे रविवार को मनाया जाता है. 2025 में यह दिन 15 जून को पड़ा.वहीं, कुछ यूरोपीय देशों में इसे 19 मार्च को मनाने की परंपरा है.      हाल में कलकत्ता महाधर्मप्रांत म...

ढोरी माता तीर्थालय में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, प्रेम और एकता का संदेश

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  ढोरी माता तीर्थालय में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, प्रेम और एकता का संदेश जारंगडीह.झारखंड के जारंगडीह स्थित ढोरी माता तीर्थालय में 69वां वार्षिक समारोह बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ. रांची महाधर्मप्रांत के अंतर्गत आने वाले गुमला धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष बिशप लिनुस पिंगल एक्का इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे. उनके साथ हजारीबाग धर्मप्रांत के बिशप आनंद जोजो भी उपस्थित रहे.     समारोह की शुरुआत अतिथि धर्माध्यक्ष के पादुका छाजन और भक्ति गीतों के साथ हुई. प्रवेश गान, नृत्य, दया याचना, महिमा गान, बाइबल जुलूस, चढ़ावा और स्तुति गान जैसे भक्ति गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ संत एंथोनी और कार्मेल स्कूल, करगली की छात्राओं एवं धर्म बहनों द्वारा दी गईं.    मुख्य याजक के रूप में बिशप लिनुस पिंगल एक्का तथा धर्माध्यक्ष आनंद जोजो के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा समारोह का आयोजन किया गया. देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने इसमें भाग लिया और ढोरी माता के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की.धर्माध्यक्षों ने अपने प्रवचन में प्रेम, सेवा और सामाजिक एकता पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि “ढोरी...

राजनीति में बाहुबल और जनाधार

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मोकामा विधानसभा : बाहुबलियों की परंपरा, जनता की परीक्षा पटना.बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही एक बार फिर मोकामा सीट सुर्खियों में है. 243 सीटों वाले इस राज्य में दो चरणों में चुनाव होने हैं — पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा 11 नवंबर को, जबकि परिणाम 14 नवंबर को घोषित किए जाएंगे. लेकिन बिहार की निगाहें मोकामा पर टिकी हैं, जहाँ राजनीति, जातीय समीकरण और बाहुबल का अनोखा संगम देखने को मिलता है.गंगा नदी के दक्षिण तट पर स्थित मोकामा क्षेत्र में घोसवरी, मोकामा और पंडारक प्रखंड के कुछ गांव शामिल हैं. यह सीट अपने इतिहास और बाहुबली नेताओं के प्रभाव के लिए प्रसिद्ध रही है. यहाँ की राजनीति में बाहुबल और जनाधार का अद्भुत संतुलन हमेशा चर्चा में रहा है.         बाहुबलियों की परंपरा और मुकाबले की विरासत मोकामा का नाम आते ही अनंत सिंह उर्फ "छोटे सरकार" की याद आती है. यह सीट लंबे समय से उनके नाम से जुड़ी रही है. लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में हालात पहले जैसे नहीं हैं.इस बार मैदान में दो बाहुबलियों का आमना-सामना होने जा रहा है — एक ओर जदयू के उम्मीदवार अनंत सिंह, तो दूसरी ओर राजद से सूर...