जेल के दिनों ने उनके शरीर पर गहरी चोट
पटना.उत्तरी भारत के एक छोटे से गाँव में 45 वर्षीय शीला देवी की कहानी आज भी सवालों से भरे हमारे समय का आईना है. मसीही विश्वास का पालन करते हुए अपने घर में एक छोटी-सी मंडली चलाने की वजह से उन्हें लगभग तीन महीने जेल में रहना पड़ा.आरोप था—धर्म परिवर्तन कानून का उल्लंघन.बीमारी के चलते ज़मानत मिली, पर जेल के दिनों ने उनके शरीर पर गहरी चोट छोड़ी; बाद में कैंसर का पता चला. पिछले दो वर्षों से शीला अपने घर में प्रार्थना सभाएँ आयोजित कर रही थीं. यह पहल उनके लिए सेवा थी, पर गाँव के कुछ लोगों के लिए असहजता. विरोध बढ़ा, शिकायत हुई और 20 जुलाई की रविवार आराधना के दौरान पुलिस ने घर में प्रवेश कर पूछताछ की. बाइबिल, क्रॉस, भजन की किताबें, दीवार पर टंगा दस आज्ञाओं का पोस्टर, एम्प्लीफायर—सब ज़ब्त कर लिया गया. यहाँ तक कि उनका मोबाइल फ़ोन भी, जो उनके लिए परमेश्वर के वचन से जुड़े रहने का माध्यम था. शीला का कहना है कि वे सभाएँ बंद नहीं कर सकती थीं. उनका विश्वास था कि ये मुलाक़ातें लोगों को शांति और चंगाई देती हैं—बीमारी और अकेलेपन के बीच आशा का सहारा बनती हैं. इसी दृढ़ता की कीमत उन्हें कैद के रूप में चु...